बिहार - खेती का रोडमैप खेतों तक पहुँचाना होगा

Submitted by editorial on Sat, 10/06/2018 - 17:27
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 06 अक्टूबर, 2018

बिहार कृषि की निम्न उत्पादकता, बढ़ती उत्पादन लागत, वाजिब मूल्य नहीं मिलने, एमएसपी पर सरकारी खरीद नहीं होने, आधारभूत संरचना के संकट, मुख्य वाणिज्यिक फसल गन्ना के वाजिब मूल्य तथा मूल्य के भुगतान, नदी जल प्रबन्धन, मजदूरों के पलायन, पूँजी की कमी इत्यादि समस्याओं से गुजर रहा है। सरकार को कृषि रोड मैप को खेतों तक पहुँचाना होगा।

बिहार से 2000 में झारखण्ड के अलग हो जाने के बाद बिहार से खनिज, उद्योग तथा विद्युत उत्पादन इकाइयों के अलग हो जाने के बाद बिहार मुख्यत: कृषि प्रधान प्रदेश रह गया। करीब 93 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले प्रदेश में सकल बुवाई क्षेत्र 76 लाख हेक्टेयर तथा 56 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र होने का सरकारी आँकड़ा है। कृषि के लिये उत्तम श्रेणी की भूमि के साथ यहाँ गंगा, बूढ़ी गंडक, सोन, बागमती, अधवारासमूह, कमला, कोसी, महानन्दा जैसी प्रमुख नदियों के साथ दर्जनों छोटी नदियाँ हैं। बिहार देश का सबसे समृद्ध जल संसाधन वाला क्षेत्र है। यहाँ की 90% आबादी गाँवों में रहती है, जिसमें खेतिहर श्रमिकों की बड़ी संख्या है। यहाँ धान, गेहूँ, मक्का, दलहन के अलावा सब्जियों, फलों तथा वाणिज्यिक फसल गन्ना तथा जूट की भी खेती होती है। बावजूद इन सारी परिस्थितियों के बिहार की खेती तथा खेतिहर समस्या-ग्रस्त हैं।

बिहार में कृषि की समस्या को आर्थिक-सामाजिक, दोनों दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। उत्तर बिहार का विस्तृत भू-भाग जहाँ बाढ़ से आक्रान्त रहता है, वहीं दक्षिण बिहार का क्षेत्र सूखे से प्रभावित रहता है। आजादी के बाद जितनी भी सरकारें बनी सभी ने बाढ़ तथा सुखाड़ की समस्या की अनदेखी की तथा उचित समाधान का रास्ता नहीं ढूँढा। इस प्राकृतिक आपदा से प्रत्येक वर्ष हजारों जीवन तथा अरबों की सरकारी, गैर-सरकारी सम्पत्ति की क्षति के आँकड़ों के बावजूद नदियों के जल प्रबन्धन पर कोई कदम नहीं उठाया गया। नदियों का पानी हिमालय से निकलकर नदियों के माध्यम से गंगा और फिर समुद्र में जाता रहा तथा बिहार की धरती बाढ़ तथा सूखे से तबाह होती रही। गाद से नदियाँ भरती जा रही हैं, छोटी नदियाँ मरती जा रही हैं। कुछ मरती नदियों को बचाने में सिविल सोसाइटी तथा समाजसेवी अच्छा प्रयास कर रहे हैं। नदियों से गाद निकाल कर नदियों को बचाने, नहरों का निर्माण कर बाढ़ से सुरक्षा तथा सिंचाई के विस्तार की रणनीति सरकार के पास नहीं है। सरकार नदियों पर अभी तक 3675 किमी. बाँध बना चुकी है एवं उनके और विस्तार तथा उच्चीकरण पर सारी ऊर्जा लगा रही है, उनके टूटने और बार-बार बाँधने के खेल में राजनेता, अभियन्ता तथा अभिकर्ता मालामाल हो रहे हैं। बिहार में 19 जिलों की 76% जनसंख्या और 73% से ज्यादा कृषि क्षेत्र प्रभावित होते हैं। तीन दशक के सरकारी आँकड़े बताते हैं कि करीब 7 हजार से अधिक मानव जीवन की क्षति हुई है।

सिंचाई के मामले में तंगहाली

इसी प्रकार कृषि के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण सिंचाई के लिये भी किसान मौसम तथा निजी महँगे सिंचाई स्रोतों पर निर्भर है। वर्षों से अधिकांश राजकीय नलकूप बन्द तथा जर्जर हैं। कुछ तो लगने के बाद एक दिन भी चालू नहीं हुए और जवाबदेही भी तय नहीं की गई। बिहार की कृषि समस्याओं के सामाजिक पहलू में समाज के बिगड़ते ताने-बाने से गाँवों के सभी जाति-धर्म के अल्पसंख्यकों की खेती असुरक्षित है, जिससे कृषि का विकास प्रभावित हो रहा है। आर्थिक पहलू में सबसे प्रमुख समस्या खेती की बढ़ती लागत है। सरकारी आँकड़ों में एक करोड़ 61 लाख जोतों में 91% छोटे तथा मझोले किसान हैं, जिनके पास कृषि उत्पादन के लिये आधारभूत संरचना का अभाव है। खेतों तक सड़क, बिजली, सिंचाई सुविधा नहीं है। महँगे बीज, उर्वरक, कीटनाशक, बिजली, डीजल से फिर सिंचाई, जुताई, ढुलाई आदि सभी की कीमत बढ़ने से खेती की उत्पादन लागत बढ़ती जा रही है। बावजूद इसके लागत की अनदेखी करते हुए कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाता है। तय एमएसपी पर सरकारी खरीद नहीं होती। बिहार में मंडी तथा बाजार समितियों की कोई व्यवस्था नहीं है। बाजार समितियों को सुव्यवस्थित करने के बजाय उन्हें बन्द कर दिया गया है। किसान बिचौलियों के चंगुल में हैं। कृषि उपज की सरकारी खरीद की पैक्सो के माध्यम से औपचारिकता की जाती है। एफसीआई, एसएफसी किसानों से सीधा खरीद नहीं करते। प्रखंडों में बने एफसीआई के गोदाम ध्वस्त हो रहे हैं।

अन्य प्रदेशों में खेती के साथ उससे जुड़े अन्य उद्योगों का विकास होने से वहाँ की खेती को बल मिल रहा है। बिहार में कृषि आधारित परम्परागत उद्योग समाप्त प्राय हैं। डेयरी, मत्स्य पालन, सब्जियों, फलों के उत्पादन की दिशा में प्रयास अपर्याप्त हैं। कृषि के लिये महत्त्वपूर्ण सहायक पूँजी का भी बिहार में अभाव है। सरकार के बार-बार के निर्देशों का भी बैंकों पर असर नहीं है। सभी किसानों तक केसीसी की पहुँच नहीं है। जहाँ पहुँच है, उसकी राशि अपर्याप्त है। अधिकांश बैंकों द्वारा बगैर रिश्वत केसीसी नहीं बनता। फलत: महाजनों से खेती के लिये ऋण लिये जाते हैं। प्राकृतिक आपदा ग्रस्त बिहार के किसानों से बीमा का प्रीमियम काटे जाने के बावजूद प्रधानमंत्री फसल बीमा का लाभ चुनिन्दा किसानों तक ही पहुँचा है। राज्य सरकार द्वारा शुरू राज्य फसल योजना कागजों में ही घूम रही है। इसी प्रकार प्राकृतिक आपदा के समय राज्य सरकार द्वारा घोषित क्षतिपूर्ति तथा इनपुट अनुदान सभी प्रभावितों तक नहीं पहुँचता और किसान ऋण के चक्र में फँसता जाता है क्योंकि जीवन-यापन हेतु खेती छोड़ी नहीं जा सकती।

गन्ने की खेती खस्ताहाल

किसानों द्वारा वाणिज्यिक फसल के नाम पर गन्ने की खेती होती है परन्तु राज्य की सभी चीनी मिलें बन्द हो चुकी हैं। अभी मात्र 10 चीनी मिल चल रही है, उनके जिम्मे किसानों के गन्ना मूल्य का गत वर्ष का करीब 150 करोड़ से ज्यादा बकाया है। कुछ मिलों के यहाँ 2016-17 के बकाये का भी भुगतान नहीं हो सका है। गन्ना विकास के लिये अंग्रेजों द्वारा स्थापित ‘गन्ना शोध संस्थान, पूसा’ मृतप्राय है। गन्ना के उन्नत बीज, खेती की आधुनिक तकनीक से कम लागत पर उन्नत, टिकाऊ खेती तथा अन्य वैज्ञानिक ज्ञान एवं सुविधा प्रदान करने में यह शोध संस्थान विफल है। फलत: बिहार में गन्ना की बढ़ती उत्पादन लागत के साथ गन्ना की उत्पादकता, गुणवत्ता तथा रिकवरी निम्न है।

कृषि के पिछड़े तथा लाभकारी नहीं होने के चलते किसान, मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी देने में असमर्थ हैं। रोजी-रोटी के लिये मजदूरों का बड़े पैमाने पर अन्य प्रान्तों में पलायन होता है जिससे खेती प्रभावित होती है और बहुत छोटे किसान खेती छोड़ उन्हीं मजदूरों के साथ पलायन करते हैं। कुछ खेती छोड़ने को विवश होते हैं। सरकारी आँकड़ा बताता है कि 2012 की तुलना में मोटे अनाज छोड़कर गन्ना सहित अन्य कृषि उत्पादों में कमी हुई है। किसान संगठन बराबर सरकार से माँग कर रहे हैं कि मनरेगा को खेती से जोड़कर मजदूरी का आधा सरकार तथा आधा किसान भुगतान करे जिससे पलायन भी रुकेगा तथा कृषि उत्पादन और बढ़ेगा। इसके अतिरिक्त, पूँजी के अभाव से गुजर रहे किसानों को पूँजी की उपलब्धता तथा ऋण बोझ से मुक्ति के लिये भी सरकार द्वारा कारगर प्रयास नहीं होने से महाजनों पर निर्भरता बढ़ती है।

इस प्रकार बिहार कृषि की निम्न उत्पादकता, बढ़ती उत्पादन लागत, वाजिब मूल्य नहीं मिलने, एमएसपी पर सरकारी खरीद नहीं होने, आधारभूत संरचना के संकट, मुख्य वाणिज्यिक फसल गन्ना के वाजिब मूल्य तथा मूल्य के भुगतान, नदी जल प्रबन्धन, मजदूरों के पलायन, पूँजी की कमी इत्यादि समस्याओं से गुजर रहा है। सरकार को कृषि रोड मैप को खेतों तक पहुँचाना होगा। विगत दिनों बिहार के शिवहर, पटना तथा गया से किसानों की आत्महत्याओं की भी खबरें आई हैं। इन विषम परिस्थितियों से किसानों को उबारना होगा। जातीय, धार्मिक तथा राजनीतिक मकड़जाल में उलझाकर खेतिहरों का मुँह अधिक दिनों तक बन्द नहीं रखा जा सकेगा।

लेखक किसान आन्दोलन से सम्बद्ध हैं।

 

 

 

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