भूजल के स्रोत

Submitted by editorial on Sat, 10/06/2018 - 14:29
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पर्यावरण विज्ञान उच्चतर माध्यमिक पाठ्यक्रम

जल चक्र जिसमें सतही जल, भूजल एवं जल तालिका दर्शाई गई हैजल चक्र जिसमें सतही जल, भूजल एवं जल तालिका दर्शाई गई है भूजल स्रोत, जैसा कि इसके नाम से ही ज्ञात होता है, भूमि के नीचे पाया जाने वाला जल होता है। वर्षा के जल अथवा बर्फ के पिघलने से पानी का कुछ भाग भूमि द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है तथा इसका कुछ भाग गुरुत्व के प्रभाव के फलस्वरूप भूमि के नीचे स्थित परतों में एकत्र हो जाता है। इस पाठ में आप भूमिगत जल के स्रोतों के विषय में जानकारी प्राप्त करेंगे, जिसका प्रयोग कृषि, उद्योगों और दैनिक जीवन के कार्यों हेतु आवश्यक रूप से महत्त्वपूर्ण है।

उद्देश्य

इस पाठ के अध्ययन के समापन के पश्चात आप-

1. सतही जल और भूजल में अन्तर को समझ पाएँगे ;
2. उन विविध तरीकों की सूची बना सकेंगे जिनसे भूजल प्राप्त किया जा सकता है ;
3. अपने घरों में जल के न्यूनतम उपयोगों के तरीकों के बारे में सुझाव दे पाएँगे ;
4. भूजल को प्राकृतिक रूप से तथा मानव एजेंसियों के द्वारा पुनः प्राप्त करने के विषय में वर्णन कर पाएँगे ; तथा
5. भूजल का यदि उपयुक्त तरीके से उपयोग नहीं कर पाये तो इसकी कमी से होने वाले जोखिम (Risk) पर प्रकाश डाल सकेंगे।

28.1 सतही जल और भूमिगत जल

जल एवं जलवाष्प (वाष्पीकरण) की क्रिया सूर्य एवं गुरुत्व द्वारा निरंतर संचालित होने वाली प्राकृतिक क्रिया है जिसे हाइड्रोलॉजिक (जल) चक्र कहते हैं। जिसके विषय में आपने पिछले पाठ में पढ़ा है। समुद्र एवं सतही भूमि से जल का वाष्पोत्सर्जन होकर यही जल पुनः पृथ्वी पर पानी की बूँदों के रूप में वापस आ जाता है। पृथ्वी पर समस्त अलवण जल का स्रोत वर्षा है। जब वर्षा होती है तो पृथ्वी पर गिरने वाला जल धारा के रूप में प्रवाहित होकर झरनों, तालाब अथवा झीलों में चला जाता है। यह जल सतही जल (Surface water) कहलाता है।

इस जल का कुछ भाग भूमि के अन्दर मृदा क्षेत्र (Soil Zone) में अवशोषित होकर एकत्र हो जाता है। जब मृदा क्षेत्र संतृप्त (भर जाता) होता है तो यह जल नीचे चला जाता है। संतृप्तता का यह क्षेत्र मृदा के उस स्थान पर होता है जहाँ मृदा के सभी छिद्र जल से भरे होते हैं। वर्षा के जल का कुछ भाग धीरे-धीरे संचारित होकर गुरुत्वाकर्षण के कारण भूमि के नीचे चला जाता है। अतः भूजल बनने की यह क्रिया जलभृत (Aquifer) कहलाती है और संचित जल भूजल (Ground water) कहलाता है। गुरुत्व प्रभाव के फलस्वरूप भूमिगत जल धीरे-धीरे मृदा के भीतर चला जाता है। निचले क्षेत्रों में यह झरनों एवं धारा के रूप में बाहर आ जाता है।

सतही जल एवं भूजल दोनों अन्ततः महासागरों में पुनः वापस चले जाते हैं जहाँ से वायुमंडलीय जलवाष्प की आपूर्ति वाष्पीकरण द्वारा होती रहती है। हवायें नमी को भूमि पर लाती हैं जिससे अवक्षेपण होता है तथा जलचक्र निरन्तर चलता रहता है। अवक्षेपण की इस प्रक्रिया को जिसके द्वारा भूमिगत जल की आपूर्ति होती है, पुनःभरण (Recharge) कहा जाता है। सामान्य रूप से पुनःभरण उष्णकटिबन्धीय जलवायु में वर्षाऋतु के समय ही होता है अथवा यह बसन्त के मौसम में होता है। पृथ्वी पर गिरने वाला यह अवक्षेपण अक्सर 10 से 20 % तक होता है जो मृदा द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है एवं जल धारण करने वाले स्तर पर योगदान देता है, उदाहरण जलभृत (Aquifer)।

भूजल निरन्तर क्रियाशील रहता है सतही जल की तुलना में यह बहुत धीरे-धीरे बहता है। इस जल के संचरण की वास्तविक दर संचरण एवं जलभृत की संग्रहण क्षमता पर निर्भर करती है। कभी-कभी झरनों एवं नदियों में भूमिगत-जल का स्तर बढ़ने से इनमें उफान (बाढ़) आ जाता है। जल तालिका में भूजल के नवीकरण का समय एक वर्ष अथवा उससे कम हो सकता है परन्तु गहरे जलभृतों में इसकी अवधि हजारों वर्ष से भी अधिक समय तक लम्बी हो सकती हैं।

जल तालिका (Water table) को भूमिगल-जल तालिका भी कहा जाता है, यह भूमि की ऊपरी सतह होती है जिसमें मृदा या चट्टानें जल के साथ स्थायी रूप से संतृप्त होती हैं। उस गहराई तक जिसमें, मृदा के छिद्रों-स्थान की जल के साथ पूर्णतः तथा जिस स्तर पर यह पायी जाती हैं उसे जल तालिका कहा जाता है। जल-तालिका भूजल क्षेत्र को अलग करती है जो इससे नीचे होता है या केशिकत्व फ्रिन्ज वायुपूर्ण क्षेत्र जो इससे ऊपर होता है। जल तालिका में ऋतुओं एवं वर्ष दर-वर्ष उतार-चढ़ाव आता रहता है क्योंकि वर्षा एवं जलवायु में भिन्नता इस पर अपना प्रभाव डालते हैं। यह कुओं या कृत्रिम रूप द्वारा जल की मात्रा निकालने से भी प्रभावित होता है।

भूजल का बहुतायत से प्रयोग घरेलू काम-काज, पशुओं एवं सिंचाई हेतु आदिकाल से किया जाता रहा है। भारत में एक बहुत बड़ी जनसंख्या भूजल पर निर्भर करती है। सतही जल एवं भूमिगत जल के मध्य मुख्य अन्तर इस प्रकार हैं:-

सतही जल

भूजल

सतही जल ऐसा जल होता है जो भूमि की सतह पर झरनों, नदियों, तालाबों अथवा झीलों के रूप में उपस्थित रहता है।

भूजल ऐसा जल है जो सामान्यतः भूमिगत रूप में पाया जाता है तथा इसे कुओं, ट्यूब-वैल अथवा हैंडपम्पों द्वारा खुदाई करके प्राप्त किया जाता है।

सतही पानी खुले रूप से पाया जाता है एवं  आसानी से दूषित हो सकता है।

भूजल पृथ्वी के अंदर (छिपा) पाया है एवं इसे आसानी से दूषित नहीं किया जा सकता है।

सतही पानी को अक्सर किसी अन्य स्थान तक ले जाने में काफी खर्च आता है अतः यह काफी महँगा होता है।

भूजल केवल अपने प्रयोग के स्थान पर वहीं उपलब्ध होता है जहाँ इसकी आवश्यकता होती है एवं इसे किसी स्थान पर नहीं ले जाया जा सकता है। इस प्रकार यह सस्ता होता है।

सतही जल का परोक्ष रूप से उपयोग नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह दूषित होता है।

भूमिगत जल अधिकतर स्वच्छ होता है और इसका प्रयोग सीधे किया जा सकता है।

सतही पानी खुला होता है एवं वाष्पीकरण क्षति पर अक्सर निर्भर है तथा इस प्रकार सूखे के समय इस पर कम निर्भर होते हैं।

भूजल भूमि के नीचे पाया जाता है एवं इस पर वाष्पीकरण से कोई प्रभाव नहीं होता। इस प्रकार सूखे के समय इस पर ज्यादा निर्भर होते हैं।


पाठगत प्रश्न 28.1
1. भूजल क्या है?
2. यह कहाँ से प्राप्त किया जाता है?
3. जलभृत (Aquifer) क्या है?
4. जल तालिका से आप क्या समझते हैं?

28.2 भूजल के स्रोत
भूजल के स्रोत के रूप में जलभृत या एक्वीफर का महत्त्व भौगोलिक परतों के छिद्रों पर निर्भर करता है जहाँ पर यह निर्मित होता है। इस जल को कुओं में जलभृत अथवा अंतःस्पंदन दीर्घा (Infiltration gallery) द्वारा बाहर निकाला जाता है। एक अन्तःस्पंदन दीर्घा के अन्तर्गत कई पाइप लगे होते हैं जो सतह से भूमि के अन्दर गहराई तक एक वृहद झुकी हुई एक वृहत ऊर्ध्वाकार व्यास वाली शॉफ्ट या कूपक के द्वारा निर्मित किये जाते हैं।

कुओं को कई प्रकार से बनाया जाता है जो जलभृत की गहराई और उसकी प्रकृति के अनुरूप होता है। कुओं का उपयोग सार्वजनिक रूप से आपूर्ति हेतु किया जाता है। सामान्यतः अधिकतम 100 फीट (30 मीटर) गहरे और 4 से 12 इंच (10 से 30 सेमी) व्यास वाले जलभृत को पृथ्वी के अन्दर निर्माण किया जाता है जहाँ पर अच्छी गुणवत्ता वाला जल प्राप्त किया जा सकता है। समर्सीबल पम्प (अपवाहन पंप या Submersible pump) जिसमें बिजली से चलने वाली मोटर लगी होती है, का प्रयोग भी भूमिगत जल को सतह पर लाने हेतु किया जाता है।

28.2.1 भूजल उपाहरण की विधियाँ
भूजल प्राप्त करने की अनेकों विधियाँ हैं। इनमें से सबसे अधिक सामान्य विधियाँ इस प्रकार हैं:

1. झरना (Spring): जल तालिका सामान्यतः भू-पृष्ठ की स्थलाकृति के अनुसार होती हैं। जल तालिका में ढाल उप-मृदा के प्रवाह को प्रकट करती है। भूमिगत जल की गतिविधि सतही जल की तुलना में काफी धीमी होती हैं। यह प्रवाह ढलान और इसकी पारगम्यता पर निर्भर करता है। कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में जब जल-तालिका में सतही जल के स्तर से ऊपर होता है, भूमिगत जल झरनों के रूप में बाहर आ जाता है। इस जल का उपयोग पीने हेतु किया जा सकता है।

रोम, ल्योन जैसे नगरों में सबसे पुरानी जल आपूर्ति इसी प्रकार के झरनों से होती थी। हिमालय क्षेत्र में रहने वाले अधिकांश लोग पीने के पानी के लिये इसी प्रकार के स्रोतों पर निर्भर थे।

2. कुआँ खोदकरः यह प्रायः साधारणतया खुले कुएँ होते हैं जिन्हें जमीन में खोदकर या भूमिगत जल को धारण करने वाले स्तर से पानी निकालकर, उनके पानी से सिंचाई हेतु किया जाता है। ये मुख्यतः राज मिस्त्री द्वारा निर्मित कुएँ, कच्चे कुएँ एवं खुदाई किए हुए बोर-वेल हो सकते हैं। यह सभी कार्य निजी लोगों द्वारा अपनी उद्देश्य पूर्ति हेतु किये जाते हैं।

जल तालिकाजल तालिका 3. उथला-ट्यूब-वेलः इसमें जमीन में एक छेद बनाकर उसमें पाइप के द्वारा भूमिगत जल को प्राप्त किया जाता है। इसकी गहराई 60-70 मीटर से ज्यादा नहीं होती। इन ट्यूबवेलों का प्रयोग सिंचाई के दौरान 6-8 घंटे तक किया जाता है जिसमें 100 -300 क्यूबिक मीटर पानी प्रतिदिन की दर से निकाला जा सकता है जिससे गड्ढा खोदकर बनाये गये कुओं से 2-3 गुना ज्यादा पानी निकाला जा सकता है।

4. गहरा ट्यूब-वेलः इसकी गहराई 100 मीटर से अधिक होती है तथा इससे 100-200 क्यूबिक मीटर पानी प्रति घंटे की दर से निकाला जा सकता है। सिंचाई के मौसम के दौरान इनका उपयोग दिन भर किया जाता है जो कि बिजली की उपलब्धता पर निर्भर करता है। इनकी वार्षिक उत्पादन क्षमता उथले ट्यूबवेल से कम से कम 15 गुना ज्यादा होती है।

5. हैंडपम्पः हैंडपम्प का प्रयोग ग्रामीण एवं शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों में किया जाता है। ये हाथ से चलाये जाते हैं। इस प्रकार इनमें बिजली या अन्य किसी भी प्रकार की ऊर्जा का उपयोग नहीं होता।

28.3 पानी का समुचित उपयोग
(क) घरों में


जल के समुचित उपयोग पर्यावरणीय, जनस्वास्थ्य एवं आर्थिक लाभों के लिये किया जाता है, इसकी सहायता से इसकी गुणवत्ता में सुधार किया जाना, जलीय पारितंत्र में संतुलन बनाये रखने तथा पेयजल संसाधनों की रक्षा करना है। यदि हम पानी का उपयोग उपयुक्त तरीकों से करेंगे एवं पानी के समुचित उपयोग वाले पदार्थों को खरीदें तो हमें सूखे अथवा अकाल की समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा। इस बचत से न केवल पानी की बचत करेंगे वरन धन और पानी के बिलों में भी कटौती होगी।

स्नानघर में

रसोई एवं लांड्री में

बगीचा एवं भू-दृश्य निर्माण में

उपकरणों में

1. दाढ़ी बनाते (शेविंग) एवं दांत साफ करते समय पानी खुला छोडें। शेव करते समय  या दांत साफ करते समय पानी के लिये मग का प्रयोग करें।

 

2. टब में नहाने के स्थान पर नहाने के लिये थोड़े पानी का प्रयोग करें।

 

3. साबुन अथवा शैम्पू लगाते समय पानी को बन्द कर दें।

 

4. यदि आप टब का उपयोग करें तब नल को पानी गिरने से पहले ही बंद कर दें एवं टब आधा ही भरें बच्चों को एक साथ नहलाने से भी पानी की बचत की जा सकती है।

 

5. अपने टॉयलेट को रद्दी की टोकरी की तरह उपयोग करें।

1. थोड़ी सी बातों का ध्यान रखने पर बहुत बड़ी मात्र में पानी की बचत की जा सकती है।

 

2. पीने के पानी को फ्रिज में भंडारित करके रखें।

 

3. फलों एवं सब्जियों को बेसिन में धोयें। सब्जियों के धोने के लिये ब्रुश का प्रयोग करें।

 

4. फ्रिज में रखे (जमे) खाद्य पदार्थों में पानी का प्रयोग करें, बल्कि उसका प्रयोग आगे करें।

 

5. बर्तनों को डिश वाशर में साफ करने से पहले उनको अच्छी तरह रगड़ लें, कि उनको धोएँ।

 

6. बचे हुए खाने को कूड़ेदान में डालकर कम्पोस्ट बनाने के लिये उपयोग करें।

 

7. केवल काफी सारे कपड़े एकत्र करके लांड्री में धोयें या कपड़े धोने की मशीन की क्षमता के अनुसार ही कपड़े धोयें।

 

नोट : जिन घरों में उच्च क्षमता वाले नलके फिट हों एवं पानी बचाने के उपकरण लगे होते हैं, इन उपकरणों से घर के अंदर 30 प्रतिशत पानी की बचत होती है एवं पानी सीवर एवं बिजली के बिलों में भी आंशिक रूप से बचत होती है।

1. जलवायु के आधार पर घर में उपयोग किए पानी का 75% बदलते मौसम में घर से बाहर उपयोग होता है।

 

2. सिंचाई के उपकरणों में सभी लीकों को जाँच लें एवं मरम्मत करवा लें।

 

3. जहाँ तक संभव हो, बेकार पानी को सिंचाई के उपयोग लायें।

 

4. बगीचे या लॉन में केवल ठंडे मौसम में ही पानी डालें। (सुबह-सुबह का मौसम अच्छा होता है।) हवा चलते समय पौधों में पानी नहीं डालना चाहिए।

 

5. बड़े पौधों एवं झाड़ियाँ जिनमें गहरा जड़ तंत्र पाया जाता है, में पानी काफी समय के अन्तराल पर डालें एवं कम गहरे जड़ तंत्र वाले पौधों में लगातार उनकी आवश्यकतानुसार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में जल डालें। अपने क्षेत्र में पानी की आवश्यकताओं की जानकारी स्थानीय विस्तारण सेवा से प्राप्त करते रहें।

 

6. केवल बगीचों या लॉन में फव्वारों का प्रयोग करें, सड़कों या फुटपाथ पर नहीं करना चाहिए।

 

7. बड़े पौधों या झाडि़यों को पानी देने के लिये हॉज या ट्रिकल सिंचाई तंत्र से पानी दें।

 

8. टॉयलेट में लीकेज हो रही है।

 

9. वाष्प सेंसर या झरना प्रणाली को लगायें।

 

10. झाडि़यों के चारों ओर मल्च लगायें एवं बगीचे के पौधों से उद्वाष्पन कम करने के लिये मृदा की सतह एवं उसके चारों ओर उगी खरपतवार को काटते रहें।

 

11. उर्वरकों का कम या बिल्कुल प्रयोग करें जिससे नई वृद्धि तकनीकों को बढ़ावा देने के लिये अतिरिक्त पानी की आवश्यकता पड़े।

 

12. उस पानी का प्रयोग करें जिसमें ब्लीच, स्वचालित डिश-वाशिंग डिटरजेंट या सिंचाई के लिये रेशे कोमल करने वाला पदार्थ मिला हो।

1. कम प्रवाह से निकलने वाले फॉसेट एवं शॉवर जैसे उपकरण लगवायें।

 

2. ऐसी उच्च क्षमता वाली वाशिंग मशीन खरीदें जिसमें 50 प्रतिशत ऊर्जा एवं पानी की बचत होती है।

 

3. रिसाव वाले सभी भागों की मरम्मत करवाएँ। टॉयलेट में रिसाव प्रतिदिन 1000 लीटर पानी को व्यर्थ कर सकता है। इसकी जानकारी हेतु अपने टॉयलेट के पानी वाले हिस्से में रंगीन पदार्थ डालकर इन रिसावों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।


 


बाह्य उपयोग

1. बाहरी स्थानों, सड़क के किनारों एवं रास्तों को पानी से साफ करने के लिये हौज पाइपों के स्थान पर उन्हें झाडू़ से साफ करें।

2. गाड़ी को साफ करते समय बाल्टी में पानी भरकर उपयोग में लाना चाहिए या व्यापारिक स्तर पर कार धोने का उपयोग करें जिससे पानी का पुनः चक्रण हो सके।

3. जब टंकी या हौज में पानी भरना हो तो उसमें जल प्रवाह को नियंत्रित करने के लिये स्वचालित बटन लगवायें।

4. जिन खिलौनों में लगातार पानी की आवश्यकता होती है, उन मनोरंजन करने वाले खिलौनों को न खरीदें।

5. पानी बचाने वाले तरण-ताल फिल्टर (Swimming pool filter) को खरीदने के विषय में सोचें।

6. नहाने के तालाब को वाष्पीकरण के दौरान अच्छी तरह से ढक कर रखें, जब उसे प्रयोग में नहीं लाया जा रहा हो।

7. उन सजावटी जल-विशिष्टताओं वाली वस्तुओं का प्रयोग नहीं करें या नहीं खरीदें जिससे पानी का पुनःचक्रण नहीं हो सकता हो। लोगों को यह चिह्न दिखाओ कि पानी को पुनःचक्रित किया जा सकता है। सूखे के समय उसका प्रयोग न करें।

पाठगत प्रश्न 28.3
1. प्रत्येक में पानी बचाने वाले दो तरीकों को बतायें:
(क) बाथरूम में (ख) रसोईघर में
2. पानी के न्यायोचित उपयोग के कोई अन्य दो तरीकें बतायें जबकि आप बागवानी एवं भूदृश्य संबंधी काम कर रहे हैं।
3. पानी के दो अन्य न्यायोचित उपयोगों को बताइये।

28.4 कृत्रिम पुनःआवेश (ARTIFICIAL RECHARGE)

जल की बढ़ती मांग ने भूजल आपूर्ति संवर्द्धन के कृत्रिम पुनःभरण के विषय में जागरुकता को बढ़ा दिया है। साधारण शब्दों में, कृत्रिम पुनःभरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें सतही जल का अधिकतम भाग सीधे जमीन के अन्दर या तो उसे जमीन पर फैलाकर अथवा पुनर्भरण कुओं का उपयोग अथवा प्राकृतिक दशाओं से ज्यादा निस्यंदन द्वारा कराया जाता है। दूसरे शब्दों में, जलभृत का भरण करना पुनःभरण का सम्बन्ध में जल की गति मनुष्य द्वारा निर्मित उस प्रणाली से है जिसमें सतही पानी को भूमि के अन्दर अथवा नीचे सुरक्षित रखा जाता है। कृत्रिम पुनःभरण (कभी-कभी योजनाबद्ध पुनर्भरण कहते हैं) एक ऐसा तरीका है जिसमें जल को भूमि के नीचे संग्रहित किया जाता है ताकि जल की कमी के समय इस जल को उपयोग में लाया जा सके।

28.4.1 सीधे कृत्रिम पुनर्भरण द्वारा
(क) फैले हुए बेसिन द्वारा (Spreading basins)


इस पद्धति में जमीन पर हौज बनाकर उसमें पानी को फैला (भर) दिया जाता है ताकि इसे मौजूदा भू-भाग में खुदाई कर प्राप्त किया जा सके। प्रभावी कृत्रिम पुनःभरण करने के लिये अच्छी गुणवत्ता की मृदा का होना आवश्यक है एवं पानी की परतों में अच्छी तरह रख-रखाव किया जा सके, जब आवश्यक हो।

(ख) पुनर्भरण गर्त एवं शॉफ्ट (Recharge pit and shaft)

ऐसी दशायें जो कृत्रिम पुनःभरण के लिये सतह फैलाव विधियों के प्रयोग करने की स्थिति हो, बहुत ही दुर्लभ बात है। अक्सर कम पारगम्यता के क्षेत्रों में भूमि की सतह और जल तालिका होती है। इस प्रकार की परिस्थितियों में कृत्रिम पुनःभरण की प्रणालियाँ जैसे गर्त एवं शॉफ्ट प्रभावी हो सकते हैं।

पानी का अनिस्यंदित (न छने) प्रवाह होने के कारण गर्त के आस-पास एवं गड्ढे की तली में रेत जमा हो जाता है जिसका समय-समय पर मरम्मत होनी आवश्यक है ताकि पुनःभरण की दशा को नियमित रखा जा सके। यह गर्त गोलाकार, आयताकार अथवा एक वर्गाकार रूप में हो सकती है एवं जिससे पुनः छिद्रित भागों को अच्छी तरह से भरा जा सकता है। इन गर्त और शॉफ्ट को बनाने व खुदाई के दौरान इस जल तालिका के ऊपर या हाइड्रोलिक कनेक्टर जल तालिका से नीचे (असामान्य) हो सकता है। गर्त एवं शॉफ्ट दोनों में पुनर्भरण की दर रेत के कणों के एकत्र होने के साथ कम हो जाती है एवं सूक्ष्मजीवी प्रक्रियाओं के द्वारा प्रभावित होती हैं।

(ग) खाईयाँ (Trenches)

खाई को एक लम्बी पतली नाली कहा जा सकता है, जिसकी तलहटी इसकी चौड़ाई से कम होती है। खाई पद्धति को जलवायु एवं भौगोलिक स्थिति के अनुरूप तैयार किया जाता है ताकि खाई को उसके दिए गए स्थान पर बनाया जा सके। खाई एवं बहते हुए पुनर्भरण परियोजना जिसके अन्तर्गत खाईयों की एक श्रृंखला जलवायु ढलानों के अनुसार इनका खाका तैयार करना आता है। खाईयों को खत्म किया जा सकता है क्योंकि ये बिना छने पानी को दूसरे स्थानों पर लाने के काम आती है। इससे पानी की अच्छी गुणवत्ता पदार्थों के जमाव में कमी आ जाती है।

(घ) पुनर्भरण कुएँ (Recharge wells)
पुनःभरण या इंजेक्शन कुओं का उपयोग सीधे पुनःभरण वाले जल को जमीन की गहराई से निकालने हेतु किया जाता है। पुनःभरण कुओं का निर्माण ऐसी जगहों पर ज्यादा प्रभावी होता है जहाँ पर मिट्टी की सतह ज्यादा मोटी है तथा जहाँ पर जलभृत यंत्र लगाये जाते हैं। ये कुएँ ऐसी जगहों पर भी लाभकारी होते हैं, जहाँ पर जमीन बहुत कम होती है। इस प्रणाली के द्वारा अधिकतम मात्रा में पुनर्भरण पानी प्राप्त किया जा सकता है।

28.4.2 पुनर्भरण की अन्य अपरोक्ष विधियाँ
(क) स्ट्रीम बेड अंतःस्यंदन को बढ़ावा (प्रेरित अंतःस्यंदन)


इस विधि से प्रेरित पुनर्भरण (Induced infiltration) एक गैलरी या कुओं की एक समांतर लाइन नदी के किनारे पर या उससे कुछ दूरी पर मिलकर बनती है। कुओं के बिना भूजल नदी की ओर बेरोकटोक बहता रहेगा। जब भूजल की थोड़ी सी मात्र इन गैलरी समान्तरों से नदी की तरफ ले जाती है, तब भूजल का नदी की ओर होने वाला पुनर्भरण कम हो जाता है। गैलरी द्वारा पानी की पुनर्प्राप्ति पूर्ण रूप से भूजल के कारण होती है।

प्रत्येक बार भूजल का निकाला जाना जल तालिका में से निकाले गये जल के साथ-साथ होता है। इस निकाले गये जल की उच्च दर पर पुनर्प्राप्ति नदी के किनारों के नीचे पायी जाने वाली भूजल तालिका से कम होता है एवं गैलरी की ओर प्रवाहित होता है। उन क्षेत्रों में जहाँ जल धारायें जलभृतों से कम पारगम्यता वाले पदार्थों द्वारा अलग होती हैं, जल धाराओं से रिसने वाला जल इतना कम होता है कि वह इस प्रणाली में दिखायी भी नहीं पड़ता है।

(ख) संयोजी कुएँ
संयोजी कुँआ वह होता है जो उथले, परिरुद्ध (Confined) जलभृत एवं गहरे आर्टिसियन (Artisan) जलभृत दोनों से मिलकर बना होता है। पानी को गहरे जलभृत से पम्प किया जाता है एवं जब इसकी सतह उथले जल तालिका से नीचे काफी कम होती है, उथले परिरुद्ध जलभृत से सीधे ही गहरे जलभृत में जल प्रवाहित हो जाता है। संयोजी कुओं द्वारा जल संवर्धन जल का रेत इत्यादि से मुक्त जल के उपयोग का लाभ प्राप्त होता है जिससे कुओं की अवरोधन सतह को नष्ट होने से काफी हद तक बचाया जा सकता है।

28.4.3 संयोजी पुनर्भरण के लाभ
1. जबकि पुनर्भरण, में वर्षा एवं सतह का जल जमीन के अन्दर अंतःस्यंदित होकर चला जाता है तथा भौगोलिक बनावट के कारण प्राकृतिक रूप से अच्छी तरह परिष्कृत एवं छिद्रित होकर नीचे चला जाता है।

2. अपवाही कुओं को खोदने में बहुत थोड़े से विशेष औजारों की आवश्यकता पड़ती है।

3. चट्टानों के निर्माण वाली जगहों (पथरीली जगहों) पर कुओं को बनाने में कुछ उच्च, संरचनात्मक अक्षतता वाले औजारों/सामग्रियों (रोड़ी, मृदु पत्थर या कोरल रॉक ब्लॉक, धातु की छड़ों) की आवश्यकता होती है।

4. भूजल का पुनर्भरण नम मौसमों में पानी को एकत्र कर रखा जाता है जिससे शुष्क मौसम में जब इनकी खपत बढ़ जाती है, को उपयोग में लिया जा सके।

5. जलभृत जल को पुनर्भरण द्वारा उच्च गुणवत्ता जल में बदला जा सकता है।

6. निरन्तर चलने वाले जलभृत तंत्र के द्वारा पुनःभरण को बढ़ाया जा सकता है।

7. पुनर्भरण की पद्धतियाँ आकर्षक हैं, विशेषकर शुष्क क्षेत्रों में।

8. अधिकांश जलभृत पुनर्भरण को चलाना आसान है।

9. अनेक नदियों के बेसिनों में, सतही जल के बहने पर नियंत्रण करने से जलभृत पुनःभरण से पानी में रेत की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है।

10. कम खारी सतही जल का पुनःभरण या बहिर्वाहों के उपचार से खारी जल के जलभृतों की गुणवत्ता में सुधार से, कृषि एवं पशुओं के लिये जल के उपयोग की सुविधाओं में सुधार किया जा सकता है।

28.4.4 कृत्रिम पुनःभरण के दोष (हानियाँ)

कृत्रिम पुनःभरण के कुछ दोष भी हैं:

1. वित्तीय प्रोत्साहनों के अभाव में अथवा नीतियों एवं नियमों के कारण भू-मालिकों को निकासी पम्पों (कुओं) के रख-रखाव हेतु पर्याप्त साधनों का अभाव है जिससे इन कुओं की मरम्मत नहीं हो पाती तथा अंततः इनमें भूजल का स्त्रोत दूषित हो जाता है।

2. सतही जल को जमीन के अन्दर भेजने में तथा उसी जल को जब सिंचाई हेतु प्रयुक्त किया जाता है, तो जल के दूषित होने का खतरा हो सकता है। यह केवल तभी ठीक रह सकता है जब सतही जल के प्रवाह को कृषि खेतों एवं सड़क मार्गों के स्थान पर पृथ्वी के अन्दर आने से पूर्व अच्छी प्रकार से उसे पूर्वोपचारित किया जाता है।

3. जब तक जलभृत में जल को अच्छी तरह से भरा नहीं जाएगा, भूजल के पुनःभरण को आर्थिक रूप से उपलब्ध नहीं कराया जा सकता।

4. भविष्य में किसी एक्वाफायर की हाइड्रोजिओलॉजी (जल विज्ञान) बड़ी मात्रा में पानी के अन्वेषण से पूर्व उसकी प्रकृति एवं क्षमता के विषय में जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।

पाठगत प्रश्न 27.4

1. कृत्रिम पुनःआवेश क्या है?
2. कृत्रिम रूप से भूमि से पानी निकालने की दो विधियाँ बताइए।
3. कृत्रिम पुनः आवेश के दो लाभ तथा दोष बताइये।

28.5 भूजल गुणवत्ता

भारत में विशेष कर पीने के पानी के स्रोत के रूप में भूजल की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। भूजल की अनेकों प्रकार की विशिष्ट विशेषताएँ हैं जिनमें मुख्यतः जल आपूर्ति स्त्रोत सबसे बड़ी है। इसकी मुख्य विशेषताएँ हैं:

1. सामान्यतः यह दूषित नहीं होता और इसे सीधे ही बिना किसी उपचार के पीने हेतु प्राप्त कर सकते हैं।

2. किसी एक स्थान से इस भूजल को अनेकों स्थानों पर उपलब्ध कराया जा सकता है जहाँ यह अधिकता से पाया जाता हो।

3. यह निर्भर (Dependable) है एवं सूखे का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

4. वृहत भंडारण, उपचार एवं वितरण को छोड़ा जा सकता है।

5. यह बिल्कुल भी महँगा नहीं है।

ऊपर दिए गए कारणों से ज्ञात होता है कि भारत की 85% जनसंख्या अपने घरेलू मांगों को पूरी करने के लिये भूजल पर आश्रित है। ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिगत जल पीने के पानी का एक महत्त्वपूर्ण मुख्य स्रोत है। भूजल, कृषि-सिंचाई एवं पशुओं के नहलाने दोनों के लिये अतिमहत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

औद्योगिक क्षेत्रों में भी भूजल की काफी मांग है। जैसे कि ऊपर इसकी विशेषताएँ बताई गई हैं भूजल के प्रयोग को प्राथमिकता दी जाती है।

कृषि, शहरीकरण एवं औद्योगिक कारखानों से उत्पन्न होने वाले अपशिष्टों के कारण भूमिगत जल की गुणवत्ता में खतरा पैदा हो रहा है। यदि एक बार यह अपशिष्ट पर्यावरण की उप-सतह के भीतर चला गया तो यह बहुत वर्षों तक अधिकांश भाग को अपनी चपेट में ले लेगा जिससे भूजल भी दूषित हो जाएगा और मानव के उपयोग के स्रोत के रूप में इसका प्रयोग नहीं किया जा सकेगा।

28.5.1 भूजल की गुणवत्ता में आयी कमी के कारण
भूजल गुणवत्ता में आयी कमी का सबसे बड़ा कारण मिलावट, जल के अतिदोहन या फिर इन दोनों के जुड़े होने के कारण की समस्या है। अधिकांश भूजल गुणवत्ता की समस्या का मुख्य कारण इनमें मौजूद तत्वों की पहचान ठीक प्रकार से नहीं हो पाने के कारण होती है क्योंकि ये तत्व सतह के नीचे छिपे रहते हैं। ये तत्व पानी में मुश्किल से घुल पाते हैं।

कई बार तो इन दूषित तत्वों की पहचान करना भी बड़ा कठिन हो जाता है। कई बार इनका समाधान काफी महँगा होता है, अधिक समय लेने वाला एवं हमेशा प्रभावी नहीं होता है। कई बार तो दूषण का पता लगाना काफी मुश्किल कार्य होता है जब तक कि वास्तव में उस प्रयुक्त जल में ये पदार्थ दिखाई नहीं पड़ते हैं। उसी समय प्रदूषण के कारण यह काफी बड़े क्षेत्र में फैल जाता है।

सभी प्रकार की प्रक्रियाएँ, शहरी, औद्योगिक या कृषि संबंधी भूजल को दूषित करने की क्षमता रखती है। उद्योगों से निकले अपशिष्टों, भूमि भरण रसायनों एवं संकटदायी अपशिष्टों का उप-सतह में प्रवेश करना ही भूजल प्रदूषण का महत्त्वपूर्ण स्त्रोत हैं। इन सांद्रित स्त्रोतों की आसानी से पहचान की जा सकती है एवं नियमित भी कर सकते हैं लेकिन इसके साथ सबसे कठिन समस्या प्रदूषण के विभिन्न स्त्रोतों के मिलने से होती है जैसे कृषि रसायनों एवं पशु-अपशिष्टों का निक्षालन, (Leaching) शौचालयों एवं सेप्टिक टैंकों से उपसतह पर पहुँचे डिस्चार्ज एवं शहरी प्रवाह से प्रदूषकों का अंतस्यंदन एवं वाहित मल जहाँ मल-जल नहीं पाया जाता है या उसे उपचारित किया गया हो।

विसरित स्त्रोत भी सम्पूर्ण जलभृत को प्रभावित करते हैं जिससे नियंत्रण एवं उपचार कठिन हो जाता है। प्रदूषण स्त्रोतों के विसरण का केवल एक ही इलाज है कि अन्तर्निहित भूमि का प्रयोग जल प्रबंधन के साथ किया जाय। तालिका 28.1 भूमि प्रयोग संबंधी प्रक्रियाओं एवं उनकी क्षमताओं का प्रयोग भूमिगत जल की गुणवत्ताओं के लिये उत्पन्न खतरों को दर्शाता है।

तालिका 28.1: भू-उपयोग गतिविधियाँ एवं उनसे भूजल गुणता में होने वाले दूष्परिणाम

भू-उपयोग

भूमिगत-जल प्रदूषण बढ़ाने वाले कारक

आवासीय गतिविधियाँ

  • अनसीवर (Unsewered) सफाई
  • सीवेज का भू एवं नहरों द्वारा निकासी
  • सीवेज ऑक्सीकृत करने वाले तालाब
  • सीवर का लीकेज, ठोस अपशिष्टों का निपटान, भूमि भरण
  • सड़क एवं नगरीकरण में बहाव, वायु में भी फैलना।

औद्योगिक एवं वाणिज्यिक गतिविधियाँ

  • प्रक्रमी जल, बहिर्बहाव लैगून
  • भू एवं झरनों में बहिर्बहावों के बहाने के कारण
  • कुओं द्वारा बहिर्बहाव का निष्कासन
  • वायु मार्ग द्वारा होने वाला बिखराव
  • जमीनों का भराव, ठोस अपशिष्ट एवं हानिकारक अपशिष्ट
  • कमजोर घरेलू रख-रखाव करने से
  • पदार्थों को संभालते समय लीकेज एवं बिखराव इत्यादि

खदानों द्वारा (खनन)

  • खुदाई के दौरान बहाने से
  • प्रक्रमी पानी, स्लज लगूनों द्वारा
  • ठोस खुदाई द्वारा अपदूषण
  • एकीकृत स्थानों पर तैलीय वस्तुओं का बिखराव

ग्रामीण क्षेत्रों में

  • कृषि रसायनों द्वारा जुताई के समय
  • अपशिष्टोयुक्त (दूषित) पानी से सिंचाई द्वारा
  •  मृदा के खारेपन से
  •  पशो के संवर्धन के द्वारा

तटीय क्षेत्रों में

  • खारे पानी के घुस जाने के कारण


28.5.2 भूमिगत जल में पाये जाने वाले सामान्य अपदूषण
1. नाइट्रेटः
पानी में घुलकर नाइट्रेट सामान्य रूप से भूमिगत जल को दूषित कर देता है। नाइट्रेट की अधिकता से बच्चों में ब्लू बेबी रोग (मीथेनोग्लोबिनेमिया) हो जाता है एवं कैंसरजनित्र बन जाते हैं एवं सतही जल को सुपोषण के लिये प्रेरित करते हैं। इसके स्त्रोतों में सीवेज, उर्वरक, वायु प्रदूषण, भूमि भरण एवं औद्योगिक स्थल इत्यादि शामिल है।

2. रोगजनकः ठीक प्रकार से रखरखाव न हो पाने के कारण एवं इसमें अपर्याप्त मात्रा में चारकोल का रिसाव से कुओं का जल दूषित हो जाता है जिसके कारण अच्छी गुणवत्ता वाला जल रोगजनकों से युक्त होकर दूषित हो जाता है और ठोस अपशिष्टों के डालने एवं नगर पालिका के अपशिष्टों के रिसाव के कारण जल रोगजनकयुक्त दूषण हो जाता है। बैक्टीरिया और वायरसों के कारण जल-जनित बीमारियाँ जैसे टॉयफाइड, हैजा, दस्त, पोलियो एवं हैपेटाइटिस इत्यादि रोग हो जाते हैं। इनमें भूमिगत जल में वाहित मल, भूमिभरण, सेप्टिक टैंकों एवं मवेशियों के आश्रय के कारण होने वाले निष्कर्षित पदार्थों से दूषित होता है।

3. धातु के अवशेषः इनमें पारा, कैडमियम, निकिल एवं सीसा शामिल होता है। ये धातुएँ जहरीली एवं कैंसरजन्य होती हैं। औद्योगिक रिसाव एवं खनिज का प्रवाह, तापीय ऊर्जा संयंत्रों से निकली फ्लाई ऐश भी भूमिगत जल में धातुओं की अधिकता को बढ़ावा देती है।

4. कार्बनिक यौगिकः कृषि में कार्बनिक मिश्रणों जैसे पीड़कनाशकों का प्रयोग करने से भूमि में उनका रिसाव होता है, जो पीड़कनाशकों से भूमिगत जल को प्रदूषित कर देता है।

पाठगत प्रश्न 28.5

1. खनन गतिविधियों के कारण किस प्रकार भूजल प्रभावित होता है?
2. भूमिगत जल को दूषित करने वाले दो तत्वों के नाम लिखो।
3. भूमिगत जल की गुणवत्ता में आई गिरावट के दो कारण बताइए।

28.6 भूजल की कमी का जोखिम

पानी की मांग सालों साल बढ़ती जा रही है एवं इससे जल की कमी विश्व के कई देशों में उठने लगी हैं। लगभग विश्व की 1/3 जनसंख्या अर्थात 2 अरब (विलियन) लोग भूजल पर निर्भर हैं। उथले जलभृतों से वैश्विक जल का लगभग 20% अर्थात 600-700 km3 या उससे अधिक वार्षिक दर से उपयोग में ला रहे हैं। इस समस्या के अत्यधिक बढ़ जाने से उत्पन्न होने का कारण होने वाली समस्या भूजल प्रदूषित होना है। भूजल की समस्या विश्व के अनेक क्षेत्रों में गंभीरता से बढ़ रही है। भूजल के निकालने की दर तीव्र गति से बढ़ने के कारण बहुत से जलभृतों में जल तालिका काफी निम्न स्तर पर चली गयी है जिसके कारण पानी के निष्कर्षण की दर उसके पुनःभरण की दर से अधिक है।

28.6.1 भूजल में आई कमी के कारण

भूजल संकट प्राकृतिक कारकों के कारण नहीं होता हैः

1. यह मानव क्रियाओं द्वारा उत्पन्न हुआ संकट है। पिछले दो दशकों में, भारत के बहुत से भागों में अत्यधिक मात्रा में पानी निकालने से जल स्तर बड़ी तेजी के साथ गिरा है। खाद्य एवं नकदी फसलों की सिंचाई हेतु बनाये गये बहुत से कुओं में जल का स्तर बड़ी तेजी से नीचे गिर रहा है। भारत की शीघ्रता से बढ़ती जनसंख्या व उसकी जीवन शैली में आये बदलाव के कारण घरेलू जल की आवश्यकता भी बढ़ रही है।

2. उद्योगों में पानी की बढ़ती आवश्यकता भी कुल मात्र में वृद्धि को दिखाती है। प्रचण्ड प्रतिस्पर्धा के चलते प्रयोगकर्ता कृषि, उद्योगों एवं घरेलू सेक्टरों में पानी के बढ़ते उपयोग से भूजल तालिका का स्तर कम हुआ है। भूजल की गुणवत्ता भी बुरी तरह से प्रभावित हुई है क्योंकि सतही जल का प्रदूषण काफी तेजी से फैल गया है। इसके साथ-साथ ठोस अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन भी भूजल को दूषित करता है, इसके कारण अलवण जल संसाधनों की गुणवत्ता में भी कमी आयी है।

3. सतही संग्रहण की तरह, भूजल का संग्रहण भी अत्यंत धीमी गति से होता है। भूजल के दो घटक हैं, एक स्थिर भाग एवं दूसरा गतिशील भाग जो वार्षिक पुनर्भरण के योग के कारण को बताता है। वार्षिक उपयोग की जरूरतों को पूरा करना जरूरी है। कमी वाले वर्षों में, जबकि स्थिर भाग के घटकों से निकाला गया जल पुनः प्राप्ति के साथ अगले आने वाले वर्षों के लिये उपयोग किया जा सकता है। स्थिर संग्रहण पर निर्भरता के लिये भूजल की अत्यधिक मात्रा का खनन होगा। आदर्शरूप से, भूमिगत जल की आयु जितनी सम्भव हो कम होनी चाहिए।

अधिक आयु का अर्थ यह होगा कि लंबे समय तक खनन किया जा सकता है।

28.6.2 जोखिम
भूजल की कमी भारत जैसे देश के सामने एक विकट समस्या है। भूमिगत जल ने भारत की सतत्पोषणीय हरित क्रांति में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उच्च उत्पादकता वाली किस्में जिनके कारण कृषि उत्पादकता बढ़ जाती है, में समय पर पानी की सिंचाई करनी पड़ती है। यह इस बात को भी बढ़ावा देता है कि किसान तकनीक एवं संस्थानात्मक आविष्कारों से भूमिगत संरचना के भूजल को न निकालें बल्कि उसे दूसरे किसानों के खेतों तक भी ले जाएँ जिसके कारण भूजल का बाजार काफी फल फूल रहा है।

1. इन क्षेत्रों में जल तालिका से कृषि निरंतरता को खतरा हो गया है। इसे बढ़ाने में सस्ती दर पर बिजली की आपूर्ति की नीतियों एवं उचित पानी के निष्कासन संबंधी सम्पत्ति अधिकारों का अभाव होता है।

2. वर्षा के दौरान, पानी की उपलब्धता अवक्षेपण के साथ-साथ प्राकृतिक एवं मानवजनित धारण क्षमता के रूप में होती है; जिसका परिणाम बाढ़ होती है। वर्षारहित मौसम के दौरान उच्च उद्वाष्पन से पानी की मात्रा में अत्यंत कमी आ जाती है। बाढ़ एवं सूखे जैसे हालात जल चक्र का निर्माण करते हैं। इसका कारण देश में तेजी से घट रहे वन आवरण हैं।

3. भूजल की आपूर्ति असीमित नहीं है ना ही यह हमेशा अच्छी गुणवत्ता में उपलब्ध होता है। कई परिस्थितियों में, भूमिगत जल का अत्यधिक मात्रा में निष्कर्षण कुओं के सूखने का कारण, खारी जल का निकलना एवं नदियों का सूख जाना होता है जो शुष्क मौसम में अपने प्रवाह को भूजल से प्राप्त करते हैं।

4. भूजल निकायों में पाया जाने वाला पानी मृदा में बहाव के कारण पुनः प्राप्त किया जा सकता है जो कि अक्सर एक धीमी प्रक्रिया है। भूजल पुनर्भरण की दर उस समय अधिक होती है जब वर्षा का जल मृदा में भर जाता है और उद्वाष्पोत्सर्जन कम होता है। जब जल तालिका काफी गहरे में भूमिगत होती है, जलभृत में पानी भी काफी पुराना होता है। इस जल का बहुतायत से प्रयोग जल आपूर्ति एवं सिंचाई के उद्देश्यों के लिये किया जाता है जो कि हजारों वर्षों पूर्व का हो सकता है। इस पानी का उपयोग जिसको कि वर्तमान जलवायुवीय पृष्ठभूमि में पुनर्भरित नहीं किया जा सकता है, भूजल खनन (Ground water mining) के नाम से जानते हैं।

5. भारत एवं बांग्लादेश में लाखों लोग भूमिगत जल के उच्च स्तर तक पाये जाने वाले आर्सेनिक की उच्च मात्रा स्तर, जो कि अत्यंत विषालु एवं खतरनाक प्रदूषक है, से पीड़ित है। भारत भी इससे प्रभावित है। ऐसा अनुमान है कि पश्चिम बंगाल में करीब 50 लाख लोग इससे पीड़ित हैं। अगली सीढ़ी पर बांग्लादेश जिसकी 120 मिलियन जनसंख्या में से आधी जनसंख्या अपने पीने के पानी में आर्सेनिक के बढ़े हुए स्तर के कारण पीड़ित है।

पाठगत प्रश्न 28.6

1. जल तालिका में गिरावट के दो कारण बताइए।
2. जल तालिका में कमी के दो कारण बताइए।
3. जल तालिका में कमी एवं भूजल के दूषित होने के दो जोखिमों को बताइए।

आपने क्या सीखा

1. पृथ्वी पर सभी अलवण जल का स्रोत वर्षाजल है।
2. वर्षा का पानी तालाबों, झीलों में इकट्ठा हो जाता है अथवा नदियों में बहता है इसे सतही जल कहते हैं।
3. वर्षाजल का भाग जो पृथ्वी की सतह से धीरे-धीरे रिसकर नीचे छिद्रित मृदा की सघन पर्तों एवं चट्टानों में चला जाता है, इस जल को भूजल कहते हैं।
4. बाहरी सतह से भूमि के अन्दर पानी की रिसने वाली क्रिया पुनर्भरण कहलाती है।
5. मृदा के अन्दर उस गहराई तक जिसमें पूरी तरह पानी से भरे छिद्रों की गहराई तथा जिस स्तर पर यह अवस्थित होता है, उसे जल तालिका कहते हैं।
6. भूजल का उपयोग घरों में, पशुपालन एवं सिंचाई के लिये काफी लंबे समय से होता आ रहा है।
7. सतही पानी वायुमंडल से प्रभावी होकर जल्दी दूषित हो जाता है जबकि भूजल पृथ्वी के अन्दर होने के कारण दूषित नहीं हो पाता।
8. कुओं, ट्यूबवैल, हैंडपम्प या झरनों इत्यादि के द्वारा भूजल का दोहन किया जाता है।
9. कृत्रिम पुनःभरण वह क्रिया है जिसमें सतही पानी को परोक्ष रूप से भूमि के अन्दर डाला जाता है या तो सतह पर फैलाकर, पुनर्भरण कुओं का प्रयोग करके, या फिर प्राकृतिक दशाओं के निस्यंदन के लिये बढ़ाकर एक जलभृत को पुनर्भरण द्वारा करते हैं।
10.कृत्रिम पुनःभरण को रिचार्ज पिट्स, शॉफ्ट, कुओं, खाईयों अथवा पानी के बेसिनों को फैलाकर प्राप्त किया जा सकता है। इसको स्ट्रीमबैड निस्यंदन या संयोजी कुओं को भरकर भी प्राप्त किया जा सकता है।
11. पुनःभरण क्रिया से जलभृत को निरन्तर प्रयोग में लाये जाने को बढ़ावा देने के लिये किया जाता है।
12. कृत्रिम पुनःभरण में भूमिगत जल की गुणवत्ता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है यदि इसका पुनःभरण दूषित जल भरने से हो।
13. पानी की बढ़ती मांग सालों-साल बढ़ती जा रही है एवं इस कारण विश्व के कई भागों ने इसकी कमी को बता दिया है।
14. भूमिगत जल दोहन के बढ़ते प्रभावों से भूमिगत जल का स्तर भी जल तालिका के निर्धारण बिन्दु से नीचे चला गया है जहाँ पर भूजल का निष्कर्षण उसके पुनर्भरण से अधिक हो गया है।
15. भारत के कुछ क्षेत्रों में भूजल का स्तर ज्यादा गिरने के कारण वहाँ खतरे की स्थिति पैदा हो गई है।
16. भूमिगत जल के अपक्षय के कारण पंम्पिंग कीम, कुओं एवं नदियों के सूखने के कारण एवं तटीय क्षेत्रों में भूजल में समुद्री जल का मिल जाना है।

पाठान्त प्रश्न
1. सतही जल एवं भूमिगत जल के मध्य तीन मुख्य अंतर बताइए।
2. जल तालिका क्या है?
3. आप भूजल को कैसे प्राप्त करोगे?
4. संक्षेप में बताइये कि पानी को घर पर कैसे बचाकर रख सकते हैं?
5. भारत में भूजल की मुख्य समस्याएँ क्या हैं?
6. भूजल के दूषित होने के प्राकृतिक एवं मानवजनित कारणों की विस्तार से व्याख्या कीजिए।
7. भूजल के कृत्रिम रूप से पुनर्भरण की पद्धतियों का वर्णन कीजिए।
8. भूजल के निरन्तर कमी के कारणों को बताइये।
9. भूजल की कमी के कारण होने वाले प्रभावों को बताइये।
10. पुनःभरण से जल की गुणवत्ता को कैसे बनाये रखा जा सकता है।

पाठगत प्रश्नों के उत्तर
28.1


1. पृथ्वी की सतह और इसके नीचे पाया जाने वाला पानी।
2. वर्षा के पानी का कुछ भाग जो धीरे-धीरे रिसकर भूमि की सतह से छिद्रित मृदा एवं चट्टानों की सघन पर्तों के भीतर चला जाता है।
3. भू-स्थिर जल से बना निकाय, जलभृत (एक्वीफर) कहलाता है।
4. जल तालिका भूमिगत सतह की ऊपरी परत होती है जिसमें मृदा या चट्टानें स्थायी रूप से पानी के साथ बनी रहती है।

28.2
1. क्योंकि यह उप-मृदा के विभिन्न स्तरों से मिलता है तथा यह दूषित नहीं होता एवं उपयोग करने में सुरक्षित होता है।
2. पाठ से देखें।
3. पाठ से देखें।

28.3
1. (क) (i) दांत साफ करते एवं दाढ़ी बनाते समय मग का प्रयोग करें।
(ii) पानी का कम प्रयोग करें।
(iii) साबुन एवं शैम्पू लगाते समय नल को बंद कर दें।
(ख) (i) पीने के पानी को फ्रिज में भंडारित करके रखें।
(ii) फलों एवं सब्जियों को बेसिन में धोयें (कोई अन्य)
2. भाग 28.3 देखें।
3. - घरों में जल बचाने वाले उपकरणों को लगवायें।
- पानी बचत योजना का विकास करें।
- पानी बचाने में कर्मचारियों, निवासियों एवं स्कूली बच्चों की मदद की जा सकती है। (कोई दो)

28.4
1. कृत्रिम पुनःआवेश ऐसी प्रक्रिया है जिसमें सतह पर उपस्थित पानी की अत्यधिक मात्रा को सीधे जमीन में प्रवेश करा दिया जाता है या तो सतह पर फैले पानी को पुनर्भरण कुओं द्वारा या फिर प्राकृतिक दशाओं में बदलाव करके अंतस्यंदन को बढ़ाकर।
2. इसमें पानी को फैलाकर, रिचार्ज पिट्स एवं शॉफ्ट अथवा खाईयां एवं पुनर्भरण कुओं द्वारा पानी को जमीन के अन्दर भेजा जाता है।
3. पुस्तक में भाग क्रमशः 28.4.3 एवं 28.4.4 देखें।

28.5
1. खान-ड्रेनेज डिस्चार्ज, ठोस माइन टेलिंग, प्रक्रम जल, स्लज लगून, तेल क्षेत्र रिसाव से समूह एकत्रीकरण स्टेशन इत्यादि द्वारा।
2. शहरी, औद्योगिक एवं कृषिकीय गतिविधियाँ (कोई दो)
3. अनसीवर सफाई, सीवेज, पानी के निकास की उपयुक्त व्यवस्था न होना, ठोस अपशिष्टों का निष्कासन, वायुवीय फाल आउट, लैण्ड-फिल अपशिष्ट, घर की खराब रखरखाव व्यवस्था इत्यादि।

28.6
1. मानवीय कारकों, औद्योगिक कारखानों में अधिकतम उपभोग तथा पृथ्वी द्वारा पानी सोखने की धीमी गति (कोई अन्य)
2. भूमिगत जल की तीव्र गति से होने वाली पम्पिंग के कारण, जल तालिका में तीव्र गति से होने वाली कमी/गिरावट
3. पाठ के भाग 28.6 को देखें।

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