स्वच्छता के संवेदनात्मक और वैचारिक पक्ष

Submitted by Hindi on Mon, 12/11/2017 - 16:10
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पाँचवाँ स्तम्भ, नवम्बर-दिसम्बर, 2017

आज पूरे एक सौ एक वर्ष बाद उन लोगों और परिवारों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो अपने बच्चों को तीन वर्ष की आयु से ही अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने वाले स्कूलों में प्रवेश पाने के लिये जमीन-आसमान एक करने को तैयार होते हैं।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिये किए गए पंडित मदन मोहन मालवीय के समाज के हर वर्ग से सहयोग ले सकने की अद्भुत क्षमता के कारण आज भी लोगों को आश्चर्य में डाल देते हैं। इसके उद्घाटन समारोह में वाइसराय लार्ड हार्डिंग के अलावा देश के उस समय के राजे-महाराजे भी अपनी पूरी शान-शौकत के साथ शोभायमान थे। इस समारोह में 3 अक्टूबर, 1916 को मोहनदास करमचंद गाँधी का ऐतिहासिक भाषण हुआ। तब वे महात्मा नहीं बने थे। दक्षिण अफ्रीका में उनके काम की सराहना सारे विश्व में हो चुकी थी, अतः वे भारत में भी सम्मानीय के रूप में स्वीकार्य हो चुके थे। उनका वह भाषण आगे आने वाले समय में उनके स्थान और सम्भावित योगदान को पूरी तरह इंगित कर देता है। सबसे पहले उन्होंने छात्रों को सम्बोधित कहा कि आध्यात्मिक जीवन का सन्देश, जिसके लिये भारत जाना जाता है और जिसमें उसका कोई सानी नहीं है, केवल भाषणों से नहीं दिया जा सकता है।

पिछले दो दिनों के भाषणों के सम्बन्ध में उन्होंने कहा कि हमें बताया गया है कि भारत की सादगी को कायम रखने के लिये हमारे हाथ, पैर तथा हृदय का समन्वय आवश्यक है। आगे उन्होंने स्पष्ट किया कि भाषण चाहे यहाँ के रहे हों या दिसम्बर में बम्बई के कांग्रेस अधिवेशन के, केवल वे ही हृदय तक पहुँच सके या उसे छू सके, जो विदेशी भाषा में नहीं थे, जो हिन्दुस्तानी में दिए गए थे! और बम्बई में सभी लोग हिन्दुस्तानी नहीं बोलते हैं, जैसा कि बनारस में है, फिर भी हृदय तो अपनी भाषाएँ ही स्पन्दित कर सकती हैं। और उन्होंने अपेक्षा की कि नए विश्वविद्यालय के छात्र अपनी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे। इस सभा में गाँधी जी ने श्रोताओं से सीधा प्रश्न किया था। क्या यहाँ कोई ऐसा है, जो अंग्रेजी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का स्वप्न देखता हो?

उत्तर कोरस में मिला, नहीं! गाँधी यहाँ पर भी सोच-विचार की स्वच्छता पर जोर दे रहे थे। उनके इस कथन के पीछे गहन चिन्तन था कि यदि पिछले पचास साल से भारत के लोगों को उनकी अपनी भाषा में शिक्षा मिली होती तो देश स्वतंत्र हो गया होता! पढ़े-लिखे और सामान्य लोगों के बीच एक संवेदनात्मक संवाद की स्थिति बनी होती और वे गरीब से गरीब वर्ग के बीच में कार्य कर रहे होते। मातृभाषा की महत्ता को इससे अधिक किन शब्दों की आवश्यकता हो सकती थी? भारतीयों पर बहुधा पहल की क्षमता न रखने का जो आरोप लगाया जाता रहा था, उस पर गाँधी जी ने कहा कि एक विदेशी भाषा सीखने में जीवन के महत्त्वपूर्ण वर्ष नष्ट करने के बाद यह कैसे सम्भव हो सकता है?

आज पूरे एक सौ एक वर्ष बाद उन लोगों और परिवारों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो अपने बच्चों को तीन वर्ष की आयु से ही अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने वाले स्कूलों में प्रवेश पाने के लिये जमीन-आसमान एक करने को तैयार होते हैं। सारा विश्व, विद्वान और शिक्षाविद, मनोवैज्ञानिक तथा मानविकी के विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रारम्भिक वर्षों में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होनी चाहिए और ऐसा न करना बच्चे के साथ अन्याय तथा क्रूरता ही माना जाना चाहिए। सामान्य तौर पर सभी शिक्षकों को प्रशिक्षण के दौरान सिखाया जाता है कि बच्चे की प्रगति, जिज्ञासा तथा सर्जनात्मकता के विकास के लिये आवश्यक है कि उसे प्रारम्भ में घर और स्कूल के वातावरण में अधिक से अधिक समानता तथा समरसता मिले। तीन-चार साल के बच्चे को स्कूल में मातृभाषा में बोलने तक को मना कर दिया जाए तो उसकी मन-स्थिति को समझा जा सकता है।

स्वच्छता का संस्कारइस भाषण में गाँधी जी ने कहा था कि उन्होंने पूना के प्रोफेसरों से चर्चा की थी और उन्हें बताया गया कि हर भारतीय जो अंग्रेजी के द्वारा शिक्षा प्राप्त करता है, जीवन के छः साल गँवा देता है! उन्होंने लोगों से हिसाब लगाने को कहा कि कितने हजारों साल (अब तो लाखों-करोड़ों) इस तरह बरबाद हो जाते होंगे? शिक्षा का माध्यम मातृभाषा माध्यम न होने के कारण देश केवल साल ही नहीं खो रहा है, उसकी आने वाली पीढ़ियाँ अपनी भाषाओं से दूर जा रही हैं, अपनी संस्कृति से अपरिचय के कारण अपनी पहचान पर वह गर्व और गौरव का अनुभव नहीं कर पा रही हैं, जो उनकी जन्मजात विरासत है और जिसका आध्यात्मिकता तथा मानव मात्र की सार्वभौमिक एकता में लोहा आज भी सारा विश्व मानता है। जो अपनी विरासत पर गर्व नहीं कर सकता है, वह बाहरी चकाचौंध से प्रभावित हो जाता है। इसी कारण आज भारत के लोगों को अन्य का अनुकरण या यों कहें कि अन्धानुकरण करने वालों में अग्रणी होने वाले वर्ग में सम्मिलित किया जाता है।

लेकिन आज भी यह कहा जा सकता है कि हम हर जगह नकल नहीं करते हैं। स्वच्छता इनमें सबसे पहले आती है। दिल्ली और ग्रेटर नोएडा के बीच में यमुना पर बने पुलों पर महँगी कार रास्ते में खड़ी कर नदी में वर्जित सामग्री डालते हुए देखे जाने वाले लोग अशिक्षित या गरीब तो कतई नहीं होते हैं। गरीबी हर प्रकार के प्रदूषण के लिये उत्तरदायी चिन्हित नहीं की जा सकती है। अमीरी, अहंकार तथा अपनी संस्कृति से दूरी इसके बड़े कारण हैं। यदि हमने अपने शिक्षा केन्द्रों में बच्चों को यह सिखाने में कोताही न की होती कि प्राचीन भारतीय संस्कृति में पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, नदी-पहाड़ों के साथ छेड़छाड़ मनुष्य के लिये ही आत्मघाती सिद्ध हो रही है। इन्हें जो देवत्व भारतीय संस्कृति में दिया गया है, उसकी जानकारी से अपनी भावी पीढ़ियों को हमने ‘सेकुलरिज्म’ के नाम पर वंचित कर दिया है। यदि ऐसा न होता तो भारत नदियों, पहाड़ों, जंगलों के प्रति आक्रमणकारी दृष्टिकोण नहीं अपनाता; उनका शोषण कर अपनी ही पीढ़ियों का भविष्य तबाह करने के रास्ते पर न चलता। वह विकास की अपनी अवधारणा विकसित करता।

हमने पश्चिम को हर प्रकार से श्रेष्ठ मान लिया है, मगर स्वच्छता के सम्बन्ध में, जहाँ हमें नकल करनी चाहिए, हमने अपने को हर प्रकार के उत्तरदायित्व से मुक्त कर रखा है। समय के साथ मन्दिरों में आमदनी बढ़ी है, दुर्भाग्य से उनके आस-पास गन्दगी भी उसी अनुपात में बढ़ी है। ऐसा नहीं है कि सुधार असम्भव है, मगर उसके लिये हर स्तर पर गहन इच्छाशक्ति, दृष्टि तथा कर्मठता चाहिए। जम्मू में वैष्णो देवी परिसर में जो सुधार किये जा सके, वे आज भी सराहे जाते हैं, उनसे वहाँ जाने वाले यात्रियों तथा पर्यटकों की संख्या बढ़ी है, लोगों की आर्थिक स्थिति सुधरी है और यह मथुरा, काशी तथा अनेक अन्य स्थानों पर भी सम्भव होना चाहिए। इसका भी अध्ययन करना लाभकारी होगा कि उत्तर भारत में ही मन्दिरों की स्वच्छता पर इतना कम ध्यान क्यों दिया जाता है, जबकि दक्षिण भारत के मन्दिरों में जाने पर अन्तर स्पष्ट दिखाई देता है? तिरुमाला-तिरुपति में जाने पर न तो अस्वच्छता मिलती है, न ही वहाँ वाहन चालकों या पंडों और भिक्षा माँगने वालों के अनावश्यक दबाव को झेलना पड़ता है।

आज एक सौ एक वर्ष बाद अस्वच्छता की समस्या भी इतनी जटिल इसलिये ही हुई है कि गाँधी जी की स्वास्थ्य और स्वच्छता पर चिन्तन को भी हमने वैसे ही नकार दिया, जैसे उनके ग्राम स्वराज की अवधारणा को उनके जीवनकाल में उन्हीं के शिष्यों ने अस्वीकार कर दिया था! पंडित नेहरू का 8 अक्टूबर, 1834 का गाँधी जी को लिखे गए पत्र में सबकुछ स्पष्ट है, किसी सन्देह की कोई सम्भावना नहीं है, “मैं नहीं समझता की क्यों गाँव अनिवार्यतः सत्य और अहिंसा की मूर्ति ही हों। गाँव आमतौर पर बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़ा होता है और पिछड़े वातावरण में प्रगति नहीं की जा सकती है।” गाँव के प्रति इस दृष्टिकोण के साथ भारत ने बिना हिचक पश्चिम की विकास की अवधारणा को अंगीकृत कर लिया और जिसे गाँधी शैतानी सभ्यता कहते थे, उसी का परिणाम है कि आज गाँव उजड़ रहे हैं, वहाँ भी कूड़े-कचरे के ढेर जमा हो रहे हैं और शहरों में मलिन बस्तियों में स्वच्छता या स्वास्थ्य सेवा के नाम पर कुछ भी उपलब्ध नहीं है। जो कभी गाँव के स्वच्छ तथा प्रदूषण रहित वातावरण में जीवन यापन करते थे, वे आज नारकीय जीवन बिताने के लिये बाध्य हैं। आज कूड़े के ढेर पर रहने और कूड़ा बीनकर जीवन बिताने का कोई विकल्प करोड़ों लोगों के पास है ही नहीं।

यदि भारत को गाँधी जी जैसी निगाह से देखा गया होता और समझा जाता तो यहाँ विकास और प्रगति की अवधारणा मनुष्य की महत्ता और उसके चरित्र-निर्माण के आस-पास बुनी जाती। शहरी चकाचौंध में गाँव को भुलाया नहीं जाता, तब एक शताब्दी पहले गाँधी जी की मातृभाषा और स्वच्छता पर चेतावनी को हमने पूरी तरह नजरअन्दाज नहीं किया होता। मातृभाषा की महत्ता समझाने के बाद अपने बनारस के भाषण में जिन मार्मिक शब्दों में उन्होंने काशी विश्वनाथ मन्दिर में अपने जाने और वहाँ की अस्वीकार्य अवस्था का वर्णन किया, वह आज भी हर संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देता है। भारत की संस्कृति और सभ्यता की अप्रतिम धरोहर है काशी का यह मन्दिर। असंख्य लोगों की आस्था और प्रेरणा का स्रोत रहा है यह! यदि हमारे ऐतिहासिक मन्दिर और पूजा-स्थल स्वच्छ तथा खुले हुए नहीं हैं तो क्या यह हमारे चरित्र को नहीं दर्शाता है? गाँधी जी ने इसी तरह रेलवे के डिब्बों के अन्दर आदतन की जाती गन्दगी पर भी फटकार लगाई थी। वैसे इस सब में शायद ही कोई खास सुधार हुआ हो।

इस देश की परम्परा और संस्कृति में माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य सुधारने में सभी कुछ न्योछावर करने के लिये सतत प्रयत्नशील रहते हैं। आज के घोर प्रतिस्पर्धात्मक समय में अपने बच्चों के भविष्य के प्रति उनकी चिन्ताएँ लगातार बढ़ रही हैं। उनके स्वास्थ्य पर प्रदूषण तथा सर्वत्र बिखरी गन्दगी का जो प्रभाव पड़ता है, उसके प्रति जागरुकता अपेक्षित सीमा तक नहीं बढ़ी है, क्योंकि इस स्थिति को अभी तक तो सामान्य माना जाता रहा है। स्कूल, अस्पताल, सरकारी कार्यालय, खेल के मैदान, यानी हर जगह बच्चों का स्वास्थ्य के लिये हानिकारक स्थितियों से साबका पड़ता ही रहता है। यह तथ्य भी आँखों से ओझल नहीं किया जा सकता है कि कुपोषित बच्चों का प्रतिशत चालीस से पचास या कहीं-कहीं उससे भी अधिक होता है। ऐसी स्थिति में गन्दगी और अस्वच्छता के प्रभाव अत्यन्त हानिकारक हो जाते हैं।

गाँधी जी ने जो कुछ 1916 में कहा, जिस पर वह जीवनपर्यंत जोर देते रहे, व्यवहार करते रहे, लोगों को सिखाते रहे, वह आज भी पहले से अधिक संदर्भित हो गया है। देश का प्रधानमंत्री का लालकिले के प्राचीर से आह्वान देश में एक नया वातावरण तैयार करने में सफल रहा है। इसमें थोड़ी भी ढील स्वीकार्य नहीं हो सकती। गाँव, शहरों, राज्यों की राजधानियों और स्वयं देश की राजधानी में लगातार फैल रहे और ऊँचे होते जा रहे कूड़े-कचरे के ढेर एक विकसित देश में कैसे बने रह सकते हैं? यह समझ आवश्यक है कि स्वच्छता अभियान जीवन के अनेक पक्षों को छूता है और इनमें से कोई भी छोड़ा नहीं जा सकता है।

राष्ट्र ‘स्वच्छता अभियान’ चला रहा है। इसकी स्वीकार्यता तथा उपयोगिता पर कोई मतभेद सम्भव ही नहीं है। परन्तु इसकी सम्पूर्ण सफलता तथा उपयोगिता तभी सम्भव होगी। जब अन्तिम व्यक्ति तक इसकी आवश्यकता अन्तर्निहित हो सके। वह सोच बहुत पहले ही समाप्त हो जानी चाहिए थी, जिसमें स्वच्छता का सारा दायित्व जाति के आधार पर वितरित कर दिया गया था और ऐसा करने वालों ने अपने को श्रेष्ठ घोषित कर रखा था। अब हर वर्ग को यह स्वीकार करना है कि हर व्यक्ति का कर्तव्य है स्वच्छता के काम में बिना हिचक भागीदारी करना और जाति प्रथा का जो कुछ बचा है, उसका भी जड़-मूल से उन्मूलन करने में बिना कहे ही भागीदारी करना, ऐसा बड़ा दृष्टिकोण परिवर्तन शिक्षा केन्द्रों की भागीदारी के बिना सम्भव नहीं हो सकेगा। इस लक्ष्य को प्राथमिकता देनी होगी कि स्कूलों से लेकर उच्चतम शिक्षा संस्थानों में बने शौचालय अपनी स्वच्छता तथा रख-रखाव में पूरी तरह खरे उतरें और अपने यहाँ के बच्चों और युवाओं में स्वच्छ शौचालय उपयोग की आदत डालें।

इसका प्रभाव घरों तथा परिवारों पर भी पड़ेगा। शौचालय पहली आवश्यकता है, परन्तु इनका निर्माण तो केवल पहला और आवश्यक कदम है, मगर केवल यही काफी नहीं है। इनकी संख्या करोड़ों में बढ़ रही है और इसकी सराहना की जानी चाहिए। उनके रख-रखाव तथा उपयोग के लिये जिस दृष्टिकोण-परिवर्तन की आवश्यकता है, उस दिशा में अनवरत कार्य करने की आवश्यकता है। इसमें सबसे बड़ा योगदान कर सकने वाले वर्ग छात्र, अध्यापक और अध्यापक-प्रशिक्षण संस्थान को आगे आना होगा। कितना अच्छा होगा कि यह वर्ग स्वयं ही आगे आये और अभियान का नेतृत्व सम्भाले।

लेखक परिचय


जगमोहन सिंह राजपूत, वरिष्ठ शिक्षाविद एवं चिंतक, मो. नं.-9810481415

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