रूपीन-सुपीन घाटी, एक प्राकृतिक विरासत

Submitted by editorial on Sun, 11/04/2018 - 12:18
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सूपीन नदीसूपीन नदी (फोटो साभार - प्रेम पंचोलीवैसे तो पूरा उत्तराखण्ड प्राकृतिक सुन्दरता का भण्डार है। पर बात जब उत्तरकाशी की आती है तो मानों प्रकृति ने सबसे अधिक नेमते बक्शी हों। उत्तरकाशी मुख्यालय में विख्यात काशी विश्वनाथ मन्दिर है तो उसके बाईं ओर गंगा-भागीरथी कल-कल करती धारा हिन्दू संस्कृति की ध्वजवाहक बनी हुई हैं। यही नहीं, इसी जनपद में यमुना का भी उद्गम स्थल है।

यमुना कालिन्दी पर्वत की उत्तरी ढलान से नदी का रूप लेकर 1029 किमी बहती हुई इलाहाबाद में गंगा में मिल संगम बनाती है। जबकि इसी कालिन्दी पर्वत की दक्षिणी ढलान से दो जलधाराएँ विभक्त होकर कमशः रूपीन व सुपीन नाम से बहती हुई, तिब्बत को छूती हुई, हिमाचल के किनौर होते हुए, फिर उत्तराखण्ड की सरहद में आकर नैटवाड़ में संगम बनाती है। बस यहीं से टोंस नदी उत्पन्न होकर कालसी में फिर से यमुना में मिल जाती है।

हम बात कर रहे हैं मध्य हिमालय स्थित उत्तरकाशी के फतेपर्वत क्षेत्र में कल-कल करती रूपीन और सुपीन नदी की। जैसा यहाँ का भूगोल है वैसा यहाँ का वातावरण। या यूँ कहें कि यहाँ पहुँचने पर लगता है कि मानो इसी के आस-पास कहीं र्स्वग होगा। जी हाँ वैसे भी कहा जाता है कि सुपीन नदी से लगे हरकीदून क्षेत्र से ही पाण्डव स्वर्ग गए थे। यहीं से विश्वविख्यात ट्रैक र्स्वगारोहणी का भी रास्ता है।

कालिन्दी पर्वत के कालिन्दी गलेशियर से निकलने वाली यमुना, रूपीन व सुपीन नाम की इन तीन जलधाराओं ने अपने में विभिन्न संस्कृतियों को समेटा हुआ है। रूपीन तिब्बत के बौद्ध संस्कृति को छूती हुई और हिमाचल के किनौर क्षेत्र की जनजातियों से मुखातिब होकर उत्तराखण्ड में अपनी उर्वरक जल संसाधन से वातावरण को खुशनुमा बना देती है।

उत्तराखण्ड में रूपीन और सुपीन नदी के बारे में कई प्रकार की दन्त कथाएँ भी प्रचलित हैं। बताया जाता है कि इन्हें शिव ने साप दिया था कि वे जहाँ तक बहेगी वहाँ तक उनका पानी उपयोग में नहीं लाया जाएगा। यह शोध का विषय हो सकता है। मगर रूपीन व सुपीन नदी के आबाद क्षेत्र में जो बसासत है उनकी संस्कृति की अपने आप में अनोखी पहचान है।

यहाँ के लोगों ने अपने रहन-सहन, गीत, नृत्य, साज-सज्जा व खान-पान को आज भी धरोहर के रूप में संजोए रखा है। यहाँ प्रत्येक गाँव में ग्राम देवी और ग्राम देवता का मन्दिर है। ये मन्दिर बौद्ध मठ शैली से निर्मित है। रूपीन-सुपीन की घाटी अर्थात फतेपर्वत, पंचगाईं, सिगतूर, बड़ासू पट्टियों के नाम से भी जानी जाती है। इस क्षेत्र में भिटासैणी देवी, सिलकुड़िया देवता, सोमेश्वर देवता व महासू देवता लोगों के आराध्य देवता हैं।

दोणी गाँव में मौजूद भिटासैणी देवी, सिलकुड़िया देवता व सोमेश्वर देवता के मन्दिर का इतिहास भी 500 वर्ष पुराना है। यहाँ का इतिहास लिखित नहीं बल्कि गाँव-गाँव में गाये जाने वाले गीत इसे दर्शाते हैं। गीत भी एक खास प्रकार की जाति के लोग गाते हैं। जिन्हें स्थानीय स्तर पर बमोटा कहते हैं। इस क्षेत्र में बमोटा, झुमरिया, हुड़क्या, बाजगी जाति के लोगों का पेशा ही गाना बजाना है जिनके गीतों में कथा, दन्तकथाएँ विद्यमान हैं।

ये जातियाँ विशेषकर देवी व देवताओं के गीत व नृत्य गाती हैं। इनके गीतों में महासू सहित यहाँ के लोक देवताओं के गीत प्रमुख हैं। इनके गीतों में स्थानीय बीर-भड़ो व राजाओं की गाथाओं का प्रमुख स्थान होता है। जैसे 400 वर्ष पूर्व ‘सलारी-मलारी’ की प्रेमगाथा। आज भी दोणी गाँव में सलारी-मलारी का यह विशाल नक्कासीदार लकड़ीनुमा भवन मौजूद है, जो इनके गीतों का साक्षात प्रमाण है।

इस क्षेत्र में लकड़ी के नक्कासीदार भवन आकर्षण का केन्द्र हैं जिन्हें फिरोल भवन या वुडस्टोन के भवन भी कह सकते हैं। ये फिरोल भवन तीन से पाँच मंजिला और विशाल हैं। ये सैकड़ों वर्षों का इतिहास अपने में समेटे हैं। ये भूकम्परोधी भी हैं। 1803 का विशालकाय भूकम्प इन भवनों का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाया था जबकि यह क्षेत्र भूकम्पीय दृष्टि से जोन 4 व 5 में आता है।

खास बात यह है कि प्रत्येक भवन के साथ विशुद्ध रूप से लकड़ी का ही एक छोटा सा भवन बनाया जाता है, जिसे स्थानीय लोग कोठार या अन्न-धन का भण्डार कहते हैं। यह इस बात का घोतक है कि यह क्षेत्र कभी अन्न-धन से सम्पन्न रहा होगा। इन फिरोल भवनों के वास्तुकार भी इसी क्षेत्र के निवासी हैं। ये इन फिरोल भवनों को बनाने के लिये घुमन्तु रूप में प्रवास करते हैं। जब से सीमेंट का प्रचलन गाँव तक पहुँचा है तब से इनके इस परम्परागत कार्य में गिरावट आई है।

यहाँ के रहन-सहन की परम्परा में परस्परता है। लोग सामूहिक रूप से अपने कामों का निष्पादन करते हैं। वह चाहे खेती किसानी का काम हो या भवन निर्माण का। इस समृद्ध परम्परा की वजह से ही लोग स्थानीय उत्पादों को ही महत्व देते हैं। यहाँ कुट्टू जिसे स्थानीय भाषा में फाफरा कहते हैं लोगों का प्रिय भोजन है। इसे लोग सत्तू, हलवा व रोटी के रूप में भी परोसते हैं। घी, दूध, मक्खन, छाछ भोजन का मुख्य हिस्सा है। यहाँ के लोगों का भेड़-बकरी पालन ही प्रमुख पेशा है। इनके अधिकांश वस्त्र भेड़ की ऊन से बने होते हैं। लोग ऊन से ही अंगवस्त्र बनाते हैं। अब तो गाँव-गाँव सड़के पहुँच गई हैं अतः कुछ कारखानों के बने कपड़े भी दिखाई देने लगे हैं।

प्राकृतिक सौन्दर्य भी ऐसा कि रूपीन व सुपीन नदी आगन्तुकों को बार-बार अपनी ओर खींचती है। रूपीन का पानी आसमानी नीला तो सुपीन का पानी मटमैला है। नैटवाड़ में जब ये दोनों मिलती हैं तो लगभग 200 मीटर तक ये दो रंग परस्पर बहते हुए दिखाई देते हैं। यहीं से टोंस नदी का रूप बन जाता है। नैटवाड़ में लोक देवता पोखू महाराज का मन्दिर है। ये क्षेत्र के ही नहीं बल्कि हिमाचल के डोडरा-क्वार से लेकर सम्पूर्ण यमुना, टोंस, रूपीन व सुपीन घाटी के लोगों का न्याय के देवता हैं। इस मन्दिर में बारहमास लोगों का तांता लगा रहता है। लोगों के बीच यह मान्यता है कि जो सुलहनामा कहीं नहीं होगा वह पोखू महाराजा के मन्दिर में होगा।

रुपीन नदीरुपीन नदी (फोटो साभार - प्रेम पंचोलीकालिन्दी पर्वत से लेकर यमुना-टोंस के संगम तक लोगों के आराध्य देवता महासू हैं। यहीं नैटवाड़ से कोई 30 किमी आगे टोंस नदी के साथ-साथ हनोल स्थित महासू देवता की थात है। यहाँ देश-विदेश के लोग महासू के दर्शनार्थ वर्ष भर आते हैं। स्थानीय लोग हनोल महासू मन्दिर को पाँचवें धाम के रूप में मानते हैं। नैटवाड़ में रूपीन व सुपीन नदी आपस में मिल जाती हैं और टोंस नदी के रूप में आगे मोरी, मोरा, ठडियार, खूनीगाड़ होते हुए महासू मन्दिर हनोल को र्स्पश करती है। टोंस नदी गहरी व संकरी घाटियों में अपने बहाव के साथ विभिन्न छोटे-बड़े नदी नालों को अपने में समाहित करते हुए लगभग 150 किमी के अन्तराल पर कालसी स्थित यमुना नदी में मिल जाती है।

कैसे पहुँचे

यहाँ पहुँचने के दो रास्ते हैं।

पहला रास्ता-

देहरादून तक बस, रेल व हवाई सेवाएँ उपलब्ध हैं। इसके बाद लगभग 200 किमी का सफर बस या टैक्सी से तय किया जाता है। इस रास्ते में मसूरी होते हुए कैम्पटी फाल, जमुनापुल, नैनबाग, डामटा, नौगाँव, पुरोला, जरमोलाधार, गड़ूगाड़, मोरी आदि स्थान आते हैं। यहाँ से 10 किमी आगे नैटवाड़ है जिसे फतेपर्वत का द्वार कह सकते हैं। यही पर रूपीन-सुपीन नदी संगम बनाती है और आगे टौंस नदी के नाम से बहती है। मोरी के बाद बसों का संचालन एकदम सीमित है। इसके बाद स्थानीय टैक्सियाँ ही यातायात के साधन हैं।

दूसरा रास्ता-

देहरादून तक बस. रेल, हवाई सेवाएँ हैं। इसके बाद लगभग 250 किमी के सफर में बस या टैक्सी द्वारा देहरादून से वाया विकासनगर, कालसी, सहिया, चकराता, मिनस, क्वानू होते हुए त्यूणी हनोल, खूनीगाड़, से मोरी तक पहुँचा जाता है। इसके आगे 10 किमी के फासले पर नैटवाड़ है।

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प्रेम पेशे से स्वतंत्र पत्रकार और जुझारु व्यक्ति हैं, विभिन्न संस्थानों और संगठनों के साथ काम करते हुए बहुत से जमीनी अनुभवों से रूबरू हुए। उन्होंने बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की।

 

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