समझें नदियों की भाषा

Submitted by RuralWater on Fri, 05/04/2018 - 18:24
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जंगल ही वास्तव में नदियों को बचाने के यंत्र हैं। वृक्षारोपण करते समय बहुत सावधानी से प्रजातियों का चयन किया जाना चाहिए ताकि नदियों को संरक्षित करने में हमें सहायता मिल सके। उन्होंने 6वीं सदी में वाराहमिहिर द्वारा लिखी वराहसंहिता का उल्लेख भी किया जिसमें भूजल और वृक्षों पर आधारित अनेक लक्षणों का विवरण उपलब्ध है। यह ग्रन्थ नदी संरक्षण पर काम करने वाले लोगों के लिये पथ प्रदर्शक का काम कर सकती है।

भोपाल के सप्रे संग्रहालय में 17 अप्रैल को नदी मित्रों का जमावड़ा लगा था। मौका था मध्य प्रदेश के नर्मदा कछार की सूखती नदियों को फिर से अविरल बनाने पर चिन्तन का। चिन्तन दो घंटे तक जारी रहा जिसमें वन विभाग के अफसर, बाँध निर्माण से जुड़े सिविल इंजीनियर, भूवैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता और मीडिया से जुड़े लोगों ने भाग लिया।

चिन्तन का लब्बोलुआब था नदियों को समग्रता में समझकर ही उन्हें संरक्षित किया जा सकता है। और इस कार्य में सबको अपनी सहभागिता सुनिश्चित करनी होगी। एकांगी सोच नदियों के पुनर्जीवन का आधार नहीं हो सकती। बैठक की अध्यक्षता भारतीय वन सेवा के पूर्व अतिरिक्त मुख्य वन संरक्षक विनायक सिलेकर ने की और अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों ने अपनी बातें रखीं।

वन प्रबन्ध संस्थान के मुखिया डॉ. पंकज श्रीवास्तव ने नर्मदा को जिन्दा करने के लिये उसकी सहायक नदियों को जिन्दा करने पर बल दिया। विदित हो कि अमरकंटक के पठार से निकलने वाली नर्मदा के पानी का लगभग साठ प्रतिशत हिस्सा उसकी दक्षिणी सीमा पर स्थित सतपुड़ा पर्वत माला से निकलने वाली नदियों के माध्यम से आता है। अतः इनके स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने का मतलब नर्मदा की सेहत पर असर पड़ना। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘जंगल रहे ताकि नर्मदा बहे’ के हवाले से वृक्षारोपण पर जोर दिया। उनका कहना था कि जंगल, हकीकत में केवल कुदरती होते हैं। कुदरत ही उन्हें गढ़ती है। हम केवल पेड़ लगा सकते हैं, जंगल नहीं।

जंगल ही वास्तव में नदियों को बचाने के यंत्र हैं। उनका सुझाव था कि वृक्षारोपण करते समय बहुत सावधानी से प्रजातियों का चयन किया जाना चाहिए ताकि नदियों को संरक्षित करने में हमें सहायता मिल सके। उन्होंने 6वीं सदी में वाराहमिहिर द्वारा लिखी वराहसंहिता का उल्लेख भी किया जिसमें भूजल और वृक्षों पर आधारित अनेक लक्षणों का विवरण उपलब्ध है। यह ग्रन्थ नदी संरक्षण पर काम करने वाले लोगों के लिये पथ प्रदर्शक का काम कर सकती है।

नर्मदा घाटी से जुड़े सेवा निवृत्त मेम्बर इंजीनियर राधेश्याम कश्यप ने बताया कि प्रारम्भ में नर्मदा घाटी का पूरा इलाका वनाच्दादित था और नदीतंत्र के प्रवाह को अविरल रखने में उसका पूरा योगदान था। बाँधों के बनने के बाद भले ही नहरों ने पानी को दूर-दूर तक पहुँचाया है पर पानी की क्वालिटी में गिरावट आ गई है। अनेक नदियाँ प्रदूषित हो गई हैं। नर्मदा में तेजी से रेत का खनन हो रहा है जो नदीतंत्र के अस्तित्व के लिये खतरा है। यदि सही समाधान नहीं खोजा गया तो अगले 50 साल के अन्दर नर्मदा कछार की नदियाँ मर जाएँगी।

मीडियाकर्मी राकेश दीवान का कहना था कि नर्मदा को हमने तालाब में तब्दील कर दिया है। हमारी नासमझी, नर्मदा के सदानीरा स्वभाव को खत्म कर रही है। सभी जानते हैं कि जल स्रोतों से खिलवाड़ करना दण्डनीय है पर हमने उज्जैन में महाकाल के पीछे बुद्धि सागर तालाब के अन्दर म्यूजियम बना दिया है। मूर्ति लगा दी है।

कहा जाता है कि सिंचाई से उत्पादन बढ़ता है लेकिन बाँधों से मात्र दस प्रतिशत ही उत्पादन बढ़ा है। वे आगे कहते हैं कि यदि नर्मदा समाप्त होगी तो मध्य प्रदेश का परिदृश्य अकल्पनीय हो जाएगा। देश के 91 प्रतिशत तालाबों में केवल 25 प्रतिशत पानी बचा है। यदि बाँध बनता है तो एक नदी मार दी जाती है। हमने नदियों को मारा है। हमने जंगलों की हत्या की है। वन्य प्राणियों को मारा है। वे जोर देकर कहते हैं कि बाँधों में सिल्ट भर रही है। वे उथले हो रहे हैं। बाँधों के कारण नदी के प्रवाह को शून्य नहीं होना चाहिए।

श्याम बोहरे का मानना था कि सरकारी व्यवस्था लोगों को अपने देशज ज्ञान के अनुसार नहीं चलने देती। व्यवस्था जिन्हें तवज्जो नहीं देती उनके पास भी ज्ञान है। प्रश्न यह है कि क्या हम उनसे कुछ सीखना चाहते हैं? समाज में अनेक लोग हैं जो एकजुट हो, अपने तरीके से अच्छा काम कर रहे हैं। हमें उनके काम का संज्ञान लेना चाहिए। लेखा-जोखा रखना चाहिए। सरकार को गलतियाँ करने से रोकना चाहिए। उन्होंने सरदार सरोवर बाँध के आन्दोलनकारियों तथा सरकार के बीच सम्पन्न वार्ता के उल्लेख द्वारा बताया जो लोग प्रारम्भ में एक दूसरे की बात सुनने के लिये तैयार नहीं थे, बाद में मुद्दों को समझने के लिये सहमत हुए। नदियों के मामले में भी सबको मिलबैठ कर हल खोजना चाहिए।

समाजिक कार्यकर्ता राजेंद्र हरदेनिया ने बताया कि प्रदेश के अनेक नगरों तथा कस्बों में नर्मदा के पानी पर आधारित प्रोजेक्ट बने हैं। कुछ जगह औचित्य पर चर्चा के बिना भी योजना बनी है। योजना बनाते समय इस बात पर भी विचार नहीं हुआ कि पानी उठाने से नर्मदा के प्रवाह पर क्या असर होगा? पिपरिया में नर्मदा पेयजल योजना लागू की गई है। पाइप लाइन बिछ चुकी है। योजना को शुरू करने की घड़ी तो नहीं आई है पर नदी में इंटेकवेल के पास पानी नहीं है।

पिपरिया के आसपास की नदियाँ सूख गई हैं। पिपरिया में समाज की पहल से सूख चुकी नदी को जिन्दा करने का प्रयास किया जा रहा है। उस नदी पर किया जा रहा प्रयास यदि सफल होता है तो वह लाइटहाउस का काम करेगा।

केजी व्यास ने भूविज्ञान की दृष्टि से नदी के उद्भव तथा उसकी भूमिका पर प्रकाश डाला। नर्मदा घाटी के मानचित्र की मदद से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि बारिश का पानी खुद अपना रास्ता चुनता है। बड़ी नदी, छोटी-छोटी सरिताओं के माध्यम से एकत्रित किये मलबे को समुद्र में पहुँचा देती है वहीं भूजल कछार की उथली परतों को साफ करता है पर यह तभी सम्भव है जब भूजल का स्तर नदी तल के ऊपर रहे।

श्री व्यास ने नर्मदा नदी के प्रवाह की यात्रा का व्यौरा भी प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि सहायक नदियों के योगदान के कारण ही बरगी बाँध में 87 प्रतिशत लाइव-स्टोरेज उपलब्ध है। सहायक नदियों के योगदान के कम होने के कारण इंदिरा सागर में 39 प्रतिशत ही लाइव-स्टोरेज बचा है। तवा बाँध में केवल तीन प्रतिशत लाइव-स्टोरेज बचा है। उल्लेखनीय है कि तवा की सहायक नदियाँ सूख चुकी हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि भूजल के अति दोहन के कारण भूजल स्तर गिरा है। उसके कारण सहायक नदियाँ सूख रही हैं।

नदियों के प्रवाह की बहाली के लिये समानुपातिक ग्राउंड वाटर रीचार्ज की मदद से स्थिति को काबू में लाया जा सकता है। इसके लिये वनभूमि सहित सभी इलाकों में समाज को मिलकर काम करना होगा।
 

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About the author

.कृष्ण गोपाल व्यास जन्म – 1 मार्च 1940 होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)। शिक्षा – एम.एससी.

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