सप्तऋषि घाट हरिद्वार - बीमार गंगा

Submitted by UrbanWater on Sat, 07/15/2017 - 11:44

2010 के हरिद्वार कुम्भ के बाद राष्ट्रीय नदी घोषित गंगा को आज तक अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के समान सम्मान और अधिकार मिला ही नहीं। यही नहीं खुलेआम गंगा में मल-मूत्र बहाया जा रहा है। पाबंदी के बावजूद निर्धारित स्थानों के अतिरिक्त अस्थि विसर्जन व गन्दगी बहाई, गंगा घाटों पर खुलेआम प्लास्टिक और पाॅलीथिन बेची जा रही है, लेकिन इसे रोकने-टोकने वाला कोई नहीं है। शहरी क्षेत्र से निकलने वाले 110 एमएलडी सीवेज जल में से 60 एमएलडी सीवेज से अधिक जल सीधे गंगा में बिना किसी शोधन के बहाया जा रहा है। गंगा के किनारे जाते ही मन निर्मल, पवित्र अनुभूतियों के सागर में डूब जाता है। दुनिया के सारे दुख दर्द भूलकर बस इन्हीं किनारों पर बैठकर कल-कल करती गंगा से मिलने वाले आशीर्वाद को ग्रहण करने का मन करता रहता है। अभी कुछ ही देर हुए थे बैठे हुए कि अचानक से काफी सारा कचरा पैरों से किनारे आकर लिपट गया। पानी को गौर से देखने पर पता चला कि अन्दर छोटे-छोटे बुलबुले उठ रहे हैं। ये नजारा हरिद्वार के सप्तऋषि क्षेत्र का है, जिसके आस-पास सौ से ज्यादा मन्दिर और अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त आश्रम हैं।

कुछ दूर चलने पर दृश्य और भी भयानक हो गया। यह गंगा में मानवजनित मैल से मेरा परिचय करवा रही थी। कहीं प्लास्टिक के पैकेट फेंके गए थे तो कहीं, पाॅलीथिन में रखे गन्दे, विभिन्न प्रकार के पात्र जिसमें पान, सुपारी, पत्ते इत्यादि गंगा को अपवित्र बनाने में अपना भरपूर योगदान दे रहे थे। साथ ही चिप्स का पैकेट पड़ा हुआ था तो कही कूड़े का ढेर लगा हुआ था। थोड़े पास जल में गिरे पेड़ के सहारे कुछ फटे कपड़े, पाॅलीथिन, खर-पतवार आदि प्रदूषित वस्तुएँ लटकते हुए बता रही थी कि, वह काफी दूरी तय करने के बाद यहाँ पहुँची है।

हालांकि भारत सरकार द्वारा 1985 से ही गंगा को पवित्र बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं, लेकिन अभी तक का सारा प्लान पानी में बह चुका है, जिसमें काफी सारा पैसा, कुछ फाइलें, कुछ पद और ढेर सारे वादे हैं।

करीब 2525 किलोमीटर की लम्बाई के साथ गंगा को देश की सबसे बड़ी नदी होने का गौरव प्राप्त है। गंगा बेसिन का कैचमेंट एरिया 861404 वर्ग किलोमीटर है जो भारत का 26.4 फीसदी है। जिसकी लगभग 43 प्रतिशत आबादी की आजीविका गंगा पर आश्रित है। लेकिन फिर भी गंगा आज अपने उद्गम से कुछ सौ किलोमीटर पर आकर हरिद्वार में ही दम तोड़ने लग जाती है।

आँकड़ों की माने तो 1985 से अब तक गंगा को स्वच्छ बनाने के लिये चलाए गए अभियानों में लगभग तैंतीस सौ करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, लेकिन गंगा की हालत जस-की-तस है। हाँ पर्यटन और पूजा पाठ से आस-पास के लोगों की आर्थिक मदद करने वाले घाटों की सुन्दरता जरूर बढ़ी है।

हरिद्वार के भीमगौड़ा बैराज से लेकर बिजनौर बैराज के बीच लगभग 82 किलोमीटर लम्बी गंगा हरिद्वार के लिये तीर्थाटन, पर्यटन ही नहीं बल्कि कृषि कार्याें व बिजली बनाने का एक माध्यम भी है। गंगा से ही निकली गंगनहर पूरे हरिद्वार जिले व यूपी के कुछ जिलों में न केवल पीने के लिये बल्कि कृषि के लिये पानी उपलब्ध कराती है। अकेले हरिद्वार में गंगा को साफ करने के लिये 2016 में 550 करोड़ का बजट आवंटित किया गया। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद भी गंगा को व्हीलचेयर से उठाकर उसके पैरों पर खड़ा नहीं किया जा सका। अलबत्ता आज हालत यह हो गई है कि पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण बोर्ड रिपोर्ट में दावा किया गया है कि गंगा का पानी हर की पैड़ी पर नहाने के लायक भी नहीं बचा है, आचमन की बात तो दूर की है।

यह तो सत्य है कि हरिद्वार के पंडे पुजारियों के लिये गंगा जीवनदायिनी और मुख्य आर्थिक आधार है। लेकिन देखा जाये तो इस मामले में ये ही सबसे पीछे हैं। गंगा से कमाने का ख्वाब तो सारे देखते हैं। लेकिन गन्दगी को साफ करने और जागरुकता फैलाने के मामले में वे चुप्पी साध लेते हैं।

गंगा में रोजाना हो रहे अवैध खनन और गिर रहे सीवेज जल ने गंगा की सूरत बिगाड़ दी है। 2010 के हरिद्वार कुम्भ के बाद राष्ट्रीय नदी घोषित गंगा को आज तक अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के समान सम्मान और अधिकार मिला ही नहीं। यही नहीं खुलेआम गंगा में मल-मूत्र बहाया जा रहा है। पाबंदी के बावजूद निर्धारित स्थानों के अतिरिक्त अस्थि विसर्जन व गन्दगी बहाई, गंगा घाटों पर खुलेआम प्लास्टिक और पाॅलीथिन बेची जा रही है, लेकिन इसे रोकने-टोकने वाला कोई नहीं है। शहरी क्षेत्र से निकलने वाले 110 एमएलडी सीवेज जल में से 60 एमएलडी सीवेज से अधिक जल सीधे गंगा में बिना किसी शोधन के बहाया जा रहा है। मेलों और स्नान पर्वाें में यह बढ़कर 80 एमएलडी तक पहुँच जाती है। सीवेज जल के शोधन को यहाँ पर मात्र 3 एसटीपी ही है, इनकी कुल क्षमता 63 एमएलडी शोधन करने की है। वह भी तब जब इनका इस्तेमाल 365 दिन 24 घंटे हो।

आज अकेले हरिद्वार शहर में सैकड़ों होटलों, आश्रमों की सीवेज सीधे तौर पर गंगा मेें गिराई जा रही है, लेकिन पैसे लेकर इन मुद्दों को दबा दिया जाता है। सरकारी मशीनरी की सुस्ती और राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के आगे गंगा को उपेक्षित करने के कारण कोई व्यापक या सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आ पाये। हालांकि समय-समय पर मौजूद मीडिया इस को लेकर मुखर रहता है। दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुस्तान जैसे समाचार पत्र पूरी निष्पक्षता के साथ गंगा की रिपोर्टिंग करते हैं और समाचार छपते भी हैं। हर दिन अनुपातिक 1 से 2 खबरें हरिद्वार जिले में गंगा को लेकर छपती हैं। लेकिन जागरुकता के अभाव में उसका सकारात्मक नतीजा सामने नहीं आ रहा है। मीडिया लोगों के बीच जागरूक करने का कार्य तो कर रहा है, लगातार खबरें भी चला रहा है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि वे खबरें इस तरह की होती हैं कि लोग उनसे लगाव नहीं रखते और वे बस पृष्ठ भरने का काम करती हैं।

गंगा आज हमारे अरबों रुपए खर्च करने के बाद भी लगातार विषैली व प्रदूषित होती जा रही है। कभी मोक्षदायिनी रही गंगा आज दुनिया की दस सबसे ज्यादा प्रदूषित नदियों में से एक है। कहते हैं कि गंगाजल पीने और इसमें स्नान करने से सारे रोग नष्ट हो जाते हैं, लेकिन उपेक्षा की शिकार उसी गंगा के बारे में हुए शोधों से पता चलता है कि देश में होने वाली लगभग 20 प्रतिशत बीमारियों की वजह गंगा है। आज गंगा गोमुख से ही प्रदूषित होनी शुरू हो जाती है, और ऋषिकेश से उतरते ही ऐसा लगता है जैसे अपनी माँ स्वरूपा गंगा को हम अपने घर में लाने के बजाय कुष्ठाश्रम छोड़ आये हैं। तीन साल गुजर चुके हैं और दो साल बाकी हैं इस सरकार से उम्मीद के।

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