संग्रामपुर में अब पानी बचाने के लिये संग्राम

Submitted by RuralWater on Mon, 04/02/2018 - 14:24
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1990 से पहले तक जहाँ 30 से 38 डिग्री तक रहने वाला पारा अब बढ़कर 49 डिग्री को छूने लगा है यानी दस डिग्री का जबरदस्त उछाल। बारिश लगातार कम होती जा रही है। कभी 60 दिनों तक होने वाली बारिश अब 35 से 40 दिन भी नहीं होती, यानी करीब आधी। नब्बे के दशक में 971 मिमी बारिश होती थी जो अब घटकर 679 मिमी तक आ गई है। बारिश की कमी का सीधा असर इलाके के मौसम तथा जलस्रोतों पर पड़ा है। कभी मार्च तक भरे रहने वाली नदी-नाले, तालाब और कुएँ-कुण्डियाँ अब दिसम्बर तक भी साथ नहीं निभाते हैं।

संग्रामपुर और उसके आसपास के दर्जन भर से ज्यादा गाँव इन दिनों एक बड़े संग्राम के दौर से गुजर रहे हैं। पानी के लिये संग्राम। ये गाँव पहले कभी 'पानीदार' हुआ करते थे लेकिन अब बूँद-बूँद को भी मोहताज हो चुके हैं। गाँव के लोग अब पानी का मोल पहचान रहे हैं और पानी बचाने के लिये जी-जान से जुटे हैं। यहाँ प्रदेश का पहला यूएनडीपी पायलट प्रोजेक्ट लागू किया गया है, जो पानी बचाने की विभिन्न तकनीकों से इलाके का पानी सहेजने की कोशिश कर रहे हैं। खास बात यह है कि स्थानीय विधायक तथा प्रदेश की महिला बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनिस भी आम राजनेताओं की छवि से हटकर अपने क्षेत्र के ग्रामीणों को पानी के जमीनी काम से जोड़ रही हैं।

मध्य प्रदेश का बुरहानपुर जिला महाराष्ट्र की सीमा से जुड़ा है। पूर्वी निमाड़ का यह पठारी इलाका गर्मियों के मौसम में खूब तपता है। गर्मी में यहाँ का पारा 45 से 49 डिग्री के बीच झूलता रहता है। गर्मी झेलना तब और भी मुसीबत भरा हो जाता है, जब मौसम की मार के साथ पानी भी दूर होता जा रहा हो। इतनी गर्मी और पानी की कमी से यहाँ के लोगों का जीना मुश्किल हो जाता है। खेतों के लिये तो दूर पीने के पानी तक के लाले पड़ जाते हैं। बीते सालों तक यहाँ के लोग धरती को भेदकर आसानी से पानी निकाल लिया करते थे, लेकिन अब धरती का पानी भी खत्म होने की कगार पर है।

एशिया में सबसे तेजी से जिन स्थानों का भूजल भण्डार खत्म हो रहा है, दुर्योग से यह इलाका इन्हीं में से एक है। यहाँ बीते बीस सालों में जल स्तर बहुत तेजी से घटा है। केन्द्रीय भूजल बोर्ड के आँकड़े बताते हैं कि सन 1990 से 2000 तक इन गाँवों में भूजल स्तर मात्र 120 फीट हुआ करता था। 2010 आते-आते यह बढ़कर दोगुना यानी 300 फीट तक जा पहुँचा। यह एक तरह से प्रकृति की चेतावनी थी लेकिन इसे किसी ने नहीं सुना। अधिक पानी में होने वाली केले और कपास की फसल में ज्यादा-से-ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़ में धरती के सुरक्षित भण्डार से गहरे और गहरे बोर करते हुए पानी उलीचने का सिलसिला चलता ही रहा। यही वजह है कि अब 2018 में जलस्तर चार गुना बढ़कर 600 से 700 फीट तक पहुँच गया है।

इतना ही नहीं जलवायु परिवर्तन से गर्मी का पारा भी तेजी से बढ़ता जा रहा है। 1990 से पहले तक जहाँ 30 से 38 डिग्री तक रहने वाला पारा अब बढ़कर 49 डिग्री को छूने लगा है यानी दस डिग्री का जबरदस्त उछाल। बारिश लगातार कम होती जा रही है। कभी 60 दिनों तक होने वाली बारिश अब 35 से 40 दिन भी नहीं होती, यानी करीब आधी। नब्बे के दशक में 971 मिमी बारिश होती थी जो अब घटकर 679 मिमी तक आ गई है।

बारिश की कमी का सीधा असर इलाके के मौसम तथा जलस्रोतों पर पड़ा है। कभी मार्च तक भरे रहने वाली नदी-नाले, तालाब और कुएँ-कुण्डियाँ अब दिसम्बर तक भी साथ नहीं निभाते हैं।

पानी का जिक्र करते हुए बुरहानपुर का महत्त्व इसलिये भी बढ़ जाता है कि आज से चार सौ साल पहले अकबर के जमाने में ख्यात कवि अब्दुल रहीम खानखाना ने यहाँ कुण्डी भण्डारा बनवाया था। इस विश्वस्तरीय अनूठी जल विरासत को आज भी उसी स्वरूप में देखा जा सकता है। उन दिनों पानी की व्यवस्था के लिये पास के सतपुड़ा के सघन जंगलों और पहाड़ियों से बहने वाले पानी की धार को सहेजकर लाया गया था। जल संकट की यही स्थिति रही तो यह विश्व में एकमात्र जीवित मुगलकालीन जल व्यवस्था भी दम तोड़ देगी। चिन्ता की बात है कि जंगलों की बेतहाशा कटाई तथा मिट्टी कटाव से पानी का रिसाव पहले ही कम होता जा रहा है।

महाराष्ट्र की तरह यहाँ के किसान भी केले और कपास की बम्पर पैदावार करते रहे हैं। सतपुड़ा के घने जंगल और ताप्ती तथा उसकी सहायक नदियों ने इलाके को ऐसी हरियाली और खुशहाली की सौगात दी थी कि पीढ़ियाँ गर्व करतीं, लेकिन पानी की नासमझी ने सब कुछ चौपट कर दिया। बीते कुछ सालों में खेती के लिये लगने वाले पानी में कमी आने लगी तो किसानों ने फसल बदलने के बजाय पानी की आस में धरती की छाती में गहरे-गहरे बोर करना शुरू कर दिये। अब फसलें कम या गुणवत्ता में कमजोर हो रही हैं। इससे किसानों की आय भी लगातार कम होती जा रही है। इधर पारम्परिक तरीकों से पानी बचाने और सहेजने की जमकर अनदेखी हुई. नतीजा सामने है कि अब लोगों को खेती तो दूर पीने के पानी तक के संकट का सामना करना पड़ रहा है।

इलाके में चार सौ साल पहले मुगलकाल से लेकर बीते सौ-पचास साल पहले तक की बनी हजारों कुएँ-बावड़ियाँ और कुण्डियाँ आज भी इन गाँवों में घूमते हुए देखी जा सकती है लेकिन इनमें से ज्यादातर वीरान होकर खंडहर में बदल चुकी हैं।

कभी पर्याप्त पानी से भरे ये जलस्रोत जीवन्त होकर धड़कते रहते होंगे। इनकी पालों पर जीवन का संगीत गुनगुनाता रहता होगा, आज वहाँ सन्नाटे के सिवाय कोई नहीं। इनकी उपेक्षा से ही बुरहानपुर अंचल को अकाल की तरह के हालातों का सामना करना पड़ रहा है।

इलाके की विधायक और मंत्री अर्चना चिटनिस अब संग्रामपुर, तारपाटी, चिड़ियापानी, जसौंदी, बलडी, चिल्लारा, दापोरा, नाचनखेड़ा, चमनगाँव, चापोरा, बहादरपुर, बम्भाड़ा, इच्छापुर, फोफनार, बिरोदा, बोरगाँव और धामनगाँव आदि में घूमकर लोगों को पानी का मोल समझा रही हैं। यहाँ रहने वाले बंजारा, गुर्जर और आदिवासी लोगों को वे समझाती हैं- 'पानी को बनाया नहीं जा सकता, सिर्फ बचाया जा सकता है। यही एक रास्ता है। पानी को सहेजने का काम सरकारी अमले को नहीं करना है, जनता को करना है। नलकूप छोड़ो, कुएँ का इस्तेमाल करो। कुएँ धरती का पानी बढ़ाते हैं और नलकूप उस भण्डार को खत्म करते हैं। खेतकुंड से खेती में फायदा होगा। केले और कपास की फसल में ज्यादा पानी लगता है। कम पानी में होने वाली फसलें लें। बाँस, सहजन और आँवला लगाएँ। मधुमक्खी पालन और मटका रेशम से अपनी आमदनी बढ़ाएँ। जनता खुद सजग होकर पानी बचाने का काम करे, वह कब तक हाथ फैलाए खड़े रहेंगे।'

इन गाँवों में रहने वाले ज्यादातर कम रकबे वाले छोटे-छोटे किसान हैं। इन्हें पानी के लिये प्रेरित करना बड़ा श्रमसाध्य और मुश्किल काम है लेकिन मंत्री चिटनिस जोश-खरोश से जागरुकता बढ़ाने में लगी हुई हैं। प्रदेश में चुनावी साल होने के बाद भी गर्मियाँ शुरू होते ही जल यात्राओं के जरिए वे गाँव-गाँव जाकर पानी की बात करती हैं। ताकि बारिश से पहले कुछ जमीनी काम हो सके। इसमें वे महिलाओं को खास तौर पर शामिल करती हैं। उनके मुताबिक पानी के संकट से सबसे ज्यादा वे ही प्रभावित होती हैं। चैत्र नवरात्रि को भी इस बार उन्होंने पानी बचाने की मुहिम से जोड़ा तथा ग्रामीणों को खेतकुंड (खेत तालाब) बनाने के लिये प्रेरित लिया।

उन्हें इलाके के लोग अब पानी वाली दीदी के नाम से पहचानने लगे हैं। उनकी बड़ी चिन्ता यह भी है कि अब धरती में पानी के लिये इससे और गहरे जाएँगे तो यह निश्चित नहीं है कि और कितने दिनों का पानी मिलेगा। दूसरा बड़ा कारण यह है कि यह पानी पीने लायक भी होगा या नहीं। अधिक गहराई के पानी का उपयोग करने से लोगों को बीमारियाँ भी हो सकती हैं। इलाके में कुछ जगह आर्सेनिक और फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने से ये आशंका और बढ़ जाती है।

जल यात्रा के लिये पहले से दिन और स्थान तय कर लिया जाता है। सुबह सूरज उगने के साथ ही एक लम्बी रैली के रूप में लोग गाँव की गलियों से होते हुए चौपाल तक पहुँचते हैं। इनमें किसान, ग्रामीण, विद्यार्थी, महिलाएँ, कर्मचारी और समाजसेवी सब इकट्ठे होते हैं। स्कूली विद्यार्थी अपने हाथों में पानी बचाने के सन्देश देते तख्तियाँ लेते हैं और बालिकाएँ सिर पर जल पात्र लिये चलती हैं। उनके पीछे गाँव की औरतें गीत गुनगुनाते हुए चलती हैं।

इस जागरण फेरी का चौपाल में समापन होता है। यहाँ गाँव के पानी को लेकर चर्चा होती है, जिसमें सब अपनी तरफ से पानी पर बात करते हैं। किसान अपने खेतों में पानी की उपलब्धता पर बात करते हैं, सुझाव देते हैं। उनकी बात को गौर से सुना और नोट किया जाता है। इसके बाद जल विशेषज्ञ पानी पर ग्रामीणों को जानकारी देते हैं और बताते हैं कि हालात कितने गम्भीर हैं और यदि अब भी नहीं जागे तो आने वाली पीढ़ियाँ पानी के लिये आपस में लड़ेगी। न उन्हें पानी मिलेगा और न ही अन्न। धरती में पानी जाएगा, तब तो उसे नलकूप से उलीच पाओगे। पानी नहीं होगा तो खेती कैसे करोगे? उनकी बात का वहाँ मौजूद लोगों पर गहरा असर होता है। फिर गाँव में मौजूद संसाधनों और खेती की स्थिति तथा किसानों की इच्छा के अनुरूप गाँव में पानी बढ़ाने के लिये कार्य योजना वहीं चौपाल पर ही तय की जाती है। गाँव के लोगों को ही इसकी जिम्मेदारी दी जाती है। सरकारी मदद के लिये मौके पर मौजूद अधिकारियों तथा कर्मचारियों को ताकीद किया जाता है। समय सीमा तय की जाती है।

शाम के वक्त किसान संगोष्ठियाँ होती हैं। इनमें किसानों के लिये पानी पर विस्तार से बात होती है तथा उन्हें बताया जाता है कि वे किस तरह कम पानी में भी अपनी खेती को लाभ की खेती में बदल सकते हैं। केले और कपास की फसल मुनाफा तो देती है, पर धीरे-धीरे जमीनी पानी के भण्डार को खत्म करती जा रही है। साथ ही जलस्तर लगातार नीचे जाते रहने से हर साल नया बोर लगाने पर किसानों को भी कर्जदार बनाती जा रही है। इस तरह गाँव-गाँव निकलने वाली जल यात्रा इन दिनों बुरहानपुर जिले को फिर से 'पानीदार' बनाने के लिये जी तोड़ कोशिश कर रही हैं।

जब एक तरफ देश के तमाम गाँवों में लोग पानी के लिये लड़ रहे हैं वहीं दूसरी तरफ बुरहानपुर के ये गाँव अपना पानी बचाने की लड़ाई में बढ़-चढ़कर योगदान कर रहे हैं। ये जान गए हैं कि गाँव का अस्तित्व खेती और पानी से ही है। पानी के बिना खेती कैसी और खेती के बिना गाँव कैसे? ये ग्रामीण हमें प्रेरणा दे रहे हैं कि अभी भी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है, उम्मीद बाकी है और बहुत कुछ बदला जा सकता है।

उनकी इस मुहिम का कुछ असर भी हुआ है। जिले के करीब 40 गाँवों में किसानों ने बारह सौ से ज्यादा खेतकुंड बनाए हैं। सरकारी अमले की मदद से किसान छोटे-छोटे तालाब बना रहे हैं। अकेले संग्रामपुर गाँव में ही इस बार पानी की चौपाल में किसानों ने अपने खेत पर पचास से ज्यादा खेत तालाब बनाने की जिम्मेदारी खुद आगे बढ़कर ली है। जैविक खेती का रकबा बढ़ा है। कम पानी और कम लागत में होने वाली फसलें तथा धारवाड़ पद्धति से होने वाली दलहन की खेती को भी किसान अपनाने लगे हैं। अमरावती और मोहना नदी में रिचार्ज सिस्टम लगाया गया है। शाहपुर में सार्वजनिक कुएँ का उपसा (उलीच) कर साफ किया गया तो यहाँ दस हार्स पॉवर की मोटर से अब नगर को पानी दिया जा रहा है। पानी के प्रति लोगों की समझ और जिम्मेदारी का भाव भी बढ़ा है।

यूएनडीपी इण्डिया और पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन एप्को ने संग्रामपुर में भूजल संरक्षण के लिये प्रदेश का पहला पायलट प्रोजेक्ट प्रारम्भ किया है। इस परियोजना में स्वचलित मौसम केन्द्र लगाया जाएगा। इसके अलावा क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार बारिश के पानी को धरती में उतारने तथा भूजल स्तर को बढ़ाने की तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। प्रारम्भिक तौर पर रिचार्ज वेल, इंजेक्शन वेल आदि अधुनातन तकनीकों को बढ़ावा देते हुए कम पानी में अधिक फसल देने वाले उत्पादों की जानकारी तथा जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिये किसानों और ग्रामीणों के लिये विशेष प्रशिक्षण दिये जाएँगे। यह सफल हुआ तो आगे इसे और वृहद रूप दिया जाएगा।

देर से ही सही, बुरहानपुर के कुछ गाँव जागे तो हैं, अब देखना यह है कि इनकी ये कोशिशें देश के दूसरे गाँवों के लिये मिसाल बन पाती है या नहीं। इतना तो तय है कि जब भी-जहाँ भी समाज खुद अपने पानी के लिये उठ खड़ा होता है, वहाँ के इलाके को 'पानीदार' बनने में देर नहीं लगती। बुरहानपुर में जो जमीनी काम किया जा रहा है, इस तरह का काम कई-कई गाँवों में किये जाने की महती जरूरत है। अब समय आ गया है कि जन-प्रतिनिधियों को भी पानी के मुद्दों पर अपने-अपने इलाके में स्थायी और जमीनी काम करना होगा।
 

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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