पर्यावरण और मानव समाज

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पर्यावरण विज्ञान उच्चतर माध्यमिक पाठ्यक्रम

मानव जाति (होमो सेपिएंस) का उद्भव लगभग पच्चीस लाख वर्षों से भी अधिक समय पूर्व हुआ था। उनमें मस्तिष्क अत्यंत विकसित होने के कारण वे सोचने की क्षमता रखते थे और अपने निर्णयों का उपयोग करते थे। मानव ने दो पैरों पर सीधे खड़े होकर चलना शुरू किया जिसके कारण उनके हाथ अपने शारीरिक कार्य करने के लिये स्वतंत्र हो गये।

दूसरे जन्तुओं की तरह मनुष्य भी अपने जीवन के निर्वाह के लिये पूरी तरह से भोजन के लिये पर्यावरण पर निर्भर था। बुद्धिमान होने के कारण मनुष्य ने पर्यावरणीय संसाधनों को न केवल भोजन के लिये बल्कि दूसरे कार्यों को करने के लिये भी खोजना शुरू किया। पिछली कुछ शताब्दियों में पर्यावरण का दोहन नाटकीय ढंग से इतना बढ़ गया है कि पर्यावरण के गम्भीर रूप से नष्ट होने तथा विघटित होने का खतरा बढ़ गया है। इस पाठ में आप प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और दोहन के बारे में जानने के साथ-साथ यह भी जानेंगे कि इनका अत्यधिक दोहन कैसे किया जा रहा है।

उद्देश्य


इस पाठ के अध्ययन के समापन के पश्चात, आपः

- पर्यावरण से प्राप्त होने वाले प्राकृतिक संसाधनों की सूची बना सकेंगे;
- आदिम समाज और पर्यावरण का भोजन संग्रहण, उसका शिकार करने और खानाबदोश जीवन के संदर्भ में परस्पर सम्बन्धों का वर्णन कर सकेंगे;
- आदिम मानव द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले औजारों और आग की खोज का वर्णन कर सकेंगे;
- व्यवस्थित रूप में रहने की शुरुआत कैसे हुई, व्याख्या कर सकेंगे;
- कृषि के उद्भव और विकास के साथ-साथ पशुपालन के बारे में वर्णन कर सकेंगे;
- पहिये के आविष्कार का महत्त्व बता सकेंगे;
- औद्योगिकीकरण कैसे आरम्भ हुआ, व्याख्या कर सकेंगे;
- औद्योगिकीकरण की वृद्धि को बढ़ावा देने वाले कारणों की पहचान कर सकेंगे;
- प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कैसे आरम्भ हुआ, इसकी व्याख्या कर सकेंगे।

2.1 पर्यावरण में प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता


आदिम मानव अपने जीवन निर्वाह के लिये पर्यावरण पर निर्भर था। मानव जब और अधिक सभ्य होता गया, तब अपने जीवन को आरामदायक बनाने के लिये पर्यावरणीय संसाधनों का उपयोग करता था और विभिन्न पर्यावरणीय खतरों से अपने को बचाने के लिये उनका विभिन्न प्रकार से उपयोग करता था।

2.1.1 अजैविक संसाधन


अजैविक संसाधन वस्तुतः प्रकृति के भौतिक संसाधन होते हैं जिनका वर्णन नीचे किया गया है-

क. भूमिः विभिन्न जीव जिनमें मनुष्य भी शामिल है, पृथ्वी पर रहते हैं। पृथ्वी की सतह का लगभग 29% भाग भूमि है जिसमें पर्वत, चट्टानें, मरुस्थल, दलदल, वन और घास के मैदान शामिल हैं। मनुष्य भूमि का उपयोग फसल उगाने के लिये करता है जिससे उसको भोजन प्राप्त होता है। उनको भूमि की आवश्यकता रहने के लिये मकान बनाने, सड़कें, तथा पशुशाला बनाने के लिये भी पड़ती है। बढ़ती हुई जनसंख्या की जरूरतों को पूरी करने के लिये, शहरीकरण और औद्योगीकरण, बांध बनाने, फ्लाई ओवर, भूमिगत पारपथ और फैक्ट्रियों के निर्माण के लिये भी भूमि की जरूरत होती है। भूमि संसाधनों का तीव्र गति से ह्रास हो रहा है।

ख. जलः प्राकृतिक जलस्रोत जिनमें महासागर और समुद्र तथा सतही जलस्रोत जैसे नदियाँ, झील, झरने और तालाब आदि आते हैं। पृथ्वी पर पाये जाने वाले अलवणीय जल का लगभग 80% भाग ऊँचे अक्षांशों और पहाड़ों की चोटियों पर बर्फ के रूप में जमा रहता है। केवल 20% भाग ही द्रव अवस्था में उपलब्ध होता है। पृथ्वी पर जल का प्राथमिक स्रोत वर्षा है। सभी जीवधारियों के लिये पानी अत्यंत आवश्यक है। पानी की आवश्यकता-

- कृषि (खेतीबारी) फसलों की सिंचाई
- उद्योगों में
- इमारतों के निर्माण में
- मछली, झींगा, जलीय पौधों (ऐक्वाकल्चर) के संवर्धन और
- पीने, नहाने, धोने, सफाई, बागवानी, मिट्टी के बर्तन बनाने आदि के लिये आवश्यक होता है।

यद्यपि जल कभी खत्म न होने वाला प्राकृतिक संसाधन है फिर भी इसके अत्यधिक प्रयोग और पानी को व्यर्थ करना इसकी कमी की तरफ इशारा करता है।

ग. ऊर्जाः ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत सौर विकिरण है। आदि मानव ईंधन तथा गोबर और जन्तुओं के अपशिष्टों का प्रयोग गर्माहट तथा खाना पकाने के लिये करता था। गुफाओं और अपनी झोपड़ी में रोशनी करने के लिये, बीज से निष्कासित तेल और मछलियों का उपयोग करते थे। ऊर्जा का दूसरा मुख्य जीवाश्मीय ईंधन के स्रोत का उदाहरण है कोयला। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि कोयला लाखों वर्ष पूर्व पायी जाने वाली वनस्पति से निर्मित हुआ है जो तलछटों में गिर गये थे और उसमें दब गये थे। अत्यधिक दबाव के चलते और वर्षों तक प्रचण्ड गर्मी के कारण ये वृक्ष और अन्य वनस्पतिक अवसादों में दबकर कोयले के रूप में परिवर्तित हो गयी। कोयले का उपयोग खाना पकाने, इंजनों को चलाने, उद्योगों में काम आने वाली भट्टियों और बिजली उत्पन्न करने में किया जाता है। कोयले का प्रयोग धातुओं और खनिजों के निष्कर्षण के लिये भी किया जाता है साथ ही तापीय ऊर्जा उत्पादन में भी करते हैं।

घ. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस भी जीवाश्मीय ईंधन है। पेट्रोलियम संभवतः जलीय जीवों जो पिछले भूवैज्ञानिक काल के दौरान पाये जाते हैं, से हुआ है। ठीक उसी तरह जैसे वनस्पतियों से कोयले का निर्माण हुआ था। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस पृथ्वी के अत्यंत भीतरी भाग से प्राप्त किये जाते हैं और ऊर्जा के ये संसाधन अनवीकरणीय हैं (अर्थात पुनःनिर्माण नहीं किया जा सकता है)। पेट्रोलियम उत्पादों का उपयोग वाहनों के चलाने, स्टीमर, हवाई जहाज और प्लास्टिक और उर्वरकों के बनाने में किया जाता है। पेट्रोल और डीजल परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद हैं। आपने शायद सीएनजी (संपीड़ित प्राकृतिक गैस) के बारे में सुना होगा जिसे आजकल वाहनों को चलाने के लिये प्रयोग में लाया जा रहा है और इसे एक स्वच्छ ईंधन माना जा रहा है। प्राकृतिक गैस और डीजल का प्रयोग विद्युत उत्पादन में किया जाता है। एल-पी-जी- (द्रवीय पेट्रोलियम गैस) को सिलिंडरों या पाइप लाइन के द्वारा लाया जाता है और खाना पकाने के ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है।

 

पेट्रोलियम को खनिज तेल भी कहते हैं। पेट्रोलियम के समान प्राकृतिक गैस भी गैसीय हाइड्रोकार्बनों का ही एक मिश्रण होती है।

 

ऊर्जा अन्य स्रोतों जैसे सूर्य (सौर ऊर्जा), पवन (पवन ऊर्जा), जीव अपशिष्ट (बायोगैस), समुद्र (ज्वारीय ऊर्जा) और रेडियोऐक्टिव खनिज (नाभिकीय ऊर्जा) से भी प्राप्त की जाती है।

ड. खनिज अयस्क या खनिजः खनिज अयस्क धातुओं के रासायनिक यौगिक होते हैं जैसे एल्युमिनियम, आयरन (लौह), कॉपर (तांबा), जिंक, मैग्नीज इत्यादि। ये सभी अयस्क पृथ्वी में एक संचित भंडार के रूप में पाये जाते हैं। एल्यूमिनियम का उपयोग बर्तन, वाहनों के विभिन्न भागों, हवाई जहाज और अंतरिक्ष यान बनाने में करते हैं। आयरन और उसके सम्मिश्रण का उपयोग हथियार, भारी मशीनरी, रेल-इंजन, रेल-पटरियां और दूसरी अन्य वस्तुएँ बनायी जाती हैं। कॉपर का उपयोग औद्योगिक पात्र, इलेक्ट्रिक तार बनाने के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक और दूरसंचार उद्योग में भी किया जाता है। सम्मिश्र धातुएँ जैसे पीतल और कांसे में भी कॉपर पाया जाता है। जबकि सभी धातु अयस्क सीमित मात्रा में ही उपलब्ध है और अत्यधिक खनन करने के कारण ये धातु अयस्क अतिशीघ्रता से खत्म होते जा रहे हैं। चांदी, सोना और प्लेटिनम जैसी बहुमूल्य धातुएँ भी हमारे बीच में पायी जाती हैं और जिसे मनुष्य एक बहुमूल्य खजाना मानता है।

2.1.2 जैविक संसाधन (जीवित प्राकृतिक संसाधन)


जैविक संसाधनः इसके अन्तर्गत पौधे, जन्तु और सूक्ष्मजीव आते हैं।

क. पौधेः मनुष्य के भोजन में प्राकृतिक खाद्य स्रोतों में विभिन्न प्रकार के अनाज, फलियां, सब्जियाँ और फल शामिल किये जाते हैं। मनुष्य अच्छी किस्म के अनाज, दालें, मसाले, सब्जियाँ, फल, चीनी और तेल प्राप्त करने के लिये पौधों को उगाता है। रेशा प्रदान करने वाले पौधे के उगाने से मनुष्य को कपास, जूट और पटसन इत्यादि प्राप्त होते हैं। फूलों की विभिन्न किस्मों को सजावटी कामों के लिये उगाया जाता है। कुछ पौधों में औषधीय गुण पाये जाते हैं जिसके कारण उनका उपयोग अविस्मरणीय होता है। औद्योगिक कच्चा माल जैसे रबर, रेजिन, लकड़ी अद्वितीय पादप उत्पाद हैं।

ख. जन्तुः बकरी, मछली, अण्डे, मुर्गियां, झींगे और केकड़े आदि मनुष्य के भोजन के विभिन्न स्रोत हैं। घोड़े, बैल, हाथी, गाय-बैल, ऊँट, खच्चर, याक आदि जंतुओं को परिवहन के लिये भार वाहक पशुओं के रूप में प्रयोग किया जाता है। याक और भेड़ों से ऊनी कपड़ों के लिये ऊन प्राप्त होती है। रेशम-कीटों को रेशम प्राप्त करने के लिये पाला जाता है।

ग. सूक्ष्म जीवः सूक्ष्मजीव एंटीबायोटिक्स (प्रतिजैविकी औषधियां) प्रदान करते हैं। प्राचीन काल से ही इनका उपयोग किण्वन प्रक्रिया और शराब बनाने के लिये किया जाता है। सूक्ष्म जीव अपशिष्टों तथा मृत पौधे और जंतुओं के विघटन के लिये भी मुख्य भूमिका निभाते हैं।

 

पर्यावरण संसाधन मनुष्य, जीवित रहने के लिये पदार्थ, मनोरंजन, रख-रखाव, सजावट तथा दूसरी अन्य वस्तुओं को देता है। लेकिन ये सब कब तक चलेगा।

 

एक तरफ तो प्राकृतिक संसाधन तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं क्योंकि इनका अति दोहन मनुष्यों द्वारा किया जा रहा है और दूसरी तरफ पृथ्वी बढ़ती हुई जनसंख्या की क्रियाकलापों के कारण अपशिष्ट पदार्थों को उत्पन्न करने वाली एक बड़ी सी कूड़ा एकत्र करने वाला मैदान बनती जा रही है। यह सब इतनी तेजी से हो रहा है कि जिसके कारण मानव, जन्तु और पौधे का जीवन भी बिगड़ता जा रहा है।

पाठगत प्रश्न 2.1


1. उन दो प्राकृतिक स्रोतों के नाम बताइये जिसके बिना जीवन संभव नहीं है।
2. प्रत्येक के दो उपयोग बताइये-
(i) पृथ्वी और (ii) मानव द्वारा उपयोग की जाने वाली धातुएँ
3. मानव के काम आने वाले पशुओं के दो उपयोग बताइये।

2.2 आदिम-समाज और पर्यावरण के बीच पारस्परिक सम्बन्ध


इस पृथ्वी पर मानव लगभग 2 लाख वर्ष से भी अधिक समय से रह रहा है। आदिम मानव के अभिलेख और उनके वे क्रियाकलाप जो उनके जीवाश्मों के साथ चट्टानों में दबे हुए हैं। जीवाश्मों के अभिलेख न केवल मानव विकास की विभिन्न अवस्थाओं को प्रदर्शित करते हैं बल्कि आदिम मानव की जीवनचर्या और उनके व्यवहार के बारे में भी जानकारी देते हैं।

2.2.1 मानव विकास की कहानी


जब मानव विकास का आरम्भ हुआ तब जंगल कम होने लगे क्योंकि हिमनद होने से ऐसा हुआ। आज तक भूमि का अधिकतर भाग वनों द्वारा ढका हुआ हैं। कपियों और मनुष्यों के निकटतम पूर्वज पेड़ों से नीचे उतर आये जहाँ पर वे रहते थे। वे सभी भूमि पर चारों पादों का उपयोग कर जमीन पर चलते थे। आधुनिक आण्विक अध्ययन ये दर्शाते हैं कि निकटतम पूर्वजों से कपियों का विकास (चिम्पैंजी, गौरिल्ला, गिबन और ओरंगउटान) और उसके बाद मनुष्यों का उद्भव लगभग 6 लाख वर्ष पूर्व हुआ था।

सबसे प्राचीन मानव पूर्वज आस्ट्रेलोपिथेकस (Australopithecines) जो सीधे खड़े होकर चलते थे, दक्षिण अफ्रीका में लगभग 3.5 लाख वर्ष पूर्व विकसित हुए थे। वे अपने औजार विभिन्न प्रकार के पदार्थों से बनाते थे।

मानव जाति की विकासीय अवस्थाओं के चित्रआस्ट्रेलोपिथेकस से शायद लगभग 2 लाख वर्ष पूर्व होमो हैबीलिस का विकास हुआ। इन मानव पूर्वजों के कपियों जैसे लंबी भुजाएँ थी परन्तु इनका मस्तिष्क कपियों के मस्तिष्क से काफी बड़ा था। इनकी अगली अवस्था होमो इरेक्टस (Home erectus) थी जो लगभग 1.5 से 2 लाख वर्ष पूर्व रहते थे। इनके जीवाश्म चीन (पीकिंग मानव), जावा (जावा मानव), जर्मनी (हेडलवर्ग मानव) से मिलें हैं। इससे यह जाना जाता है कि इनका विकास अफ्रीका में हुआ पर बाद में ये एशिया और यूरोप में बस गये थे। इनके मस्तिष्क का आकार कपि और मानवों के मस्तिष्क के मध्य में था। कपियों की तरह की उनकी आँखों के ऊपर बड़े-बड़े उभार भी थे। होमो इरेक्टस पत्थर की कुल्हाड़ी बनायी थी।

होमो इरेक्टस के बाद विकसित होने वाले निएन्डरथल मानव (होमो सेपियन्स निएन्डरटलैन्सिस) थे जो उसी जाति से सम्बन्धित थे, जिससे आधुनिक मानव होमो सेपियंस (Homo sapiens) सम्बन्धित है। निएन्डरथल मानव के अवशेष यूरोप, एशिया और अफ्रीका में पाये जाते हैं। उन्होंने बहुत से किस्मों के अच्छे औजार तैयार किये और वे बहुत अच्छे शिकारी थे। करीब 35000 वर्षों से होमो सेपियंस या आधुनिक मानव ही एकमात्र जीवित मानव प्रजाति है (होमोः फैमिली होमिलिडी से सम्बन्धित है, सेपियंस: बुद्धिमान)

विभिन्न मानव स्पीशीजों का विकास जिसमें वह पूर्वज भी दर्शाया गया है जिससे कप और मानव दोनों का विकास हुआ।

2.2.2 आदिम मानव जैसे शिकारी- संग्राहक और खानाबदोश


आदिम मानव जंगलों, जलस्रोतों जैसे नदी और झीलों जो जंगल के किनारों पर होते थे, के पास रहा करता था। उनका प्रमुख कार्य भोजन एकत्र करना था। उनके भोजन में पौधों से प्राप्त बीज, जड़ें तथा फल और छोटे जानवर जिन्हें वह उन औजारों से मारता था जिन्हें रोड़े और पत्थरों से बनाया जाता था। वे दिन भर भोजन की तलाश में जंगल में घूमते फिरते थे और सूर्यास्त के समय अपनी गुफाओं में जंगली जानवरों के आक्रमण से बचने के लिये वापस लौट आते थे।

पिछले पैरों पर चलने के कारण आदिम मानव के हाथ अन्य काम को करने के लिये स्वतंत्र थे-

- खाद्य जड़ों को उखाड़ने;
- फल और सब्जियों को तोड़ने;
- नदियों के किनारों से रोड़ी उठाने में तथा दूसरे स्थानों से पत्थर एकत्र करने में; और
- उनसे औजार बनाने में;
- जानवरों का शिकार करने, उनकी खाल अलग करने और तब उनको खाने के लिये।

इस प्रकार आदिमानव शिकारी और संग्राहक थे। वे 20 से 30 लोगों के समूह में रहते थे और पौधों से प्राप्त भोजन को एकत्र करते थे, वे पक्षियों के अंडे एकत्र करते थे और मछलियाँ पकड़ते थे। औरतें छोटे जानवरों का शिकार तथा पेड़ों से फल और बीज एकत्र करने का काम करती थी।

आदमी बड़े जानवरों का शिकार करते थे। आदिम मानव कछुए, ऑयस्टर तथा सीप भी खाते थे। ये सभी तथ्य यह दर्शाते हैं कि आदिम मानव अपना भोजन बाँटकर खाते थे और खाद्य पौधों, फलों के पकने का समय, जानवरों की मांद तथा जंगली जानवरों के पकड़ने से सम्बन्धित जानकारियाँ भी एकत्र करते थे।

आदिम मानव, जो शिकारी और संग्राहक, एक स्थान से दूसरे स्थान पर रसद एकत्र करने के लिये घूमते थे। वे खानाबदोश का जीवन जीते थे। खानाबदोश जैसे वे बड़े और दूरस्थ क्षेत्रों में घूमते रहते थे। उनका कोई भी स्थायी ठिकाना नहीं था। वे नदी किनारे रहते हैं जहाँ पौधे और जन्तु बहुतायत से पाये जाते हैं। वे गुफाओं में भी रहते थे। जब वे जहाँ से जाते हैं वहाँ अपने पीछे पत्थर और हड्डियों के औजार छोड़ जाते थे।

पाठगत प्रश्न 2.2


1. मानव विकास की प्रथम अवस्था का नाम लिखिए।
2. आधुनिक मानव की उत्पत्ति कब हुई?
3. शिकारी और संग्राहक से आप क्या समझते हैं? एक वाक्य में उत्तर दीजिए।
4. आदिम मानव कहाँ पर रहते थे?
5. आदिम मानव के दो पैर पर चलने में समर्थ होने से लाभ बताइये।

2.3 आदिम मानव द्वारा तैयार किये गये औजार और अग्नि की खोज


पौधों से भोजन एकत्र करने और जानवरों के शिकार करने का काम, विभिन्न प्रकार के औजार बनाने के लिये प्रेरित करते थे। यहाँ पर आशय है कि आस्ट्रेलोपिथैकस संभवतः औजारों का उपयोग (i) जंगली जानवरों को भगाने और (ii) भोजन के लिये जानवरों का शिकार करने के लिये करते थे। अफ्रीका में आस्ट्रेलोपिथैकस के जीवाश्मों वाली जगह से पत्थर के औजार पाये गये हैं।

होमो इरेक्टस ने पत्थर से कठोर औजार बनाये और औजार बनाने की परम्परा को होमो सेपियन्स निएन्डेरटेलैन्सिस या निएन्डरथल मानव के साथ-साथ होमो सेपियन्स या आधुनिक मानव को भी सौंप दिया। होमो इरेक्टस के द्वारा बनाए गए औजार चकमक पत्थर के बने थे और जो चट्टानें उन्होंने इन औजारों को बनाने के लिये प्रयुक्त की थी वे क्वार्टज, क्वार्टजाइट तथा अन्य ज्वालामुखीय चट्टानें थी।

पत्थर से बनी हत्था लगी कुल्हाड़ी जो होमो इरेक्टस ने बनायी थी, उसके सिरे पैने थे। पैना करने के लिये उन्होंने हड्डी या सख्त लकड़ी के एक टुकड़े को ठोक पीटकर तैयार किया था। ये औजार आस्ट्रेलोपिथैकस और होमो हैबीलिस (Homo habilis) द्वारा बनाए गए पत्थरों के औजारों की तुलना में ज्यादा बेहतर थे, और आसानी से पौधों की खाने योग्य जड़ों तथा अन्य भागों को जमीन से उखाड़ डालते थे। इनके पैने सिरे शिकार किये गये जानवरों को काट सकते थे और उनकी खाल निकालने में मदद करते थे। उनके द्वारा बनाए गए लकड़ी के भालों और हड्डियों से बने भालों से वह बड़े जानवरों जैसे हाथी, घोड़े, गैंडे और विशाल बबूनों का शिकार करने में मदद मिलती थी।

- निएन्डरथलों के औजार


निएन्डरथल मानव द्वारा औजार बनाने की तकनीक और उनके द्वारा बनाये गये औजार अधिक बेहतर किस्म के थे। चकमक पत्थर से पत्रक निकालकर ठोक पीटकर औजार बनाने की कला वे पहले से ही जानते थे और वे मृगभ्रंग, हड्डी, लकड़ी का हथौड़ा और पत्थर के हथौड़े जिन्हें वे चट्टान से एक-जैसे पत्रक निकालकर उपयोग में लाते थे।

वे चाकू, पिन, मछली पकड़ने के हुक और सुइयां और हड्डियों से बने हारपून भी बनाते थे। निएन्डरथल अपने पूर्वजों की भांति मिलजुल कर शिकार करते थे और बड़े-बड़े जानवरों जैसे हाथी गैंडो, बाइसन (जंगली भैंसों), जंगली घोड़े, भालू, जंगली बिल्लियों और जंगली सूअरों का शिकार करते थे। इन्हें वे बड़ा शिकार कहते थे। इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि वे भाले की शक्ल के औजारों का उपयोग करते थे ताकि दूर से ही जानवरों का शिकार कर सकें।

आदिम मानव द्वारा बनाये गये औजारों नियोलिथिक या नवपाषाणी युग का परिचायक थे। ये औजार काफी भव्य और पॉलिश किये हुए थे लेकिन उनका उपयोग खत्म होने पर मानव ने ‘‘कृषि-युग’’ में अपना कदम रखा।

आदिम मानव द्वारा बनाये गये हथियार

- आग का प्रयोग


आदिम मानव, होमो इरेक्टस ने आग की खोज लगभग 2 लाख वर्ष पूर्व की थी। आग की खोज का उनकी जीवन शैली पर एक गहरा प्रभाव पड़ा। आदिम मानव विभिन्न कार्यों के लिये आग का प्रयोग करते थे।

उन्हें यह महसूस हुआ कि आग उनको पृथ्वी के ठंडे भागों में बस्ती बनाने में सक्षम थी और मांस जब आग में भूना जाता था, स्वादिष्ट हो जाता था, इससे यह अधिक पचने योग्य बन जाता था। आग का उपयोग खतरनाक जानवरों को अपने से दूर भगाने में भी होता था।

आग ने मानवों के सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को भी बढ़ाया था।

पाठगत प्रश्न 2.3


1. आदिम मानव ने अपने हथियार किस चीज से बनाये थे?
2. इन औजारों के दो उपयोग बताइये।
3. आदिम मानव द्वारा आग के दो उपयोग बताइये।

2.4 आवासी जीवन का आरंभ


‘‘शिकारी और संग्राहकों’’ ने अंततः खानाबदोश जीवन को छोड़ने की शुरुआत की। इस समय तक वे शायद रसद खोजने वाले (भोजन की तलाश में) दुनियाँ के बहुत से भागों में जाकर बस गये। उनके अस्थायी आवास जैसा आपको पता है, पर्वतों की गुफायें थी।

एक पुरातात्विक अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि रसद खोजने वाले अस्थायी अंडाकार झोपड़ी जैसे आश्रय में रहते थे, जो वे अक्सर पौधों से ढककर बनाया करते थे।

आदिम मानवों (जानवरों की खाल के वस्त्र पहने हुए) के आवासएक बार औजारों में सुधार होने, आग की खोज करने तथा खेती आरंभ करने से मानव ने आबादी में रहना शुरू कर दिया। वे अपने लिये आवास बनाते थे और समूहों में रहते थे।

2.5 कृषि का उद्भव विकास और पशुपालन


आप पहले जान चुके हैं कि आदिम मानव का जीवन भोजन की उपलब्धता पर ही प्रधानतः से निर्भर था। उनका एक छोटा-सा परिवार हुआ करता था जिसमें बच्चे और नाती-पोते भी शामिल होते थे। वे जंगलों में भोजन की खोज में घूमा करते थे और गुफाओं में रहते थे। शिकारी मनुष्य, शिकार का पीछा करने और शिकार करने के लिये अपने भाग्य के ऊपर निर्भर था और जानवरों की बहुतायत पर भी।

जैसे ही मनुष्य ने अस्थायी आश्रय बनाए और 3-4 महीनों तक एक साथ एक ही स्थान पर रहना प्रारम्भ किया, उन्होंने फलों के बीजों और अनाज के दानों को अपने घर के सामने फेंक दिया और उनमें से नई पौध निकलनी शुरू हो गयी। समझदार तो थे ही वे, उन्होंने महसूस किया कि रसद खोजने के बजाय वे अपने लिये भोजन उगा सकते हैं। लगभग 12000 वर्ष पूर्व मानव ने फसल उगाना सीखा था। भोजन उगाने के कारण जानवर भी आकर्षित होंगे जिनको वे अपने खाने के लिये पकड़ सकेंगे। सतत रूप से भोजन प्राप्त करने के लिये कृषि का विचार आया और स्थायी भोजन प्राप्ति का विचार अपेक्षाकृत रूप से इतना प्रभावी हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि लगभग 10,000 वर्ष पहले उसने एक आदिम कृषि समाज का गठन कर लिया।

जैसे-जैसे समय बीतता गया, मनुष्य ने धातु के औजारों से खेती करना सीख लिया एवं पादप और जन्तु अपशिष्टों को खाद के रूप में प्रयुक्त करने लगे। सबसे पहला पालतू पशु कुत्ता था। वे मछली पालन करते थे। कृषि और पशुपालन में आगे बढ़ते हुए सुधारों को देखते हुए मानव बस्ती का निर्माण नदी किनारों और घाटियों में बनाने की प्रेरणा मिली। इस प्रकार आदिम कृषि व समाज का विकास हुआ और पारम्परिक कृषि करने की शुरूआत हुई।

औद्योगीकरण का प्रारम्भ

पशुपालन


इन आदिम मानवों को खेती के लिये भूमि की आवश्यकता थी और एक स्थान से दूसरे स्थान पर बसने के लिये भी भूमि की आवश्यकता थी। इसलिये इन्होंने बैलों का प्रयोग किया और कुछ अन्य जानवरों जैसे हाथी, ऊंट और बैल इत्यादि को मनुष्यों और उनके सामानों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाने-ले जाने के लिये उपयोग करना शुरू किया। ये जानवर सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने कारण बोझा ढोने वाले (भार वाहक) पशु कहलाये।

आदिम मानव अपने भोजन के लिये बकरी, भेड़, सूअर, हिरन, मुर्गियों जैसे जानवरों को पाला करता था और इनको अपने साथ रखता था।

जैसे ही मनुष्य ने स्थायी रूप से बसना शुरू किया, उनकी जनसंख्या में वृद्धि होने लगी। प्राकृतिक संसाधन समाप्त होने लगे और तब बाहर से वस्तुओं को प्राप्त करने की आवश्यकता पड़ने लगी। वे सांस्कृतिक/सामाजिक रूप से एक कदम आगे बढ़ गये और उनको कपड़ों, आभूषणों और कृषि में काम आने वाले उपकरणों इत्यादि की आवश्यकता होने लगी। वे लोग जो परोक्ष रूप से कृषि कार्य नहीं करते थे वे शिल्पकार बन गये। अतिरिक्त मात्र में उत्पन्न हुए कृषि उत्पाद के बदले अनावश्यक वस्तुओं जैसे मिट्टी के बर्तन, आभूषण इत्यादि को प्राप्त करना आरंभ कर दिया।

स्वयं एवं सामान के परिवहन के लिये जानवरों का प्रयोग करना

2.6 पहिये का आविष्कार


आदिम मानव पहले एक स्थान से दूसरे स्थान पर पैदल आता जाता था। लेकिन पैदल यात्रा करना काफी मंद गति से होता था और समय भी अधिक लगता था इसीलिये आवागमन के लिये वे खच्चर और ऊँटों का प्रयोग करने लगे।

ठीक तरह से कोई भी नहीं जानता है कि पहिये का आविष्कार किसने किया था लेकिन संभवतः 5000 वर्ष पूर्व इराक, सीरिया, टर्की आदि में लोग इनका प्रयोग करते थे। पहला पहिया शायद लट्ठे की गोल स्लाइस जैसा था।

प्रथम पहिये वाला वाहन एक रथ था जिसमें दो पहिये वाली गाड़ी थी, जिसे गधे खींचते थे और बाद में घोड़ों द्वारा खींची जाने लगी। ग्रीक और रोमन इन रथों का उपयोग युद्ध के दौरान भी करते थे।

पहिये की खोज धातुओं के औजार बनाने से भी लगभग 3000 ईसा पूर्व पहले हुई थी। लट्ठों के बने पहिये आदिम काल की गाड़ी में प्रयोग किये जाते थे। लकड़ी के ठोस पहिये का प्रयोग दूसरे कार्यों में भी होता था। उदाहरण के लिये कुम्हार द्वारा लगभग 1000 वर्ष ईसा पूर्व मिट्टी और टेराकोटा के बर्तन बनाने के लिये प्रयोग में लाया जाता था (कुम्हार की चाक)

पहियों का आविष्कारलकड़ी के पहिये भारी होते थे और जब तक धातुओं की खोज की जा चुकी थी, अर वाले (spokes) धातु के पहियों को लकड़ी के पहियों से बदल दिया गया क्योंकि यह बहुत हल्के और मजबूत थे।

पाठगत प्रश्न 2.4


1. पुरातात्विक अध्ययन के अनुसार रसद एकत्र करने वाले कैसे जीवित रहते थे।
2. आदि कृषि समाज कब बना?
3. कौन से जानवर को सर्वप्रथम पालतू बनाया गया?
4. बोझा ढोने वाले तीन जानवरों के नाम बताइये।
5. पहिये का आविष्कार कब और कहाँ हुआ?

2.7 औद्योगीकरण का प्रारम्भ


एक अत्यधिक सुरक्षित भोजन आपूर्ति और भोजन में सुधारों ने कृषि समुदाय को खेती के लिये नई भूमि पर जाने का रास्ता दिखाया। इसका एक कारण जनसंख्या में वास्तविक वृद्धि होना था। कुछ लोग खनिक बन गये। वे चकमक पत्थर का खनन करते और उससे पत्थर की कुल्हाड़ियाँ बनाते थे। इस प्रकार कृषि की वृद्धि के साथ-साथ औजार बनाने की वृद्धि ने अपरिष्कृत कृषिकीय औजार प्रदान किए।

औद्योगीकरण का सबसे पहला संकेत लकड़ी और पत्थर के इंजीनियरों का था जिसे आदिम मानव किया करता था। यह विशिष्ट नहीं था और इसके लिये कड़े परिश्रम की आवश्यकता होती थी। चट्टानों से चकमक पत्थर के निष्कर्षण के लिये खनिक हिरन की सींगों का तथा मवेशियों के कंधों की स्कैपुला अस्थि ‘‘ब्लेड’’ से बने फावड़ों का प्रयोग करते थे। वे काम करते समय रोशनी के लिये छोटी लेम्पों का प्रयोग करते थे जो चाक के खोखले टुकड़ों में जन्तु वसा (Animal Fat) और मांस से बनी बत्ती का प्रयोग करके बनती थी।

औद्योगीकरण का प्रारम्भचकमक कुल्हाड़ियाँ किसान के लिये घने जंगलों को साफ करके अगली फसल उगाने का महत्त्वपूर्ण काम करती थी। पत्थर की कुल्हाड़ियाँ पेड़ों को गिराने के लिये प्रयोग में लाया करते थे।

इस प्रकार, पहिये का बनाना, इमारतों का बनाना, खान से निकाले गये अयस्कों से औजार और आभूषण बनाना औद्योगिकीकरण की दिशा में उठाया गया एक कदम था।

2.7.1 धातु की खोज


मनुष्य ने तांबा, लोहा, कांसा से मजबूत औजार बनाने की खेाज की। यह खोज मानव को पाषाणयुग से निकाल कर ले आयी और यही औद्योगिक क्रांति की शुरुआत मानी गयी।

कुम्हार उच्च तापमान वाली भट्टी का प्रयोग अपने बर्तन पकाने के लिये करते थे। अचानक उन्होंने सोने और तांबे के ढेले को उच्च तापमान पर पिघलते देखा और उसे एक आकार में ढलते देखा। इस प्रकार धातु कर्मी ने खोज की कि चट्टान में दबे हुए अयस्क में से तांबा को निकालने के लिये अत्यधिक ऊष्मा के प्रयोग से अलग किया जा सकता है। इस प्रक्रिया को आजकल ‘प्रगलन’ (smelting) कहते हैं।

लगभग 8000 वर्ष पहले ईरान और तुर्की में धातु के उपयोग की प्रथम खोज हुई। पहले पहल तांबे और सोने का प्रयोग आभूषण बनाने के लिये किया जाता था। 2 हजार वर्षों के बाद मानव ने तांबें से कुल्हाड़ियाँ और पैने सिरे वाले हथियार बनाना शुरू किया। जल्दी ही कर्मियों ने धातुओं को मिलाना शुरू कर दिया और तांबा और टिन को मिलाकर कांसा तैयार किया। इस मिश्र धातु की प्रकृति काफी सख्त थी और इससे आसानी से चाकू और कुल्हाड़ियाँ बनायी जा सकती थी। 2500 ईसा पूर्व तक कांसा एक प्रमुख धातु बन गया।

1000 ईसा पूर्व तक किसानों के पास अच्छी किस्म की कुल्हाड़ियाँ, हसिया और चाकू थे। बढ़ईयों के पास भी अच्छे किस्म के औजार थे।

कांस्य युग से लौह युग तक


7वीं से 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक मानव ने लोहे का प्रयोग हथियार बनाने में शुरू किया और कांसे से भी ज्यादा उत्तम पाया। 1200 ईसा पूर्व तक पश्चिम एशिया (ईरान, तुर्की इत्यादि) कांस्य युग से आगे बढ़कर लौह युग में प्रवेश कर चुके थे। कांसे से बने औजारों को लोहे के औजारों और हथियारों से बदल दिया गया।

2-8 कारक जिनके कारण औद्योगीकरण की वृद्धि हुई


औद्योगिकीकरण की वृद्धि के लिये कुछ कारक उत्तरदायी हैं-
तकनीकी विकासः
धातुओं की खोज से अच्छी किस्म के औजार और हथियारों के निर्माण से तकनीक का आरम्भ हो गया था।

आर्थिक विकासः (i) कृषक समाज के उद्भव से लोग अपने अत्यधिक उत्पादों को बेचने और अदला बदली करने लगे। इससे उनकी आर्थिक दशा सुदृढ़ होने लगी थी।

(ii) कृषक समाज में लोग कृषि के अलावा दूसरे व्यवसायों में लगे हुए थे।

पहिये का आविष्कारः इससे परिवहन की दिशा में तेजी आयी और परिवहन उद्योग की शुरूआत हुयी। काफी लंबे समय पहले लोग बैलगाड़ियों से यात्रा करते थे। आज कार, बस, रेल और इस सबसे भी सामान्य हवाई जहाज अक्सर दिखायी पड़ते हैं।

खनन का आरंभः यह अद्भुत चकमक से संबंधित है। बाद के अयस्कों में तांबा, लोहा और एल्युमिनियम का खनन किया गया। यह खनन उद्योग की विकास प्रक्रिया को दिखाता है। खनिजों को खनन और खनिजीय जीवाश्म ईंधनों जैसे कोयला और प्राकृतिक गैस आज भी सामान्य रूप से प्रयोग किये जाते हैं।

कृषिः कृषि का आरम्भ आदिमानव के समय में हुआ। लेकिन आज कृषि लाखों लोगों के लिये जीविका का एक साधन है। वे भोजन, रेशा और उद्योगों के लिये कच्चा माल उगाते हैं। आधुनिक खेती के तरीकों से लाखों लोगों के लिये भरपूर भोजन उगाया जाता है। कृषि स्वयं में एक उद्योग बन गई है। यह खाद्य उद्योग के विकास को बढ़ावा देता है इसलिये आजकल तैयार किये गये नाश्ते उपलब्ध हैं।

कांस्य युग और लौह युगः कांस्य युग और लौह युग और आग की खोज से बहुत पहले ही मशीन औजार बनाने के उद्योग की शुरूआत हो चुकी थी। मशीनों का प्रयोग कृत्रिम कपड़े बनाने, टेक्सटाइल उद्योग में छपे हुए कपड़ों का आरम्भ हुआ।

भाषाः मनुष्य ही एक मात्र प्राणी है जिसमें भाषा की क्षमता काफी विकसित है। बातचीत द्वारा संप्रेषण ने ही भाषा के विकास को बढ़ावा दिया। भाषा ही काम करने वाले समूहों को मदद करती है जिससे आर्थिक विकास की गति बढ़ती है।

इस प्रकार न केवल एक बल्कि बहुत सारे कारकों से औद्योगीकरण हुआ।

2.9 प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की शुरूआत


जब से मानव जाति विकसित हुई है, वे जंगल और उनके उत्पादों पर पूरी तरह से निर्भर है। बीज, फल, और जंगली जानवर जो जंगल में पाये जाते हैं, जो आदिम मानव के भोजन का भाग होते हैं।

वे पत्तियां, शाखाएं और छाल का उपयोग कपड़ों की तरह करते थे और रोड़ी, पत्थर और मृत जानवरों की हड्डियों को हथियार की तरह उपयोग करते थे।

जंगलों की कटाई करके कृषि के लिये खेत बनाये गए। इन लोगों ने पर्याप्त मात्रा में भोजन उगाने का काम किया और अपने आश्रय बनाए और इससे जनसंख्या की काफी वृद्धि भी हुई। ज्यादा से ज्यादा लोगों को खाना मिला और सुविधाएँ भी उपलब्ध हुयीं। सभ्यता की प्रगति के साथ शहरी संस्कृति की वृद्धि के कारण जंगलों का एक बहुत बड़ा क्षेत्र समाप्त कर दिया गया। पेड़ों को लकड़ी, आश्रय बनाने, परिवहन के लिये गाड़ियाँ इत्यादि बनाने के लिये काट डाला गया और यह ईंधन का भी एक स्रोत था।

आग की खोज के साथ ही खाना पकाने के लिये ईंधन की अत्यधिक जरूरत होती थी। मानव ने ना केवल कोयले का खनन ईंधन के लिये बल्कि धातुओं के अयस्कों का प्रयोग पहिये तथा आभूषण इत्यादि बनाने के लिये करना आरम्भ किया। शुरूआत में यह क्षति उतनी गंभीर नहीं थी औद्योगिक क्रांति के बाद पिछले 400 सालों में जंगल जो मनुष्य का पर्यावास था, बहुत तेजी से घट रहे हैं, वन्य जीवन समाप्त होने के कगार पर है। कुछ वन्य जीव तो समाप्त हो चुके हैं। उद्योगों से होने वाले प्रदूषण से वायु अशुद्ध हो गयी है तथा जलस्रोत गाद से भर चुके हैं।

आदिम मानव और पर्यावरण के बीच एक सम्बन्ध था जिसमें वे एक डर के साथ रहते थे और उसका सम्मान भी करते थे। जैसे-जैसे मनुष्य और अधिक सभ्य होता चला गया और उसने नयी-नयी तकनीकें खोजनी शुरू कर दी, उसके चलते प्राकृतिक संसाधनों का खजाना जैसे मृदा, जंगल, खनिज, धातुएँ, हवा, पानी, पौधे और जानवर अत्यधिक मात्रा में दोहन का शिकार हुये।

दोहन के लिये मानव जनसंख्या में बढ़ोत्तरी उत्तरदायी है। पिछले दस सालों में पर्यावरणविद खतरे की खोजों के बारे में बताते आये हैं।

- पर्यावरणीय संसाधन सीमित हैं और अति दोहन के कारण शीघ्र ही समाप्त होने पर हैं।
- वायु, जल और मृदा का प्रदूषण मानव प्रक्रियाओं के कारण होता है जो मानव की उत्तरजीविता और कल्याण के लिये भी एक खतरे का संकेत है।

मानव और उसके पर्यावरण के बीच का संबंध विशेषतः औद्योगिक क्रांति की शुरूआत से ही बदल गया है। यह सामना करने तथा इसके परिणाम पहले से ही आने शुरू हो गये हैं। पर्यावरण के अवक्रमण के बारे में आप अगले पाठ में विस्तार से जानेंगे।

पाठगत प्रश्न 2.5
1. औद्योगिकीकरण के संबंध में कुछ कदमों की सूची बनाइये।
2. कौन सी धातुएँ आदिम मानव द्वारा खोजी गयी थी।
3. उन चार कारकों की सूची बनाइये जिससे औद्योगिकीकरण की वृद्धि हुई।
4. प्रकृति पर पड़ने वाले औद्योगिकीकरण के प्रभाव क्या हैं?

आपने क्या सीखा


- पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक संसाधन पाये जाते हैं जिसमें से निर्जीव या अजैव संसाधन भूमि, जल, वायु, जीवाश्मीय ईंधन और खनिज हैं और सजीव या जैव संसाधन पौधे, जानवर और सूक्ष्मजीव हैं।

- मनुष्यों को भोजन के अलावा दो मुख्य प्रकार के संसाधनों की आवश्यकता होती है जिनमें (1) पदार्थ और (2) ऊर्जा जो आराम और आर्थिक विकास के लिये आवश्यक है।

- पृथ्वी पर मानव के विकास के समय से ही वे अपना भोजन, वस्त्र और दूसरी अन्य वस्तुएँ प्रकृति से ही प्राप्त करते आए हैं।

- मनुष्य का विकास आज से लगभग 2 लाख वर्ष पूर्व हुआ जब वे कपियों से अलग हो गए, दोनों के पूर्वज सामान्य ही थे।

- दो पैरों पर चलने वाला सबसे पहला मानव आस्टेंलोपिथैकस था जो अफ्रीका में विकसित हुआ। वे कपि सदृश थे लेकिन उनके मस्तिष्क का आकार बड़ा था।

- मानव विकास की अगली अवस्था होमो इरेक्टस थी जिसका बड़ा मस्तिष्क और सीधा खड़े हो सकते थे। उनके जीवाश्म जावा और चीन में पाये गये हैं।

- होमो सेपियन्स निएन्डरेथेलेन्सिस या निएन्डरथल मानव का विकास होमो इरेक्टस से हुआ। वे जल्दी ही विलुप्त हो गए। लेकिन मानवों की एक दूसरी पंक्ति होमो सेपियन्स विकसित हो गयी और उनको आधुनिक मानव का परोक्ष रूप में पूर्वज माना गया।

- आदिममानव वनों में रहते थे और अपने हाथों से खाद्य पौधों की जड़े उखाड़ने, और फल तोड़ने और बीज एकत्र करने का काम करते थे। जबसे हाथ का उपयोग चलने के लिये बंद कर दिया गया तबसे वे हाथों से ही औजार भी बनाने का काम करने लगे।

- आदिम मानव शिकारी और संग्राहक थे और भोजन की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान को आते रहते थे।

- मानव विकास के साथ-साथ औजार बनाने की कला में भी आशानुरूप सुधार हुआ। मानव ने पत्थर से साधारण औजार बनाये। जिसमें वे पृथ्वी पर उपस्थित थे उस काल को पुरापाषाण काल या पेलियोलिथिक युग कहा जाता है। शुरूआत में कड़े रोड़ी वाले औजार बनाये गये परन्तु जैसे-जैसे समय बीतता गया उन्होंने अच्छे और धारदार औजार बनाने शुरू कर दिये। नियोलिथिक या नव पाषाण युग में औजार पॉलिश किये हुए और सिरे पर पैने होते थे।

- बाद में मानव ने आग की खोज की और जिसका उपयोग वह भोजन पकाने, जंगली जानवरों को भगाने और बड़े जानवरों को पकड़ने के लिये करता था।

- खानाबदोश जीवन से आरम्भ करके मानव ने आबादी बनानी आरम्भ की और अपने लिये आवास बनाये।

- लगभग 12000 वर्ष पूर्व मनुष्य ने फसल उगाना सीखा था। कृषि बीज पद्धतियों में सुधार हुआ और मानव ने पर्याप्त मात्र में भोजन उगाया और उनकी जनसंख्या बढ़ गयी।

- अतिरिक्त मात्र में उगी फसल को दूसरे स्थानों पर अदला-बदली के लिये ले जाया जाता था।

- पहिये की खेाज हुई और परिवहन (आवागमन) एकदम आसान हो गया। वे नये-नये स्थानों पर जाते और नयी-नयी फसलें उगाना प्रारम्भ करते थे और उन्होंने पशुओं को पालना भी शुरू कर दिया था।

- जबकि आदिम मानव चकमक को खनन द्वारा निकालकर उससे औजार बनाता था। तब उन्हें धातु अयस्क भी देखने को मिले और खनन और ऊष्मन प्रक्रिया द्वारा परिष्कृत धातु को प्राप्त करना शुरू हो चुका था।

- उन्होंने काँसे से बहुत सी चीजें बनायी जो कि ताबें और जस्ते की एक मिश्र धातु था और बाद में लोहे से।

- जल्दी ही उन्होंने उत्पादन की प्रक्रिया आरम्भ कर दी और इस प्रकार औद्योगिकीकरण की शुरूआत हुई।

- औद्योगिकीकरण का अतिशीघ्र विस्तारण का परिणाम (क) प्राकृतिक संसाधनों की कमी और (ख) प्रकृति में प्रदूषण हुआ।

- मानव की उत्तरजीविता अब एक खतरा बन गयी है क्योंकि पर्यावरण का अवक्रमण हो रहा है।

पाठांत प्रश्न


1. अजैविक और जैविक प्राकृतिक संसाधनों के नाम बताइए।
2. मानव के लिये पौधे और जंतुओं का क्या उपयोग है?
3. मानव जाति के लिये जल के कोई दस उपयोग बताइये।
4. ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों की सूची बनाइये।
5. मानव के विकास का वर्णन आधुनिक मानव तक कीजिए।
6. इस कथन का क्या तात्पर्य है कि ‘‘आदिम मानव शिकारी और संग्राहक थे’’।
7. उन प्रयोजनों को बताइये जिसके लिये आदिम मानव ने औजार बनाये थे।
8. आदिम मानव आग की खोज से विस्मित थे और क्यों?
9. मानव ने कैसे फसल उगाने के बारे में सोचा?
10. आदिम मानव के व्यवहार और जीवनशैली में क्या-क्या बदलाव आये थे जब वे कृषक बन गये?
11. ‘‘काँस्य युग’’ और ‘‘लौह युग’’ से क्या तात्पर्य है?
12. उन कारकों का वर्णन कीजिए जिनसे औद्योगिकीकरण को बढ़ावा मिला।
13. बढ़ती हुई जनसंख्या द्वारा पर्यावरणीय संसाधनों का वर्षों से उपयोग करने का क्या प्रभाव पड़ा?

पाठगत प्रश्नों के उत्तर


2.1
1. वायु, जल, आधार (तत्व) (कोई दो)।
2. भूमि- आश्रय बनाने, कृषि, बर्तन बनाने इत्यादि के लिये।
धातुएं- औजार, आभूषण और अन्य वस्तुओं के बनाने के लिये।
3. भोजन और परिवहन के रूप में।

2.2
1. आस्ट्रेलोपिथैकस।
2.2 लाख वर्ष पूर्व।
3. चारा, फल तोड़ना और पेड़ों को उखाड़ना और जानवरों का शिकार करना।
4. गुफाएं।
5. हाथ के औजार बनाने और दूसरी अन्य बहुत सी प्रक्रियाओं को करने के लिये स्वतंत्र हो गये थे।

2.3
1. पत्थर और धातुएं।
2. पेड़ों को उखाड़ना, जानवरों को मारना।
3. भोजन पकाने, कमरे को गर्म करने, और जानवरों को भगाने के लिये (कोई दो)।

2.4
1. अस्थायी अण्डाकार झोपड़ी सा आश्रय जिसे प्रायः पौधों से ढका जाता था।
2. लगभग 10,000 वर्ष पहले।
3. कुत्ता।
4. बैल, ऊंट, हाथी।
5. लगभग 5000 वर्ष पहले इराक और सीरिया में।

2.5
1. पहियों के निर्माण, भवन निर्माण, अयस्कों के खनन से औजार और आभूषण बनाने में।
2. तांबा, लोहा और कांसा।
3. तकनीकी विकास, आर्थिक विकास, पहिये का आविष्कार, खनन का आरम्भ, कृषि इत्यादि (कोई चार)।
4. जंगलों (वनों) का काटा जाना, वन्य जीवन के विलुप्त होने का खतरा और उद्योगों से होने वाले प्रदूषण के कारण वायु अशुद्धऔर जलस्रोतों का दूषित होना।

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