यह जो इक शहर है बेपानी शिमला...

Submitted by RuralWater on Tue, 04/24/2018 - 18:45

एक करोड़ लीटर पानी का सूखा टैंकएक करोड़ लीटर पानी का सूखा टैंकशिमला की ठंड, भारत में एक मुहावरे की तरह है। गर्मी में ठंड की बात हो, तो शिमला याद आता है। उत्तर के मैदानी इलाके में ठंड बढ़ जाये तो कहा जाता है कि शिमला की हवा चल गई। और-तो-और यदि ठंड में बर्फ का नजारा देखने की बात हो, तो भी शिमला का ही नाम लिया जाता है।

अब यदि मैं शिमला का नाम एक ऐसे शहर के रूप में लूँ, जहाँ पानी की कमी है; जहाँ के नलों में तीसरे-चौथे दिन पानी आता है; जहाँ मार्च के अन्तिम सप्ताह में लू चलती है; तो आप क्या कहेंगे? या तो आप विश्वास नहीं करेंगे या आपके मन में बनी शिमला की छवि टूटेगी। किन्तु शिमला की ताजा स्थिति यही है।

शिमला के आम आदमी से लेकर नगरनिगम, विधानसभा और राजभवन तक सोच रहे हैं कि जब मई-जून की तपिश सिर पर आएगी, तो शिमला नगर की जलापूर्ति का क्या होगा? इसे लेकर हिमाचल विधानसभा में बहस हुई। हिमाचल विधानसभा ने बीते मार्च अपने मंत्रियों, विधायकों और शासकीय अधिकारियों के लिये पानी पर एक विशेष संबोधन रखा।

जिज्ञासा मुझे भी थी कि पानी-जंगल के प्रभामण्डल में जीने वाला शिमला, पानी के संकट वाला नगर कैसे हो गया? क्या इसका कारण, वाकई वैश्विक तापमान वृद्धि है अथवा स्थानीय कारण ज्यादा जिम्मेदार हैं? इस जिज्ञासा ने मुझे बताया कि शिमला की इस ठंड की वजह, शिमला की भौगोलिक पहाड़ी अवस्थिति तो है ही, सही समय पर पर्याप्त बर्फबारी, जंगल और 1600 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा का औसत भी है। इस ठंड में जलग्रहण क्षेत्र के योगदान को भी नहीं भूलना चाहिए। क्या इसमें कोई गिरावट आई है?

शिमला : जनसंख्या बढ़ी, वृद्धि दर घटी

ऐसे तमाम सवालों के जवाब तलाशने के लिये, मैंने डिजिटल दुनिया को खंगालने की कोशिश की तो सिर मुंडाते ही ओले पड़े। पाया कि इण्डिया पापुलेशन नामक वेबसाइट के हिसाब से 1991 में शिमला की आबादी एक लाख, 29 हजार, 827 थी। 2011 की जनगणना के मुताबिक आबादी एक लाख, 69 हजार, 578 थी।

वर्ष 2016 में शिमला की आबादी का आँकड़ा एक लाख, 94 हजार, 539 दिखाया गया है। औसत बढ़ोत्तरी 4221 प्रतिवर्ष दर्शाई गई है। इस हिसाब से इस वर्ष 2018 के अप्रैल महीने में शिमला की आबादी दो लाख के ऊपर हो जानी चाहिए। किन्तु शिमला नगर निगम की वेबसाइट बता रही है कि शिमला की आबादी अभी एक लाख, 74 हजार, 789 ही है। जाहिर है कि यह डिजिटल खोज भ्रामक है। सच तो शिमला जाकर ही समझा जा सकता है, सो विश्व जल दिवस - 22 मार्च, 2018 को गया। जो समझा, सो आपके साथ साझा कर रहा हूँ।

स्थानीय पत्रकार, मेयर, डिप्टी मेयर आदि का कहना है कि शिमला नगर निगम का आँकड़ा दुरुस्त है। इस बीच शिमला नगर की जनसंख्या वृद्धि रफ्तार में कमी आई है। दूसरी ओर, शिमला की आती-जाती जनसंख्या बढ़ी है। पर्यटन विभाग के आँकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2017 में 33 लाख, 18 हजार, 829 पर्यटक शिमला आये।

राजधानी होने के नाते अपने काम से आने वाले हिमाचलवासियों को संख्या को जोड़ लें, तो यह आँकड़ा और अधिक हो जाएगा। किन्तु यदि देखें तो आती-जाती जनसंख्या की वृद्धि दर में वर्ष 2001 के बाद से लगातार गिरावट आ रही है। बहुत सम्भव है कि शिमला का जलापूर्ति के स्रोत और तंत्र, वर्तमान आबादी के हिसाब से अपर्याप्त हों; इसलिये जलसंकट हो। अतः सबसे पहले मैंने यह जानने की कोशिश की कि शिमला की जलापूर्ति का स्रोत क्या है?

क्या हैं जलापूर्ति स्रोत?

शिमला, मात्र 35.34 वर्ग किलोमीटर में फैला छोटा सा नगर है। शिमला नगर से होकर कोई नदी नहीं बहती है। सतलुज नदी, शिमला नगर से करीब 21 किलोमीटर दूर बहती है। जिला शिमला में अवश्य गिरि और पब्बर नाम की नदियाँ हैं। ये दोनों यमुना की सहायक धाराएँ हैं। अश्विनी खड्ड नामक एक छोटी पहाड़ी नदी अवश्य दिखाई दी। उसमें मामूली प्रवाह भी दिखाई दिया। अश्विनी खड्ड के पानी का शोधन करके नगर को पानी भेजा जा रहा है।

मुख्य जलस्रोत के नाम पर शिमला जलग्रहण वन्यजीव अभयारण्य देखने का मौका मिला। बताया गया कि 1020.32 हेक्टेयर में फैला यह अभयारण्य, हिमाचल के अन्य अभयारण्यों की तुलना में अधिक घना, सुरक्षित और वन्यजीव विविधता से भरपूर है। यहाँ प्रतिदिन मात्र 35 पर्यटकों को प्रवेश का नियम है। 1999 में इसे अभयारण्य के रूप में अधिसूचित किया गया। 2009 तक इस अभयारण्य का जिम्मा जंगल विभाग को दिया गया था। वर्ष 2011 में इस अभयारण्य को जंगल विभाग के वन्यजीव प्रकोष्ठ को सौंप दिया गया।

गौर करने की बात है कि शिमला अभयारण्य के साथ जलग्रहण शब्द जुड़ा ही इसलिये, चूँकि शिमला के सिर पर बरसने वाले पानी को संजोने और शिमला को पानी पिलाने का मुख्य आधार, यह अभयारण्य क्षेत्र ही था। कभी इस अभयारण्य क्षेत्र में ताजे-निर्मल जल का स्रोत 25 प्रमुख पहाड़ी नाले थे। अभी इनकी संख्या 19 बताई गई। बताया गया कि 19 पहाड़ी नालों के पानी को टैंकों में रोककर आगे सियोग के एक बड़े हौज में एकत्र कर लिया जाता था। वहीं से आगे नगर तक पहुँचा दिया जाता था।

टैंको को स्थानीय लोग, खुरली कहते हैं। स्थानीय इंजीनियर ने बताया कि इन खुरलियों को 1875 में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया था। इन खुरलियों में पानी और मिट्टी-पत्ती आदि को अलग करने की सुन्दर प्रणाली मौजूद है। सभी 19 नालों को एक नम्बर दिया गया है।

जंगलात के दस्तावेज के मुताबिक, पहाड़ी नाले, खुरली और हौज के सम्मिश्रण से बना यह तंत्र 1878 से शिमला नगर को पानी पिला रहा था। यह जानना दिलचस्प है कि यह पूरा तंत्र, पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बहाव को ध्यान में रखकर बनाया गया था। इसमें कोई बिजली नहीं लगती थी। मन में उठा प्रश्न था कि अब ऐसा क्या हो गया कि ऐसे सुन्दर तंत्र के बावजूद, पानी की आपूर्ति कम पड़ने लगी?

क्यों कम पड़ रही जलापूर्ति?

पहला कारण तो यह समझ में आया कि वर्ष 1878 में शिमला नगर की आबादी मात्र 16 हजार थी। आज, 10 गुना अधिक है। शिमला ने इस डेढ़ दशक में अपनी जलापूर्ति बढ़ाने के लिये जो कुछ मामूली काम किया, उसमें दूरदर्शिता के अभाव के चलते वह आज अपर्याप्त साबित हो रहा है।

दूसरा, शिमला को पानी पिलाने का काम, पहले शहर में बनी कुछ बावड़ियाँ और कुएँ भी करते थे। श्री शांता कुमार के कार्यकाल में शिमला शहर में हैण्डपम्प लगने का काम बड़े पैमाने पर हुआ। हैण्डपम्पों की आवक ने कुएँ और बावड़ियों की जावक तय कर दी। इनका उपयोग नहीं रहा तो रख-रखाव भी नहीं हुआ।

तीसरा और सबसे मुख्य कारण यह समझ में आया कि पिछली डेढ़ सदी से शिमला की जलापूर्ति का मुख्य स्रोत बने रहे 19 पहाड़ी नालों में से मात्र दो ही बारहमासी बचे हैं; शेष 17 स्रोत, अब अक्तूबर में ही सूख जाते हैं। इसी कारण, मार्च के महीने में हमें एक करोड़ लीटर की क्षमता के हौज में हमें एक लीटर पानी भी देखने को नहीं मिला। मैंने पूछा कि स्रोत सूखने के क्या कारण हैं?

क्यों सूखे मुख्य जलस्रोत?

शहर के डिप्टी मेयर श्री राकेश कुमार शर्मा का जवाब था कि एक तो बारिश कम हो रही है। पिछले साल 600-700 मिलीमीटर बारिश ही हुई। दूसरा, जो बर्फबारी, 15 दिसम्बर से 13 जनवरी के मध्य होती थी, वह अब फरवरी मध्य से अप्रैल मध्य तक हो रही है। एक बर्फबारी में दो-दो इंच बर्फ पड़े तो उसे सामान्य माना जाता है। बर्फबारी की परत की मोटाई भी अब कम हो गई है।

अत्यन्त ठंडे तापमान के दौरान पड़ी बर्फ धीमे-धीमे पिघलती है; लिहाजा, उसका पानी धरती के पेट में ज्यादा बैठता है अर्थात रिचार्ज ज्यादा होता है। अब बर्फ, उस वक्त पड़ रही है, जब तापमान ज्यादा होता है। ऐसे समय की बर्फ बहकर चली जाती है। उसका पानी धरती के पेट में कम ही बैठ पाता है। दिसम्बर-जनवरी की बर्फ, कीड़ों को मारती है तो गर्म समय की बर्फ, नाजुक पौधों को नष्ट कर देती है।

स्रोत सूखने का तीसरा कारण यह ज्ञात हुआ कि पहले जितने बड़े इलाके का पानी शिमला जलग्रहण वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में आता था, राष्ट्रीय राजमार्ग उसके बीच में दीवार बनकर खड़ा हो गया है। राजमार्ग ने अभयारण्य के स्रोतों के जलग्रहण क्षेत्रफल को घटा दिया है। इस कारण भी स्रोतों में अब पर्याप्त पानी नहीं आ पाता। चौथा कारण, कुछ इलाकों में बढ़ता खनन भी है। पाँचवाँ, अश्विनी खड्ड जैसी नजदीकी धाराओं में पानी आये तो आये कहाँ से? इसे पानी देने वाले छोटे-छोटे स्रोतों का पानी भी उठाकर अन्यत्र उपयोग हो रहा है।

जल संधारण क्षमता बढ़ाने के लिये प्राकृतिक स्रोतों की सफाई जरूरी होती है। वह हो नहीं रही; उलटा, सड़क किनारे की बावड़ियों को कूड़ा-मलबा से भर दिया गया है। जो अन्य चश्मे अथवा हुरडू यानी स्थानीय छोटे झरने हैं; शिमला शहर में ही परम्परागत तौर पर कई चश्मों के निशान मिलते हैं। शिमला जलापूर्ति संचालकों को अपने ऐसे स्रोतों के नाम तक याद नहीं हैं। क्या ऐसे स्रोतों पर क्या कोई काम हुआ है? उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया।

कितनी शुद्ध जलापूर्ति?

हिमाचल प्रदेश में सबसे ज्यादा पीलिया के रोगी, शिमला में पाये जाने का आँकड़ा है। फरवरी, 2016 में 9265 लोग पीलिया की चपेट में आये और 34 की मौत हुई। अश्विनी खड्ड स्थित जलशोधन संयंत्र से की जाने वाली जलापूर्ति में हेपटाइटस ई के वायरस की उपस्थिति मिलने पर दोषियों पर कार्रवाई भी हुई। हालांकि नगर निगम प्रतिनिधि कहते हैं कि अब पूरी सतर्कता है, किन्तु वर्ष 2017 में स्थानीय सरकारी चिकित्सा तंत्र ने बताया कि वर्ष 2016 की मौतों से शिमला जलतंत्र संचालकों ने कुछ नहीं सीखा।

हमने अश्विनी खड्ड में बहता जो काला पानी देखा, उसे देखकर आप भी यही कहेंगे कि शिमला जलापूर्ति की गुणवत्ता अब गारंटीप्रूफ है। खुद शिमला नगर निगम द्वारा अप्रैल महीने में अश्विनी खड्ड के ट्यूबवेल नम्बर एक, दो, तीन, चार तथा शिमला काॅलेज के पास स्थित प्राकृतिक स्रोत से लिये नमूनों की जाँच रिपोर्ट कह रही है कि गुणवत्ता सन्तोषजनक नहीं है।

कारण क्या है?

शिमला शहर में 245 होटल हैं। शहर में पाॅली कचरा बहुत है। दुकानों-घरों के कचरे के कारण भी नालियाँ चोक रहती हैं। कचरा ढोते इंसानों को देखकर भी स्थानीय बाशिन्दों तथा पर्यटकों में संवेदना नहीं जगती। वे अपना कचरा यूँ ही बाहर फेंक देते हैं। यह सब कचरा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जल के शोधन को मुश्किल बनाता है।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक, शिमला 45 एमएलडी सीवेज पैदा होता है। छह छोटे-छोटे संयंत्रों के बावजूद, सीवेज शोधन की वास्तविक क्षमता इसका दसवाँ हिस्सा ही है। जाहिर है कि शेष मल, बिना शोधन ही बहाया जा रहा है। मलियाना के सीवेज संयंत्र को लेकर शिकायत मिली। इससे भी जल शोधन और प्रबन्धन के खर्च की कीमत बढ़ रही है।

कितनी महंगी जलापूर्ति?

खर्च और आमदनी का चित्र देखिए। शिमला में 25 प्रतिशत जल कनेक्शन व्यावसायिक, 75 प्रतिशत घरेलू हैं। घरेलु उपभोक्ता से 12 रुपए और व्यावसायिक उपभोक्ता से 65 रुपए प्रति किलोलीटर वसूला जाता है; जबकि शिमला में जलापूर्ति की कीमत 100 रुपए प्रति किलो लीटर से कम नहीं पड़ती।

जलापूर्ति खर्च बढ़ने की एक वजह यह भी है कि शिमला की पूरी जलापूर्ति, आज पूरी तरह पाइप और बिजली के जरिए पानी को उठाकर लाने की समझ पर आधारित है। अभी शिमला में 50 किलोमीटर दूर से पानी आता है। शोधन खर्च तो वजह है ही। शिमला की मेयर श्रीमती कुसुम सबलेट इस बात से तो चिन्तित दिखीं कि पानी प्रबन्धन में लगने वाली बिजली का बिल ही काफी आता है, किन्तु वह इस बात को लेकर निश्चिंत भी लगीं कि सतलुज नदी से पानी लाने की विश्व बैंक परियोजना के सम्पन्न होते ही शिमला में पानी की समस्या का समाधान हो जाएगा।

उधार का पानी कब तक?

दरअसल, शहरों की जेबों में पैसा है। इसलिये शहरों को दूसरे का और दूर का पानी लेने में डर नहीं लगता। शिमला भूल गया है कि हिमालयी इलाकों के 70 प्रतिशत चश्मे अब सूख चुके हैं। यदि ऐसे प्राकृतिक जलस्रोतों को जिन्दा करने के काम में नहीं लगा गया, तो पानी उधार देने वाला स्रोत भी कितना दिन चलेगा? हमें विश्व बैंक प्रायोजित ऐसी परियोजनाओं की हकीकत समझनी चाहिए। अपने सिर पर बरसे पानी को सहेजना चाहिए।

हरियाली, पानी की माँ होती है; लिहाजा, हमें अपने जंगल और वनस्पतियों को बचाना चाहिए। कोई भी निर्माण करते वक्त जल निकासी तंत्र की सुरक्षा की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। पहले से मौजूद जल संरक्षण ढाँचों को सुरक्षित रखना चाहिए। शिमला चाहे तो यह सब कर सकता है। अपने हर घर की छत को वर्षा के झरनों को संजोने वाली खुरली बना सकता है।

शिमला, पूरे हिमाचल की राजधानी है। शिमला को याद रखना चाहिए कि यदि शहरों को अपना भविष्य सुरक्षित रखना है, तो उन्हें गाँवों का वर्तमान सुरक्षित करने बारे में सोचना होगा; नहीं तो चेतावनी स्पष्ट है।

और कितने केपटाउन?

आज एक केपटाउन की चर्चा है। केपटाउन को इसके जल संरक्षण तथा जल माँग कार्यक्रम के लिये वर्ष 2015 में सी 40 सिटी अवार्ड दिया गया था। वर्ष 2018 में उसके पानी का ढोल फूट गया है। दक्षिण अफ्रीका, दुनिया का धनी-मानी शहर है। किन्तु उसका पैसा भी कुछ नहीं कर पाया। कहा जा रहा है कि आने वाली जून-जुलाई में केपटाउन 'डे जीरो' श्रेणी का शहर हो जाएगा। 'डे जीरो' का मतलब है कि नलों में पानी की आपूर्ति बन्द है। टैंकरों के माध्यम से प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 25 लीटर की औसत से पानी पहुँचाया जा रहा है।

विज्ञान पर्यावरण केन्द्र का आकलन है कि दुनिया के 200 शहर इसी स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। उसने बीजिंग, मैक्सिको, साना, नैरोबी, इस्तांबुल, साओ पाउलो, कराची, ब्युनस आयर्स और काबुल का नाम प्रमुखता से लिया है। विज्ञान पर्यावरण केन्द्र ने भारत के चेन्नई और बंगलुरु शहर को सावधान किया है। उसने कहा है कि यदि वे साझे भविष्य के लिये काम नहीं करेंगे, तो वे भी जल्द ही केपटाउन की स्थिति में पहुँच सकते हैं।

गैरसैंण को राजधानी बनाने से पहले सोचें

हमारे सभी नगर नियोजकों को समझना चाहिए कि सावधानी का यह सबक शिमला के लिये भी है, दिल्ली के लिये भी और उत्तराखण्ड के उस गैरसैंण के लिये भी, जिसे राजधानी बनाने को लेकर उत्तराखण्ड में राजनीति तो होती है, लेकिन गैरसैंण के जलसंकट को लेकर विधानसभा में कोई आवाज नहीं उठती। गौर कीजिए कि गैरसैंण की आबादी आज महज 12,000 है।

इतनी छोटी सी आबादी के बावजूद, गैरसैंण को हासिल जलापूर्ति मात्र 27 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन है। कई नगरों में 17 लीटर प्रति व्यक्ति, प्रतिदिन जलापूर्ति का आँकड़ा बताया गया है। गैरसैंण समेत क्या ये सभी आज ही 'डे जीरो' की श्रेणी के नगर नहीं हैं? दैनिक हिंदुस्तान में 09 अप्रैल को छपी श्री बी. एस. नेगी की रिपोर्ट बता रही है कि उत्तराखण्ड के 92 में से 71 नगरों में आपूर्ति किये गए पानी की मात्रा, तय मानक से कम है। 19 नगरों में 50 लीटर प्रति व्यक्ति, प्रतिदिन से कम जलापूर्ति हो रही है।

उत्तराखण्ड सरकार, नए नगर पंचायती इलाकों के लिये 900 करोड़ की विश्व बैंक परियोजना के बारे में सोच रही है। उत्तराखण्ड के गाँववासी दूर तक पैदल चलकर पानी लाने की अपनी विवशता के बारे में सोच रहे हैं। गैरसैंणवासी सोचें कि यदि कल को गैरसैंण राजधानी बन गई, तो बढ़ी आबादी के लिये पानी कहाँ से आएगा? ....तब आप गैरसैंण को किस श्रेणी में रखेंगे?
 

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