खाद्यान्न के समर्थन मूल्य पर खरीद की जाये

Submitted by editorial on Sat, 10/06/2018 - 16:36
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 06 अक्टूबर, 2018

आंदोलनआंदोलन केन्द्र सरकार वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने को वचनबद्ध तो है, लेकिन इस लक्ष्य को केवल 23 फसलों के एमएसपी निर्धारण से हासिल करना मुश्किल है, बल्कि अन्य फसलों खासकर फल-सब्जियों जैसे आलू, प्याज, टमाटर, हरी मिर्च, मौसमी फल तथा दूध की किसानों को कैसे उचित कीमत मिले, इस पर भी नजर रखना होगा

न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमसपी) में बढ़ोतरी के बजाय किसान संगठनों को फसलों की एमएसपी पर खरीद सुनिश्चित करवाने पर जोर देना चाहिए। केन्द्र सरकार ने भले ही खरीफ के बाद रबी फसलों की एमएसपी का निर्धारण भी ए2 प्लस एफएल के आधार पर किया है तथा किसान संगठनों द्वारा सी-2 प्रणाली को आधार मानकर लागत के अतिरिक्त 50 फीसदी का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने की माँग की जा रही थी, लेकिन किसानों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि संप्रग सरकार के मुकाबले एनडीए सरकार ने पिछले पाँच साल में एमएसपी में ज्यादा बढ़ोत्तरी की है। इसका एक प्रमुख कारण किसान संगठनों द्वारा बनाया गया दबाव भी है।

पिछले पाँच साल में जहाँ मोदी सरकार ने गेहूँ के एमएसपी में 315 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोत्तरी की है वहीं धान की एमएसपी में इस दौरान 340 रुपए बढ़ाए। संप्रग सरकार के पाँच साल के कार्यकाल में जहाँ गेहूँ का एमएसपी केवल 165 रुपए बढ़ाया गया था, वहीं धान का एमएसपी 280 रुपए प्रति क्विंटल ही बढ़ा था। मोदी सरकार ने गेहूँ का एमएसपी 1,525 से बढ़ाकर 1,840 रुपए प्रति क्विंटल किया है, जबकि इसके पिछले पाँच साल में यह 1,285 से बढ़कर 1,450 रुपए प्रति क्विंटल किया गया था। अब सवाल उठता है कि एमएसपी पर खरीद हो भी रही है, या नहीं। अत: जब तक तय समर्थन मूल्य पर खरीद नहीं होगी तो, बढ़ोत्तरी का क्या औचित्य? अगर हम धान और गेहूँ को छोड़ दें तो अन्य फसलों दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों की समर्थन मूल्य पर खरीद अभी भी कुल उत्पादन के मुकाबले सीमित मात्रा में होती है, जिस कारण किसानों को अपनी फसल औने-पौने दाम पर व्यापारियों को बेचनी पड़ती है। ऐसे में किसान संगठन मिलकर केन्द्र और राज्य सरकारों पर दबाव बनाएँ कि समर्थन मूल्य पर खाद्यान्न की खरीद को कानूनी अधिकार बनाने पर जोर दिया जाए।

एमएसपी से नीचे बेचने की मजबूरी

खरीफ फसलों की दैनिक आवक उत्पादक राज्यों की मंडियाँ शुरू तो हो गई हैं, लेकिन कई राज्यों में सरकारी खरीद के अभाव में किसानों को दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे दाम पर बेचना पड़ रहा है। अधिकांश राज्यों में धान को छोड़ अन्य फसलों की या तो अभी तक सरकारी खरीद शुरू ही नहीं हुई है या हुई भी है तो सीमित मात्रा में ही। राजस्थान की अलवर मंडी में किसान बाजरा 1,251 से 1,415 रुपए प्रति क्विंटल के भाव बेचने पर मजबूर हैं, जबकि केन्द्र सरकार ने चालू खरीफ विपणन सीजन के लिये बाजरा का एमएसपी 1,950 रुपए प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। इसी तरह से हरियाणा की फरूक नगर मंडी (गुरुग्राम) में बाजरा 1,400 से 1,550 रुपए प्रति क्विंटल के भाव बिका। हरियाणा की मंडियों में किसानों से प्रति एकड़ के हिसाब से केवल 8 क्विंटल बाजरा की खरीद की जा रही है, बाकी उसे व्यापारियों को ही बेचना पड़ रहा है।

मध्य प्रदेश छिंदवाड़ा मंडी में किसानों को मक्का 1,355 से 1,436 रुपए प्रति क्विंटल के भाव बेचना पड़ रहा है, जबकि मक्का का एमएसपी चालू खरीफ के लिये 1,700 रुपए प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। राज्य की विदिशा मंडी में किसानों को सोयाबीन 2,900 से 2,950 रुपए प्रति क्विंटल बेचनी पड़ रही है, जबकि केन्द्र सरकार ने सोयाबीन का एमएसपी 3,399 रुपए प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। उधर, गुजरात के जूनागढ़ की मंगरौल मंडी में किसान मूंगफली 4,050 से 4,250 रुपए प्रति क्विंटल बेचने को मजबूर हैं, जबकि मूंगफली का एमएसपी 4,890 रुपए प्रति क्विंटल है। सांगली मंडी में किसान मूँग 4,000 से 4,500 रुपए और उड़द 3,500 से 4,200 रुपए प्रति क्विंटल बेचने पर मजबूर हैं। केन्द्र सरकार ने चालू खरीफ सीजन के लिये मूँग का एमएसपी 6,975 रुपए और उड़द का एमएसपी 5,600 रुपए प्रति क्विंटल तय किया हुआ है।

नहीं मिल पा रहा एमएसपी

किसानों को उनकी फसलों के उचित दाम मिलें, इसके लिये केन्द्र और राज्य के समक्ष चुनौती तो होगी कि प्रत्येक फसल उत्पाद की खरीदारी एमएसपी पर सुनिश्चित कैसे की जाए। लेकिन केन्द्र सरकार राज्यों के साथ मिलकर इसकी पहल कर सकती है तथा किसान संगठनों को भी चाहिए कि एकजुट होकर इस पर जोर दें। संसद में भी यह बात स्वीकारी जा चुकी है कि किसानों को निर्धारित एमएसपी नहीं मिल पा रहा है। केन्द्र सरकार नई खरीद नीति लेकर आई है, इसके तहत मध्य प्रदेश सरकार द्वारा चलाई जा रही भावान्तर भुगतान योजना के साथ ही प्राइवेट कम्पनियों को भी खरीद में शामिल करना है, लेकिन मध्य प्रदेश में भावान्तर भुगतान योजना पर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं कि इससे किसानों के बजाय व्यापारियों को ज्यादा फायदा हो रहा है। इसी तरह से प्राइवेट कम्पनियों द्वारा खाद्यान्न की खरीद तो पहले से ही की जा रही है, लेकिन कम्पनियाँ किसानों के बजाय अपना मुनाफा सुनिश्चित करेंगी। केन्द्र सरकार वर्ष-2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने को वचनबद्ध तो है, लेकिन इस लक्ष्य को केवल 23 फसलों के एमएसपी निर्धारण से हासिल करना मुश्किल है, बल्कि अन्य फसलों खासकर फल एवं सब्जियों जैसे आलू, प्याज, टमाटर, हरी मिर्च, मौसमी फल तथा दूध की किसानों को कैसे उचित कीमत मिले, इस पर भी नजर रखना जरूरी है।

लेखक आर्थिक पत्रकार हैं।

 

 

 

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