ट्यूनीजिया

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ट्यूनीजिया यह उत्तरी अफ्रीका का एक स्वतंत्र गणतंत्र (जुलाई, 1957 तक राजतंत्र) राष्ट्र है, जिसके पश्चिम में अलजीरिया, उत्तर तथा पूर्व में भूमध्यसागर तथा दक्षिण-पूर्व में लीबिया है। जिब्राल्टर के मुहाने तथा स्वेज नहर के मध्य में स्थित होने के कारण ट्रयूनीजिआ सिसली के साथ भूमध्यसागर के पूर्वी तथा पश्चिमी भागों में व्यवधान उपस्थित करता है। इस तरह की स्थिति तथा 900 मील लंबे समुद्रतट पर अधिकार होने के कारण ट्यूनीजिआ क बहुत आर्थिक तथा राजनीतिक महत्व है। गणतंत्र का क्षेत्रफल 48,332 वर्ग मील है।

90,00,000 हेक्टेयर विस्तृत खेती करने लायक जमीन में से 34,00,000 हेक्टेयर पर खेती होती है परंतु उपज बहुत कम होती है। 36,000 हेक्टेयर पर अंगूर की खेती तथा 25,00,000 एकड़ में जंगल है।

यहाँ फॉस्फेट का अक्षय भंडार है। अच्छे किस्म का कच्चा लोहा केफ के दक्षिण में मिलता है। पारा, मैंगनीज, ताँबा, तथा नमक भी यहाँ मिलते हैं।

भाषा- अरबी राजभाषा है। फ्रेंच का भी प्रयोग प्रशासन और व्यापार में किया जाता है ट्यूनिजियाई अरबी भाषा, जिसपर मगरिबी लिपि का प्रभाव है, मध्य पूर्व में ही वोली जाती है। बेरबर भाषियों की संख्या बहुत थोड़ी है।

राज्य का धर्म इसलाम है। फिर भी यहाँ के निवासी धर्म के मामले में दुराग्रही नहीं। मूलवासी सुन्नी मुस्लिम हैं। यूरोपीय लोग रोमन कैथोलिक, ग्रीक आर्थोडॉक्स, प्रोटेस्टेंट और अंग्लिकन आदि धर्मों पर आस्था रखते हैं।

इतिहास- ट्यनूीजिया का इतिहास 1200 वर्ष ईसा पूर्व से आरंभ होता है। उस समय कुछ फीनिशियन वहाँ आ बसे, और उन्होंने कार्थेज नगर की स्थापना की। 146 वर्ष ईसा पूर्व प्रसिद्ध प्यूनिक युद्ध में कार्थेज ध्वस्त हुआ और वहाँ रोमनों का राज्य स्थापित हुआ। कुछ समय पश्चात्‌ रोमनों का पतन हुआ तथा लगभग दो शताब्दियों तक ट्यूनीजिया में अव्यवस्था तथा अराजकता रही विदेशी आक्रमणकारियों ने ट्यनूीजिया आना आरंभ किया। पाँचवीं और छठी शताब्दियों में क्रमश: वंडल और बाइजेंटाइन आए। अरबों ने सातवीं शताब्दी में ट्यूनिजिया को विजय किया।

800 में ट्यूनिजिया के तात्कालिक मनोनीत प्रशासक इब्राहिम बिन अगलब ने बगदाद के खलीफा से विद्रोह करके अपने आधिपत्य में ट्यूनिजिया को अलग राज्य बनाया। सिसली भी उसमें मिला लिया गया। दो शताब्दियों बाद हाफसिद वंश सत्तारूढ़ हुआ, और उसने अगले 300 वर्षों में ट्यूनीजिया को बहुत संपन्न बना दिया। 1574 से 1881 के बीच तुर्क आटोमन साम्राज्य का अधिकार रहा। धीरे धीरे टर्की द्वारा नियुक्त छोटे-छोटे स्थानीय प्रशासक ट्यूनीजिया के शासक बन गए, और 1705 में उन्होंने राज्य को स्वतंत्र घोषित कर दिया। इस प्रकार सत्ता हुसेन वंश को प्राप्त हुई। यह वंश 1957 तक ट्यूनीजिया का शासक रहा।

19वीं शताब्दी का अंतिम चरण आते आते ट्यूनीजिया की आर्थिक स्थिति गंभीर रूप से बिगड़ गई। अन्तराष्ट्रीय आयोग की सिफारिश पर उसे यूरोप के राष्ट्रों से ऋण प्राप्त हुआ, साथ ही फ्रांस, ब्रिटेन और इटली की प्रतिनिधि वहाँ के आर्थिक मामलों की देख रेख के लिये नियुक्त हुए। इस संदर्भ में फ्रांस ने वहाँ अपनी स्थिति सुधारनी चाही और इसी से प्रेरित होकर 1885 के मई में उसने अपना सैनिक अड्डा कायम कर लिया। इसके अतिरिक्त ट्यूनीजिया के आधुनिकीकरण में भी उसने रुचि ली। बदले में प्रथम विश्वयुद्ध में ट्यूनीजिया ने फ्रांस का साथ दिया।

प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के साथ ट्यूनीजिया में राष्ट्रीय चेतना का जागरण हुआ। ज्यून ट्यूनीजिया पार्टी (Jeune Tunisian Party) ने 1920 में सामाजिक सुधारों की माँग की। द्वितीय विश्वयुद्ध में जब फ्रांस की बहुत क्षति हुई तो उसने ट्यूनीजिया को अंतरिक विषयों में स्वायत्तता प्रदान करने का आश्वासन दिया। 1945 में देस्तूर पार्टी और नियो-देस्तुर पार्टी ने मिलकर पूर्ण स्वतंत्रता की माँग की। किंतु 1951 में फ्रांस अपने वादे से मुकर गया और उसने स्वायत्त शासन की माँग को भी ठुकरा दिया। साथ ही फ्रांसीसी प्रशासकों ने दमनचक्र आरंभ किया। अनेक लंबी वार्ताओं के बाद जून, 1955 को फ्रांसीसी ट्यूनीजियाई सम्मेलन पेरिस में हुआ। 20 मार्च, 1956 की फ्रांस ने ट्यूनीजिया को स्वतंत्र कर दिया। उसी वर्ष अप्रैल में हबीब बोरगुइवा (नियो-देस्तू पार्टी के नेता) के नेतृत्व में स्वतंत्र सरकार का गठन हुआ। 25 जुलाई 1957 को प्रतिनिधि सभा ने ट्यूनीजिया को गणराज्य घोषत किया और हबीब-बोर-गुइवा राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। 1 जून, 1959 को स्वतंत्र ट्यूनिजिया का नया संविधान लागू हुआ।

अर्थव्यवस्था- कृषि ट्यूनीजिया का मुख्य उद्योग है। राष्ट्रीय आय का लगभग 40 प्रतिशत भाग इससे प्राप्त होत है। धान्य का निर्यात बड़ी मात्रा में देश के लिये लाभकारी है। खनिज पदार्थों से भी जिनमें फास्फेट राक्‌ (Phosphate rock) मुख्य हैं, लाभ मिलता है। उद्योगीकरण क्रमश: बढ़ रहा है और वह राष्ट्रीय आय के 28 प्रतिशत भाग की पूर्ति करता है। किंतु आबादी के निरंतर बढ़ते रहने के साथ साथ आय में वृद्धि नहीं हो पा रही है। फलत: रहनसहन का स्तर गिर रहा है और बेरोजगारी भी बना रही है। इस संकट के निवारण के लिये सरकार अनेक योजनाएँ बना रही है और नए नए उद्योग भी खोल रही है।

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