टिकाऊ पारिस्थितिक जलकृषि व्यवस्थाएँ एक परिचय

Submitted by editorial on Fri, 09/28/2018 - 11:07
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केंद्रीय समुद्री मात्सियकी अनुसंधान संस्थान कोची, केरल

मछली पालनमछली पालन पारिस्थितिकी जलकृषि यानि कि मानव स्वास्थ्य, दीर्घायु और सामुदायिक स्थिरता के लिये आवश्यक जलीय प्रोटीन का पैदावार हमारे ग्रहीय बौद्धिकता और सांस्कृतिक विरासत का अविभाज्य अंग, हमारे अतीत के आवश्यक अंग और भविष्य की पीढ़ी को भूमि के मूल्यवान एवं जटिल जलीय पारिस्थितिकी व्यवस्था में रहने के लिये महत्त्वपूर्ण अंग है।

जलकृषि विकास का एक अलग तरीका है पारिस्थितिकी जलकृषि, जो जलकृषि में परिस्थिति रूपरेखा के तकनीक पहलुओं और पारिस्थितिकी तत्वों को जोड़ती है और इसके साथ-साथ सामाजिक परिस्थिति, सामुदायिक विकास की योजना और जलकृषि के व्यापक सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय स्थितियों को भी सम्मिलित कराती है। पारिस्थितिक जलकृषि जलकृषि के आर्थिक और सामाजिक लाभ की योजना और मूल्यांकन करती है। टिकाऊ सामुदायिक विकास के रूप में जलकृषि को सुधार करने के लिये विज्ञान और प्राकृतिक एवं सामाजिक परिस्थिति के व्यवहारों को उपयुक्त किया जाता है। पारिस्थितिकी जलकृषि वहाँ के प्राकृतिक और सामाजिक पर्यावरण को परिरक्षित और उन्नयन करने वाले जलीय पालन आवास तंत्रों की योजना, रूपायन, विकास, अनुवीक्षा और मूल्यांकन करती है। पारिस्थितिकी जलकृषि स्थान 'जलकृषि आवास तंत्र' हैं।

जलकृषि विभिन्न खाद्य, संसाधान, परिवहन और समाज के अन्य सेक्टरों पर आश्रित है। जलकृषि आवास तंत्र मूल्यवान, अप्रदूषित मलिन जल और मछली अपशिष्ट बनाते हैं, जो परिस्थिति के अनुकूल रूपायित जलीय एवं स्थलीय पारिस्थितिकी पालन व्यवस्थाओं में प्रमुख उत्पादक सामग्री बन जाती हैं। समाज के सभी स्तरों में सामाजिक उद्यमिता, पारिवारिक पालन खेत या सामुदायिक परिचालन के रूप में इस तरह के एकीकृत खाद्य उत्पादन व्यवस्थाओं का रूपायन या आयोजन किया जा सकता है। खाद्येतर यानि कि प्राकृतिक आवास तंत्र पुनर्वास सुधार और उन्नयन में भी पारिस्थतिकी जलकृषि प्रमुख भूमिका निभाती है। पारिस्थितिक जलकृषि परिस्थिति विज्ञान को समेकित करके, परिष्कृत ज्ञान पर आधारित तरीके से प्रौद्योगिकीय सूचनाओं को साझा करके भौगोलिक बाजारों में सामाजिक एवं पर्यावरणीय लागतों को मिलाकर नवपरिवर्तन और दक्षता को प्रोत्साहित करती है। इस तरह पारिस्थतिकी जलकृषि केवल समुद्री खाद्य उत्पादन और आर्थिक लाभ के लिये नहीं, बल्कि व्यापार, शिक्षा और सामुदायिक प्रबंधन कार्यों को प्रोत्साहित करने वाले सामाजिक पूँजी और सामाजिक नेटवर्क का विकास करते हुए सामाजिक लाभ की योजना बनाती है।

जलकृषि में पारिस्थितिक अभिगम
वर्ष 2006 में एफएओ (Food and Agriculture Organization) के मात्स्यिकी एवं जलकृषि विभाग ने उत्तर दायित्व पूर्ण मात्स्यिकी के लिये आचरण संहिता के समान जलकृषि के लिये परिस्थिति पर आधारित प्रबंधन तरीका विकसित करने की आवश्यकता को पहचाना था। एफएओ ने यह सुझाव दिया कि जलकृषि के पारिस्थितिकीय तरीके में तीन प्रमुख लक्ष्य हैं : मानव कल्याण, पारिस्थतिकीय कल्याण और प्रभावकारी नियंत्रण से, खेत के, क्षेत्रीय और भौगोलिक स्तर पर मापन योग्य पदानुक्रम ढांचे में दोनों से प्राप्त करने की क्षमता।

वर्ष 2008 में एफएओ ने जलकृषि में पारिस्थतिक अभिगम का निर्वचन किया 'टिकाऊ विकास, समता और आपस में संबंधित सामाजिक पारिस्थितिक तंत्र के लचीलापन को प्रोत्साहित करने वाले व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र के अंदर जल कृषि का एकीकरण करने की रणनीति’ जल कृषि में पारिस्थितिक अभिगम पूरे स्टेकहोल्डरों (पणधारियों) के परास, प्रभाव के क्षेत्रों और आपस में संबंधित सभी प्रक्रियाओं का विवरण देता है। परिस्थिति पर आधारित अभिगम के लिये सामुदायिक विकास के भाग के रूप में जलकृषि पर प्रभावित होने वाले व्यापक सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय क्षेत्रों में पणधारियों को विचार करते हुए भौतिक पारिस्थितिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्थाओं की योजना बनाने की आवश्यकता है। जलकृषि में पारिस्थितिक अभिगम के लिये एफएओ ने समाज के विभिन्न स्तरों पर तीन सिद्धांतों और मुख्य मामलों पर प्रकाश डाला है।

सिद्धांत 1: 'परिस्थिति प्रक्रियाओं और सेवाओं (जैवविविधता सहित), जिनकी लचीलापन क्षमता को अवनति लाने के बिना जलकृषि का विकास किया जाना है।' इस पर मुख्य मामला 'स्वीकार्य पर्यावरणीय परिवर्तन' की सीमाओं का आकलन करना है। पर्यावरणीय परिवर्तन की सीमाओं का आकलन करने के लिये कई मदों जैसे 'पर्यावरणीय धारिता क्षमता', 'पर्यावरणीय क्षमता', 'परिस्थिति प्रक्रियाओं की सीमाएँ', 'पारिस्थितिकी स्वास्थ्य', 'परिस्थिति एकीकरण' और 'पूर्णत: क्रियाशील परिस्थिति' का उपयोग किया जाता है, जो विशेष सामाजिक / सांस्कृतिक / राजनीतिक संदर्भों से संबंधित है। पूर्वोपाय अभिगम लेना भी मुख्य है लेकिन यह अपर्याप्त है और जलकृषि के निर्णायकों द्वारा इसका दुरुपयोग किए जाने की संभावना है, पूर्वोपाय के अलावा जलकृषि में जोखिम के निर्धारण को व्यापक प्रचार मिलता जा रहा है।

सिद्धांत 2: 'जलकृषि से मानव की भलाई में सुधार होना चाहिए और सभी प्रासंगिक पणधारियों में समानता होनी चाहिए।' जलकृषि से विकास कार्यों में समान अवसर प्रदान किया जाना चाहिए, जिससे इसके लाभ के सभी तलों, विशेषत: स्थानीय गरीब लोगों के बीच बाँटा जा सकेगा। जलकृषि को मानव की भलाई, विशेषत: विश्व के विकासशील देशों के लोगों की भलाई के दो प्रमुख घटकों के रूप में खाद्य सुरक्षा एवं खाद्य संरक्षण को प्रोत्साहन देना चाहिए। जलकृषि में लगे हुए लोगों के आजीविका स्तर में बढ़ावा लाने योग्य होनी चाहिए, जिससे इस स्तर के लोगों का सामाजिक उन्नयन हो सकता है। जलकृषि से आबादी के कुछ प्रतिशत लोगों को आजीविका प्रदान करना भी चाहिए।

सिद्धांत 3: अन्य सेक्टरों, नीतियों और उपलब्धियों की तरह जलकृषि का विकास भी किया जाना चाहिए। जलकृषि और इसके आस-पास के प्राकृतिक और सामाजिक पर्यावरण के बीच का संबंध भी पहचाना जाना चाहिए। जलकृषि में भी मानवीय गतिविधियों की तरह छोटा संघात होगा, उदाहरण के लिये कृषि और उद्योग। सामग्रियों और ऊर्जा के पुन: चक्रण के प्रोत्साहन और सामान्य तौर पर संपदाओं के बेहतर उपयोग के लिये जलकृषि गतिविधियों को अन्य प्राथमिक उत्पादन सेक्टरों के साथ मिलाने के लिये कई अवसर हैं।

समाज के विभिन्न स्तरों पर पारिस्थितकी जलकृषि अभिगम का प्रयोग
जलकृषि में पारिस्थितिकी अभिगम की प्रगति की योजना और निर्धारण करने के लिये तीन भौतिक मापन प्रमुख हैं, जो हैं फार्म, जलक्षेत्र / जलकृषि मेखला और वैश्विक मापन। इन में हर एक को प्रमुख योजना और निर्धारण की आवश्यकताएँ अनिवार्य हैं।

फार्म मापन
जलकृषि फार्मों की योजना आसानी से की जा सकती है। ये फार्म पालन व्यवस्था की सीमा से कुछ मीटर की दूरी पर होना चाहिए। फिर भी फार्मों (उदाहरण : बड़े पैमाने का चिंगट पालन / मछली पालन) के गहनता और आकार बढ़ जाने से जलखंड के उपतल सहित पूरे जलाशय या जल क्षेत्र को प्रभावित किया जाएगा। फार्म में पारिस्थितिकी जलकृषि अभिगम के निर्धारण के लिये योजना का मूल्यांकन और पारिस्थितिकी, आर्थिक और सामाजिक कार्यक्रमों का कार्यान्वयन व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र और फार्म स्तरीय जलकृषि विकासों, जिनमें बेहतर (उत्कृष्ट) प्रबंधन प्रक्रिया, पुन:स्थापन, उपचार और शमन कार्य भी सम्मिलित हैं, के संघातों को मानते हुए किया जाना आवश्यक है।

उचित प्रकार के स्थान चयन, उत्पादन, गहनता के स्तर, मछली जातियों (विदेशी या देशज) के उपयोग, उचित पालन व्यवस्था प्रौद्योगिकियों के प्रयोग तथा फार्म स्तर पर आर्थिक और सामाजिक संघातों के ज्ञान पर भी विचार किया जाना चाहिए। जलकृषि में बडे़ पैमाने के जलकृषि उद्योग की तरह कई मामले होती हैं। वर्तमान जलकृषि विकास से संबंधित मामलों में व्यापक रूप से प्रचलित पारिस्थितिकी जलकृषि, वर्ष 2050 तक प्रलंबित, की प्रगतियों द्वारा परिवर्तन किया जा रहा है, जो यह सुनिश्चित करता है कि बड़े पैमाने की जलकृषि पारिस्थितिक पूर्णत: जलकृषि अभिगम की ओर जा रही है।

जलक्षेत्र / जलकृषि मेखलाओं का मापन
जलक्षेत्र / जलकृषि मेखलाओं में पारिस्थितिक जलकृषि अभिगम के मापन की योजना सामान्य पारिस्थितिकी तंत्र और रोगों, संतति और खाद्यों के विपणन, जलवायु और स्थल की स्थितियों, शहरी/ग्रामीण विकासों आदि जैसे सामाजिक मामलों की तरह प्रासंगिक है। इस स्तर पर पारिस्थितिक अभिगम के निर्धारण के लिये दो स्तर होते हैं। स्तर I में (i) जलकृषि को क्षेत्रीय शासन ढांचे में सम्मिलित कराना, उदाहरणार्थ समेकित तटीय मेखला प्रबंधन या समेकित जलक्षेत्र, भूमि की पानी संपदा प्रबंधन की योजना और कार्यान्वयन किया जाना। वर्तमान परिवेशों, उपयोक्ता स्पर्धा और भूमि तथा जल के उपयोग और मानव विकास के लिये विकल्पों की तुलना के आधार पर निर्धारण किया जाना चाहिए। (ii) क्षेत्रीय स्तर पर जलकृषि के संघात यानि कि पलायन करने वाले लोग, रोग प्रसारण और जलकृषि के प्रदूषण के स्रोत और (iii) धंधा और आर्थिकी जलकृषि पर साध्य हितकारी बहुगुणीय संघातों की व्यापक योजना जैसे सामाजिक विचार और देशीय समुदायों पर जलकृषि संघांतों पर विचार सम्मिलित हैं।

स्तर II में जलक्षेत्र / जलकृषि मेखलाओं में पारिस्थितिक जलकृषि अभिगम के कार्यान्वयन की प्रगति का निर्धारण इस प्रकार किया जा सकता है कि (i) पारिस्थितिक जलकृषि को सम्मिलित करने के लिये तटीय और जलीय गवर्नेंस के नए तरीकों का कार्यान्वयन (ii) जलकृषि और जलीय पारिस्थितिकी को अधिक साकल्यवादी रूप से यानि की संसूचना, सहकारिता और विविध सेक्टरों के बीच सहयोग के साथ संघात करने वाली कार्यविधियों पर विचार और प्रबंधन के लिये उत्तरदायी एजेंसियों को अनुमति देने वाले अभिगमों का विकास और (iii) जलकृषि की शिक्षा, अनुसंधान और नए आविष्कारों और सहभागिताओं को विकसित करने वाले पारिस्थितिकी जलकृषि प्रबंधन मेखलाओं एवं पार्कों का रूपायन करना और एकीकृत जलकृषि, बहुकृषि या नवोन्मेषी, एकीकृत जलकृषि-मात्स्यिकी व्यवसायों और अभिगमों जैसे सीमांकित मेखलाओं को अनुमति देने में विशेष ध्यान देना।

वैश्विक मापन
वैश्विक तौर पर पारिस्थितिकी जलकृषि अभिगम की योजना में वैश्विक मालों (उदाहरण: सालमन और चिंगट) के अन्तरराष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय मामलों का विचार किया जाता है। वैश्विक स्तर पर पारिस्थतिकी जलकृषि अभिगम की प्रगति का निर्धारण करने में जलकृषि खाद्य के रूपायन के लिये मात्स्यिकी और जलकृषि खाद्य स्टॉक की उपलब्धता एवं दूरव्यापक समुद्री और सामाजिक परिस्थिति पर होने वाले संघात, मात्स्यिकी और कृषि संपदाओं पर जलकृषि के सामाजिक संघात, बाजारों पर जलकृषि का संघात और सामाजिक स्थिरता (सामाजिक पूँजी, माल और सामाजिक अवसर) पर वैश्वीकरण का संघात जैसे मामलों का मूल्यांकन आवश्यक है। जलकृषि मालों के जीवनचक्र जैसे उपायों का प्रयोग और नवोन्मेषी सामाजिक उद्यमों के प्रबंधन के मार्गदर्शन का प्रयोग वैश्विक स्तर पर संघात निर्धारण करने के लिये उपयोगी हैं।

पारिस्थतिकी जलकृषि में सफलता की कहानियाँ हैं (i) चीन, वियतनाम, इन्डोनेशिया और भारत के मिलियन ग्रामीण लोगों को हितकारी चावल मछली पालन, चावल मछली पारिस्थितिकी जलकृषि को 'वैश्विक प्रमुख कृषि विरासत व्यवस्था' के रूप में अभिहित किया गया है। (ii) चीन, थाईलैंड, कम्बोडिया, वियतनाम और इन्डोनेशिया में प्रचलित एकीकृत जलकृषि मिलियनों लोगों के लिये हितकारी है। (iii) चीन और कनाडा में मछली, कवच मछली और समुद्री शैवालों की एकीकृत बहु पौष्टिकता युक्त जलकृषि जैव उपचार सहित और लगभग 50 प्रतिशत फसल लाभ बढ़ाने युक्त है और (iv) कनाडा और यूएस में कवच मछली जलकृषि को पर्यावरण अनुकूल और सामाजिक तौर पर स्वीकार्य रीति के रूप में अधिक स्वीकार्यता प्राप्त हुई है।

आवास व्यवस्था और जलकृषि
जलकृषि को परिस्थिति अभिगम को स्वीकार करने, पारिस्थितिकी सिद्धांतों और तरीकों का प्रयोग करने, परिस्थिति पर आधारित प्रबंधन अवधारणाओं और मार्गनिर्देशों को सम्मिलित करने और रूपायन, परिचालन एवं सूचनाओं में व्यवस्था परिस्थिति, पारिस्थितिकी प्रतिमान और पारिस्थितिकी अर्थविज्ञान का प्रयोग करने की आवश्यकता है। इस तरह के मार्गनिर्देशों और उपायों का प्रयोग करने से उत्पादनशील जलकृषि व्यवस्थाओं के रूपायन की साध्यताएँ बढ़ जाती है, क्योंकि जलकृषि से जीव-जाति, पर्यावरण और संस्कृति की व्यापक उपलब्धता होती है। एशिया में भूमि और पानी पर आधारित सुविकसित जलकृषि परिस्थितियों के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं। जलक्षेत्र/जलकृषि मेखला मापन में पारिस्थितिकी जलकृषि अभिगम के अच्छे उदाहरण इज़राइल और ऑस्ट्रेलिया से मिल सकते हैं। दोनों राष्ट्र भूमि, पानी और ऊर्जा की कमियों का सामना करते हैं।

इज़राइल में उच्च क्षमता वाले जलाशयों में जलकृषि तथा खेती और समुद्री जातियों के पालन के लिये भूमि पर आधारित अत्यधिक उत्पादन क्षमता वाले जलकृषि व्यवस्थाओं का विकास किया गया है। ये जलकृषि व्यवस्थाएँ अधिक उत्पादनशील और अर्ध गहन उद्यम हैं, जो पानी एवं भूमि में सक्षम भी हैं और इसके साथ-साथ ये एग्रो इकोलॉजी और एग्रो इकोसिस्टम के समान सिद्धांतों का अनुपालन करने हैं। ऑस्ट्रेलिया में पारिस्थितिक स्थिरता विकास की ढांचा विकसित करने के लिये राष्ट्रीय प्रयास के रूप में जलकृषि विकास का अभियान शुरू किया गया है।

जलकृषि में संपदा उपयोग की क्षमताएँ
पिछले दशक के दौरान एशिया के प्रमुख जलकृषि उत्पादन केंद्रों, विशेषत: चीन, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, थाईलैंड और भारत में भूमि क्षेत्रों की कमी की वजह से जलकृषि के विकास में दुविधा की समस्या महसूस की जाती है। कुछ क्षेत्रों में (विशेषत: चीन में), जहाँ पूँजी उपलब्ध है, कम भूमि (और कम पानी) और पेलेट खाद्य के रूपायन के लिये आयातित खाद्य सामग्रियां उपयुक्त करके गहन जलकृषि व्यवस्थाएँ विकसित की गयी हैं। अर्ध गहन और गहन जलकृषि व्यवस्थाओं में भूमि उपयोगिता की क्षमता भूमि पर आधारित जलकृषि उत्पादन व्यवस्थाओं में उच्चतम है, जहाँ 100 वर्गमीटर के क्षेत्र की भूमि से मीट्रिक टन (एम टी) उत्पादन किया जाता है।

हाल ही में स्थलीय कृषि प्रोटीन उत्पादन व्यवस्थाओं की तुलना में तालाबों की भूमि उपयोगिता उच्चतम देखी गयी है। कई देशों में चावल के खेतों को मछली पालन तालाबों के रूप में परिवर्तित किया जाता है। भविष्य में, शहरीकरण की वजह से सारे भूमि की उपयोगिता की जाएगी और इस से पिंजरा व्यवस्थाओं में पानी का संघर्ष होने की संभावना होगी और जलमग्न पालन व्यवस्थाओं का उपयोग करना पड़ेगा। छोटे जल निकायों, जलाशयों और तटीय खुले समुद्र में पिंजरों का उपयोग प्रचलित है, लेकिन समुद्री क्षेत्रों में जलमग्न पालन व्यवस्थाओं का उपयोग साधारण देखा गया है। स्थलीय उत्पादन की अपेक्षा गहन पुन:चक्रण व्यवस्थाएँ अत्यधिक सक्षम है। एकीकृत पालन व्यवस्थाएँ और भी अधिक साधारण हो जाएँगी।

पानी का उपयोग
गहन, पुन:चक्रण जलकृषि व्यवस्थाएँ अधिक सक्षम पानी उपयोगिता व्यवस्थाएँ हैं। विस्तृत जलकृषि तालाब व्यवस्थाएँ और गहन स्थलीय जंतु उत्पादन व्यवस्थाएँ सब से कम सक्षम देखी गयी हैं। जलकृषि में पानी का उपयोग प्रति मछली उत्पादन के लिये 45 मी3 की दर में उच्चतम है। जलकृषि में पानी के उपयोग की क्षमता स्थानीक व्यवस्थाओं की अपेक्षा अधिक है। भौगोलिक रूप से जंतु खाद्य में उपयुक्त किए जाने वाले एक किलोग्राम धान के उत्पादन के लिये लगभग 1.2 मी3 (या 1200 लीटर) पानी की जरूरत है। एक किलोग्राम तिलापिया के उत्पादन के लिये मीठा पानी के उपयोग के बिना (पिंजरा, समुद्री पानी पालन व्यवस्था) या केलव 50 लीटर मीठा पानी आवश्यक है। समुद्री जलकृषि व्यवस्थाओं (समुद्र कृषि) में खेती के लिये अनुचित पश्चजल का उपयोग किया जा सकता है और एकीकृत या भूमि पर आधारित लवण जल पालन रीति भी अपनाई जा सकती है।

पानी के उपयोग की प्रवणताएँ
पिछले दशक की अपेक्षा स्थलीय कृषि प्रोटीन उत्पादन व्यवस्थाओं में पानी का अधिक उपयोग किया गया था। एशिया में शहरीकरण की वजह से तटीय शहरों और खेती के लिये पानी का अधिकाधिक उपयोग किया जाता है। वर्ष 2050 होने तक उच्च स्थानों के बांधों से नीचे स्थानों के उपयोक्ताओं तक पानी पर्याप्त रूप से नहीं मिलेगा, मीठे पानी की कमी की वजह से जलकृषि उत्पादन क्षेत्रों, विशेषत: तालाबों के निकट अनावृष्टि या अकाल होने की साध्यताएँ बढ़ती जाएगी और इसके साथ-साथ खुले समुद्र में पिंजरा व्यवस्थाओं के द्रुत विकास, लागतों की घटती और गहन, तालाबों एवं स्थलीय जंतु उत्पादन व्यवस्थाओं की अपेक्षा पुन:चक्रण व्यवस्थाओं की पानी के उपयोग की क्षमता, मिश्रित जलाशयों के लैन्डस्केप व्यवस्थाओं की जलकृषि/खेती, एशिया में बड़े पैमाने पर भूमि का परिवर्तन करने से परंपरागत चावल / मछली पालन व्यवस्थाओं का बदलाव, चावल की खेती के बदले उच्च मूल्य वाली जीव जातियों (चिंगट) का पालन, बंजर भूमि में समुद्रजल पालन व्यवस्थाओं का विकास आदि प्रवणताएँ भी बढ़ने की सम्भावनाएँ हैं।

ऊर्जा के उपयोग की प्रवणताएँ
पिछले दशक के दौरान भौगोलीकरण और खाद्य उत्पादन की अधिकता से मत्स्यन और स्थलीय कृषि प्रोटीन उत्पादन व्यवस्थाओं की अपेक्षा ऊर्जा के उपयोग में ज्यादातर वृद्धि हुई है। वर्ष 2050 में, पुन:चक्रण व्यवस्थाओं, जो अन्य व्यवस्थाओं की तुलना में अधिक ऊर्जा का उपयोग करती हैं, से अधिक मात्रा में कार्बन उत्सर्जन, जीवन चक्र निर्धारण से जलकृषि में होने वाले लाभ / नुकसान, बड़े पैमाने में विकास कार्य और लागत अनुकूल बदलने योग्य ऊर्जा व्यवस्थाओं के उपयोग से गहन पुन: चक्रण व्यवस्थाएँ अधिक व्यापक और स्वीकार्य हो जाएँगी।

संपदा आवंटन तथा उपयोग
यह आकलन किया जाता है कि पिंजरा जलकृषि सुविधाओं से विश्व के महासागरों में कुल नाइट्रोजन का -7 प्रतिशत और कुल फास्फोरस का -10 प्रतिशत उत्सर्जन होता है और तटीय एवं नितलस्थ जलीय आवास व्यवस्था के विनाश के लिये अनुचित रूप से स्थापित पिंजरा स्थानों पर दोष लगाया जाता है। लेकिन अगर समुद्री घास (पोसिडोनिया ओशियानिका) के संस्तरों के ऊपर समुद्री बांस/ब्रीम का पिंजरा स्थापित किए जाएँ तो इस जलकृषि के उत्सर्जन के प्रति समुद्री घास की अनुकूल प्रतिक्रिया होती है और इससे नितलस्त जैवविविधता पर कोई संघात नहीं होता है। इस परीक्षण से यह व्यक्त होता है कि इकोलॉजिकल इंजीनियरिंग द्वारा द्वोष रहित रूप से इस क्षेत्र में मछली उत्पादन के लिये आवास व्यवस्था पर अनुकूल पिंजरा जलकृषि और इससे पर्यावरण सुधार भी साध्य है। जलकृषि से पौष्टिक (विशेषत: नाइट्रोजीनस घटकों) उत्सर्जन के उपचारी उपाय के अतिरिक्त मानव उपभोग एवं पर्यावरण तथा कृषि के सुधार के लिये उच्च मूल्य वाले जलीय फसलों के उत्पादन के लिये व्यापक तरह की प्रौद्योगिकियों और जीवों का उपयोग किया जा सकता है।

गहन, एकीकृत तटीय पालन व्यवस्थाएँ
चीन के कई क्षेत्रों में साधारण बन गयी हैं जहाँ समुद्री एकीकृत व्यवस्थाओं की दो प्रमुख विधाएँ हैं मछली पालन पिंजरों के साथ समुद्री शैवाल पालन और लटकी हुई कवच मछली जलकृषि। चीन में चिंगटों के साथ शंबु और सीपियों के साथ केंकड़ों का पालन भी प्रचलित है। इस पालन रीति से प्रति वर्ष प्रति हेक्टेयर से लगभग 300-600 किलोग्राम चिंगट का उत्पादन किया जाता है। यह पालन रीति उचित प्रकार प्रबंधन किया हुआ है और इसे विश्व व्यापक तौर पर पारिस्थितिक गहनता के उदाहरण के रूप में दिखाया जा सकता है।

निष्कर्ष
विश्व के गरीब लोगों के हितों के लिये जलकृषि में उपयुक्त की जाने वाली भौगोलिक रणनीति में (1) विश्व व्यापक रूप से गरीबी हटाने और मानव जरूरीयों के लिये अधिक मछली का आवंटन, इस प्रकार फेड अक्वाकल्चर के लिये कम आवंटन, जिससे: (क) हमबोल्ट परिस्थिति के पारिस्थितिक लचीलान में वृद्धि और (ख) दक्षिण पूर्व के पैसिफिक महासमुद्र के परिस्थिति पर थाईलैंड जैसे देशों की जलकृषि (चिंगट) और नॉर्वे (सालमन) की अतिनिर्भरता कम करना। आल्डर आदि (2006) ने आंकलित किया कि विश्व की मात्स्यिकी पकड़ का 36 प्रतिशत (30 मिलियन टन) मछली, मुर्गी और सुअर पालन में खाद्य देने के लिये मछली खाद्य एवं तेल निर्माण के लिये संसाधित किया जाता है। (2) जलकृषि में मछली खाद्य और तेल की उपयोगिता खत्म करने की क्षमता होने वाले प्रकार्यात्मक आहार पदार्थों को स्पष्ट करने लायक अनुसंधान में तेजी लाना। (3) कृषि, शैवाल, जीवाणु, किण्वन आहार और तेलों के उपयोग को त्वरित करने लायक बदल पारिस्थितिक जलकृषि प्रतिरूपों का विकास करना आदि मुद्दे सम्मिलित हैं।

आगामी 20 वर्षों के दौरान एकीकृत खेती जलकृषि पालन व्यवस्था अभिगमों की गहनता एवं व्यापक तौर पर स्वीकार्यता द्वारा भूमि, पानी, आहार, संतति और ऊर्जा के सक्षम उपयोग में वर्धन देखा जा सकता है।

 

 

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