जैव विविधता को नुकसान पहुँचा रही हैं लघु जलविद्युत परियोजनाएँ

Submitted by editorial on Sat, 06/09/2018 - 15:43
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इंडिया साइंस वायर, 1 जून, 2018


पश्चिमी घाट में स्थित एक लघु जलविद्युत परियोजनापश्चिमी घाट में स्थित एक लघु जलविद्युत परियोजना नई दिल्ली। लघु जलविद्युत परियोजनाओं को स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। लेकिन, भारतीय वैज्ञानिकों के एक ताजा अध्ययन से पता चला है कि इन परियोजनाओं के कारण पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता को लगातार नुकसान हो रहा है।

वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसायटी ऑफ इंडिया के वैज्ञानिकों द्वारा पश्चिमी घाट में किये गये इस अध्ययन में लघु जलविद्युत परियोजनाओं के प्रभाव का मूल्यांकन किया गया है। अध्ययन से पता चला है कि लघु जलविद्युत परियोजनाओं के कारण जल की गुणवत्ता, प्रवाह ज्यामिति और मछली समूहों में बदलाव हो रहा है।

बंगलुरु स्थित वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसायटी ऑफ इंडिया, नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज, अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड एनवायरनमेंट और फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल रिसर्च एडवोकेसी एंड लर्निंग के शोधकर्ताओं द्वारा यह अध्ययन किया गया है। अध्ययन के नतीजे शोध पत्रिका ‘एक्वेटिक कंजर्वेशन’ में प्रकाशित किये गये हैं।

नेत्रवती नदी के ऊपरी हिस्से में यह अध्ययन किया गया है, जो पश्चिमी घाट में जैव विविधता का एक प्रमुख क्षेत्र है। बाँध वाली दो सहायक नदियों और पश्चिम की ओर बहने वाली नेत्रवती नदी की बाँध रहित एक सहायक नदी को अध्ययन में शामिल किया गया है।

इस अध्ययन से जुड़ी प्रमुख शोधकर्ता सुमन जुमानी के अनुसार, “बाँधों के कारण लम्बी दूरी तक नदी का जल प्रवाह परिवर्तित होता है। इससे शुष्क मौसम में नदी का विस्तृत हिस्सा लगभग जल रहित हो जाता है। ऐसे नदी क्षेत्रों के जल में ऑक्सीजन का स्तर कम और जल का तापमान अधिक हो जाता है। जलीय आवास में इस तरह के परिवर्तन का असर मछलियों पर पड़ता है।”

किसी लघु जलविद्युत परियोजना में मुख्य रूप से चार भाग होते हैं। इनमें नदी की जलधारा को बाधित कर जलाशय निर्माण तथा जल प्रवाह मोड़ने के लिये बनाया जाने वाला बन्ध या बन्धिका, टरबाइन युक्त पावरहाउस, पेनस्टॉक पाइप और विसर्जन जलमार्ग शामिल हैं। बन्ध पर परिवर्तित किये गये प्रवाह का जल पाइपों के जरिये पावर हाउस में बिजली उत्पादन के लिये भेजा जाता है और फिर विसर्जन मार्ग के जरिये इसे दोबारा नदी के निचले हिस्से में छोड़ दिया जाता है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि लघु जलविद्युत परियोजनाओं में बाँध के निचले हिस्से में जल प्रवाह कम होने से नदी का सामान्य प्रवाह प्रभावित होता है और बिजली उत्पादन के बाद नदी में जब पानी वापस भेजा जाता है तो जल प्रवाह में उतार-चढ़ाव भी होता है। इन दोनों परिस्थितियों का असर मछलियों पर पड़ता है, जिससे मछली समूहों की संरचना में बदलाव हो रहा है और मछली प्रजातियों की संख्या कम हो रही है।

अध्ययनकर्ताओं के अनुसार, कुछेक नदियों में ही पायी जाने वाली अनूठी मछली प्रजातियों की तुलना में व्यापक रूप से पायी जाने वाली मछलियों की सामान्य प्रजातियाँ बाँध के आस-पास के क्षेत्र में अधिक थीं, जो कठोर वातावरण में जीवित रह सकती हैं। मछलियों की कई प्रवासी प्रजातियाँ भी इन परियोजनाओं के कारण प्रभावित हो रही हैं। स्थानीय जीव प्रजातियाँ भी इन परियोजनाओं के कारण खतरे में पड़ रही हैं। यह चिन्ता का विषय है क्योंकि ये प्रजातियाँ सिर्फ पश्चिमी घाट में ही पायी जाती हैं, जिन पर लुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।

वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसायटी ऑफ इंडिया से जुड़े एक अन्य शोधकर्ता शिशिर राव के मुताबिक, “इससे पूर्व किये गये अध्ययनों में भी लघु जलविद्युत परियोजनाओं के दुष्प्रभावों के संकेत मिले हैं। पश्चिमी घाट में परियोजना के निर्माण क्षेत्रों में इंसानों और हाथियों के टकराव के मामले भी बड़ी संख्या में सामने आए हैं। बाँध के अलावा उससे सम्बन्धित अन्य संरचनाओं के कारण हाथियों का मार्ग अवरुद्ध होने से उन्हें नये रास्तों की तलाश करनी पड़ती है, जिससे टकराव की घटनाएँ अधिक होती हैं।”

लघु जलविद्युत परियोजनाओं में बड़े जलविद्युत संयंत्रों की अपेक्षा ऊर्जा उत्पादन की कम क्षमता होती है। भारत में 25 मेगावाट तक ऊर्जा उत्पादन वाले संयंत्रों को लघु परियोजनाओं की श्रेणी में रखा जाता है। इन परियोजनाओं का प्रसार जैव विविधता से सम्पन्न पश्चिमी घाट और हिमालय क्षेत्रों में लगातार बढ़ रहा है।

जुमानी के अनुसार, "नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की योजना करीब 6500 अतिरिक्त लघु जलविद्युत परियोजनाएँ बनाने की है। इनमें से अधिकतर नियोजित बाँध पश्चिमी घाट और हिमालय के जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्रों में स्थित हैं। इन परियोजनाओं के कारण पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव के मूल्यांकन और जरूरी न्यूनतम जल प्रवाह बनाये रखने के लिये सम्बन्धित नीतियों को संशोधित किया जाना चाहिए।”

सुमन जुमानी और शिशिर राव के अलावा अध्ययनकर्ताओं में नचिकेत केलकर, सिद्धार्थ माचदो, जगदीश कृष्णास्वामी और श्रीनिवास वैद्यनाथन शामिल थे।

Twitter handle : @usm_1984

 

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Small hydropower projects in Hindi, environment in Hindi, biodiversity in Hindi, Western Ghats in Hindi, Fish species in Hindi, Netravathi River in Hindi

 

 

 

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