बुन्देलखंड के चन्देला-बुन्देला के तालाबों की गाद निकासी 

Submitted by UrbanWater on Sat, 06/15/2019 - 15:07

समूचे बुन्देलखंड में 600 से अधिक बडे़ तालाब बनाये गये थे।समूचे बुन्देलखंड में 600 से अधिक बडे़ तालाब बनाये गये थे।

भारत के मध्यभाग में स्थित क्षेत्र को ही बुन्देलखंड कहते हैं। यह क्षेत्र उत्तरप्रदेश के सात जिले (झांसी, जालौन, हमीरपुर, ललितपुर, बांदा, महोबा और चित्रकूट) और मध्यप्रदेश के छः जिले (दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, सागर और दमोह) में फैला है। इस क्षेत्र का परंपरागत व्यवसाय खेती है। खेती को सम्बल प्रदान करने के लिए चन्देल तथा बुन्देल राजाओं ने अनेक तालाबों का निर्माण कराया था। 

बुन्देलखंड में जल संचय की परंपरा

चन्देल राजाओं ने बड़े पैमाने पर विभिन्न आकार के निस्तारी तालाब बनवाये थे। मदनवर्मन ने अकेले टीकमगढ़ जिले ही में एक हजार से अधिक तालाब बनवाये थे। चन्देल राजाओं द्वारा बनवाये तालाबों को मुख्यतः निम्न दो वर्गों में बांटा जा सकता है- 

  1. पेय जल और स्नान हेतु इन तालाबों पर घाट बनाये जाते थे। 
  2. सिंचाई और पशुओं के लिये निस्तारी तालाब।

चन्देल राजाओं द्वारा बनवाये तालाबों का एक और वर्गीकरण है। इस वर्गीकरण के अनुसार तालाबों को निम्न दो वर्गों में बांटा जा सकता है-

  1. स्वतंत्र तालाब (स्वतंत्र एकल संरचना)
  2. तालाब श्रृंखला (एक दूसरे से सम्बद्ध तालाबों की श्रृंखला, सांकल या श्रृंखलाबद्ध तालाब) 

चन्देलों के बाद बुन्देलखंड पर बुन्देला राजाओं का आधिपत्य रहा। छत्रसाल सहित लगभग सभी बुन्देला राजाओं ने तालाब निर्माण की चन्देल परिपाटी को बढ़ावा दिया। उन्होंने चन्देल काल में बने कुछ तालाबों की मरम्मत की, कुछ का पुनर्निमाण किया गया और अनेक नये तालाब बने। कुछ तालाबों से सिंचाई के लिये नहरें निकालीं। उनके शासनकाल में बनाये तालाब की साइज अपेक्षाकृत बड़ी थी। उनमें नीचे उतरने के लिये सीढ़ियां बनाई गई थीं। उनके घाटों पर चबूतरे, मंडप और बाग-बगीचे लगाये गये थे।  बुन्देलखंड के राजाओं द्वारा बसाहट के निकट और छोटी-छोटी पहाड़ियों के ढाल पर बनवाये तालाब सामान्यतः छोटी साइज के हैं। बुन्देलखंड के कुछ इलाके जहां छोटी-छोटी साईट और अधिक मात्रा में बरसाती पानी उपलब्ध था। वहां राजाओं ने तालाबों की श्रृंखलायें बनवाई थीं। कहा जाता है कि चन्देल और बुन्देला राजाओं ने टीकमगढ़ जिले के सघन वन क्षेत्रों में जंगली जीवों और जनजातीय लोगों के लिये लगभग 40 तालाब बनवाये थे। इनमें से अभी भी 24 तालाबों शेष हैं।

बुन्देलखंड का प्राकृतिक परिदृष्य

बुन्देलखंड का इलाका मुख्यतः चट्टानी है। बुन्देलखंड के उत्तरी भाग में ग्रेनाइट एवं नीस, दक्षिणी भाग में बेसाल्ट एवं सैंडस्टोन और चूना पत्थर मिलता है। उत्तरी बुन्देलखंड में ग्रेनाइट की कम ऊंचाई की और दक्षिणी बुन्देलखंड में सैंडस्टोन की अपेक्षाकृत अधिक ऊंची पहाड़ियां मिलती हैं। कई स्थानों पर क्वार्टज रीफ ने स्थानीय चट्टानों को काटा है। बुन्देलखंड के ग्रेनाइटी इलाकों में डोलेराइट डाइकें भी मिलती हैं। 

बुन्देलखंड में दो प्रकार के तालाब अस्तित्व में हैं- आधुनिक तालाब और परंपरागत चन्देल और बुन्देला तालाब। दोनों ही किस्म के तालाब अतिक्रमण, उपेक्षा, प्रदूषण और अनदेखी के शिकार हैं। उनमें गाद जमा हो गई है। उसे निकालने के लिए समय-समय पर प्रयास किए गए हैं, अभी भी हो रहे हैं। सरकार, एनजीओ और काॅरपोरेट घराने सामने आ रहे हैं। बढ़ते जल संकट तथा पलायन के कारण यह आवश्यक भी है। 

इन डाइकों ने भी स्थानीय चट्टानों को काटा है। जल संरक्षण में क्वार्टज रीफ की भूमिका महत्वपूर्ण है। सागर और दमोह जिलों में अधिकांष पहाड़ियों की ऊंचाई 300 से 380 मीटर के बीच है। इस क्षेत्र के मैदानी हिस्सों और घाटियों में बेसाल्ट पाया जाता है। यह हिस्सा मुख्यतः पठारी है। बुन्देलखंड में मुख्यतः तीन प्रकार की मिट्टियां मिलती हैं। स्थानीय लोग इन मिट्टियों को मार, काबर और राखड़ कहते हैं। मार मिट्टी काले रंग की उपजाऊ मिट्टी है। काबर मिट्टी अपेक्षाकृत कम उपजाऊ एवं हल्के काले रंग की मिट्टी है। राखड मिट्टी लाल और पीले रंग की होती है। यह सबसे कम उपजाऊ मिट्टी है। 

बुन्देलखंड के मैदानी इलाकों में काबर और मार मिट्टियां मिलती हैं। झांसी और ललितपुर के बीच के पहाड़ी इलाकों और मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में राखड मिट्टी मिलती है। इस मिट्टी में रेत, बजरी और कंकड़ के कण होते हैं। खेती के लिये यह मिट्टी अच्छी नहीं है। बहुत से इलाकों में मिट्टी की परत की मोटाई बहुत कम है। इस पठारी और ऊबड़-खाबड़ जमीन में सामान्यतः लाभप्रद खेती करना कठिन होता है। बुन्देलखंड़ में कम ऊँची पहाडियों और संकरी घाटियों के बीच में खुले मैदान हैं। यहां की जलवायु मुख्यतः अर्ध-शुष्क है। इस क्षेत्र में बरसात में अकसर बाढ़ की और गर्मी में सूखे की स्थिति बनती है। इस क्षेत्र में 90 प्रतिशत वर्षा जून से सितम्बर के बीच होती है। जुलाई और अगस्त सबसे अधिक गीले होते हैं। उत्तर के मैदानी हिस्सों को छोड़कर बाकी क्षेत्र की औसत बरसात 75 सेंटीमीटर से लेकर 125 सेंटीमीटर के बीच है। वर्षा का क्षेत्रीय वितरण असमान, अनिश्चित और असंतुलित है। यह सही है कि बुन्देलखंड में पर्याप्त बरसात होती है। चन्देल-बुन्देल काल में भी बरसात के मौसम में अनिश्चित सूखे अन्तराल आते होंगे। 

यह अनिश्चितता मानसूनी सीजन में पानी की उपलब्धता और फसल प्रबन्ध को जटिल बनाती होगी। उपर्युक्त तथ्यों की रोशनी में कहा जा सकता है कि बुन्देलखंड के अधिकांश हिस्सों में पर्याप्त पानी बरसने के बावजूद छोटे नदी नालों के प्रवाह में कमी और उथली रेतीली मिट्टी की नमी घट जाती होगी। उपर्युक्त वर्णित परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में ही बुन्देलखंड में निरापद बारानी खेती और तालाबों के निर्माण के तकनीकी पक्ष का विकास हुआ होगा। 

बुन्देलखंड में जल संरक्षण 

प्रारंभ में बुन्देलखंड का समाज घूमन्तु पशुपालक समाज था। तालाबों के निर्माण के बाद वह खेतिहर समाज बना। अर्थात तालाबों के कारण ही खेती और पशुपालन आसान बना। तालाब निर्माण ने घूमन्तू समाज को आजीविका का बेहतर जरिया दिया। इन्हीं परिस्थितियों ने राजाओं को तालाब बनाने के लिये प्रेरित किया। अपनी उपयोगिता के कारण, तालाब, धीरे-धीरे राजाओं के लिए राजधर्म और सम्पन्न लोगों के लिए सामाजिक दायित्व बन गया। 

चन्देल और बुन्देला राजाओं ने स्थानीय भूगोल को ध्यान में रख उन संरचनाओं को प्राथमिकता दी। जो खेती को सीधे-सीधे लाभ पहुँचाती थीं। उन्होंने मंहगी संरचनाओं का निर्माण राजकोष से कराया। उन्होंने भूजल स्तर को सतह के करीब रखने और नदियों में अधिकतम समय तक जलप्रवाह सुनिष्चित करने के लिये तालाबों के निर्माण और पेयजल सुलभ कराने के लिये कूपों और बावड़ियों के निर्माण का विकल्प चुना। 
उन्होंने आबादी के पास छोटे तालाब और बसाहट से दूर बडे़ तालाबों का निर्माण कराया। अनुमान है कि समूचे बुन्देलखंड में 600 से अधिक बडे़ तालाब और 7000 से अधिक छोटे तालाब बनवाये गये थे। इन तालाबों की डूब की जमीन का रकबा लगभग 57,700 हैक्टर था। राजाओं ने तालाब निर्माण के लिये बहुत सहज तकनीक अपनाई थी। इस तकनीक के अन्तर्गत क्वार्टज रीफ की पहाड़ियों के बीच बहने वाली छोटी-छोटी नदियों और नालों पर मिट्टी के बाँध बनाकर पानी रोका। खोद कर तालाबों का निर्माण किया। 

गौरतलब है कि वे तालाब जिनमें संचित जल और खोदकर निकाली मिट्टी के आयतन का अनुपात 1.5 से 4.5 के बीच होता है, को बेहतर माना। इन बांधों की नींव की चौड़ाई 60 मीटर या उससे अधिक रखी। उनमें नींव की चैड़ाई एवं बांध की ऊँचाई का अनुपात कम से कम 7ः1 रखा। तालाबों की पाल मिट्टी की बनाई जाती थी। पाल के दोनों तरफ पत्थरों के ब्लाक लगाये जाते थे। तालाबों का आकार यथासंभव चन्द्राकार या अर्ध-चन्द्राकार होता था। यह वैज्ञानिक तथ्य है कि चन्द्राकार या अर्ध-चन्द्राकार तालाबों में अधिक पानी जमा होता है। पानी का वेग कम करने के लिये कहीं कहीं तालाब के बीच में टापू छोड़े जाते थे। उल्लेख है कि उनके द्वारा अपनाये तकनीकी मानकों के कारण तालाब पूरी तरह सुरक्षित रहता था। 

तालाबों की भूमिका की बहाली 

पिछले कुछ सालों में बुन्देलखंड के प्राचीन तालाबों के केचमेंट में भूमि उपयोग में बदलाव हुआ है और अतिक्रमण बढ़ा है। जंगलों के कटने के कारण भूमि कटाव की गति बढ़ गई है। इस कारण वन भूमि की जल संचय और पानी मुहैया कराने की क्षमता घट रही है। नदी-नालों का गैर-मानसूनी प्रवाह और अवधि घट रही है। उनकी पर्यावर्णीय भूमिका को ग्रहण लग रहा है। तालाबों में बहुत अधिक मात्रा में गाद जमा हो रही है। इसके अलावा बसाहटों के अपषिष्टों के तालाब में मिलने के कारण प्रदूषित तालाब मल-मूत्र, गंदगी और बीमारी के स्थायी स्रोत बन गये हैं। पानी की कमी के चलते कई तालाब सूख गये हैं। कुछ पुराने तालाब अस्तित्व और अस्मिता के लिये संघर्ष कर रहे हैं तो कुछ इतिहास के पन्नों में खो गये हैं। 

बुन्देलखंड में दो प्रकार के तालाब अस्तित्व में हैं- आधुनिक तालाब और परंपरागत चन्देल और बुन्देला तालाब। दोनों ही किस्म के तालाब अतिक्रमण, उपेक्षा, प्रदूषण और अनदेखी के शिकार हैं। उनमें गाद जमा हो गई है। उसे निकालने के लिए समय-समय पर प्रयास किए गए हैं, अभी भी हो रहे हैं। सरकार, एनजीओ और काॅरपोरेट घराने सामने आ रहे हैं। बढ़ते जल संकट तथा पलायन के कारण यह आवश्यक भी है। इस लेख में पैरवी की गई है कि चन्देला और बुन्देला तालाबों के पीछे के विज्ञान और धरती से संबंध को समझने के बाद ही उनकी गाद निकाली जाये। यदि उन तालाबों के पीछे के विज्ञान और धरती से सम्बन्ध को को बिना समझे गाद निकाली तो उन तालाबों का मूल चरित्र खत्म हो जायेगा। उनका पुराना वैभव तथा असर खत्म हो जायेगा। इसी क्रम में कुछ सुझाव पेश हैं- 

  • बुन्देलखंड के चन्देला और बुन्देला तालाबों के धरती से संबंध की स्टडी कर उनकी वास्तविक भूमिका को जान लीजिए। उस आधार पर उन्हे जल संचय या जल संचय सह रीचार्ज तालाब के तौर पर वर्गीकृत किया जाये।
  • वर्गीकरण के आधार पर गाद निकासी की कार्ययोजना बनाई जाये।
  • कार्ययोजना में सावधानियों का उल्लेख हो। तदोपरान्त पुरानी भूमिका की बहाली के लिये कार्ययोजना क्रियान्वित की जाये।
  • कार्ययोजना के पूरा होने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब के प्रबन्ध की जिम्मेदारी समाज को और नगरीय क्षेत्रों में जिम्मेदारी नगरीय निकाय को सोंपी जाये। 
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