चंबल में जलस्तर गिरने से स्थानीय लोग परेशान

Submitted by UrbanWater on Fri, 05/17/2019 - 13:07
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जनसत्ता, नई दिल्ली 16 मई 2019

इटावा। जिले में गर्मी की शुरुआत में ही पानी की कमी का अहसास आम लोगों का होना शुरू हो गया है, क्योंकि पूरे जिले भर में बड़े स्तर पर जलस्तर में गिरावट ने हर तरफ त्राहि-त्राहि मचा दी है।

क्षेत्र में पानी की कमी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आई है। सिर्फ पानी की चिंता कर लेने से इस समस्या का हल होने वाला भी नहीं है। इटावा जीले के विभिन्न स्थानों पर जलस्तर में भारी गिरावट दर्ज की गई है। स्थिति यह है कि पानी की बर्बादी नहीं रोकी गई तो पानी की एक-एक बूंद के लिए निवासियों को तरसना पड़ेगा।

1993 से लगातार जलस्तर में गिरावट

प्राकृतिक श्रोत खत्म हो गए हैं और समर पंपों से पानी की खूब बर्बादी हो रही है। इटावा जिले में 1993 से जलस्तर में गिरावट आने का जो सिलसिला शुरू हुआ था वह अभी भी जारी है। हालांकि, ताखा जैसे कुछ क्षेत्रों में पिछले वर्षों में जलस्तर में सुधार भी हुआ है।

इटावा के शहरी क्षेत्र में तो स्थिति यह है कि समर पंप डेढ़ सौ फीट नीचे तक लगाए जा रहे हैं, तब पानी मिल रहा है। यही स्थिति जसवंतनगर, चकरनगर जैसे क्षेत्रों की भी है। पहले जो हैंडपंप लगाए गए थे, जलस्तर नीचे गिरते जाने के कारण अब इन तमाम हैंडसेटपंपों ने पानी देना बंद कर दिया है। इन दिनों तो हैंडपंप लगाए ही नहीं जा रहे हैं। सिर्फ समर पंप लग रहे हैं और पानी की बर्बादी हो रही है।

पानी की चिंता सिर्फ भाषणों में 

विषम स्थिति यह है कि पानी की कमी पर चिंता तो जताई जा रही है, लेकिन पानी बचाने के प्रयास नहीं हो रहे हैं। आम जन में भी जागरूकता की काफी कमी है। परिस्थिति ये हैं कि पानी की चिंता भाषणों में तो की जा रही है, लेकिन जमीन पर पानी खूब बर्बाद किया जा रहा है।

पीने योग्य पानी लगातार कम होता जा रहा है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में पीने के पानी को समर पंपों के माध्यम से बेकार में बहाया जा रहा है।) सरकार ने जल संरक्षण की कई योजनाओं को बनाया है, लेकिन ये पर अमल न होने के कारण ये योजनाएं कागजों पर ही दम तोड़ रही हैं।)

जल संरक्षण को लेकर सिर्फ समझौते

2004 में बरसात के पानी के संरक्षण के लिए रूफ टॉप, वाटर हार्वेस्टिंग स्कीम बनाई गई थी। इसमें बरसात का पानी छतों पर एकत्रित किया गया था, लेकिन इस योजना पर कोई काम नहीं हुआ और जल संरक्षण को लेकर सिर्फ और सिर्फ समझौते होते रहे।

पहले कच्ची गलियां व नालियां थीं, जिससे जमीन में भी बरसात का पानी चला गया था। इससे कुछ हद तक वाटर रिचार्ज हो जाता था और पानी की बर्बादी भी कम होती थी। अब स्थितियां बदल गई हैं। कंक्रीट की सड़कें बनी हुई हैं, जिसके कारण न तो बरसात का पानी और न नालियों का पानी जमीन में जाता है। इस पानी की सिर्फ बर्बादी ही होती है।

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