ठोस अपशिष्ट प्रबंधन

Submitted by HindiWater on Sun, 12/01/2019 - 11:00
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योजना,नवम्बर, 2019

फोटो - knnindia

कुशल ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली का मुख्य उद्देश्य कूड़े-करकट से अधिकतम मात्रा में उपयोगी संसाधन प्राप्त करना और ऊर्जा का उत्पादन करना है ताकि कम-से-कम मात्रा में अपशिष्ट पदार्थों को लैंडफिल क्षेत्र में फेंकना पड़े। इसका कारण यह है कि लैंडफिल में फेंके जाने वाले कूड़े का भारी खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। एक तो इसके लिए काफी जमीन की आवश्यकता होती है जो लगातार कम होती जा रही है, और दूसरे कूड़ा वायु, मिट्टी और जल-प्रदूषण का सम्भावित कारण भी है। अपशिष्ट पदार्थ पैदा करने वालों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे कूड़े की छंटाई करें, जो ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की मूल आवश्यकता है।
 
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन भारत में बहुत बड़ी समस्या का रूप ले चुका है क्योंकि शहरीकरण, औद्योगिकरण और आर्थिक विकास के परिणाम स्वरूप शहरी कूड़े-करकट की मात्रा बहुत बढ़ गई है। बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या और लोगों के जीवन स्तर में सुधार से यह समस्या और भी जटिल हुई है। देश में ठोस कूड़े-करकट का समुचित निस्तारण सुनिश्चित करने के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (प्रबंधन और निपटान) नियमावली, 2000 और पुनर्गठित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2000 अधिसूचित किए हैं। देश के विभिन्न भागों में इस दिशा में पहल की जा रही हैं। लेकिन ठोस अपशिष्ट प्रबंधन से सम्बन्धित मसलों के व्यापक समाधान के लिए अब भी बहुत-कुछ किया जाना बाकी है।  इस लेख में देश में कारगर ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए आवश्यक कानूनी ढाँचे, इसके महत्त्वपूर्ण घटकों और इसकी स्थिति, अब तक उठाए गए कदमों तथा चुनौतियों और आगे के रास्ते की चर्चा की गई है।
 
कानूनी ढाँचा
 
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली 2016, वन और जलवायु परिवर्तन, आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों, राज्यों के शहरी मामलों के विभागों, स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायतों तथा कूड़ा उत्पन्न करने वालों समेत विभिन्न भागीदारों की जिम्मेदारी रेखांकित करती है। दूसरी ओर आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय, राज्यों के शहरी मामलों के विभागों और स्थानीय निकायों को मुख्य रूप से अपशिष्ट प्रबंधन के लिए बुनियादी ढाँचे के विकास का उत्तरदायित्व सौंपा गया है। इसके अलावा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और प्रदूषण नियंत्रण समितियों को नियमों पर अमल की निगरानी करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कूड़ा उत्पन्न करने वालों की मूल जिम्मेदारी यह है कि वे कूड़े की छंटाई करें क्योंकि यह ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की मुख्य आवश्यकता है। ये नियम ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली के महत्त्वपूर्ण घटकों की आवश्यकताओं को रेखांकित करने के साथ ही लक्ष्यों को प्राप्त करने की समय-सीमा भी निर्धारित करते हैं। 

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन-प्रमुख घटक

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के प्रमुख घटकों में ये शामिल हैं-

  1. प्रथम चरण - अपशिष्ट पदार्थ उत्पन्न करने वालों द्वारा कचरे को सूखे और गीले कचरे के रूप में छांट कर अलग करना।

  2. द्वितीय चरण - घर घर जाकर कूड़ा इकट्ठा करना और छंटाई के बाद इसे प्रसंस्करण के लिए भेजना।
  3. तृतीय चरण - सूखे कूड़े में से प्लास्टिक, कागज, धातु, कांच जैसी पुनर्चक्रित हो सकने वाली उपयोगी सामग्री छांटकर अलग करना।
  4. चतुर्थ चरण - कूड़े के प्रसंस्करण की सुविधाओं, जैसे कम्पोस्ट बनाने, बायो-मीथेन तैयार करने, और कूड़े-करकट से ऊर्जा उत्पादन करने के संयंत्रों की स्थापना करना।
  5. पंचम चरण - अपशिष्ट के निस्तारण की सुविधा-लैंडफिल बनाना।

कुशल ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली का मुख्य उद्देश्य कूड़े-करकट से उपयोगी पदार्थों को निकालना और बचे हुए अपशिष्ट से प्रसंस्करण केन्द्र में बिजली का उत्पादन करना है (चतुर्थ चरण) और लैंडफिल में डाले जाने वाले कूड़े की मात्रा को कम से कम करना है क्योंकि तेजी से सिमट रहे भूमि संसाधन पर इसका बहुत बुरा असर पड़ रहा है। इतना ही नहीं। इस तरह से फेंका गया कूड़ा-करकट वायु, मृदा और जल प्रदूषण का खतरा पैदा कर सकता है। सभी अपशिष्ट प्रसंस्करण केन्द्रों (चतुर्थ चरण) के लिए पहली जरूरत सूखे और गीले कूड़े को अलग करने की है। अगर कूड़ा-करकट एकत्र नहीं किया जा रहा है और छांट कर अलग-अलग करके प्रसंस्करण केन्द्र में ठीक से नहीं भेजा जा रहा है तो इसका प्रसंस्करण करना सम्भव नहीं है। इस स्थिति में अपशिष्ट लैंडफिल (पंचम चरण) में फेंक दिया जाता है। अगर कूड़े-करकट को इकट्ठा करके उसकी छंटाई किए बिना ही प्रसंस्करण केन्द्र में पहुँचा दिया जाता है तो उसका प्रसंस्करण बड़ा मुश्किल है क्योंकि ऐसे कूड़े के साथ भवन निर्माण और उनकी तोड़-फोड़ से निकला मलबा भी होता है जिसे प्रसंस्करण संयंत्र में सीधे उपयोग में नहीं लाया जा सकता। कूड़े को इकट्ठा करने, छांटने और परिवहन जैसी गतिविधियों के बीच पूरा तालमेल होना जरूरी है। तभी उसका उपयोग उस इलाके के प्रसंस्करण केन्द्र में किया जा सकता है। कूड़े के विभिन्न अवयवों से सम्बन्धित मुद्दे संक्षेप में टेबल-1 में दिए गए हैं।
 
ठोस अपशिष्ट  प्रबंधन

राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों/प्रदूषण नियंत्रण समितियों द्वारा प्रस्तुत वार्षिक रिपोर्ट 2018-19 के अनुसार देश में रोजाना कुल 1,52,076 टन ठोस कूड़ा उत्पन्न होता है। रोजाना 1,49,748 टन कूड़ा, जो कि कूड़े की कुल मात्रा का 98.5 प्रतिशत इकट्ठा किया जाता है। लेकिन केवल रोजाना 55,759 टन (35 प्रतिशत) कूड़े का उपचार किया जाता है, 50,161 टन (33 प्रतिशत) लैंडफिल में फेंक दिया जाता है और 46,156 टन यानी रोजाना उत्पन्न होने वाले कुल कूड़े के एक तिहाई का कोई हिसाब नहीं रहता।
 
देश में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की स्थिति का विहंगावलोकन इस प्रकार हैः

  1. 24 राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों में स्रोत पर ही छंटाई शुरू हुई।
  2. 22 राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों में यह जारी।
  3. 25 राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन सुविधा के लिए जमीन का अधिग्रहण किया।
  4. अपशिष्ट प्रसंस्करण सुविधाएँ स्थापित-2028, अपशिष्ट प्रसंस्करण शुरू-160।
  5. लैंडफिल स्थानों की पहचान-1161, संचालन शुरू हुआ-37।

जिस कूड़े का कोई हिसाब-किताब नहीं मिलता वह गलियों में पड़ा रहता है या कूड़ा फेंकने के स्थानों में डाल दिया जाता है। इस समय देश में कूड़ा फेंकने के 3,159 स्थान हैं जो भूमिगत जल और वायु के प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं। कूड़े के इन ढेरों में आग लगने, इनकी स्थिरता और कूड़े से इन स्थानों की खूबसूरती खराब होने की भी समस्या उत्पन्न होती है। हाल में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के हस्तक्षेप से 11 राज्यों में ऐसे स्थानों में कूड़े के ढेरों की बायोमाइनिंग शुरू हुई है। (बायोमाइनिंग कूड़े के ढेरों को स्थिर बनाने की विधि है ताकि उनसे पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर को कम-से-कम किया जा सके)।

(1) केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की पहल

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने निम्नलिखित दिशा-निर्देश तैयार किए हैं जिन्हें वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है-

  • लिगेसी वेस्ट (पुराने कूड़े) के बारे में दिशा निर्देश।
  • बफर जोन के बारे में दिशानिर्देश।
  • सेनेटरी वेस्ट (घरों से निकलने वाला ठोस और तरल अपशिष्ट पदार्थ) और
  • कूड़ा प्रसंस्करण करने की टेक्नोलॉजी के चयन में मानदंड।

इसके अलावा, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सम्बन्धित अधिकारियों को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के नियमों का अनुपालन कराने और इसमें चूक करने वाले अधिकारियों से दंड के तौर पर पर्यावरण-मुआवजा वसूलने के निर्देश दिए हैं।
 
(2) राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों की पहल

छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, दमन और दीव तथा गोवा जैसे कुछ राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के नियमों का अधिकतम अनुपालन किया है, लेकिन बाकी के मामले में अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा की गई पहल इस प्रकार है-

  • सभी स्थानीय शहरी निकायों में घर घर जाकर कूड़ा एकत्र करने, उसकी छंटाई और बंद वाहनों के जरिए उसके परिवहन की व्यवस्था करने का कार्य पूरा हुआ।
  • सभी 168 शहरी स्थानीय निकायों में कचरे के प्रसंस्करण की सुविधाओं की स्थापना के लिए जमीन की पहचान की गई।
  • सेनेटरी लैंडफिल बनाने की योजना नहीं - 166 शहरी स्थानीय निकायों ने ठोस और तरल संसाधन प्रबंधन केन्द्र स्थापित किए और 2 शहरी स्थानीय निकायों में कम्पोस्ट/कूड़े से ईधन बनाने की सुविधा विकसित की।
  • ग्राम पंचायतों में ठोस और तरल संसाधन प्रबंधन केन्द्र बनाने की योजना।
  • 160 शहरी स्थानीय निकायों में बायोरीमेडिएशन/कैपिंग का काम पूरा हुआ। शेष आठ में इसके 2021 तक पूरा होने की सम्भावना।
  • सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा फेंकने वालों पर तत्काल जुर्माना लगाने के उप-नियम बनाए गए।

 
(3)  कूड़े से ऊर्जा उत्पादन करने वाले संयंत्रों की स्थापना
 
देश में कूड़े से ऊर्जा प्राप्त करने वाले 4 संयंत्र स्थापित किए गए, जिनमें से 4 दिल्ली में हैं। इन संयंत्रों में उत्पन्न बिजली विद्युत नियामक द्वारा खरीद कर राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड को सप्लाई कर दी जाती है। देश के विभिन्न भागों में इसी तरह के कई संयंत्रों का निर्माण किया जा रहा है।
 
(4) मॉडल शहरों का विकास

पुणे (महाराष्ट्र), इंदौर (मध्य प्रदेश) और अम्बिकापुर (छत्तीसगढ़) को मॉडल शहरों के रूप में विकसित किया गया है। इन शहरों ने कूड़े-करकट का दक्षतापूर्ण संग्रह करने, उसकी छंटाई और प्रसंस्करण की सुविधाएँ विकसित की हैं। इन शहरों ने कूड़ा फेंकने से खराब हुए स्थानों को ठीक करने की विधियों को अपनाया है और जमीन को फिर से उपयोग योग्य बनाया है।
 
(5) बढ़ता हुआ कानूनी हस्तक्षेप

राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम 2010 के पारित होने के बाद पिछले कुछ वर्षों में न्यायिक हस्तक्षेप की वजह से विभिन्न भागीदार, खास तौर पर राज्यों के अधिकारी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित कर रहे हैं। अधिकरण के कुछ प्रमुख आदेश इस प्रकार हैः-

(क) अलमित्र एच.पटेल और एक अन्य बनाम भारत सरकार और अन्य, ओ.ए. 199/2014 दिनाँक 22.12.2026 में अधिकरण ने यह आदेश दियाः-

  • प्रत्येक राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश बिना और देरी किए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली, 2016 का प्रवर्तन और क्रियान्वयन करेगा।
  • सभी सरकारें और केन्द्र शासित प्रदेश प्रशासन 2016 के नियमों और इस फैसले में दी गई हिदायतों के सन्दर्भ में इस निर्णय की घोषणा की तारीख से चार सप्ताह के भीतर एक कार्य योजना बनाएँगे।
  • कूड़े-कचरे को जलाने से पहले उसकी मात्रा को ध्यान में रखकर उसकी छटाई करना अनिवार्य होगा।
  • संयंत्रों और लैंडफिल स्थलों के आसपास बफर जोन बनाना अनिवार्य होगा।
  • राज्यों, स्थानीय प्राधिकारियों के लिए कूड़े-करकट से बनाए गए ईंधन (आरडीएफ) के उपयोग के लिए बाजार बनाना अनिवार्य होगा।
  • लैंडफिल वाली जगहों को आदेश की घोषणा की तारीख से छह महीनों के भीतर बायो-स्टेबिलाइज कराना होगा।
  • कूड़े-करकट को लैंडफिल की जगह या किसी अन्य स्थान पर जलाने की पूरी मनाही होगी।

(ख) राष्ट्रीय हित अधिकरण ने ओ.ए. 606/2018 पर अपने आदेश दिनाँक 5.3.2019 में सभी राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को निम्नलिखित निर्देश दिए हैः

  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के नियम 22 और 24 पर अमल पर अब छह सप्ताह के भीतर वे सब कदम उठा लिए जाने चाहिए जो अभी तक नहीं उठाए जा सकें हैं। इसी तरह के 23 कदम बायो-मेडिकल अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली और प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली के लिए भी उठाए जाने चाहिए।
  • आज (22.12.2016) से दो सप्ताह के भीतर राज्य में कम-से-कम तीन प्रमुख शहरों और ज्यादा-से-ज्यादा मुमकिन कस्बों में तथा हर जिले की तीन पंचायतों को ऐसे आदर्श शहर/कस्बे/गाँव के रूप में अधिसूचित किया जाना चाहिए जिन्हें अगले 6 महीनों में इन नियमों का पूरी तरह से पालन करने वाला बना दिया जाएगा।
  • राज्य के शेष शहरों/कस्बों/ग्राम पंचायतों को एक साल के भीतर पर्यावरण सम्बन्धी मानदंडों का पूरी तरह से पालन करने वाला बना दिया जाना चाहिए।
  • मुख्य सचिव द्वारा हर तीन महीनों मिं त्रैमासिक रिपोर्ट भेजी जानी चाहिए। इस तरह की पहली रिपोर्ट 10 जुलाई, 2019 तक भेज दी जानी चाहिए।
  • मुख्य सचिव को महीने में कम-से-कम एक बार सभी जिला मजिस्ट्रेटों के साथ प्रगति की स्वयं निगरानी करनी चाहिए।
  • जिला मजिस्ट्रेटों या अन्य अधिकारियों को इस बारे में वांछित प्रशिक्षण दिया जा सकता है।
  • जिला मजिस्ट्रेटों को पर्यावरण सम्बन्धी मानदंडों के अनुपालन की स्थिति की निगरानी दो सप्ताह में कम-से-कम एक बार करनी चाहिए।

(ग) माननीय राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने अपने आदेश दिनाँक 17.7.2019 ओ.ए. सं. 519/2019 (ओ.ए.सं. 386ं/2019) में दिल्ली में कूड़ा फेंकने के तीनों स्थानों यानी गाजीपुर, भलस्वा और ओखला में बायोमाइनिंग कराने का आदेश दिया है।
 

चुनौतियाँ

  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों पर अमल के रास्ते में विभिन्न चुनौतियाँ इस प्रकार हैंः-
  • कूड़ा उत्पन्न करने वालों द्वारा स्रोत पर ही इसकी छंटाई।
  • कूड़ा-करकट जमा करने और उसके परिवहन के लिए बुनियादी ढाँचे की कमी।
  • कूड़ा-करकट जमा करने और परिवहन सुविधाओं की स्थापना के लिए जमीन की उपलब्धता।
  • उपर्युक्त 2 और 3 के लिए बजट सम्बन्धी प्रावधान।
  • नए और पहले से चले आ रहे कूड़े-करकट के लिए तकनीकी और आर्थिक दृष्टि से व्यावहारिक समाधान।
  • पुराने ठोस शहरी कचरे का प्रबंधन।
  • ज्यादातर राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों में ग्रामीण इलाकों को छोड़ दिया गया।
  • प्रवर्तन सम्बन्धी मुद्दे।

आगे का रास्ता

भूमि की उपलब्धता, अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा और वित्तीय संसाधनों की कमी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा हैं इसलिए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का मुख्य जोर-कूड़े-करकट में से अधिक से अधिक उपयोगी संसाधनों को अलग करना है ताकि कुशल ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए इन संसाधनों की उपलब्धता आसान हो जाए, इस दिशा में प्रमुख कदमों में शामिल हैं:-

  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए कार्य में विभिन्न सहभागियों की भागीदारी के लिए जन जागरूकता पैदा करना।
  • कूड़े-करकट का संग्रह करने, उसकी छंटाई, परिवहन और प्रसंस्करण के लिए शहरी स्थानीय निकास की जरूरत के अनुसार कार्य योजना बनाना। इन योजनाओं को लागू करने के लिए इंदौर, अम्बिकापुर और पुणे जैसे मॉडल शहरों से जानकारी प्राप्त की जानी चाहिए।
  • कूड़े-करकट के प्रसंस्करण की सुविधाओँ की स्थापना पर जोर दिया जाना चाहिए न कि इसके निपटान की सुविधाओं पर जैसा की छत्तीसगढ़ के मामले में देखा गया है।
  • कूड़े करकट में से संसाधनों को छांट कर निकालने पर जोर देते हुए अनुसंधान और विकास गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की विभिन्न व्यवस्थाओं के तहत क्षमता निर्माण।
  • राज्य और जिला स्तरों पर उपयुक्त अभिशासन ढाँचा खड़ा करना।
  • शहरी स्थानीय निकायों, कूड़ा फैलाने वालों को बुनियादी ढाँचा खड़ा करने के लिए स्पष्ट रूप से जिम्मेदारी सौंपना और अनौपचारिक क्षेत्रों को कूड़ा इकट्ठा करने/छांटने के काम में भागीदार बनाना।
  • शहरी स्थानीय निकायों को प्रसंस्करण टेक्नोलॉजी और अपशिष्ट प्रबंधन के बेहतरीन तौर-तरीके अपनाने में पर्याप्त तकनीकी सहायता। 

 

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