सिक्किम को मिला पहला भूस्खलन निगरानी तंत्र

Submitted by editorial on Mon, 09/24/2018 - 18:04
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Source
इंडिया साइंस वायर, 24 सितम्बर, 2018


चांदमरी गांव में स्थापित भूस्खलन चेतावनी प्रणालीचांदमरी गांव में स्थापित भूस्खलन चेतावनी प्रणाली गंगटोक। सिक्किम में भूस्खलन की रियल टाइम निगरानी के लिये पहली बार चेतावनी तंत्र स्थापित किया गया है। भूस्खलन के लिये संवेदनशील माने जाने वाले उत्तर-पूर्वी हिमालय क्षेत्र में स्थापित यह प्रणाली समय रहते भूस्खलन के खतरे की जानकारी दे सकती है, जिससे जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

उत्तर-पूर्वी हिमालय क्षेत्र की सिक्किम-दार्जिलिंग पट्टी में स्थापित इस चेतावनी प्रणाली में 200 से अधिक सेंसर लगाए गए हैं। ये सेंसर वर्षा, भूमि की सतह के भीतर छिद्र दबाव और भूकम्पीय गतिविधियों समेत विभिन्न भूगर्भीय एवं हाइड्रोलॉजिकल मापदंडों की निगरानी करते हैं। यह प्रणाली भूस्खलन से पहले ही सचेत कर देती है, जिससे स्थानीय लोगों को आपदा से पहले उस स्थान से सुरक्षित हटाया जा सकता है।

सिक्किम की राजधानी गंगटोक के चांदमरी गाँव में यह प्रणाली 150 एकड़ में स्थापित की गई है जो आस-पास के 10 किलोमीटर के दायरे में भूस्खलन की निगरानी कर सकती है। चांदमरी के आस-पास का क्षेत्र जमीन खिसकने के प्रति काफी संवेदनशील है और पहले भी यहाँ भूस्खलन की घटनाएँ हो चुकी हैं। हिमालय के भू-विज्ञान को केन्द्र में रखकर विकसित की गई यह चेतावनी प्रणाली इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) पर आधारित है। सिक्किम आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण की पहल पर केरल के अमृता विश्वविद्यापीठम के शोधकर्ताओं द्वारा इस प्रणाली को विकसित किया गया है।

इस चेतावनी प्रणाली के अन्तर्गत वास्तविक समय में निरन्तर आँकड़े एकत्रित किए जा सकते हैं। इन आँकड़ों का स्थानीय नियंत्रण केन्द्र में बुनियादी विश्लेषण किया जाता है और फिर उन्हें केरल के कोल्लम जिले में स्थित अमृता विश्वविद्यापीठम की भूस्खलन प्रयोगशाला के डाटा प्रबन्धन केन्द्र में भेज दिया जाता है।

इस प्रणाली से प्राप्त आँकड़ों का उपयोग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा भूगर्भीय एवं जल विज्ञान की प्रकृति और पहाड़ी क्षेत्र की प्रतिक्रिया का अध्ययन करने के लिये किया जा रहा है ताकि भूस्खलन के प्रति संवेदनशील क्षेत्र के लिये प्रारम्भिक चेतावनी मॉडल विकसित किया जा सके।

इस परियोजना से जुड़ी प्रमुख शोधकर्ता डॉ. मनीषा सुधीर ने बताया कि “यह नई चेतावनी प्रणाली भूस्खलन से 24 घंटे पूर्व चेतावनी जारी कर सकती है। स्थानीय स्तर पर स्थापित की जाने वाली यह प्रणाली विभिन्न प्रकार के सेंसरों पर आधारित है। इन सेंसरों को ड्रिल करके जमीन के भीतर पाइप की मदद से स्थापित किया जाता है। यह प्रणाली सौर ऊर्जा से संचालित होती है और सौर ऊर्जा के भंडारण के लिये परियोजना स्थल पर बैटरियाँ लगायी गई हैं।"

शोधकर्ताओं के अनुसार, वर्षा सीमा पर आधारित मॉडल, इन-सीटू सेंसर आधारित निगरानी प्रौद्योगिकी, इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक एपर्चर रडार आधारित तकनीक, जमीन आधारित रडार प्रौद्योगिकी, इलेक्ट्रिकल रेजिस्टिविटी टोमोग्राफी और उपग्रह छवियों के जरिये भूस्खलन का अनुमान लगाया जा सकता है। यह बहुस्तरीय चेतावनी प्रणाली है जो आपदा प्रबन्धन अधिकारियों को सम्भावित भूस्खलन के खतरों को कम करने और उसके प्रबन्धन करने के लिये प्रभावी कदम उठाने में मददगार हो सकती है। यह प्रणाली दुनियाभर में भूस्खलन की निगरानी के लिये आमतौर पर उपयोग होने वाले रेनफॉल थ्रेसाल्ड मॉडल से अधिक प्रभावी पायी गई है।

सिक्किम का 4,895 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र भूस्खलन के प्रति संवेदनशील है, जिसमें से 3,638 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र मानव आबादी, सड़क और अन्य बुनियादी ढाँचे से घिरा हुआ है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह प्रणाली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित है जिसे विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित करके विस्तृत भूक्षेत्र में भूस्खलन की निगरानी की जा सकती है।


सिक्किम के चांदमरी गांव में पूर्व चेतावनी तंत्र स्थापित करते हुए शोधकर्तासिक्किम के चांदमरी गांव में पूर्व चेतावनी तंत्र स्थापित करते हुए शोधकर्ता डॉ सुधीर के मुताबिक, “भारत में घातक भूस्खलन की घटनाएँ अन्य देशों की अपेक्षा अधिक होती हैं। पश्चिमी घाट और कोंकण हिल्स, पूर्वी घाट, उत्तर-पूर्वी हिमालय और उत्तर-पश्चिमी हिमालय जैसे क्षेत्रों में भारत की 15 प्रतिशत भूमि भूस्खलन के खतरे के प्रति संवेदनशील है। उत्तर-पूर्व हिमालय क्षेत्र में, सिक्किम-दार्जिलिंग पट्टी में भूस्खलन का सबसे अधिक खतरा है। यही कारण है कि हमने हमारी भूस्खलन पहचान प्रणाली स्थापित करने के लिये इस क्षेत्र को चुना है।’’

वैज्ञानिकों के अनुसार, भूकम्पीय कम्पन, लम्बे समय तक बारिश और पानी का रिसाव भूस्खलन का कारण हो सकते हैं। ढलानों से पेड़-पौधों की कटाई, प्राकृतिक जल निकासी में हस्तक्षेप, पानी या सीवर पाइप के लीकेज, निर्माण कार्यों और यातायात से होने वाले कम्पन जैसे मानवीय कारण भी भूस्खलन के लिये जिम्मेदार माने जाते हैं।

डॉ सुधीर के अनुसार, “लोगों को भूस्खलन और जोखिमों के बारे में शिक्षित करना जरूरी है। आम लोगों और सरकारी संगठनों से भूस्खलन की सम्भावना के बारे में डाटा इकट्ठा करने के लिये सोशल मीडिया और मोबाइल फोन एप्स भी विकसित किए जा सकते हैं।”

सिक्किम के चांदमरी गाँव में पूर्व चेतावनी तंत्र स्थापित करते हुए शोधकर्ता अमृता विश्व विद्यापीठम के उप कुलपति डॉ. वेंकट रंगन ने बताया, “अमृता विश्वविद्यापीठम द्वारा सिक्किम में लगाई गई यह प्रणाली भारत में ऐसी दूसरी प्रणाली है। इससे पूर्व केरल के मुन्नार जिले में इस तरह की प्रणाली लगाई जा चुकी है, जो कई सफल चेतावनियाँ जारी कर चुकी है। इस चेतावनी तंत्र को स्थापित करने के लिये पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और अमृता विश्वविद्यापीठम द्वारा वित्तीय मदद दी गई है।”

Twitter : @usm_1984

 

 

 

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