प्रथम अध्याय - कला एवं पर्यावरण का परिचय

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कला एवं पर्यावरण - एक अध्ययन मध्य प्रदेश के प्रमुख दृश्य चित्रकारों के सन्दर्भ में (पुस्तक), 2014

प्राचीन चित्रकारीप्राचीन चित्रकारीआकाश, पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि, वनस्पति, जीव-जन्तु आदि पर्यावरणीय घटक हैं। मानव जाति प्रकृति अर्थात पर्यावरणीय घटक का ही एक अंग है, जिसका प्रादुर्भाव करोड़ों वर्ष पूर्व हुआ था। एजाईक युग, पोलीजोइक युग, मेसोजोइक युग एवं सिनोजोइक युग जीव विकास की प्रक्रिया को दर्शाते हैं। मनुष्य की उत्पत्ति लगभग बीस लाख वर्षों पूर्व हुई। इस समय मनुष्य वनमानुष था और प्रागैतिहासिक मानव या आदिमानव कहलाता था। इस समय तक इतिहास नहीं लिखा गया था। लिखना सीखने से पहले मानव लाखों वर्षों तक का लम्बा सुदूर अतीत सफर तय कर चुका था। मनुष्य ने घटनाओं का लिखित विवरण नहीं रखा इसे ‘प्राक् इतिहास’ या ‘प्रागैतिहासिक’ काल कहते हैं।

अब से लगभग तीस-चालीस हजार साल पूर्व होमो-सेपियंस (Homo-Sapiens) या ज्ञानी मानव इस धरती पर प्रकट हुए। आज के मानव इसी होमोसेपियंस जाति के हैं।

उस समय का मानव प्रकृति की गोद में परिपोषित हुआ। वर्षा, धूप, आँधी, ठण्ड से बचने के लिये कन्दराओं की शरण ली। सामान्यतया तत्कालीन मानव घुमक्कड़ प्रवृत्ति का था। वह छोटे-छोटे समूहों में रहता था। वह शिकारी था। उसका जीवन प्राकृतिक संसाधनों तथा पशु-पक्षियों पर आधारित था। वह कन्द-मूल, फल एवं मांस का सेवन करता था। पशुओं की खाल के बने वस्त्र धारण करता था। आत्म सुरक्षार्थ कन्दराओं की दृढ़ सतहों का सहारा लिया। वह छोटे-छोटे समूह में रहने लगा। उसका सम्पर्क जंगली जानवरों जैसे शेर, हाथी, बारहसिंघा, वृषभ, जंगली भैंसा, गैंडा, सुअर आदि से हुआ। इस प्रकार आदिमानव और जानवरों के बीच एक अटूट सम्बन्ध स्थापित हुआ। उसकी दिनचर्या जंगली जानवरों के चारों ओर भ्रमण करती है। उसके क्रिया-कलापों से ही सबसे बड़े उद्देश्य शक्ति और बुद्धिमत्ता की झलक दिखाई देती है। वह अनजान शक्ति से भयभीत भी होता था, अतः उसे खुश करने के लिये विभिन्न अनुष्ठानों और जादू-टोना पर भी विश्वास करता था। मनोरंजन के लिये आल्हादित होकर नृत्य भी करता था। जानवरों का शिकार और विजयोत्सव उसके विशिष्ट क्रिया-कलापों में से हैं।

विश्व की सभी प्रागैतिहासिक कलाएँ मानव के सभ्य होने के पूर्व की हैं। उनमें मानव के जन्मोत्थान और उसके क्रमिक विकास की कहानी छिपी है। संघर्षपूर्ण पर्यावरण के साथ ही मानवीय विकास की कड़ियों को जोड़ पाते हैं। पुरातत्त्वीय साक्ष्य-औजार और शैल चित्रों के माध्यम से ही हम उसकी जीवन-शैली से अवगत हो पाते हैं।

वंश-वृद्धि की जिस शाखा से मानव का विकास हुआ, उसे दो भागों में विभक्त किया गया है।

1. होमोइरेक्टस और
2. होमोसेपियंस

वर्तमान मानव ‘होमोसेपियन’ शाखा से विकसित हुआ है। समस्त विश्व में प्रागैतिहासिक चित्रों के रचयिता इसी वंशज से उत्पन्न हुए हैं।

मानवीय विकास के साथ ही कलात्मक विकास भी परिलक्षित होता है। शैलाश्रयों में शरण लेने वाले मानवों की भावनात्मक अभिव्यक्ति और सृजनशीलता के दर्शन इन कन्दराओं की दीवारों पर ही होते हैं। जहाँ मानव का उद्भव एवं विकास उसकी सृजनात्मकता और पर्यावरण को जानने की उत्सुकता स्पष्ट नजर आती है, जो कि शैलाश्रयों में बने चित्रों से स्पष्ट होता है। ये चित्र पाषाण-काल के मानवों द्वारा निर्मित थे, जो चारों ओर के वातावरण की स्मृति बनाए रखने के लिये तथा अपनी विजय का इतिहास व्यक्त करने की भावना से प्रेरित होकर निर्मित किए गए थे। गुहावासी मानव ने अमूर्त भावना को मूर्त रूप प्रदान करने की वृत्ति के कारण बनाए हैं।

मानव की प्रगति के आधार पर पाषाण युग को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है।

1. पूर्व पाषाण युग (Palaeolithic age)- 30,000 ई.पू. से 25,000 ई.पू. तक।
2. मध्य पाषाण युग (Middle stone age)- 25,000 ई. पूर्व से 10,000 ई. पूर्व तक।
3. उत्तर पाषाण युग (Neolithic age)- 10,000 ई.पूर्व से 5,000 ई. पूर्व तक।

सर्वाधिक चित्र उत्तर पाषाण काल के ही प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार कला का बीजारोपण और प्रवर्धन इन्हीं शैलाश्रयों में हुआ। जिसका ज्ञान हमें पुरातत्वविदों के प्रयासों से होता है। जिनमें स्व.डॉ. वाकणकर, डॉ. जगदीश गुप्त, काकबर्न महोदय एवं कनिंघम महोदय आदि ने समूचे संसार को शैल चित्रों के सौन्दर्य से अवगत कराकर आश्चर्यचकित कर दिया।

प्रागैतिहासिक मानव ने भाषा के अभाव में जीवन से सम्बन्धित भावाभिव्यक्ति का सर्वप्रथम माध्यम रेखांकन को बनाया। वह तृप्त एवं हर्षोल्लासित नेत्रों द्वारा मुग्ध मनःस्थिति में भावों का रसास्वादन करता रहा। इसके उपरान्त उसने अनेकों स्थूल उपायों एवं माध्यमों द्वारा अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति करने का प्रयास किया, जिसके फलस्वरूप ही उसमें अभिव्यंजना-शक्ति विकसित अवस्था में परिलक्षित हुई।

वह पत्थरों की चट्टानों, भित्तियों आदि पर खड़िया, गेरू, कोयला आदि माध्यमों से कुछ रेखाएँ अंकित कर आनन्द का अनुभव करने लगा।

प्रागैतिहासिक मानव को स्वयं की अनुभूतियों को स्वयं देखने की अभिलाषा थी। अतः उसने कन्दराओं की दीवारों पर नुकीले औजारों से गहरा रेखांकन कर आड़ी-तिरछी रेखाओं से मानवाकृति तथा पशु समूह का रेखांकन किया एवं प्राकृतिक रंगों से परिपूर्ण किया। इन दीवारों पर ही उसने पशुओं पर विजय प्राप्त करने की योजना बनाई। पशुओं के विभिन्न स्वरूपों को दर्शाया।

Neolithic Period में कला का परिष्कृत रूप देखने को मिलता है। इस समय समूह में रहने से सम्प्रेषण की आवश्यकता महसूस की। गुफा चित्रों द्वारा वह सम्प्रेषण प्रभावों के आदान-प्रदान में कामयाब रहा। प्रकृति की मनोरम छटाओं व चेष्टाओं के अनुकरण, विश्राम की स्थिति, मनोरंजन एवं अनुभवों की सुखद पुनरावृत्ति से प्रेरित होकर कलाकृतियों का निर्माण किया। प्राकृतिक संसाधनों का सानिध्य और मानव उद्गारों की अभिव्यक्ति ने कला को प्रेरित किया।

पेंटिंगपेंटिंगकला सदैव से मनुष्य की सहचरी रही है। मनुष्य की सृजन की प्रक्रिया जिसमें नवीनता का समावेश हो, उसे कला की संज्ञा दी गई। कला एक ऐसी अभिव्यक्ति है, जिसमें सुख और शान्ति की प्राप्ति होती है। आत्मा के स्वरूप को समझने की जिज्ञासा और प्रवृत्ति को समझना एक मानवीय स्वभाव है। कला के माध्यम से इस स्वरूप को आसानी से समझा जा सकता है। कलात्मक सृजनशीलता में ही सौन्दर्य के दर्शन होते हैं।

समस्त सृजनात्मक प्रक्रियाओं का उद्देश्य आनन्द की प्राप्ति होता है। भावनाओं को रूप प्रदान करना और निर्माण की प्रक्रिया दोनों में ही कला के दर्शन होते हैं। इससे जीवन को गति मिलती है और उसके रूप को आकर्षण प्राप्त होता है।

कला प्राकृतिक रूपों से भिन्न होती है। प्राकृतिक रूपों में यथार्थता होती है तो कलात्मक रूपों में विशिष्टता। हीगल के मतानुसार प्रकृति एवं ईश्वरीय सौन्दर्य का आभास ही कला है। डॉ. आनन्द कुमार स्वामी के मतानुसार कलाकार किसी विशेष प्रकार का व्यक्ति नहीं, प्रत्युत प्रत्येक व्यक्ति विशेष प्रकार का कलाकार होता है।

कला के माध्यम से मनुष्य सृष्टि के सम्पर्क में बिखरे असीमित सौन्दर्य के रूपों में उस महान कलाकार परमात्मा के दर्शन करता है।

“मनुष्य में सौन्दर्य बोध की वृत्ति जन्मजात है। वह अपने जीवन को सौन्दर्य के विभिन्न उपादानों से सजाने-संवारने तथा मूर्त रूप देने का प्रयत्न करता है। इस प्रवृत्ति ने ही कला को जन्म दिया। उसकी समस्त कल्पनाओं, भावनाओं तथा क्रिया-कलापों को उत्कर्ष की सीमा तक ले जाने का एक मात्र माध्यम कला है।” कला का प्रमाण प्राचीन वेदों, बाह्यण ग्रन्थों और उपनिषदों में मिलता है। कला का प्राचीनतम प्रयोग ऋग्वेद में हुआ है।

कला शब्द का अर्थ सौन्दर्यात्मक अभिव्यक्ति है। शब्द, रेखा, वाणी, चेष्टा आदि किसी भी प्रकार से मानव द्वारा मन और बुद्धि के संयोग से की गई सौन्दर्यमयी अभिव्यक्ति कला है। कला शब्द अपने आप में एक व्यापक अर्थ लिये है।

भारतीय कलाचार्यों ने कला की उत्पत्ति संस्कृत की ‘कल्’ धातु से मानी है, जिसका अर्थ निम्नानुसार है।

कल- सुन्दर, कोमल, सुखद, मधुर
कल्- शब्द करना, बजना, गिनना
कड्- मदमस्त करना, प्रसन्न करना
कं- आनन्द
कम्- आनन्द लाती/ इति/कला अर्थात -आनन्द लाने का नाम कला है।

आचार्य भरत ने पहली शती के लगभग कला शब्द का प्रयोग शिल्प, कौशल एवं हुनर से किया। इसके अतिरिक्त कला शब्द का प्रयोग शतपथ बाह्यण, सांख्यायन बाह्यण, एतरेय बाह्यण संहिताओं और बौद्ध साहित्यों में प्रयुक्त होता था। पाणिनी की अष्टाध्यायी और बौद्ध साहित्य में ‘सिप्प’ शब्द ललित और उपयोगी दोनों तरह की कलाओं के लिये प्रयुक्त हुआ। इस प्रकार प्राचीन काल में समस्त कलाएँ ‘शिल्प’ के अन्तर्गत आती थीं। अष्टाध्यायी में शिल्प का प्रयोग ‘चारू’ और ‘कारू’ अर्थात-सौन्दर्यपूर्ण कला और क्रिया पूर्ण कला के लिये किया गया।

कला शब्द का परिचय भारतीय भाषा में ‘कला’ के रूप में पाश्चात्य (यूरोपीय) भाषा में ‘Art’ के रूप में मिलता है, जो लेटिन भाषा के ‘आर्स’ (ARS) शब्द से बना है। जिसका ग्रीक रूपान्तर ‘TEXVEN’ (तैक्ने) है। इस शब्द का प्राचीन अर्थ शिल्प या क्राफ्ट (Craft) अथवा नैपुण्य-विशेष है। प्राचीन भारतीय मान्यताओं में भी कला के लिये ‘शिल्प’ और कलाकार के लिये शिल्पी शब्द का अधिक प्रयोग हुआ। इटालियन शब्द ल आर्ते (L’arte), स्पेनिश एल आर्ते (el’arte), फ्रेंच ल आर्त (L’art) तथा अंग्रेजी शब्द आर्ट (Art) समस्त ‘अर’ नामक मूल धातु से उत्पन्न हुए हैं।

जर्मन भाषा दिई कुनस्त (die kunst) इण्डियन यूरोपियन- ग्न (gne) एवं रूसी भाषा में इस्कुज्त्वो से जाना गया।

इन शब्दों में विभिन्नता होते हुए भी इन सबके अर्थ और प्रयोग में समानता दिखाई देती है। ईरानी भाषा में कला को ‘तशन’ एवं ‘हुनर’ कहा गया, जिसका सम्बन्ध क्रमशः ‘तक्षण’ और संस्कृत शब्द ‘सुनर’ से किया गया।

इन सभी शब्दों का प्रयोग हस्त शिल्प (hand carft) के लिये किया जाने लगा। इसके अन्तर्गत बढ़ई, सुनारी, लुहारी, कपड़ा बुनना आदि कलाएँ आने लगीं। 15 वीं शताब्दी में केवल उदार कलाओं का अभ्यास करने वाले को कलाकार कहा गया। प्राचनी भारतीय साहित्य में कला को महाशिव की आदिशक्ति से सम्बद्ध माना है।

‘ललिता-स्तवराज’ से ज्ञात होता है कि शिव की सखी महामाया ललिता के लालित्य से ही ललित कलाओं की सृष्टि हुई है। ललित कलाएँ आनन्द की निधि हैं। वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला तथा संगीत को ललित कला के अन्तर्गत माना गया है।

भारतीय विचारधारा

कला एक व्यापक शब्द है, जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि का आनन्द निहित है। भारतीय विचारधारा अनुसार ब्रह्मा को कलाकार और विश्व को उनकी महानतम कृति कहा गया है। कला सौन्दर्य पर आधारित है। ‘सत्यम शिवम् एवं सुन्दरम्’ की विचारधारा भारत में प्रचलित रही है। कला में समस्त सृजन संसार सिमटा हुआ है, जो विचारों और आकारों से सम्बन्धित है। विचारकों एवं दार्शनिकों ने कला के सम्बन्ध में अपने-अपने विचार व्यक्त किए हैं।

1. रवीन्द्रनाथ टैगोर
जो सत्य है, सुन्दर है वही कला है।
सत्यम शिवम सुन्दरम की अभिव्यंजना कला है।
कला में मनुष्य अपनी अभिव्यक्ति करता है।

2. पण्डित क्षेमराज
कलयति स्वरूप आवेशयति वस्तुनिवा।
कला वस्तु के स्वरूप को सम्मोहक बनाती है।
नव-नव पथोन्मेष शालिनी प्रतिभा कला।
वस्तु को रूप देने का नाम कला है।

3. डॉ. राधा कृष्णन
कला व्यक्ति कोे चिरस्थायी कीर्ति संस्कृति की शास्वत धरोहर ही नहीं अपितु उसकी प्रधान प्रेरणा भी है कला स्फूर्ति देती है, प्रोत्साहित और सुशिक्षित भी करती है। कला सबको एक सूत्र में बाँधने वाली महान शक्ति है। जन-जीवन पर उसका प्रभाव सर्व व्याप्त है।

4. डॉ. राधा कृष्णन
“कला वस्तुओं के अन्तरंग वास्तविकता के रहस्यों को उद्घाटित करती है, जो ज्ञान है और कला का अनुकरण भी है।”

5. मैथिली शरण गुप्त
- ‘आनन्द और सौन्दर्य की साधना कला है।’
- हो रहा है जो जहाँ सो हो रहा
यदि हमने कहा तो क्या कहा?
किन्तु होना चाहिए कब क्या यहाँ,
व्यक्त करती है कला ही यह यहाँ

अर्थात कलाकार कल्पना के सहारे यथार्थ या सत्यता में भावों को व्यक्त करता है, परन्तु कला के सहारे कलाकार आदर्श रूप को भी प्रस्तुत करता है।

6. जय शंकर प्रसाद
- ‘ईश्वर की कृतित्व शक्ति का संकुचित रूप जो हमको बोध के लिये मिलता है वही कला है।’
- ‘श्रेयमयी प्रेम रचना कला है।’

7. वासुदेव शरण अग्रवाल
“कला किसी विचार या कल्पना को दृश्य रूप देती है। कला का रहस्य यही है कि उसमें लोक संस्कृति-परम्परा की व्याख्या होती है।”

8. रायकृष्ण दास
“कला हृदयानुभूति का परिणाम है, किसी तथ्य का आदर्शवादी स्वरूप नही।”

9. डॉ. हरद्वारी लाल शर्मा
“किसी कृति (करना) प्रणति (कथन), गठन, निर्माण, रचना अथवा अभिव्यक्ति को हम कला कह सकते हैं, जिसके विन्यास या ताने-बाने में रूप का अनुभव हो।”

10. डॉ. त्रिगुणायत
“अनुभूत सौन्दर्य के सजीव पुनर्विधान को ही कला कह सकते हैं।”

11. श्याम सुन्दर दास
“जिस अभिव्यंजना में आन्तरिक भावों का प्रकाशन तथा कल्पना का योग रहता है, वह कला है।”

12. अज्ञेय
“सामाजिक अनुपयोगिता की अनुभूति के विरुद्ध अपने को प्रभावित करने का प्रयत्न।”

13. जैनेन्द्र
“अहम का विसर्जन-साहित्य और कला है।”

14. शुक्ल जी
“कला का सम्बन्ध मनुष्य की भावना से है। वह तो रूप की अभिव्यक्ति मात्र है।”

भारतीय विचारकों के कला के सम्बन्ध में सामान्य विचार

1. सृष्टि के सौन्दर्य की वाणी कला है।
2. महान सृष्टिकर्ता के चरम आदर्श की ज्योति कला है।
3. जन-जन की आत्मा से मुखरित होने वाला स्वर कला है।
4. विधाता की इस विशाल सृष्टि की मूल शक्ति का स्वरूप कला है।
5. रूप प्रतिष्ठा में अप्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष, मूक को वाचाल, अमूर्त को मूर्त रूप देने में जिस चातुर्य, कौशल एवं नीति का सहारा लेना पड़ता है, वह कला है।

उपनिषदः तैतरीय उपनिषद में कहा गया है कि ‘कला स्वर्ग से उतरी है।’ अर्थात कला में स्वर्ग का प्रतिरूप दिखाई देता है।

कला के सम्बन्ध में पश्चिमी विचार धारा

कला के सम्बन्ध में पश्चिमी विचारकों, दार्शनिकों एवं विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत दृष्टिगोचर होते हैं, जो कि उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि एवं कला के प्रति पैनी दृष्टि को प्रकाशित करते हैं। पाश्चात्य विचारकों ने कला को परिभाषित करते हुए अनेकों सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। कला के सम्बन्ध में उनके कुछ प्रमुख विचार इस प्रकार हैं।

1. प्लेटो
“कला सत्य की अनुकृति की अनुकृति है।”

2. अरस्तू
“कला प्रकृति के सौन्दर्यमय अनुभवों का अनुकरण है।”

3. हरबर्ट रीड
यद्यपि अभिव्यंजना ही कला है किन्तु प्रत्येक अभिव्यंजना ही कला है।

4. फ्रायड
- ‘कला दमित भावनाओं की अभिव्यक्ति है।’
- ‘यौन भावनाओं की अभिव्यक्ति का साधन कला है।’

5. क्रोचे
- ‘कला बाह्य प्रभावों की अभिव्यक्ति है।’
- ‘मानसिक अभिव्यक्ति है।’

6. बेडले
कला का उद्देश्य इस दृश्यमान जगत के किसी एक भाग या अंग का प्रदर्शन करना नहीं है और न ही उसकी अनुकृति उपस्थित करना है बल्कि उससे भिन्न एक सम्पूर्ण सृष्टि का विधान करना है।

7. काण्ट
“कला एक अभिव्यक्ति है।”

8. टॉलस्टॉय
- ‘कला आचार तथा भाव प्रेरणा का महत्त्वपूर्ण साधन है।’
- ‘अपने में भावों की क्रिया रेखा रंग ध्वनि द्वारा इस प्रकार अभिव्यक्त करना कि उसे देखने-सुनने में भी वही भाव उत्पन्न हो जाए।’
- ‘कला भावना की भाषा और तत्वतः अभिव्यक्ति है।’
- ‘कला एक मानवीय चेष्टा है जिसमें मनुष्य अपनी अनुभूतियों को स्वेच्छापूर्वक कुछ संकेतों के द्वारा दूसरों पर प्रकट करता है।’

9. रस्किन
‘प्रत्येक महान कला ईश्वरीय कृति के प्रति मानव के अह्लाद की अभिव्यक्ति है।’

10. सुकरात
“कला केवल अनुकरण नहीं है, बल्कि कलाकार प्रकृति में जो कुछ अभाव देखता है, उसे वह अनपी आन्तरिक अनुभूतियों के आधार पर पूरा कर देता है।”

11. कलिंगवुड
‘कला को आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति मानते हैं।’

12. गिब्सन
“कला प्रकृति का अनुवाद है और अनुवाद जितना ही निकटतम होता है, उतना ही श्रेष्ठतर होता है।”

13. हीगल
- ‘प्रकृति एवं ईश्वरीय सौन्दर्य का आभास।’
- ‘कला, अधिभौतिक सत्ता को व्यक्त करने का माध्यम।’
- ‘भाव के विकास का माध्यम।’

14. मार्क्स
‘व्यक्ति में समष्टि की चेतना का प्रतिफलन।’

15. हर्बर्ट स्पेंसर
‘फालतू शक्ति का खेल।’

16. शेली
‘कला में मनुष्य अपनी अभिव्यक्ति करता है।’

17. टी. एस. इलियट
‘व्यक्ति से मोक्ष’

18. Dante
‘Art must be God’ grand child.’

19. फागुए (फ्रेंच समालोचक)
“कला भाव की उस अभिव्यक्ति को कहते है, जो तीव्रता के साथ मानव हृदय को स्पर्श कर सके।”

20. हम्बोल्ट
“कला कल्पना के माध्यम से प्रकृति का निरूपण करती है। इस तरह कलाकार कल्पना शक्ति के माध्यम से प्रकृति का पुनः निर्माण करता है अर्थात कला प्रकृति के सत्यों का उद्घाटन करती है।”

21. फ्रेडिक
‘कला अनन्त अपरिमेय है।’

22. बेबर
“कला दर्शन से भी उच्चतर है, क्योंकि दर्शन ईश्वर की कल्पना करता है, कला स्वयं ईश्वर है।”

23. हर्बट रीड
“एक साधारम सा शब्द कला साधारणतया उन कलाओं से जुड़ा होता है, जिन्हें हम रूप प्रद या दृश्य कलाओं के रूप में जानते हैं। वस्तुतः इसके अन्तर्गत साहित्य व संगीत कलाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि सभी कथाओं में कुछ तत्व एक समान होते हैं।”

नटराज की मूर्तिनटराज की मूर्ति कला के मूल तत्व

भारतीय और पाश्चात्य दोनों विचार धाराओं के विश्लेषण के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि कलाकृति का लक्ष्य कला रसिक को आनन्द की अनुभूति कराना है। जिसमें कलाकृति का सौन्दर्यपूर्ण होना आवश्यक है। वह सौन्दर्यपूर्ण तभी मानी जाएगी। जब वह कलागत सूक्ष्मता और तकनीकी ज्ञान से परिपूर्ण होगी। कलाकृति को सौन्दर्यपूर्ण और आनन्द योग्य बनाने के लिये कला सम्बन्धी नियमों का ज्ञान भी परमावश्यक है।

कलाओं में चित्रकला का स्थान सर्वोपरि है। जब कलाकार चित्र सृजन करता है कला के तत्व और चित्र सृजन के सिद्धान्तों का ज्ञान अत्यावश्यक है। कला के तत्व ही संयोजन की विभिन्नता दर्शाते है। कला के मूल छः तत्व हैं।

कला के मूल तत्व
1. रेखा
2. रूप
3. वर्ण
4. तान्
5. पोत
6. अन्तराल

इन तत्वों के उचित संयोजन से ही चित्र सृजन सफल होता रहा है और इसी कारण से नई-नई कला शैलियों ने जन्म लिया और इसी से शैलीगत विकास हुआ। नए-नए प्रयोगों द्वारा नई सम्भावनाओं के द्वारा और अपने क्रमिक प्रयत्नों से सर्वमान्य सिद्धान्तों के आधार पर सम्भव हुआ।

चित्र सृजन में बिन्दु का अपना महत्त्व है। जब किसी समतल रिक्त सतह पर कोई बिन्दु रख दिया जाता है, तो वह सतह सक्रिय हो जाती है। बिन्दु अपने आप में गूढ़ रहस्यों को समाहित किए हुए है। बिन्दु से आन्तरिक शक्ति जागृत होती है, जिससे कलाकृति में शक्ति का बोध हो जाता है। यही बिन्दु कलाकृति के सृजन में प्रेरक बनता है। जब एक से अधिक बिन्दु आपस में मिलते हैं तभी रेखा का निर्माण होता है।

1. रेखा (LINE)-
प्रकृति में हमें रेखा प्राप्त नहीं होती। मनुष्य ने कलात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में रेखा का विकास किया है। यह कलाकृति का आधार है।

A line, thus, can be said a symbolic mark denoting movement and force in a form metered by our eye.

रेखा चित्र सृजन का महत्त्वपूर्ण माध्यम है भारतीय कला रेखा प्रधान कला रही है। “आदिम चित्रकार ने परवर्ती संतति को रेखाओं का अमूल्य उपहार प्रदान किया है जो आज तक चला आ रहा है।” अजन्ता की इसी रेखा शैली ने चीन, जापान, सुदूर पूर्व व समस्त एशिया की कला को प्रभावित किया।

रेखा दो बिन्दुओं या दो सीमाओं के बीच का विस्तार है और कई बिन्दुओं के जुड़ाव या बिन्दुओं के पंक्तिबद्ध समूह से रेखा बनती है।

रेखा दिशा-निर्देश भी देती है। इसके अपने प्रभाव होते हैं। हल्की रेखा कोमलता, अस्पष्टता तथा दूरी की द्योतक होती है। वहीं गहरी रेखा स्पष्टता, सजीवता, निश्चयता, कठोरता, शक्ति और समीप्य प्रकट करती है। गोल रेखा में सौन्दर्य और सौष्ठव झलकता है। तिरछी रेखाओं में गति, दृढ़ता एवं शक्ति होती है। उर्ध्व रेखाएँ आशा उत्साह का संचार करती है। नीचे जाने वाली रेखाएँ करूणा और दुख प्रकट करती हैं। जटिल रेखाएँ उलझन तथा सरल रेखाएँ सहजता और शान्ति प्रकट करती हैं।

रेखा की दुर्बलता, अस्पष्टता इसके दुर्गुण हैं।

चित्र निर्माण में रेखा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके बिना रूप की कल्पना असम्भव है। चित्रकार की निपुणता ही रेखा की सहायता से विभिन्न संयोजन बनाती है।

2. आकार (FORM)-
‘From in two dimensional art is the area containing colour.’- N.Knobler

रूप वह क्षेत्र या स्थान है जिसका निश्चित आकार और वर्ण होता है। इसे FORM कहते हैं अर्थात-

F- First
O-Organic
R- Revelation of
M- Matter

अर्थात किसी पदार्थ का चित्र भूमि पर प्रथम दृश्य प्रत्यक्षीकरण ही रूप है।

हम प्रकृति से विभिन्न रूपों मनुष्य, पशु, पक्षी, वनस्पति, मूर्त, अमूर्त आकारों को चित्र में संयोजित करते हैं। विभिन्न आकारों के प्रभाव मानस पटल पर अलग-अलग होते हैं। आयताकार दृढ़ता, स्थिरता, शक्ति, एकता भाव दर्शाते हैं। त्रिभुजाकार (पिरामिड) स्थिरता, सुरक्षा व शाश्वता (Permanancy) तथा विलोम त्रिभुज अनिश्चय, अशान्ति, लिप्तता व परिवर्तन दर्शाते हैं। वक्राकार या वृत्ताकार, अण्डाकार, दीर्घवृत्तीय आदि लामण्य सौन्दर्य नित्यता सृजनात्मकता पूर्णता, गति, समानता आदि प्रभावों के संवाहक है। रूप के अभाव में भाव अभिव्यक्ति नहीं की जा सकती।

सृजन प्रक्रिया में रूप का स्थान महत्त्वपूर्ण है। रूप के अभाव में चाक्षुष कलाओं का अस्तित्व ही नहीं है। रूप एक से अधिक भी हो सकते हैं जो चित्र भूमि को विषयानुरूप कलाकृति निर्मित करते हैं।

आकार चार प्रकार के होते हैं।

1. प्राकृतिक
2. आलंकारिक
3. ज्यामितिक व
4. सूक्ष्म आकार।

कलाकार सदैव नवीन आकार की खोज में निरन्तर लगा रहता है।

3. रंग (COLOUR)-

रंग किसी भी कलाकृति का प्राण है जो दृ्ष्टि एवं प्रकाश पर निर्भर करता है। प्रत्येक वस्तु का कोई-न-कोई रंग अवश्य होता है। जिसकी पहचान धरातलीय रंग के कारण होती है।

“वर्ण प्रकाश का गुण है। कोई स्थूल वस्तु नहीं है। इसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, बल्कि ‘अक्षपटल’ द्वारा मस्तिष्क पर पड़ने वाला एक प्रभाव है।”

एक ही आकार की दो वस्तुओं को उनके अलग-अलग रंगों से पहचाना जा सकता है। रंग दृश्य पदार्थ का वह गुण है, जिसका अनुभव हम केवल नेत्रों द्वारा कर सकते हैं। प्रकाश द्वारा ही हम किसी वस्तु को देख सकते हैं प्रकाश ही रंगों का बोध कराता है। रंग से ही मानसिक अनुभूति कराता है। रंग दो प्रकार के होते हैं।

1. प्राथमिक(Primary)- R, Y, B (लाल, पीला और नीला)
2. द्वितीयक (Secondary)- नारंगी, हरा, जामनी।

चित्र विधि अनुसार अपारदर्शी (Opaque) और पारदर्शी (Transparent) विधियाँ है।
रंग की रंगत (Hue), मान (Value) तथा सघनता (Intensity) वर्ण के गुण हैं।
रंगों के अपने प्रभाव हैं जैसे-

लाल- उत्तेजकता, क्रोध, संघर्ष, उष्णता, प्रेम, आवेश।
पीला- प्रफुल्लता, प्रकाश, बुद्धिमत्ता, प्रसन्नता तथा समीपता आदि।
नीला- शीतलता, आनन्द, आकाश, मानसिक अवसाद, दुख आदि।
हरा- विश्राम, सुरक्षा, मनोहरता, उर्वरता, विकास आदि।
नारंगी- ज्ञान, वीरता तथा प्रेरणा।
सफेद- शुद्धता, शान्ति, उज्ज्वलता, एकता, सत्यता।
काला- अवसाद, अन्धेरा, भय व बुराई।

इस प्रकार चित्रकार रंगों के माध्यम से रसमय एवं भावपूर्ण बना कर उसे जीवन्त करता है जिससे कला रसिक आनन्दित होता है।

4. तान (TONE)

रंगों के छाया प्रकाश का प्रभाव तान (TONE) कहलाता है। जब किसी रंग में सफेद रंग की मात्रा मिलाई जाती है तो हल्की रंगत मिलती है और यदि काले रंग की मात्रा मिलाई जाती है तो गहरी रंगत प्राप्त होती है।

इस प्रकार तान द्वारा द्विआयामी तल पर त्रिआयामी प्रभाव उत्पन्न किया जा सकता है। रंगों के टोन से हल्का और भारीपन दर्शाया जा सकता है।

5. पोत (TEXTURE)
‘Texture is the character of the surface.’

किसी भी वस्तु के धरातल के गुण को ही पोत कहते हैं। इसे देखकर या स्पर्श कर महसूस कर सकते हैं। जैसे चिकना, खुरदुरा आदि।

6. अवकाश(Space)

किन्हीं दो आकृतियों के बीचे की जगह को अवकाश कहते हैं। यह अवकाश ही आकृतियों को महत्त्व प्रदान करता है। इससे शैली का अन्तर पता चलता है। जैसे मधुबनी में अवकाश कम दिखाई देता है तो मुगल राजस्थानी शैली में अपेक्षाकृत अधिक अवकाश दिखाई देता है।

कला के उद्देश्य

कला अनन्त व अपरिमेय है। जिसमें कल्पना और अभिव्यक्ति का भाव निहित है। मानव एक सामाजिक प्राणी है और वह स्वयं के चारों ओर के परिवेश को सौन्दर्यतापूर्ण बनाने की चाह रखता है। कला सजाती संवारती और संस्कारवान भी बनाती है।

कला के लिये ऐतरेय बाह्यण में कहा गया है।
आत्मान्- संस्कुरते।

अर्थात कला आत्मा को संस्कारवान बनाती है।
पुरातन युग में कला ही नहीं समग्र जीवन पर धर्म का सर्वाधिक प्रभाव रहा है। शिवस्वरूपविमर्शिनी में क्षेमराज ने परमानन्द में लीन होने में कला को सर्वोत्तम माना है-

विश्रान्तिर्यस्याः सम्भोगे सा कला न कला मता।
लीयते परमानन्दे ययात्मा मा परा कला।।


अर्थात जिसकी विश्रान्ति भोग में है वह कला नहीं है। जिससे आत्मा परमानन्द में लीन हो जाए वही कला है।

भारत में यद्यपि एक ओर कला काम-तृप्ति का साधन मानते हुए काम कलाओं का विकास हुआ, वहीं दूसरी ओर चित्र सूत्रकार ने कलाओं को चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति में सहायक माना है।

कलानां प्रवरं चित्रम् धर्मार्थ काम मोक्षदं।

अर्थात कला के द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। कला का उद्देश्य जीवन की व्याख्या करना ही नहीं बल्कि उसके आदर्श को भी स्थिर करना है। यथार्थ और आदर्श के सामंजस्य से श्रेष्ठतम कला को जन्म मिलता है। जब आदर्श रूप धारण कर कला के रूप में व्यक्त होता है तो उसका रूप अलौकिक होता है। कला द्वारा आदर्शीकरण की भी भावना को मैथिलीशरण गुप्त ने इस प्रकार व्यक्त किया है-

हो रहा है जो जहाँ सो हो रहा,
यदि वही हमने कहा तो क्या कहा।
किन्तु होना चाहिए कब क्या कहाँ,
व्यक्त करती है कला ही यह यहाँ।


कला का मुख्य उद्देश्य आनन्द की प्राप्ति है। कुछ विद्वानों का मत है कि कला कला के लिये है, उसका उद्देश्य शुद्ध सौन्दर्य सृजन आत्म सन्तुष्टि कुछ नया, कुछ अनोखा, अद्भुत एवं अमूर्त सृष्टि करना हो गया है। यह विचारधारा यूरोप में अधिक प्रचलित रही है।

चित्रकारीचित्रकारीसमय के साथ-साथ कला के उद्देश्यों में भी परिवर्तन आता चला गया। प्रारम्भिक दौर में मनुष्य जैविक परिस्थितियों से संघर्ष कर रहा था। अतः कला का उद्देश्य शिकार करने की प्रक्रियाओं से ही सम्बन्धित रहा। उसके पश्चात यह धर्म की ओर अग्रसर हुआ। पूर्व एशियाई देशों में कला धर्म प्रचार हेतु रही। बौद्ध, जैन, वैष्णव धर्म के प्रचारार्थ कला का उपयोग किया गया। अजन्ता, बाघ, सांची, चीन, जापान की बौद्ध धर्म को इंगित करती है। राजपूत, कांगड़ा शैली वैष्णव धर्म को उजागर करती है।

वहीं पश्चिमी सभ्यता में कला का उद्देश्य दो प्रकार से दृष्टिगत होता है। प्रथम ईसाई धर्म प्रचारार्थ और दूसरा ‘कला कला के लिये’ इस भावना का जन्म 19 वीं शताब्दी में फ्रांसीसी साहित्य में हुआ। जिसके प्रवर्तक आस्कर वाइल्ड माने जाते हैं। इस विचारधारा को यूनान ने माना और यह इटली, जर्मनी, फ्रांस तथा इंग्लैण्ड होता हुआ भारत में फैला।

इस प्रकार उद्देश्य की दृष्टि से कलाकार दो वर्गों में वर्गीकृत हो गए-

1. परम्परावादी कलाकार जो समाज के लिये कला को उपयोगी मानते हैं।
2. स्वान्तः सुखाय मानकर ‘कला के कला के लिये’ सिद्धान्त मानकर चलते हैं।

काण्ट ने कला के आनन्द गुण को ही स्वीकारा है।

“Art is different but in no way divorced from life and many of the problems and feelings of life take part in it.”

अर्थात कला जीवन से भिन्न अवश्य है, पर अलग नहीं वह जीवन की समस्याओं का समाधान भी करती है।

भारतीय कला का उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति है। कलाओं की रचना करने और उसके आस्वादन लेने कलाकार दर्शक या श्रोता आनन्द से भर जाए। उसकी आत्मा परमानन्द में डूब जाए, इसी परमानन्द की प्राप्ति भारतीय कला का लक्ष्य है।

क्षणिक आनन्द की प्राप्ति भारतीय कला का लक्ष्य कभी नहीं रहा। कला का उच्चतम लक्ष्य आनन्द की प्राप्ति है। तप और योग की समस्त क्रियाएँ इसी आनन्द की साधना हेतु है।

विभिन्न विद्वानों ने कला के उद्देश्य के बारे में कहा है-

1. ‘समस्त कला आनन्द के प्रति समर्पित है।’-शिलेर
2. ‘कला का धर्म मानव मस्तिष्क को सत्य की अनुभूति कराना होता है। मानव मस्तिष्क को उस स्तर पर पहुँचना होता है, जहाँ उसकी समस्त इच्छाएँ, वासनाएँ लुप्त हो जाती हैं और वह शुद्ध सद्चित आनन्द की अनुभूति करने लगता है।’-शापर
3. ‘कला का लक्ष्य मानव आनन्द की अभिवृद्धि करना होता है।’ -विलियम मोरिस
4. ‘कला का सबसे महत्त्वपूर्ण काम यह है कि वह मनुष्य के मन और इन्द्रियों को आनन्द की दुनिया से उठाकर उस दुनिया में ले जाए, जहाँ वह अपने स्व से परे एक ऐसी सत्ता की अवस्था अनुभव कर सकें, जो उसे समष्टि के साथ एकता प्रदान करे, यानि मोक्ष की अवस्था तक ले जाए।’ -निहाररंजन
5. ‘कला धर्म (लक्ष्य) एन्द्रिक परिवेश में सत्य को दिग्दर्शित करना होता है अर्थात जड़ में चैतन्य की अभिव्यक्ति।’-हीगल
हीगल ने कला को प्रकृति से श्रेष्ठ माना है।
6. ‘कला के केवल तीन कार्य हैं- मानव की धार्मिक आस्थाओं की अभिव्यक्ति उनकी नैतिक स्थिति की पूर्णोपलब्धि एवं उनकी भौतिकी सेवा।’-रस्किन
7. ‘कला का धर्म समकालीन ऊँचाइयों तक पहुँचना होता है अर्थात उसे अपने युग का प्रतिनिधित्व करना चाहिए।’ -टॉलस्टॉय
8. ‘कला का प्रथम और अन्तिम लक्ष्य केवल सौन्दर्य को प्रतिबिम्बित करना होता है।’ -लेसिंग
9. ‘कला का उद्देश्य इस दृश्यमान जगत के किसी भाग अथवा अंग का प्रदर्शन करना नहीं है, न ही उसकी अनुकृति उपस्थित करना है बल्कि उससे भिन्न एक सम्पूर्ण स्वतंत्र सृष्टि का विधान करना है।’-बेडले
10. ‘कला के माध्यम से जब व्यक्ति सृष्टि के रचयिता के महान कलाकार के सम्पर्क में आता है तो उसे उस बिखरे हुए असीमित सौन्दर्य के रूप में वह उस महान कलाकार परमात्मा के दर्शन करता है।’-रवीन्द्रनाथ टैगोर

कला मानव जीवन में सहजता और सन्तोष प्रदान करती है। जब कला भाव चेतना जागृत करती है, तो उसके हृदय, मस्तिष्क और ज्ञान को आनन्द प्रदान करती है। जब कला का लक्ष्य नैतिक सौन्दर्य बनता है, तो कला उत्कृष्टता को प्राप्त करती है। तब वह रहस्यमयी न होकर जीवन-दर्शन और मानव धर्म के इतने निकट आ जाती है कि दोनों उससे परिप्लावित होते हैं। इसके द्वारा ईश्वर के निकट पहुँच जाना सम्भव है।

कला का एक उपयोगी पक्ष भी है, जो जीवन में दृढ़ सम्बन्ध स्थापित करता है। वर्तमान में कला का उद्देश्य स्वांतः सुखाय और धनोपार्जन हो गया है। अद्यतन स्थिति में कला का व्यवसायीकरण हो गया है। कला जन की कला से ही दूरी बनाए हुए है। अद्यतन स्थिति में परिवर्तित रूप में प्रफुल्लित हो रही है।

कला के बिना किसी भी क्षेत्र में सफलता पाना असम्भव है।

कला का वर्गीकरण

कला हृदय (आत्मा) को आनन्द की अनुभूति कराती है। कला अविभाज्य है, पर उसके गुणों और सुविधा की दृष्टि से उसे विद्वानों दार्शनिकों एवं विचारकों ने उसे वर्गीकृत कर दिया है। प्राचीन साहित्य के अध्ययन से कला के वर्गीकरण का ज्ञान होता है। कला के वर्गीकरण की दो परम्पराएँ दिखाई देती हैं। (1) पूर्वी तथा (2) पश्चिमी। कुछ विद्वानों का मानना है कि कला को वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। सौन्दर्य शास्त्री क्रोचे का मानना है कि कलाओं में श्रेणी विभाजन तो किया जा सकता है परन्तु वर्गीकरण नहीं, क्योंकि एक कला को दूसरी कला से पृथक नहीं किया जा सकता है।

भारतीय साहित्य में कला इस प्रकार पाई गई है-

ललित विस्तार- 86
प्रबन्ध कोष - 72
कामसूत्र (वात्स्यायन) - 64
कालिका पुराण - 64
कादम्बरी - 64
काव्य शास्त्र (आचार्य दण्डीकृत) - 64
अग्नि पुराण - 64
बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों में -64

अधिकांश शास्त्रों में कलाओं की संख्या 64 होने से यही संख्या सर्वमान्य मानी गई है। कामसूत्र के तीसरे अध्याय में उल्लेखित 64 कलाएँ निम्नानुसार हैं।

1. गीतम (संगीत)
2. वाद्यम (वाद्य वादन)
3. नृत्यम (नाच)
4.आलेख्यम (चित्रकला)
5.विशेषकच्छेद्यम (पत्तियों को काट-छांट कर विभिन्न आकृतियाँ बनाना या तिलक लगाने के लिये विशेष प्रकार के साँचे बनाना)
6.तण्डुलकुसुमावलि विकारा (देव पूजन के समय विभिन्न प्रकार के जौ चावल तथा पुष्पों को सजाना)
7. पुष्पास्तरणम् (कक्षों तथा भवनों को उपस्थानों को पुष्पों से सजाना)
8. दशनवसनांगराग (दाँत, वस्त्र और शरीर के दूसरे अंगों को रंगना)
9. मणिभूमि का कर्म (घर के फर्श को मणि मोतियों से जड़ित करना)
10. शयनरचनम (शैय्या को सजाना)
11.उदकवाद्यम (पानी में ढोलक की सी आवाज निकलना)
12. उदकाघात (पानी की चोट मारना या पिचकारी छोड़ना।
13. चित्राश्वयोगा (शत्रु को विनष्ट करने के लिये तरह-तरह के योगों का प्रयोग)
14. माल्यग्रंथन विकल्पा (पहनने तथा चढ़ाने के लिये फूलों की मालाएँ बनाना)
15. शेखरकापीडयोजनम (शेखरक तथा आपीड जेवरों को उचित स्थान पर धारण करना)
16. नैपथ्यप्रयोगा (अपने शरीर को अलंकारों व पुष्पों से विभूषित करना)
17. कर्णपत्रभंगा (शंख, हाथी दाँत आदि के कर्ण आभूषण बनाना)
18. गन्ध युक्ति (सुगन्धित धूप बनाना)
19. भूषणयोजनम् (भूषण तथा अलंकार पहनने की कला)
20. एंद्रजाल (जादू का खेल दिखाकर दृष्टि को बाँधना)
21. कौचुमारयोग (बलवीर्य बढ़ाने की औषधियाँ बनाना)
22. हस्तलाघवम (हाथ की सफाई)
23.विचित्रशाकयूष भक्ष विकार क्रिया (अनेक प्रकार के भोजन जैसे शाक, रस मिष्ठान आदि बनाने की क्रिया)
24. पानकरसरागासवयोजनम (विभिन्न पेय शर्बत बनाना)
25. सूचीवानकर्माणि (सुई के कार्य में निपुणता)
26. सूत्र क्रीड़ा (सूत में करतब दिखाना)
27. वीणाडमरूकवाद्यानि (वीणा और डमरू को बजाना)
28.प्रहेलिका (पहेलियों में निपुणता)
29. प्रतिमाला( दोहा श्लोक पढ़ने की रोचक रीति)
30. दुर्वाचक योग (कठिन अर्थ और जटिल उच्चारण वाले वाक्यों को पढ़ना)
31. पुस्तक वाचक (सुन्दर स्वर में ग्रन्थ पाठ करना)
32. नाटकाख्यायिकादर्शनम ( नाटकों तथा उपन्यासों में निपुणता)
33. काव्यसमस्यापूरणम (समस्या पूर्ति करना)
34. पट्टिकाचित्रवानविकल्पानि ( छोटे उद्योगों में निपुण)
35. तक्षकर्माणि (लकड़ी धातु की चीजों को बनाना)
36. तक्षणम (बढ़ई के कार्य में निपुण)
37. वास्तु विद्या (गृह निर्माण कला)
38. रूप्य रत्न परीक्षा (सिक्कों तथा रत्नों की परीक्षा)
39. धातुवाद (धातुओं को मिलाने तथा शुद्ध करने की कला)
40. मणिरागाकारज्ञानम (मणि तथा स्फटिक काँच आदि रंगने की कला ज्ञान)
41. वृक्षायुर्वेदयोग (वृक्ष तथा कृषि विद्या)
42. मेषकुक्कुट-लावक-युद्ध विधि (टेढ़े मुर्गे और तीतरों की लड़ाई परखने की कला)
43. शुकसारिका-प्रलापनम (शुकसारिका को सिखाना तथा उनके द्वारा संदेश भेजना)
44. उत्सादने संवादने केशमर्दने च कौशलम (हाथ पैरों से शरीर दबाना, केशों को मलना, उनका मैल दूर करना और उनमें तेलादि सुगन्ध मिलाना)
45. अक्षर-मुष्टिका कथनम ( अक्षरों को सम्बद्ध करना और उनसे किसी संकेत अर्थ को निकालना)
46. म्लेच्छित-विकल्पा (सांकेतिक वाक्यों को बनाना)
47. देशभाषाविज्ञानम (विभिन्न देशों की भाषाओं का ज्ञान)
48. निमित्तज्ञानम (शुभाशुभ शकुनों का ज्ञान)
49. पुष्पश्कटिका (पुष्पों की गाड़ी बनाना)
50. यंत्रमातृका (चलाने की कलें तथा जल निकालने के यंत्र बनाना)
51. धारणमातृका (स्मृति को तीव्र बनाने की कला)
52. सम्पाठ्यम (स्मृति तथा ध्यान सम्बन्धी कला)
53. मानसी (मन से श्लोंको तथा पदों की पूर्ति करना)
54. काव्य क्रिया (काव्य करना)
55. अभिधान-कोश छंदोपज्ञानम (कोश तथा छंद का ज्ञान)
56. क्रियाकल्प काव्यालंकार ज्ञानम (काव्य और अलंकार का ज्ञान)
57. छलितकयोग (रूप और बोली छिपाने की कला)
58. वस्त्रगोपनानि (शरीर के गुप्तांग को कपड़े से छुपाना)
59. द्यूतविशेष (विशेष प्रकार का जुआ)
60. आकर्षक्रीड़ा (पाँसों का खेल खेलना)
61. बालक्रीड़नकानि (बच्चों का खेल)
62. वैनयिकीनाम (अपने पराये के साथ विनम्रपूर्वक शिष्टाचार दर्शित करना)
63. वैजयिकीनाम (शस्त्र विद्या) और
64. व्यायामिकानां च विद्यानाशानम (व्यायाम, शिकार आदि की विधाएँ)।

वभ्रु पांचाल ने इन्हें चार भागों में विभाजित किया है-

1. कर्माश्रित 2. द्यूताश्रित 3. श्यानोपचारिका और 4. उत्तर कला

कलाओं के वर्गीकरण में नया दृष्टिकोण तब आया जब पाणिनी ने अपने अष्टाध्यायी में शिल्प यानी कला को चारू (ललित) और कारू (उद्योग) के अर्थों में प्रयुक्त किया। ऐतिहासिक दृष्टि से व्यवस्थित विभाजन सर्वप्रथम अरस्तू ने उपस्थित किया।

सामान्यतया हमें सृष्टि में दो प्रकार की कलाएँ दिखाई देती हैं।

1. ललित कला - सौन्दर्य से सम्बन्धित
2. उपयोगी कला - मानव उपयोग से सम्बन्धित कला
इन दोनों को चारू और कारू कहा गया।

भारतीय वर्गीकरण
भारतीय वर्गीकरण के अन्तर्गत कला को निम्नानुसार विभक्त किया है-

1. रूप की कला
(1) रूपात्मक-चित्र और मूर्ति (2) गत्यात्मक-नृत्य और संगीत

2. मूर्त- कला
(1) मूर्तता की कला (2) अमूर्त कला

3. इन्द्रियों की कला
- आँखों को सुख देने वाली कला- चित्र, मूर्ति नाटक
- आँख और कान दोनों को दुरूस्त करने वाली कला नाटक।
4.अनुकरण की कला
(1) अनुकरण करने वाली (2) अनुकरण न करने वाली

आधुनिक विद्वानों ने कलाओं का वर्गीकरण मेजर-आर्ट-ललित कलाओं के लिये और माइनर आर्ट उपयोगी कला के लिये मेजर आर्ट सौन्दर्य की अभिव्यक्ति से सम्बन्धित है । माइनर आर्ट में उपयोगिता सर्वोपरि रहती है।

आसित कुमार हल्दार का वर्गीकरण
इन्होंने अपनी पुस्तक में कला के 2 रूप माने हैं-

1. पहली वह जो सिर्फ सौन्दर्यबोध कराती है अर्थात ललित कला। यह आत्मा को आनन्द प्रदान करती है। इसका भौतिक उपयोग नहीं है।
2. दूसरी वह जिसकी उत्पत्ति ही सिर्फ आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये हुई है अर्थात उपयोगी कला।

ललित कला सौन्दर्यपूर्ण कला है, इसके तीन स्तर हैं-

1. ललित कला स्वयं जो केवल आनन्द के लिये सृजित की जाती है तथा इसका भौतिक उपयोग नहीं है जैसे चित्र और मूर्ति कला।
2. दूसरी कला उपयोगी भी है और कलात्मक भी।
3. तीसरी वह है जो मानव अपने परिवेश को सुसज्जित, सुन्दर व लावण्यमय बनाने के लिये इस्तेमाल करता है, जिसे लोक कला कहते हैं।

इन तीनों स्तरों में चित्र सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है।
‘चित्रं हि सर्व शिल्यानां मुखं लोकस्य च प्रियम्।’

भारतीय कला ने केवल पाँच कलाएँ मानी हैं-
(1) चित्रकला (2) काव्य (3) मूर्तिकला (4) शिल्प या वास्तुकला एवं (5) मूर्तकला।

हीगल का वर्गीकरण
हीगल ने कलाओं का वर्गीकरण इन्द्रियों के आधार पर किया-

1. दृश्य - नृत्य, मूर्ति, चित्र, वास्तुकला
2. श्रव्य - संगीत व काव्य

दृश्य कलाएँ दिखाई देने के कारण ‘मूर्त’ कलाएँ कहलाती हैं। संगीत व काव्य कलाएँ ‘अमूर्त’ कलाएँ कहलाती हैं।

बोसां (Bosan) का वर्गीकरण

1. रूप की कला - चित्र, मूर्ति तथा वास्तुकला
2. वाणी की कला - काव्य की कला
3. स्वरों की कला - संगीत कला
4. गति की कला - नृत्य कला

जार्ज सांतायन का वर्गीकरण

1. ऑर्गेनिक- जिनकी अभिव्यक्ति बाह्य साधनों पर आधारित होती है।
2. ऑटोमेटिक- जिनकी अभिव्यक्ति सहज रूप से होती है।

अरस्तू का वर्गीकरण

1. आचरण विषयक कला
2. ललित कला तथा
3. उदार कला

मनोवैज्ञानिक आधार पर तीन भेद स्वीकृत हैं

1. अलंकरणात्मक कला
2.अनुकरणात्मक कला
3. आत्माभिव्यंजक कला

अनेकों वर्गीकरणों के पश्चात कलाएँ मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित हैं-

1. ललित कला
2. उपयोगी कला

इन वर्गीकरणों केआधार पर कहा जाता है कि दोनों प्रकार की कलाओं में समान कला मूल्यों का न्यूनाधिक प्रयोग किया है। कला सौन्दर्य की चाह रखती है।

कलाकार कोई भी कलाकृति सृजित करने के लिये सौन्दर्य का ध्यान तो रखता ही है, साथ ही उपयोगी सिद्धान्तों का भी ध्यान रखता है, जिससे कि कृति का मूल्यांकन किया जा सके। भारतीय कला में चित्र के मूल्यांकन के लिये ‘षडंग’ (Sixlimbs) का उल्लेख मिलता है। चित्रण में निहित ये सभी सिद्धान्त भारतीय चित्रकला के ही मूलभूत सिद्धान्त हैं-

“विश्व में अजन्ता के भित्ति चित्र, राजपूत, मुगल और पहाड़ी पुस्तक चित्र अपना उचित स्थान इसलिये बनाएँ हैं कि ये मूलभूत सिद्धान्तों की नींव पर खड़े होकर अपना मस्तक उठाए हुए है।”

वात्स्यायन ने ‘काम-सूत्र’ के प्रथम अधिकरण के तृतीय अध्याय में श्लोक में षडंगों का वर्णन किया है-

रूप भेदाः प्रमाणनि भाव लावण्ययोजनम्।
सादृश्यं वर्णिका भंग इति चित्र षडंगकम।।


कामसूत्र की टीका ‘जय मंगल’ भी जयपुर निवासी प. यशोधर ने की। अतः राजस्थान में पल्लवित शैलियों पर इनका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। कामसूत्र में वर्णित ये षडंग समूचे चित्रण विधान के सैद्धान्तिक और क्रियात्मक दोनों पक्षों को हर समय हर पीढ़ी और हर परिवेश के लिये मार्गदर्शक रहे हैं। कलाकार ही नहीं कला समीक्षक के लिये भी इनका ज्ञान होना अति आवश्यक है। इस शोध प्रबन्ध में चित्रकारों के चित्रों की व्याख्या इसी आधार को ध्यान में रखकर की जाएँगी। कलाकृति सृजन के लिये कला के तत्व और कला-षडंग का ध्यान रखा जाना अति आवश्यक है।

कला का सम्बन्ध प्रकृति से है और इससे ही पर्यावरण बना। पर्यावरण की सार्थकता तभी है, जब कलाकार उसे प्रत्यानुकृत करे।

पर्यावरण का परिचय

पर्यावरण जीव जगत का आवरण है, जो जीव जगत का नियामक और जीवन का आधार है, जिसमें प्राणी, जीव एवं वनस्पति के उद्भव और विकास का ज्ञान छिपा है। पर्यावरण के अभाव में जैविक कल्पना असम्भव है।

पर्यावरणीय ज्ञान सदियों पुराना है, जिसके मूल में ब्रह्माण्ड के कल्याण की भावना निहित है। पर्यावरण चेतना के प्रति जागरूक और तपश्चर्या में रत ऋषियों न जब भौतिक और अध्यात्मिक ज्ञान का साक्षात्कार किया तो उन्होंने पाया कि हमारे चारों ओर एक आवरण है, यही विभिन्न प्रकार के पर्यावरण को निर्मित करता है। इसके मूल घटक वायु, जल, भूमि, जीव-जन्तु और वनस्पति आदि है। इनकी क्रिया-प्रतिक्रिया से सम्पूर्ण ‘जीव-मण्डल’ परिचालित होता है, जैसे ही प्राकृतिक घटकों में समन्वय और सामंजस्य बाधित होता है तो पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) में असन्तुलन आ जाता है और विभिन्न प्रकार के प्रदूषण उत्पन्न होते हैं।

सामान्यतया दो प्रकार के पर्यावरण दृष्टिगत होते है- (1) भौतिक (2) जैविक।

भौतिक एवं जैविक पर्यावरण के अवयव एक दूसरे के पूरक हैं तथा एक दूसरे के अस्तित्व को बनाए रखने के लिये आवश्यक हैं। भौतिक पर्यावरण के अन्तर्गत भूमि, वायु, जल, ऊर्जा तथा मृदा तत्व आते हैं तथा जैविक के अन्तर्गत प्राणी, पौधे तथा मनुष्य आते हैं। मानवीय-पक्ष के अन्तर्गत सामाजिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक, प्रबन्धकीय, राजनैतिक, मौसम, अर्थशास्त्र एवं विधिक पर्यावरण सम्मिलित होते हैं अर्थात पर्यावरण सर्वव्यापी है, जिस प्रकार पर्यावरण सर्वव्यापी है उसी प्रकार कला भी सर्वव्यापी है। कला में पर्यावरण का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कला का रूप स्थानीय पर्यावरण के अनुरूप परिवर्तित होते देखा गया है। कला का सम्बन्ध विभिन्न विषयों से सदैव से रहा है। मनुष्य पर्यावरण को रूपान्तरित करने में समर्थ होता है। मानव एक संवेदनशील प्राणी है। वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति अन्य जीवों की अपेक्षा अधिक अच्छे से कर सकता है।

प्राचीन समय से मानव सभ्यताएँ (Human civilization) जीवन-यापन के लिये प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर रही हैं। आदिम काल में मानव पर्यावरणीय परिस्थितियों से संघर्षरत रहा। सभ्यता की सीढ़ी चढ़ते हुए आज मानव ने जो प्रगति की है, उसमें पर्यावरण का विशेष सहयोग रहा है।

मानवीय संस्कृति का विकास समायानुरूप सामंजस्य का परिणाम है। पर्यावरण कभी स्थिर नहीं रहा, इसकी गति कभी मद्धिम और कभी तेज होती है। यही कारण रहा कि मानव की कई प्रजातियाँ एवं सभ्याताएँ विलुप्त हो गईं।

मानव अपने विकास हेतु पर्यावरण का उपयोग करता है जब तक यह उपयोग सामंजस्यपूर्ण होता है, पारिस्थितिक सन्तुलन बना रहता है, किन्तु जैसे ही प्राकृतिक तत्वों में वृद्धि होती है, इस असन्तुलन में व्यतिक्रम आता है और पर्यावरण सम्बन्धी अनेक समस्याओं का जन्म होता है। यह कहना गलत न होगा कि प्रकृति का सानिध्य मानव के सर्वांगीण विकास की आधारशिला है और विकृति का साहचर्य उसके विनाश का फतवा है।

पर्यावरण विनाश का दुष्परिणाम प्रदूषण के रूप में हमारे सामने आया। इन विभिन्न समस्याओं के कारण ही पर्यावरण के अध्ययन की आवश्यकता महसूस हुई। सन् 1950 से 1970 तक पर्यावरण और मानव सम्बन्ध को गौंण समझते रहे, किन्तु 1980 के दशक में पर्यावरण और पारिस्थितिकी अध्ययन एक विशिष्ट शाखा के रूप में सामने आया, जिसे पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी भूगोल से जाना गया।

पर्यावरण

‘Environment is the sum total of all external conditions and the influence on the developmental cycle of biotic elements over the earth’s surface.’- Herskovites

अर्थात पर्यावरण सम्पूर्ण बाह्य परिस्थितियों और जीवधारियोें पर पड़ने वाला प्रभाव है, जो जैव जगत के विकास चक्र का नियामक है।

प्रकृति में पर्यावरण का व्यापक अर्थ है। इसका शाब्दिक अर्थ है-

“वह जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है, जो उन दशाओं को दर्शाता है, जिसमें जीव आवास करते हैं, इसमें वायु , जल, भोजन, सूर्य प्रकाश आता है, जो सजीवों की मूलभूत आवश्यकता है।”

पर्यावरण ‘परि’ और ‘आवरण’ शब्दों से मिलकर बना है। ‘परि’ का अर्थ है चारों तरफ और ‘आवरण’ का अर्थ है घेरे हुए अर्थात चारों ओर घेरे को पर्यावरण कहते हैं। चारों ओर के आवरण के बीच जो भी सम्मिलित होता है, उसे पर्यावरण कहा गया है।

पर्यावरण शब्द फ्रेन्च भाषा के एनवायरन (Environe) और मेण्ट (Ment) के मेल से बना है, जिसका अर्थ है ‘encircle’ or all round अर्थात चारों ओर से घेरे हुए है, वह पर्यावरण है। शाब्दिक दृष्टि से इसका अर्थ ‘Surrounding’ है। उदाहरण के तौर पर पृथ्वी वायुमण्डल से आवृत है, जो मनुष्य एवं सजीवों को जीवन भर जीवन शैली तथा कार्यशैली को प्रभावित करता है।

संस्कृत भाषा में पर्यावरण शब्द ‘परि’ और ‘आ’ उपसर्ग पूर्व ‘वृ’ धातु से ल्यूट प्रत्यय लगाकर बना है-

परि+आ+वृ+ल्यूट
परि+आ+वर्+अन-पर्यावरण

पर्यावरण का अर्थ है संसार के चारों ओर का सम्पूर्ण आवरण, ढक्कन, आच्छादन अथवा घेराव। परि उपसर्ग का अर्थ है ‘चारों ओर’ आ उपसर्ग का अर्थ है असमन्तता अर्थात ‘सम्पूर्ण’ और ‘वृ’ का अर्थ है ढकना, छिपाना, आवृत्त करना, व्याप्त करना, परदा डालना, लपेटना आदि। ल्यूट प्रत्यय (अन्) का अर्थ है ‘संसार’ या ‘विश्व’। इस प्रकार संक्षेप में पर्यावरण का अर्थ हुआ संसार के चारों ओर का सम्पूर्ण आवरण या घेरा।

पर्यावरण की परिभाषा

पर्यावरण एक व्यापक शब्द है। इसका तात्पर्य समूचे भौतिक एवं जैविक विश्व से है, जिसमें जीवधारी रहते हैं, बढ़ते हैं, पनपते हैं और अपनी स्वाभाविक प्रकृतियों का विकास करते हैं।

पर्यावरण वह आवरण है, जिसने सम्पूर्ण जीव-मण्डल को आवृत्त कर रखा है। परिभाषित रूप से पर्यावरण उन सभी भौतिक तथा जैविक परिस्थितियों का समूह है जो जीवों की अनुक्रियाओं को निरन्तर प्रभावित करता है।

जिसमें मानव और जीव-जन्तु विशेष प्रभावित होते हैं। पर्यावरण के अनुसार उसकी प्रकृति (आदतों) में परिवर्तन आता है। पर्यावरण ही भौगोलिक सांस्कृतिक, ऐतिहासिक कलात्मक परिवेश को प्रभावित करते हैं। यही कारण रहा कि भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार ही कला में परिवर्तन देखने को मिलता है। इसके स्पष्ट उदाहरण हमें बंगाल शैली, राजस्थानी, कांगड़ा शैली, मुगल शैली के चित्रों में दिखाई देते हैं। चित्रों में वह भौगोलिक स्थिति परिलक्षित होती है।

विश्व शब्द कोष में पर्यावरण को इस प्रकार परिभाषित किया गया है-

“The sum total of all conditions, agencies and influences which affect the development growth, life and death of an organism, species or race.” अर्थात ‘पर्यावरण उन सभी दशाओं प्रणालियों एवं प्रभावों का योग है जो जीवों, स्पेशीज या जातियों के विकास, जीवन एवं मृत्यु को प्रभावित करता है।’

‘जीवों को प्रभावित करने वाले बाह्य प्रभावों का योग पर्यावरण है, जिसमें प्रकृति की भौतिक जैविक शक्तियाँ सम्मिलित होती हैं, जिनसे जीव सदैव आवृत्त होता है।’

सामान्य तौर पर हम इसे जीवमण्डल कहते हैं, जो जलमण्डल (Hydrosphere), स्थल मण्डल (Lithosphere) तथा वायुमण्डल (Atmosphere) के जीवनयुक्त भागों का योग होता है।

भौगोलिक परिस्थियतियों अनुसार पर्यावरण को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है।

- पर्यावरण पृथ्वी के भौतिक घटकों (Physical Compinents) का प्रतिनिधि है जबकि मनुष्य अपने वातावरण को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारक है।
- पर्यावरण दशाओं की सम्पूर्णता को दर्शाता है, जो कि मनुष्य को एक निश्चित स्थान एवं समय में निश्चित बिन्दु पर आवृत्ति करता है।
-पर्यवारण सभी सामाजिक (Social)आर्थिकी, जैविकी, भौतिक एवं रासायनिक कारकों का सम्पूर्ण योग है, जो कि मनुष्य के प्रतिवेश (Surroundings) को स्थापित करता है जो अपने पर्यावरण का रचयिता एवं निर्माता है।
- पर्यावरण चारों ओर की उन बाहरी दशाओं का सम्पूर्ण योग है, जिसके अन्दर एक जीव (Organism) या समुदाय (Cimmunity) रहता है।

अनेक विद्वानों ने पर्यावरण को इस प्रकार परिभाषित किया है-

1. फिटिंग (Fitting 1922)- आपने सर्वप्रथम पर्यावरण को परिभाषित किया। इनके अनुसार- ‘जीवों के पारिस्थितिक कारकों का सम्पूर्ण योग पर्यावरण है।’

2. हर्सकोविट्ज (Herskovites) के अनुसार- ‘पर्यावरण उन सभी प्रकार की बाहरी दशाओं एवं प्रभावों का योग है, जो प्राणी जीवों एवं पादप समूह के जीवन एवं विकास पर प्रभाव डालते हैं।’

3. ए.जी. टेन्सले (A.G.Tansley)- ‘प्रभावकारी दशाओं का वह सम्पूर्ण योग, जिसमें सभी प्रकार के जीव निवास करते हैं, पर्यावरण कहलाता है।’

4. आर.एस. मैकाइवर (R.S. Maciver)- ‘मानव आवास पृथ्वी और उस पर ध्यान समस्त प्राकृतिक दशाएँ (Natural Combination) भूमि, जल मैदान, पर्वत, खनिज पदार्थ, प्राकृतिक संसाधन, पादप प्राणी एवं सम्पूर्ण प्राकृतिक शक्तियाँ, जो कि पृथ्वी पर मानव जाति को प्रभावित करता है। पर्यावरण का भाग है।’

5.क्लार्क (Clarke)- ‘मनुष्य को एक निश्चित समयावधि एवं स्थान विशेष पर आवृत्त करने वाली दशाओं के सम्पूर्ण योग को पर्यावरण कहते हैं।’

6. रॉय जे. एस- ‘पर्यावरण एक बाह्य शक्ति है, जो कि हमें प्रभावित करती है।’

7. ए. गाउडी- ‘पर्यावरण संसार का समग्र दृष्टिकोण है, यह किसी समय सन्दर्भ में बहुस्थानिक, तत्वीय एवं सामाजिक, आर्थिक तंत्रों, जो कि जैविक-अजैविक रूपों के व्यवहार पद्धति एवं स्थान को गुणवत्ता एवं गुणों के आधार पर एक-दूसरे से पृथक होते हैं, लेकिन एक साथ कार्य करता है।’

8. सविन्द्र सिंह एवं ए. दुबे- ‘पर्यावरण एक अविभाज्य समष्टि है तथा भौतिक एवं जैविक शक्ति सांस्कृतिक तत्वों वाले पारस्परिक क्रियाशील तंत्रों के द्वारा इसकी संरचना होती है।’

9. विश्व शब्द कोष अनुसार पर्यावरण के अन्तर्गत उन सभी प्रकार की दशाओं, संगठन एवं प्रभावों को सम्मिलित किया जाता है, जो कि किसी जीव, प्रजाति के उद्भव, विकास एवं मृत्यु को प्रभावित करते हैं।

10. ब्रिटेन के विश्व ज्ञान कोष के अनुसार पर्यावरण उन सभी प्रकार के बाहरी प्रभावों का समूह है, जो कि जीवों को भौतिक एवं जैविक शक्ति से प्रभावित करते हैं तथा प्रत्येक सजीव को आवृत्त रखते हैं।

उपरोक्त सभी विचारकों को दृष्टिगत रखते हुए व्यापक रूप से स्वीकृत परिभाषा निम्न है

प्राणियों, सजीवों की प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करने वाली आस-पास की सभी जैविक-अजैविक स्थितियों का समुच्चय पर्यावरण कहलाता है।

पर्यावरण किसी एक तत्व का नाम नहीं है, बल्कि समस्त दशाओं या तत्वों का सम्पूर्ण योग है, जो कि सभी प्रकार के सजीवों के जीवन एवं विकास को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।

1. पर्यावरण के तत्व

संसार की रचना मुख्यतः पाँच तत्वों से हुई है जिसका आवरण सदैव विश्व पर रहा है। यही तत्व प्रकृति कहलाते हैं। ये तत्व नित्य अखण्ड, अनन्त अनादि हैं। वेदों, पुराणों, दर्शन और धर्मों में इन तत्वों का उल्लेख मिलता है। सम्पूर्ण जीवित अजीवित चीजें इनसे बनी हैं और इसी में विलीन हो जाती हैं। ये पाँच तत्व हैं-

1. आकाश
2. वायु
3. अग्नि
4. जल और
5. पृथ्वी

इन्ही पंच तत्वों से प्रकृति बनी है, जिसे जीव इन्द्रियों (आँख, नाक, कान, त्वचा हाथ तथा पैर) से अनुभूत करता है। मानव प्रकृति की देन है और उस पर प्रकृति का संरक्षण (आवरण) है। प्राचीन काल में मानव प्रकृति के संरक्षण में रहा है और प्रकृति से सम्बद्ध देवताओं की पूजा-अर्चना की जैसे अग्नि, वायुदेव, जलदेव (वरुण), आकाश, ऊषस और इन्द्रदेव आदि।

महाकवि तुलसीदास ने कहा है-
‘क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंच रचित यह अधम शरीरा।’

अर्थात मानव शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु से निर्मित है। इसी पर्यावरण के सन्तुलन को सदैव बनाए रखना है। प्राचीन काल में मानव ने संघर्ष की स्थिति के बजाए शान्ति का मार्ग अपनाते हुए वेदों की रचना की हवन अनुष्ठान किए, इस प्रकार प्रकृति मानव की सहचरी के रूप में दिखाई देती है। मानव को प्रकृति ने अनेक संस्कारों से आप्लावित किया। यही संस्कार हमारे जीवन में कला के रूप में विकसित हुए। सर्व व्याप्त पर्यावरणीय तत्व आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी जीवन और ऊर्जा देने वाले हैं। इन तत्वों की अलग-अलग प्रतिशत में उपस्थिति के कारण पर्यावरण में विभिन्नता देखने को मिलती है।

1. आकाश

मानव सृष्टि में सर्वाधिक योगदान आकाश का है। आकाश अर्थात खाली स्थान (space) चीनी कला में यांग और यिन का उल्लेख मिलता है। यांग अर्थात आकाश, यिन अर्थात पृथ्वी। चीनी संस्कृति में आकाश को देव पुरूष माना है। यह स्वर्ग, अग्नि तथा पुरूष का प्रतीक है।

बौद्ध धर्म में ‘प्रवृत्ति’ और ‘निवृत्ति’ को क्रमशः ‘विश्राम’ और ‘कृति’ के रूप में परिभाषित किया है। प्रवृत्ति मानवीय गुण है तो निवृत्ति आकाशीय तत्व। जो निराकार है। वह एक शून्य होते हुए भी सब में व्याप्त है।

ई. पू. 2800 में चीन के सम्राट ‘फू-शी’ ने यिन तथा यांग के अस्तित्व के तत्व को लिपि-आघातों से प्रतीक के रूप में लेखन शैली का प्रारम्भ किया। इसमें यांग को दीर्घ रेखा और यिन को दो छोटी रेखाओं से स्पष्ट किया।

भारत में वेद, पुराण, उपनिषद आदि ग्रन्थ भी ‘आकाश’ तत्व की सृष्टि सर्वप्रथन मानते हैं जो सम्पूर्ण पृथ्वी को घेरे हुए है। यह सबके अन्दर भी है और बाहर भी। आकाश की विशेषता है ‘शब्द’।

‘शब्द गुणकम आकाशम’।

अर्थात शब्द का गुण आकाश है। आकाश की उपस्थति ही शब्द बोध कराती है। यदि आकाश नहीं होता तो हम अपनी संवेदनाओं को आपस में अभिव्यक्त नहीं कर पाते। आकाश और पृथ्वी का महत्त्व देते हुए ऋग्वेद में कहा है।

आपःधावा पृथ्वी अन्तरिक्षः सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुश्च। -ऋग्वेद 21-115-1

अर्थात जैसे माता-पिता अपने शिशु का पालन-पोषण और रक्षण करते हैं, वैसे ही पृथ्वी और आकाश सारे संसार का भरण-पोषण और रक्षण करते हैं।

कला क्षेत्र में जहाँ पृथ्वी और आकाश मिलते हैं, उसे क्षितिज रेखा कहते हैं। यह क्षितिज रेखा ही विभिन्न शैलियों की पहचान है। चीन और जापान की दृश्यकला में क्षितिज रेखा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। आकाश चित्रकला में संयोजन के प्रमुख तत्वों में से एक है ईरानी चित्रों में यह क्षितिज रेखा ऊपर की ओर चली गई है या अति अल्प रूप में दिखाई देती है। भारतीय शैलियों में पाल और जैन शैली धार्मिक घटना प्रधान रही है। इसमें आकाश का अभाव है, जबकि मुगल, राजस्थानी, पहाड़ी शैली में प्रकृति आकाश तत्व से ही परिपोषित हुई है। इन शैलियों में आकाश की अलंकारिता स्पष्ट होती है। आकाश चमकती हुई बिजली और बादलों से आवृत्त दिखाई देता है। जो कि विभिन्न शैलियों की पहचान है। अतः चित्र संसार में आकाश का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

2. वायु

सृष्टि का दूसरा तत्व वायु है। जिसकी उत्पत्ति आकाश से मानी गई है। आकाश की रिक्तता को वायु परिपूर्ण करती है। प्रकृति का दूसरा तत्व वायु जो मानव ही नहीं समस्त जीवों को जीवनदान देती है, जीव मात्र को स्पन्दित करती है। वायु को ‘प्राण वायु’ कहा गया है। इसकी दो विशेषताएँ हैं- 1 ध्वनि या शब्द तथा 2 स्पर्श।

कलाकलाआकाश में केवल ‘शब्द’ का पता चलता है जबकि वायु में स्पर्श रूपी स्पन्दन भी होता है जो आनन्ददायक होता है। जब हवा चलती है तो सांय-सांय की ध्वनि सुनाई देती है। इस वायु की गति के कारण मन्द-मन्द बयार, आँधी-तूफान का अहसास होता है। वायु से ही पर्यावरण के अन्य तत्व प्रभावित होते हैं। जैसे वनस्पति (प्रकृति) इसके स्पर्श से प्रफुल्लित और पल्लवित होती है। जल का निर्माण और प्रवाह इसी से है।

वेदों, ग्रन्थों, उपनिषदों में ‘वायु देवता’ के नाम से पूजे जाते हैं। वायु की शुद्धता के लिये यज्ञ और हवन किए जाने के संस्कार सदियों से विद्यमान हैं। वायु पवित्र होने के कारण इसे ‘पवन’ भी कहा गया है।

वैदिक ऋषि वायु देव से सबके कल्याण की कामना करते हुए कहता हैः

शनोवातः पवतां शंनस्तपतु सूर्यः।
शंनः कनिक्रद्द देव पर्जन्यो अभिवर्षतु।।


हमारे शरीर में नौ द्वार हैं जहाँ से वायु का आगमन निगमन होता है गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है ‘नवद्वारे पुरे देहि।’ मनुष्य वायु में ही जन्म लेता है, वायु ही ग्रहण करता है और अन्त में ‘वायु’ पर्यावरण में ही विलीन हो जाता है।

मनुष्य द्वारा किए गए सत्कर्मों (यज्ञ-यजन) से मेघों का निर्माण होता है, जिससे जल की प्राप्ति होती है। जिससे वसुन्धरा को शस्य श्यामला और सुन्दर बनाया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर वायु की अशुद्धता प्रदूषण फैलाती है और वायु की अतिगतिशीलता आँधी तूफान बनाती है।

कला में भी वायु तत्व मौजूद होते हैं, इसकी उपस्थिति से ही कला में गति और लय दिखाई देती है। इससे ही जल तत्व प्रभावित और प्रवाहित होता है। चीनी, जापानी और भारतीय दृश्य चित्रों में जल की हिलोरें वृक्ष-पत्रों का कम्पन और चंचलता वस्त्रों की फहरान में दृष्टिगत होता है। जापान में उकियो-ए-शैली में क्षण-भंगुर संसार की कल्पना की है। वहाँ के दृश्य चित्रों में यह तत्व विशेष रूप से हिरोशिजे, होकोसाई के काष्ठ-छापा चित्रों में दिखाई देता है। जापान एवं चीन में दृश्य कला में विशेष रूप से दिखाई गई है। भारतीय कला में राजपूत शैली में ऋतुओं का वर्णन दिखाई देता है।

विभिन्न शैलियों में ऋतुओं की दशा के साथ ही दिशा का भी बोध होता है। यह वायु तत्व के कारण ही होता है। वायु शान्त, मद्धम और तीव्र होती है। भारतीय कलाकारों ने इसके प्रभाव को वस्त्रों की फहरान, वृक्षों के दोलन, मन्दिर की पताका और नदियों के जल की लहरों में बताया है। मध्य प्रदेश के वरिष्ठ चित्रकार श्री हरि भटनागर ने रेखांकन में वृक्ष के पत्तों में वायु की गतिशीलता को दिखाया है। इसी प्रकार अनेक कलाकारों ने इसके सुखद अहसास को चित्रों में परिणित किया।

3. अग्नि

अग्नि तत्व एक महत्त्वपूर्ण तत्व है। अग्नि चेतना और गति का प्रतीक है, जिसका स्वरूप है ऊष्मा। ऊष्मा से ही सारी प्रकृति संचालित होती है। आकाश और वायु का आकार नहीं होता, परन्तु अग्नि साकार रूप में विद्यमान होती है उसे हम देख सकते हैं महसूस भी कर सकते हैं, क्योंकि इसका रंग लाल नारंगी पीले के मिश्रण से युक्त होता है। यह ऊष्मा प्रदान करने वाला होता है। अग्नि में स्पर्श का गुण विद्यमान होता है इसे सभी प्राणी महसूस कर सकते हैं। अग्नि की तीसरी विशेषता शब्द करना है। जब अग्नि जलती है तो शब्द करती है।

आकाश वायु और अग्नि में अतःसम्बन्ध होता है। अग्नि ने आकाश और वायु से शब्द और स्पर्श के गुण ग्रहण किए हैं, क्योंकि आकाश तत्व जलने के लिये space देता है तो वायु तत्व अग्नि प्रज्वलन में सहायक बनती है। जिस प्रकार प्राणी की उत्पत्ति में आकाश और वायु का महत्त्व होता है, उसी प्रकार अग्नि भी प्राणी मात्र के सृजन में सहायक होती है। सूर्य में अग्नि तत्व प्रचुरता से होता है। जब पौधों पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं, तभी पौधे के पोषक तत्व (भोजन) का निर्माण होता है। यह पोषक तत्व ही प्राणियों को जीवित रखने में सहायक होता है। प्रत्येक प्राणी में अग्नितत्व विद्यमान होता है, जो मृत्यु पर्यन्त अग्नि में समाप्त हो जाता है। प्राणियों के शरीर में अधिकाधिक ऊर्जा का स्रोत अग्नि है। किसी व्यक्ति में इस तत्व की अधिकता उसकी तेजस्विता को प्रकट करती है। ऊष्मा ही रक्त को प्रवाहित करने में सहायक होती है।

अग्नि में प्रकाश और ऊष्मा दोनों ही पाए जाते हैं। जब सूर्य उदित होता है तो पूरी प्रकृति प्रफुल्लित और प्रकाशवान होकर रोमांचित हो जाती है। सूर्य के प्रकाश में पर्वत शृंखला, नदी, तालाब, वनस्पति, पृथ्वी आदि प्रकाशित होते हैं। जल में झिलमिलाता जल सभी को आकर्षित करता है। विभिन्न रंग सूर्य प्रकाश की उपस्थिति में ही दिखाई देते हैं।

प्रकृति के तत्वों में अग्नि एक महत्त्वपूर्ण तत्व है, जिसे देवता के रूप में पूजा जाता है। प्राचीन काल में अग्निदेव को मनाने के लिये हवन किया करते थे। अग्नि को हव्यवाहक कहते थे क्योंकि दूसरे द्वारा समर्पित हवि को यह देवताओं तक पहुँचाता था। दूसरे देवता भी अग्नि का सम्मान करते थे कि वह उनके लिये हवि रूपी भोजन की व्यवस्था करता था। अतः अग्नि को प्रधान देवता कहा जाता था। मानव ने कामना पूर्ति के लिये इनकी आराधना की। तत्कालीन मानव प्राकृतिक तत्वों का दुरुपयोग नहीं करता था अतः अग्नि भी उनके अनुकूल रहती थी।

वर्तमान में हमने प्राकृतिक तत्वों की अवहेलना की है। अतः उसके दुष्परिणाम भी हमें भुगतने पड़ रहे हैं। अत्यधिक जहरीली और ज्वलनशील गैसों से पर्यावरण प्रदूषित हो गया है। अग्नि पर्यावरण को प्रदूषित होने से रोकने के लिये हमें उन पदार्थों के निर्माण को रोकना होगा, जो अत्यधिक प्रज्वलनशील है। पृथ्वी के दोहन को कम करना होगा।

अग्नि का महत्त्व इसलिये भी है क्योंकि अग्नि अपने आप में पवित्र होती है। यहाँ यज्ञानुष्ठान से रोगी की चिकित्सा भी की जाती है। यज्ञाग्नि अनेक रोगों का विनाश कर देती है।

अर्थववेद में ऋषि कहते हैं कि अग्नि पृथ्वी में, जलों में, वनस्पतियों में, पुरूषों में, पशुओं में सर्वत्र व्याप्त है।

अग्निर्भम्याभोषधीषु अग्निमापो बिभ्रत्यग्निरश्मसु। अग्निरन्तः पुरूषेशु गोष्वश्वेषवग्न्यः।।

पृथ्वी के गर्भ में और मध्य में जो ऊर्जा है वह अग्नि के कारण ही है। जिस प्रकार जल हर वस्तु को शुद्ध कर देती है उसी प्रकार अग्नि शुद्ध-अशुद्ध वस्तुओं को गलाकर पवित्र कर देती है। अतः हमारे संस्कारों में शुद्ध वस्तुओं चन्दन, अगरू, धृत, जौ, तिल को जलाने का विधान है।

कला में अग्नि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रागैतिहासिक काल में अग्नि का प्रादुर्भाव हुआ और मानव ने अपनी गुफाओं को प्रकाशित किया। वह कन्द-मूल को पकाकर खाने लगा। इन लकड़ियों को जलाने से कोयला बनाया गया, जिसका उपयोग प्रागैतिहासिक चित्रों के निर्माण में किया गया। सिन्धु घाटी की सभ्यता में अग्नि की उपस्थिति से पके हुए बर्तन, ईटों और खिलौनों का निर्माण हुआ। टेराकोटा की मुद्राएँ प्रचलन में आईं। अग्नि तत्व की उपस्थिति में कला का उत्तरोत्तर विकास होता गया।

दक्षिण भारत में तंजौर मद्रास में प्राप्त नटराज शिव की तांडव करती हुई कांस्य मूर्ति, जो कि 13वीं शताब्दी की बनी है। यह संहार और सृजन दोनों की प्रतीक है। यह कांस्य की त्रिभंगी प्रतिमा है जो नृत्य की मुद्रा में है। यह उल्टे कमल दल के पेडस्टेल पर स्थित है। इनका मुखमंडल दीप्तिमान है। केश वायु से कम्पायमान लहरा रहे हैं। दाहिने हाथ में अग्नि विद्यमान है, जो ऊष्मा, दैदीप्तमान का प्रतीक है। यह शक्ति और ऊष्मा का प्रतीक है। दूसरा बाया हाथ एवं पैर नृत्य की मुद्रा में पृथ्वी से उठा हुआ है जो गति का परिचायक है। शिव के एक दाहिने हाथ में डमरू है जो ध्वनि से संसार को आह्लादित करता है। दूसरा दाहिना हाथ वरद मुद्रा में है जो संसार के कल्याणकारी रूप को दिखाता है। दाहिना पैर असुर के विनाश का प्रतीक है। सिर पर भी अग्नि का मुकुट धारण किया है। कमर तथा बाजू में सर्प रूपी बाजू बन्द विद्यामान है। यह मनमोहक प्रतिमा नवीनता धारण किये है।

अतः यहाँ भी अग्नि तत्व की महानता झलकती है। इसी प्रकार चित्रों में प्रचण्ड ज्वाला का रूप भी प्रतिष्ठित हुआ है। कांगड़ा शैली एवं राजपूत शैली में दावानल (जंगल की आग) का दृश्य है जिसमें गायें बैचेन होकर भटक रही हैं। उन्हें बचाने के लिये कृष्ण उस जंगल की आग को मुख से पीते हुए दिखाए गए हैं। इस प्रकार भारतीय चित्रों में अग्निरूपी ऊष्मा विद्यमान है। कहीं वह पोषक है और कहीं संहारक भी है।

अतः इससे सिद्ध होता है सभी तत्वों का सन्तुलन होना आवश्यक है तभी वह कल्याणकारी स्वरूप में होगी।

उदाहरण स्वरूप श्री अमृतलाल वेगड़ के कोलाज में कुछ व्यक्तियों को आग सेंकते हुए बताया है। बाह्य वातावरण Cobalt blue को हल्के और Parssain blue के गहरे शेड में बनाया है। इसमें शीतल और उष्ण रंगों का अच्छा संयोजन बताया गया है। डी.जे. जोशी, रजा, चंद्रेश सक्सेना, सचिदा नागदेव और डॉ. आर.सी. भावसार ने अपने चित्रों में ऊष्मा से परिपूर्ण नारंगी, लाल और चटक पीले रंग का उपयोग खुले मन से किया है। ये चटक रंग मालवा क्षेत्र की पहचान है।

4. जल

‘जल ही जीवन है।’

पर्यावरणीय तत्वों में जल एक महत्त्वपूर्ण तत्व है। किसी भी क्षेत्र का पर्यावरण जल की उपस्थिति पर निर्भर करता है। जल भूतल पर पाए जाने वाले समस्त प्राणियों एवं वनस्पतियों का आधार है। इसके अभाव में पौधे, प्राणी, जीव और वातावरण की बहुत सी क्रियाओं का होना सम्भव नहीं है जल प्रकृति का सबसे अमूल्य संसाधन है। सजीवों में जीवन की सम्पूर्ण जैविक क्रियाएँ जल की उपस्थिति में ही होती है। जल मानवीय क्रियाओं का प्राचीन काल से वर्तमान समय में भी नियंत्रण करता है। संसार के 95-98 प्रतिशत मानव सभ्यता का अधिवास जल-स्रोत जलाशयों, जलागरों के पास है या फिर जल उपलब्धता के अनुसार मानव सभ्यता आवासित हुई। जल जीवन का परिपालन करता है और आर्थिक क्रियाओं का नियन्ता है। जल में अनेक तत्व घुलनशील है तथा लवण एवं खाद्य पदार्थ पौधे के शरीर में प्रवाहित होते रहे हैं। जल एक औषधि भी है जल रोगों को दूर भगाता है। अतः जल के कारण ही स्वच्छता और स्वस्थ जीवन रहता है।

जल से ही पृथ्वी का अलंकरण होता है। पृथ्वी पर रहने वाले पशु-पक्षी मानव पेड़-पौधे आदि जल की उपस्थिति से ही विद्यमान हैं। हरितिमायुक्त पर्वत श्रेणियाँ, पलास, टेसू, बकायन जैसे रंगयुक्त फूल वाले पौधे इस धरा को सौन्दर्यपूर्ण बनाते हैं। वास्तुकला को निर्माण एवं संयोजित करने में जल का बहुत बड़ा हाथ है। कलाकार भी इन संसाधनों से प्रेरित होता रहा है। प्रकृति ने विशाल समुद्र एवं महासागर तथा नदियाँ, तालाब, झीलों, झरनों, पोखर, बावड़ी आदि के रूप में स्वच्छ जलीय भण्डार दिये हैं। पृथ्वी के 70-75 प्रतिशत भाग पर जल पाया जाता है।

जलीय स्रोत (Sources of water)

जलीय स्रोत दो प्रकार के हैं-
1. स्थलीय जल स्रोत और
2. महासागरीय जल स्रोत

स्थलीय जल स्रोत भी दो प्रकार का होता है (1) सतही और (2)भूमिगत

सतही जल स्रोत

1. वर्षाजल (Rain Water)
2. नदियाँ (Rivers)
3. झीलें (Lakes)
4. तालाब (Ponds)
5. सरिताएँ (Streams)
6. झरने (Spring)
7. नहरें (Canals)
8. जलाशय (Revervoirs)
9. हिमनद (Snow)

भूमिगत जल-स्रोत (Under ground water sources)

1. पाताल तोड़ कुँआ (Artesian Wells)
2. गहरे कुँए (Deep Wells)
3. उथले कूप (Infiltration Well)
4. नल कूप (Tube Well)
5. बावड़ी (Baoli)
6. रिसन कुँए (Infiltration Well)

महासागरीय जल-स्रोत (Ocean water Resource)

पहाड़ों या पर्वतों से मैदानी भागों में प्रवाहित नदियाँ समुद्र में मिल जाती हैं। इन जलीय स्रोतों को देखते हुए कह सकते हैं कि सृष्टि की संरचना में जल का बहुत बड़ा स्थान है। सृष्टि निर्माण के अन्य संसाधन जल पर ही निर्भर हैं।

जल हाइड्रोजन के दो अणु और ऑक्सीजन के एक अणु से मिलकर बना है। जल में अग्नि और वायु का योग रहता है। सामान्यतः इसके चार गुण होते हैं।

1. शब्द
2. स्पर्श
3. रूप
4. रस

1. शब्द या ध्वनिः जल में प्रवाह होता है। जब वह तीव्रता से प्रवाहित होती है तो उसमें कल-कल की ध्वनि सुनाई देती है। पृथ्वी पर अनेकों नदियाँ हैं जिनका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व है। जैसे गंगा, यमुना, कावेरी, ब्रह्मपुत्र आदि।

2. स्पर्शः जल का स्पर्श सुखद और शीतल होता है। जल ने यह गुण वायु से ग्रहण किया है। जल का स्पर्श आसानी से किया जा सकता है। जल से स्पर्श कर हर वस्तु प्रक्षालित कर पवित्र की जा सकती है।

3. रूपः जल जिस संसाधन में भरा हो वह उसका रूप धारण कर लेता है। वर्षा का जल हमें बूँदों के रूप में दिखाई पड़ता है।

4. रसः जल को अमृत माना जाता है इसमें सभी रस विद्यमान रहते हैं। प्राणी के जीवन का अस्तित्व इसी पर निर्भर होता है। जल ही विभिन्न प्रकार के minerals and vitamins को प्राणी के विभिन्न अंगों तक पहुँचाता है।

संसार की संरचना

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार संसार की सृष्टि से पूर्व केवल जल ही जल था। हिम युग के समय जल जमना शुरू हुआ और इसके बाद से संसार में जड़-चेतन उत्पन्न हुए। जहाँ मनुष्य एक ओर जल-सेवन से शरीर अस्तित्व धारण करता है और वहीं शरीर का बाह्य परिमार्जन भी जल ही करता है।

हिन्दू संस्कार में जल को देवता माना है और वरुण देव के रूप में पूजा जाता है। वैदिक साहित्य में वरुण देव का उल्लेख मिलता है। भारतीय समाज में जन्म से मृत्यु तक मानव का जल से घनिष्ठ सम्बन्ध है। हमारे धार्मिक संस्कारों रीति-रिवाज में जल की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

वृष्टि के जल से कृषि क्षेत्र में उन्नति मिलती है अतः कृषक इन्द्रदेव को प्रसन्न करने के लिये पूजा अर्चना करते हैं, इससे धन-धान्य और समृद्धि प्राप्त होती है। मालवा क्षेत्र में एक कहावत मशहूर है-

मालव धरती गहन-गम्भीर, डग-डग रोटी पग-पग नीर।

जल संरक्षण आज बहुत आवश्यक है। इसके लिये शासकीय प्रयास भी किये जा रहे हैं। कलाकार पोस्टर और चित्र-प्रदर्शनियों द्वारा लोगों को जागरूक करने का प्रयास कर रहे हैं। केन्द्रीय जल संसाधन भोपाल द्वारा जल संरक्षण के लिये चित्रकला के विद्यार्थियों द्वारा कैम्प लगाकर चित्र बनवाए और उसकी प्रदर्शनी लगाई। श्री अमृत लाल वेगड़ द्वारा नर्मदा की पैदल यात्रा (परकम्मा) की गई। यात्रा के दौरान वे स्केचेस किया करते थे और बाद में उन्हें कोलाज में परिवर्तित कर देते थे। उनकी कला और साहित्य दोनों साथ-साथ चलते रहे। नर्मदा यात्रा पर आधारित उनकी पुस्तकें तीरे-तीरे, सौन्दर्यमयी नर्मदा एवं अमृतस्य नर्मदा आदि है।

चित्र में जल के बिना दृश्य चित्रण अधूरा सा लगता है। कला, संस्कृति विशेष रूप से नदी किनारे ही पनपी है। सिन्धु घाटी की सभ्यता, मिश्र की नील नदी सभ्यता इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। गुफा चित्रण के लिये गुफाओं का निर्माण भी नदी किनारे ही हुआ है जैसे बाघोरा नदी।

दृश्य चित्रण में जल एक आवश्यक तत्व है। चीन और जापान के दृश्य चित्र अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। भारतीय चित्रकला में विशुद्ध दृश्य चित्रण उन्नीसवीं शताब्दी में दिखाई देता है। इससे पूर्व यह संयोजन में सहायक तत्व के रूप में प्रस्तुत हुआ है।

5. पृथ्वीः पर्यावरण का अति महत्त्वपूर्ण तत्व पृथ्वी है। जिस पर जड़-चेतन पदार्थ स्वयं के अस्तित्व को धारण करता है। पृथ्वी का निर्माण करोड़ों वर्ष पूर्व हुआ। विद्वजनों का मानना है कि यह पिघली हुई अवस्था में थी धीरे-धीरे इसकी ऊपरी सतह ठंडी होती गई और इस पर प्रारम्भ में सूक्ष्म एक कोशिकीय जीवों का जन्म हुआ। उसके बाद रेप्टाइल और कालान्तर में कशेरूकीय जीवों का जन्म हुआ।

चीनी लोक किंवदन्ती के अनुसार ब्रह्माण्ड एक विशाल अंड था। एक दिन इस अंड के टूट कर दो भाग हो गए। ऊपरी भाग आकाश और नीचे का भाग पृथ्वी बन गया। जिसमें से फान-कू (Pan ku) नामक मिथकीय वीर निकला। वह प्रतिदिन दस फीट लम्बा होता गया। आकाश दस फीट ऊँचा होता गया और पृथ्वी दस फीट मोटी। अठारह हजार वर्ष पश्चात वह मर गया। उसका सिर फटकर सूर्य और चन्द्र बन गये और उसके रक्त ने नदियों तथा समुद्र को भर दिया। उसके केश जंगल और घास बन गये। पसीना वर्षा की बूँदे बन गये, श्वास वायु बन गई, स्वर गर्जन और जुएँ हमारे पूर्वज बने।

इस प्रकार सृष्टि में पृथ्वी तथा अन्य तत्वों का जन्म हुआ। डाइग्राम्स के अन्तर्गत पृथ्वी को ≡ ≡ से चिन्हित किया है।

पृथ्वी तत्व का निर्माण आकाश, वायु, अग्नि और जल के सहयोग से हुआ है। आकाश से ध्वनि, वायु से स्पर्श, अग्नि से रूप और जल से रस प्राप्त किया है। अतः इन सब गुणों के कारण ही पृथ्वी वनस्पति और विभिन्न प्रकार के जीवों से समृद्ध रही है। संसार के समस्त चर-अचर तथा जड़-चेतन को रहने का एक आधार प्राप्त हुआ।

प्राचीन काल से वर्तमान तक भूमि पूजन का उल्लेख प्राप्त होता है। वसुन्धरा की अर्चना इस प्रकार की है-

वसुन्धरे नमस्तुभ्यं भूतधात्री नमोस्तुते।
रत्नगर्भे नमस्तुभ्यं पाद स्पर्श क्षमस्व में।
समुद्रवसने देवि पर्वतस्तन मण्डले।
विष्णु पत्नि! नमस्तुभ्यं पाद स्पर्श क्षमस्व में।।


सृष्टि क्रम में पृथ्वी पाँचवे स्थान पर है। इसे ‘भू’, ‘धरा’ जैसे नामों से जाना जाता है। बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा-

सुजलाम शुफलाम मलयज शीतलाम।
शस्य श्यामलाम मातरम वन्दे मातरम।


कह कर वन्दना की है। पृथ्वी की शस्य श्यामलाम रूप की कामना की है। इसके गर्भ में अनेको रत्नों का भण्डार होने से इसे रत्नगर्भा भी कहा गया है। पृथ्वी तत्व को स्थल मण्डल (Lithosphere) भी कहते हैं यह ठोस घटक है। इसके अन्तर्गत पृथ्वी, धरातल की संरचना, मिट्टी, भू आकृतियाँ, चट्टानें, भूमिगत जल-स्रोत एवं प्राकृतिक संसाधन सम्मिलित होते हैं। इन सभी से मिलकर पर्यावरण बनता है। मिट्टी स्थल मण्डल का अत्यधिक प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण भाग होता है। यह विभिन्न प्रकार के प्राणियों पादप समूह एवं जीवों को आधार प्रदान करते हैं। वहीं दूसरी ओर जल मण्डल वायुमण्डल के साथ भी पारस्परिक सम्बन्ध रखते हैं। अर्थात पर्यावरण किसी भी एक घटक की उपस्थिति में पूर्ण नहीं हो सकता। सभी तत्वों का सन्तुलन आवश्यक है।

भूमि बहुत ही समृद्धशाली है क्योंकि इस पर ही मनोरम विशाल पर्वत शृंखलाएँ, लहराती हुई नदियाँ झरने आदि पृथ्वी का अलंकरण है। धन-धान्य से भरे खेत-खलिहान, घने वन, विचरण करते पशु और पक्षी, घाटियाँ, खाई, मैदान, रेगिस्तान, बर्फ से आच्छादित भूमि और शृंग सब इसी धरा पर हैं।

पृथ्वी बहुत सौन्दर्यपूर्ण है। पक्षियों का कलरव, शेर की दहाड़, हिरण का कुलांचे भरना, गाय का रंभाना, बालकों की अठखेलियाँ युवक-युवतियों की चंचलता मन मोहक छवि उपस्थित करती है।

इन सभी को देखकर किसका मन आनन्दित नहीं होगा। कवि कविता के रूप में, गायक गाने के रूप में तो चित्रकार चित्र सृजन में लीन होता है।

ईश्वर सबसे बड़ा चित्रकार है। जिसने विशाल केनवस पर विभिन्न आकृतियाँ और रंग भरे हैं। हम तो मात्र उस प्रकृति की अनुकृति करते हैं। अतः कलाकार को ईश्वर के समान माना गया है। क्योंकि दोनों ही सृजन करते हैं।

‘Artist as a almost god’

चित्रण में भू-दृश्यावलियों का बहुत महत्त्व है। चित्रकार भूमि पर उपस्थित दृश्यों का ही चित्रण करता है। चीनी चित्रकला में ताओवाद से प्रकृति के प्रति एक अनुभूति जागृत हुई, जिससे कलाकार प्रकृति के निकट आ गये। रंग योजनाओं में संगति और लयात्मकता आई। चित्रकारों के ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन करने से प्रकृति चित्रण में महान परिवर्तन हुआ। इस युग में रंगीन चित्रों के बजाए इक रंगे दृश्य, मेघों को चीरते हुए शिखर, अत्यन्त छोटी मानवाकृतियाँ प्रकृति की विशालता का आभास कराती है।

भू-दृश्य चित्रण में क्षेत्र विशेषानुसार जमीन के रंगों में परिवर्तन दिखाई देता है जैसे यदि हम मुगल चित्रण को देखें तो वहाँ के अलंकृत पहाड़ तथा जमीन हरीतिमा लिये हुए जिसमें छोटे-छोटे पौधों में पुष्प लगे हुए दिखाई देते हैं, जैसे चित्रों में भूमि पर गलीचा बिछा दिया गया हो। पहाड़ी चित्रों में भूमि की मनमोहकता और बढ़ जाती है। इसके रंगों में मौलिक रंग के साथ ही मिश्रित रंगों का भी प्रयोग किया है, जिससे रंग अधिक लुभावने दृष्टिगोचर होते हैं।

हमारे मध्य प्रदेश की भूमि विविध रंगों की है। इस विविधता का कारण उसमें पाये जाने वाले विभिन्न तत्व हैं। यहाँ की भूमि सामान्यतया काली, लाल और पीली, लाल और काली तथा पथरीली दिखाई देती है।

यहाँ की भूमि Coal, iron, boxite, lime stone, loamy earth and copper से सम्पन्न है। उसी के अनुसार भूमि के रंगों में विविधता दिखाई देती है। अतः भूमि एक महत्त्वपूर्ण तत्व है।

पर्यावरण के मूल तत्व ही सृष्टि की रचना और विकास में सहायक होते हैं। सृष्टि की निर्मित उस क्षेत्र की प्रकृति अर्थात भूमि, जलवायु, वनस्पति पशु-पक्षी पर आश्रित होती है। यह प्राकृतिक पर्यावरणीय मौसमों के अनुरूप अपना रंग परिवर्तित करती है। इससे मानवीय हृदय को आनन्दानुभूति होती है। वह प्रकृति में ही सौन्दर्य ढूंढता है। वह अपनी रचना द्वारा सौन्दर्य की अनुभूति कराता है। जब दृष्टा का चित्त एकाग्र होता है तभी तो वह जगत के वास्तविक स्वरूप को देखने की क्षमता पाता है। जगत का अर्थ ही परिवर्तनशील है। प्रकृति प्रतिक्षण पट परिवर्तन करती रहती है। यही अनुभूति सौन्दर्य की अनुभूति है।

क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैति
तदैव रूपं कमनीयतायाः।


प्रकृति के क्षण-क्षण में बदलते स्वरूप से सौन्दर्य बढ़ता है। यह सौन्दर्य ही कला के लिये प्रेरित करता है। प्रकृति का रंग मौसम के अनुरूप परिवर्तित होता है। वर्षा के मौसम में पृथ्वी हरितिमा युक्त हो जाती है बारिश से मानव सहित पशु-पक्षी भी प्रफुल्लित हो जाते हैं। इसी प्रकार शीतकाल में फसलें कुछ परिपक्व होने लगती हैं और गर्मी आते-आते इसमें फल आ जाते हैं। इसी प्रकार वातावरण की रंगत में भी परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। वर्षा में काले बादलों का घुमड़ना, हरियाली और मयूर-नृत्य मानव मन को आनन्दित कर देता है। शिशिर में कांस के पौधों में पुष्प का आना, सूर्य का चाँद जैसा परिवर्तित रूप, बसन्त में टेसू का खिलना, नयी कोपलों का आना, विभिन्न रंगों के पुष्पों का पुष्पित होना, कोयल की कूक, गर्मियों में आम्र वृक्षों का पुष्पित होना और फलयुक्त होना मानव मन को प्रभावित करता ही है।

चित्रकार को भी सौन्दर्य बोध होता है। बाह्य और आन्तरिक सौन्दर्य से प्रभावित हो कवि काव्य लिखता है, तो चित्रकार चित्र बनाता है। उसे सृष्टि में उपस्थित नदियों, झरनों, पहाड़ों, जंगल, समुद्र की ऊँची उठती लहरों, दूर से आती नाव अथवा जहाज, मौसम के बदलते स्वरूप ने आकर्षित किया। इस प्रकार कला और पर्यावरण का समन्वित रूप कला सृजन के रूप में प्रकट हुआ। प्रत्येक मौसम के अपने-अपने पर्व त्योहार होते हैं। इन पर्व-त्योहारों ने ही कला को जन्म दिया। साथ ही सांस्कृतिक पर्यावरण को भी।

पर्यावरण एक अति व्यापक शब्द है जिसमें भौतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक सभी प्रभावशील कारक सम्मिलित हैं। पर्यावरण को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है। 1. प्राकृतिक पर्यावरण और 2. सांस्कृतिक पर्यावरण।

1. प्राकृतिक पर्यावरणः इसे भौतिक पर्यावरण भी कहते हैं। इसमें मानव का हस्तक्षेप नहीं होता, बल्कि प्रकृति ही उसकी नियामक होती है। अर्थात समस्त उपादान प्रकृति प्रदत्त हैं जैसे सूर्य ताप, ऋतु परिवर्तन, स्थिति, भूकम्पन, ज्वालामुखी उद्भेदन, मृदा, खनिज, वनस्पति, जीव-जन्तु आदि ऐसे तथ्य हैं, जो प्रकृतिजन्य हैं।

2. सांस्कृतिक पर्यावरणः मानव निर्मित क्रियाशीलता को सांस्कृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत रखा गया है। यह प्राकृतिक पर्यावरण पर आश्रित होता है। भारत में सांस्कृतिक पर्यावरण- आखेटक संस्कृति, सिन्धु घाटी की नगरीय संस्कृति, कृषि और पशुपालन संस्कृति तथा महानगरीय संस्कृति आदि। इन संस्कृतियों से समाज प्रभावित होता है। आखेट संस्कृति ने प्रकृति से प्राप्त संसाधनों का उपयोग किया। किन्तु नगरीय और महानगरीय संस्कृतियों ने प्रकृति का अतिदोहन किया। कला पर्यावरण भी अलग-अलग समयों में विभिन्नता के साथ प्रकट होता है। मानव जीवन में वेद-पुराणों में जीवन के जन्म से लेकर मृत्यु तक 16 संस्कारों का उल्लेख मिलता है। इन्ही संस्कारों-व्रतों और त्योहारों में कला प्रसारित होती है। प्रकृति चित्रण भी एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है। पर्यावरण के परिवर्तित स्वरूप के कारण ही प्रकृति का विभिन्न रूपों में चित्रण हुआ। प्रकृति दृश्य-चित्रण के रूप में प्राकृतिक रहस्यों को प्रकट करती है। इसमें कलाकार की स्वानुभूति होती है। दृश्य चित्र द्वारा ही यह ज्ञात होता है कि कला और पर्यावरण को कभी अलग नहीं किया जा सकता। यह मध्य प्रदेश के दृश्य चित्रकारों के सृजन कार्यों से पता चलता है, जिनमें श्री डी.जे.जोशी, एन.एस.बेंद्रे, विष्णु चिंचालकर, श्रेणिक जैन, सुशील पाल, चन्द्रेश सक्सेना, सचिदा नागदेव, आर.सी.भावसार, एल.एस.राजपूत, जी.एल.चौरागड़े आदि प्रमुख हैं।

सन्दर्भ एवं सूची

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47. कैटलाग- एकल प्रदर्शनी
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54. वर्मा प्रो. धनजंय- पर्यावरण चेतना-मध्य प्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल, 2006, पृष्ठ-1

चित्र सूची-
1. प्रागैहासिक चित्र ‘मातृ देवी पूजा’
2. रेखा चित्र
3. अग्नि चित्र
4. नटराज
5. जल
6. सांस्कृतिक पर्यावरण

 

 

 

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