ग्रामीण भारत में समावेशी विकास जरूरी

Submitted by editorial on Sat, 09/29/2018 - 17:30
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कुरुक्षेत्र, सितम्बर, 2018

देश की 68.84 प्रतिशत यानी 83.3 करोड़ आबादी गाँवों में ही निवास करती हैं। बेशक ग्रामीण आबादी की वृद्धि दर 2001 के 18.1 प्रतिशत से घटकर 2011 में 12.2 प्रतिशत रह गई है। लेकिन अब भी ग्रामीण आबादी ही बहुसंख्यक स्थिति में है। लिहाजा सरकारी नीति-निर्माताओं के लिये संवहनीय योजनाएँ बनाना जरूरी हो जाता है। सरकार और नागरिक समाज के बीच तालमेल होना चाहिए ताकि विकास समावेशी हो और इसके क्रम में संसाधनों का दोहन कम-से-कम किया जाये।


ग्रामीण विकासग्रामीण विकास‘धरती के पास हर आदमी की जरूरत को पूरा करने के लिये पर्याप्त संसाधन है। लेकिन उसके लोभ को पूरा करने के लिये हरगिज नहीं।’-महात्मा गाँधी

क्या ग्रामीण भारत में समावेशी विकास जरूरी है?

ब्रंटलैंड आयोग (Brundtland commission) की रिपोर्ट के मुताबिक अपनी जरूरतों को पूरा करने की, आने वाली पीढ़ियों की क्षमता को नुकसान पहुँचाए बिना, मौजूद आवश्यककताओं की पूर्ति करना ही संवहनीय विकास है। संयुक्त राष्ट्र ने भी सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य (Millennium Development Goals - MDG) के बजाय अब संवहनीय विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals - SDG) को अपना लिया है। उसने एसडीजी के 17 लक्ष्यों को पूरा करने के लिये 2016 से 2030 तक की समय-सीमा तय की है। बारहवीं पंचवर्षीय योजना के नतीजे बताते हैं कि भारत की विकास दर तो अच्छी रही मगर प्राकृतिक संसाधनों की तंगी भी है। इसलिये इन संसाधनों का दोहन समझदारी से करने की जरूरत है। विकास के बजाय संवहनीय विकास का चलन कोई नया नहीं है लगभग 40 साल पहले ही पता चल गया था कि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की रफ्तार उनकी भरपाई की दर से काफी ज्यादा है। संवहनीय विकास का मसला भी तब से ही हमारे बीच है। इस उत्तर आधुनिक विकल्प की जड़ें अर्वाचीन औद्योगिक समाज की आलोचना में हैं। यह समावेशी निवेश से समावेशी विकास को जोड़ने की प्रक्रिया है। शुरुआती बरसों में संवहनीयता के बारे में जोर प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण तक सीमित था। इसे विकास योजनाओं और संसाधनों के इस्तेमाल के बारे में स्थानीय समुदायों को जागरूक बनाने से जोड़ा नहीं गया था। प्रौद्योगिकी के उपयोग और संसाधनों के दोहन पर सवाल उठाए जा रहे थे। इससे बड़े उद्योगपतियों को यह प्रचार करने का मौका मिल गया कि संवहनीय विकास दरअसल प्रगति के ही खिलाफ है। उन्हें समाज विज्ञानियों और पर्यावरणविदों के बारे में यह दुष्प्रचार करने का अवसर मिल गया कि वे वंचित तबके को कंदराओं में ही रहता देखना चाहते हैं। इन तर्क-वितर्कों से ऐसा मकड़जाल पैदा हो गया जिससे निकलने और ठोस नीतियों के साथ सामने आने में बरसों गुजर गए। इस समूची बेमानी बहस में उस ग्रामीण क्षेत्र को बाहर ही छोड़ दिया गया जो ज्यादा संवेदनशील है।

वास्तव में भारत गाँवों में ही रहता है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश की 68.84 प्रतिशत यानी 83.3 करोड़ आबादी गाँवों में ही निवास करती हैं। बेशक ग्रामीण आबादी की वृद्धि दर 2001 के 18.1 प्रतिशत से घटकर 2011 में 12.2 प्रतिशत रह गई है। लेकिन अब भी ग्रामीण आबादी ही बहुसंख्यक स्थिति में है। लिहाजा सरकारी नीति निर्माताओं के लिये संवहनीय योजनाएँ बनाना जरूरी हो जाता है। सरकार और नागरिक समाज के बीच तालमेल होना चाहिए ताकि विकास समावेशी हो और इसके क्रम में संसाधनों का दोहन कम-से-कम किया जाये। अन्तरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (international fund for agricultural development - IFAD) 1999 से ही पूर्वोत्तरी सामुदायिक संसाधन प्रबन्धन परियोजना को धन मुहैया करा रहा है। इन दोनों ने संवहनीयता के चार पैमाने तय किये हैं- परिणामों की संवहनीयता, प्रक्रिया की संवहनीयता, आजीविका की संवहनीयता और संसाधनों की संवहनीयता। इस परियोजना ने इन वर्षों में दिखा दिया कि स्थानीय समुदाय को शामिल कर संवहनीय विकास किस तरह मुमकिन है। नीतियों के निर्धारण में महिलाओं को प्रमुख किरदार देकर और उन्हें लागू करने में उनकी भागीदारी सुनिश्चित कर व्यवस्था को ज्यादा पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जा सकता है।

विकास की मौजूदा प्रणाली में सरकार, औद्योगिक समूहों और स्थानीय समुदाय जैसे विभिन्न सम्बन्धित पक्षों के बीच काफी विभेद है। स्थानीय समुदाय को विश्वास में लिये बिना ऊपरी स्तर पर समझौते हो जाते हैं। झारखण्ड, ओड़िशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश जैसे प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण राज्य सामाजिक और मानवीय विकास के विभिन्न सूचकांकों में चोटी पर नहीं रहे हैं। दूसरी ओर दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश जैसे राज्य प्रगति के सूचकांकों के अलावा मानव विकास सूचकांक में भी शिखर पर हैं। प्राकृतिक संसाधन-बहुल राज्यों के पिछड़ेपन की वजह इन संसाधनों के दोहन की दर और राज्य इनके इस्तेमाल के बीच असन्तुलन है। बहुराष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय कम्पनियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं क्योंकि इनमें जमीन सस्ती और पानी प्रचुर मात्रा में है। इन कम्पनियों की वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। झारखण्ड के गोड्डा जिले में एक बड़ा औद्योगिक घराना एक बिजली संयंत्र लगा रहा है। इस संयंत्र में स्थानीय खदानों से निकलने वाले कोयले के इस्तेमाल से जो बिजली पैदा होगी उसे बांग्लादेश को बेचा जाएगा। इस तरह की परियोजनाएँ अपनी प्रकृति में दोहरा शोषण करने वाली होती हैं। समूचे अस्सी और नब्बे के दशक में विभिन्न राज्य सरकारों ने विकास के नाम पर कैप्टिव खदानों को बढ़ावा दिया। लेकिन इन खदानों ने अपने इलाकों के विकास में शायद ही कोई योगदान किया है। उच्चतम न्यायालय को 2014 में कैप्टिव खदानों के आवंटन को रोकने के लिये हस्तक्षेप करना पड़ा। इसी तरह 2003 में केरल में पलक्कड़ जिले के प्लाचीमाड़ा गाँव में महिलाओं ने कोका कोला कम्पनी की बॉटलिंग इकाई के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। इस संयंत्र की वजह से उनके कुएँ सूख रहे थे और जमीन प्रदूषित हो रही थी गुजरात में वापी औद्योगिक एस्टेट से 15 किलोमीटर दूर कोलक गाँव में 2000 में कैंसर की वजह से कई मौतें हुईं। पंजाब में हरित क्रान्ति के दौरान उत्पादन और उत्पादकता के लिहाज से बेहतरीन नतीजे हासिल किये। लेकिन इस क्रम में उर्वरकों और कीटनाशकों के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल के कारण उसे 30 साल बाद बंजर भूमि और कैंसर जैसी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। पश्चिम बंगाल में जमीन-जायदाद के कारोबारियों ने पोखरों तक को पाट दिया। इससे समूची स्थानीय पारिस्थितिकी में असन्तुलन पैदा होने के अलावा छोटे मछुआरों की आजीविका भी जाती रही। गाँवों में संसाधनों को बर्बाद किये जाने की ऐसी अनेक घटनाएँ प्रकाश में आई हैं।

कानूनी समाधान

पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिये 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की स्थापना की गई। वनों तथा उनमें रहने वाले आदिवासियों और घुमन्तू जातियों के हितों की रक्षा करना भी उसके कार्यक्षेत्र में आता है। एनजीटी के गठन के बाद से इस अधिकरण और पर्यावरण मंत्रालय ने संवहनीय विकास से जुड़े मसलों को विभिन्न स्तरों और मंचों पर उठाया है। अब किसी भी बड़ी परियोजना को शुरू करने से पहले पर्यावरण पर उसके समग्र प्रभाव का आकलन किया जाता है। पर्यावरण पर पड़ने वाला असर अब परियोजना के प्रस्ताव का हिस्सा होता है। जंगलों और अपनी आजीविका के लिये उन पर आश्रित रहने वाले मूल निवासियों के हितों की रक्षा के लिये 2006 में वन अधिकार कानून बनाया गया। इसे बनाते समय मध्य प्रदेश, ओड़िशा और छत्तीसगढ़ जैसे विशाल वन आच्छादन वाले राज्यों के वनवासियों के हितों को खासतौर से ध्यान में रखा गया। इस बात का ध्यान रखा गया कि ये आदिवासी विस्थापित नहीं हों तथा इंसान और प्रकृति के बीच मानवीय रिश्ता भी बना रहे।

कैसे मुमकिन है संवहनीय विकास?

संवहनीय विकास के लिये यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि गैर-नवीकरणीय संसाधन एक दिन खत्म हो जाएँगे। प्रदूषण करने वाले उद्योगों, प्राकृतिक संसाधनों के अन्धाधुन्ध दोहन और नीति निर्धारण की प्रक्रिया से स्थानीय समुदाय को अलग रखे जाने की सामाजिक कीमत पर भी गौर करना होगा। पश्चिमी देश यह सब भुगत चुकने के बाद अब संरक्षण और पुनर्जीवन की बात कर रहे हैं। भारत जैसे देशों को संवहनीय विकास योजनाओं को अपनाने को लेकर काफी समझदारी से काम लेना होगा। ग्रामीण विकास योजनाओं को बनाते समय इस बात का ध्यान रखना होगा कि विश्व की कुल आबादी का 17 प्रतिशत हिस्सा भारत में रहता है। भारतीयों में 35 प्रतिशत गरीब और 40 प्रतिशत अनपढ़ हैं। कृषि भूमि का 68 प्रतिशत हिस्सा सिंचाई के लिये वर्षा पर निर्भर है। इसके अलावा कुल जमीन का 69 प्रतिशत भाग शुष्क भूमि है। बारिश पर निर्भरता घटाने और भूजल स्तर को बढ़ाने के लिये वर्षाजल संचय को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जाना चाहिए। राज्य-स्तरीय केन्द्रीकृत योजनाओं के बजाय योजनाएँ स्थानीय स्तर पर विकसित की जानी चाहिए। चूँकि वन समितियों और ग्राम समितियोंं का लक्ष्य एक ही है इसलिये उनका विलय कर ग्राम पंचायतों के साथ उनका बेहतर तालमेल बनाया जाना चाहिए। कृषि के विविधीकरण और फसल खराब होने की स्थिति से निपटने के लिये आपात योजनाएँ तैयार करने की जरूरत है। स्थानीय जलवायु और माँग के अनुकूल फसलों को बोया जाना चाहिए मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों में सन्तुलन बनाए रखने के लिये कुट्टू और कोदो जैसे मोटे अनाजों की खेती फिर से शुरू की गई है। औद्योगीकरण की सामाजिक कीमत सबसे ज्यादा महिलाएँ ही चुकाती हैं इसलिये संवहनीय विकास योजनाओं में उन्हें प्रमुखता दी जानी चाहिए। अमर्त्य सेन, ज्यां द्रेज और महबूबुल हक ने सुझाव दिया है कि महिलाओं पर विकास के प्रभाव का आकलन करते समय जीवनचक्र के बजाय क्षमता का दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। संसाधनों का प्रबन्धन ग्राम समुदायों के साथ मिलकर करते हुए इन पर पहला अधिकार महिलाओं को दिये जाने की जरूरत है। रॉबर्ट पटनम का सामाजिक पूँजी का सिद्धान्त संवहनीय विकास का आधार बन सकता है। ग्रामवासियों को अपनी रिहाइश और प्राकृतिक पर्यावास की अन्तर-निर्भरता को समझना होगा। सरकार को उस पारस्परिकता और विश्वास के बारे में विचार करना होगा जो इसके जरिए निर्मित होता है।

निष्कर्ष

1992 में रियो डी जेनेरो में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन एक तरह से विकास नीतियों के सिलसिले में बदलाव का अग्रदूत था। समूचे विश्व में नीति निर्धारण का एक पूरी तरह से अलग दृष्टिकोण लागू किया गया। इसके तहत संवहनीय विकास के लिये पर्यावरण के साथ सामंजस्यपूर्ण रिश्ता स्थापित करना महत्त्वपूर्ण हो गया। विकास के शब्दकोश में पर्यावरणीय हिसाब-किताब को भी शामिल कर लिया गया। हमारे देश में 10 जैव-भौगोलिक क्षेत्र हैं जिनकी अलग-अलग विशिष्टताओं को बरकरार रखे जाने की जरूरत है। पर्यावरण मंत्रालय लुप्तप्राय प्रजातियों को शामिल करते हुए जन्तुओं और वनस्पतियों के आँकड़े प्रकाशित करता है। ज्यादातर ये आँकड़े सिर्फ संख्या बनकर रह जाते हैं जिनका इस्तेमाल सम्मेलनों और संगोष्ठियों में किया जाता है। इन आँकड़ों को उस समाज तक ले जाने की जरूरत है जिनसे वे आते हैं। ग्रामीणों को इन प्रजातियों के संरक्षण के बारे में जागरूक बनाए जाने की आवश्यकता है।

सरकारी पहल के सकारात्मक नतीजे

प्लास्टिक आधुनिक समय का अभिशाप है। लेकिन प्लास्टिक कचरे को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की मदद से सड़कों में तब्दील कर दिया गया है। मध्य प्रदेश इस प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल में सबसे आगे है। सिहोर जिले का पीपलिया धाकड़ प्लास्टिक से बनी सड़क वाला मध्य प्रदेश का पहला गाँव है। राज्य के अन्य जिलों में ऐसी 22 और सड़कें बनाई गई हैं।

महाराष्ट्र के सिंधू दुर्ग किले में एक स्थानीय गैर-सरकारी संगठन ने सरकार और यूएनडीपी के सहयोग से सैलानियों को अपना कूड़ा एकत्र करने के लिये जूट की थैलियाँ दी। क्षेत्र के मछुआरे भी अपना उत्पादन बढ़ाने के लिये समुद्र की सफाई कर रहे हैं।

यूएनडीपी ने नागालैंड सरकार के साथ मिलकर एक कार्यक्रम चलाया है जिससे 30 हजार हेक्टेयर जमीन की गुणवत्ता बरकरार रहने के अलावा 70 गाँवों की लगभग 7000 महिलाओं को लाभ पहुँच रहा है। इन पर्वतीय क्षेत्रों में झूम खेती की वजह से ऊपरी मिट्टी की उर्वरता घट रही थी। मगर बाँध निर्माण और जल-संरक्षण की बदौलत वे तीन साल तक उसी मिट्टी का इस्तेमाल कर पा रही हैं। इससे पृथ्वी का संरक्षण होने के साथ ही उनकी आमदनी में भी इजाफा हुआ है।

महाराष्ट्र में मालवन के मछुआरों ने नई तरह की चौकोर बुनावट वाली जाली का इस्तेमाल शुरू किया है। इससे उनकी आमदनी बढ़ी है और बिक्री के अयोग्य छोटी मछलियाँ जाल में फँसने के बजाय पानी में ही रह जाती हैं। क्षेत्र में मछुआरों की 17 हजार नौकाएँ हैं और चौकोर बुनावट वाले जाल का इस्तेमाल सबके लिये जरूरी कर दिया गया है।

छोटे गाँवों और देश के अंदरूनी हिस्सों से सफलता की ऐसी अनगिनत कहानियाँ सामने आ रही हैं। इन पहलकदमियों की कामयाबी के लिये सरकार के हस्तक्षेप और नागरिक समाज के सहयोग की दरकार है।

(लेखिका तनिमा दत्त लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, फगवाड़ा, (पंजाब) में सहायक प्रोफेसर हैं, जसपाल सिंह, नीति आयोग, नई दिल्ली में सलाहकार और अनुपमा रावत, बीआर अम्बेडकर समाज विज्ञान विश्वविद्यालय, महू (मध्य प्रदेश) में अर्थशास्त्र और कृषि विस्तार विभाग की प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष हैं।)


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