तापमान शमन का ढूंढें ठोस समाधान

Submitted by editorial on Tue, 12/25/2018 - 14:01
Source
राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 22 दिसम्बर, 2018


जलवायु परिवर्तनजलवायु परिवर्तन 2018 में दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ ‘पेरिस जलवायु समझौते’ की दिशा में बेहद अहम प्रयास हैं। आईपीसीसी का 48वां सम्मेलन जो 1-5 अक्टूबर के बीच दक्षिण कोरिया के इंचियोन शहर में खत्म हुआ, वह ‘वैश्विक ऊष्मा’ को 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड तक करने और सम्बन्धित ग्रीन हाउस गैसों को पूर्व औद्योगिक स्तर (प्री इंडस्ट्रियल लेवल) में रोकने की दिशा में महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट प्रस्तुत किया। और इसी साल कोप-24 जो पोलैंड के कातोविसे सम्मेलन के नाम से जाना जाता है, इस दिशा में प्रभावी कदम उठाने में सक्षम नहीं दिखाई पड़ता है। हमें 2030 तक 45 फीसद कार्बन उत्सर्जन को कम करना और 2055 तक 0 डिग्री पर लाकर तापक्रम को 1.5 डिग्री तक रोकने की योजना है। लेकिन अभी भी इसकी राह आसान नहीं दिखती क्योंकि प्रभावी कदम की कमी नजर आती है।

हमें ऐतिहासिक सन्दर्भों में इसका विश्लेषण करना होगा। वैसे, तो कुछ प्राकृतिक कारण भी हैं, जो वैश्विक ऊष्मा को बढ़ाने में प्रभाव डालते हैं। जैसे; सौर ऊर्जा के वितरण में परिवर्तन, पहाड़ों के बनने की प्रक्रिया आदि प्रमुख हैं। मगर मानव द्वारा उत्सर्जित ऊष्मा 2017 में पूर्व औद्योगिक स्तर से 0.2 डिग्री सेंटीग्रेड प्रति दशक के हिसाब से बढ़ोत्तरी हो रही है। कई प्रदेशों और मौसम में वैश्विक औसत से ऊपर ऊष्मा पहुँच गई है। समुद्र की तुलना में सरजमीं पर तापमान ज्यादा पाया जाता है। इसका प्रभाव वैश्विक औसत तापक्रम के बढ़ने के साथ-साथ अन्य समस्याओं की आहट भी दिखाई पड़ने लगी है। जैसे; ग्लेशियर का पिघलना, समुद्र तल का बढ़ना, खाद्य उत्पादन में कमी, अतिशय प्राकृतिक घटनाओं का बढ़ना मसलन केरल, चेन्नई और जम्मू-कश्मीर में बाढ़ की विभीषिका इसके उदाहरण हैं।

सराहनीय प्रतिबद्धताएँ

विश्व के स्तर पर भी काफी विभिन्नता पाई जाती है। ताप से घटित घटनाएँ गर्मी के दिनों में मध्य अक्षांश के क्षेत्रों में 3 डिग्री तक बढ़े हैं। उच्च अक्षांश क्षेत्रों में ठंडे मौसम में 4.5 डिग्री सेंटीग्रे़ड तक बढ़ा है। उच्च ताप से सम्बन्धित घटनाएँ मध्य और पूर्वी उत्तरी अमेरिका, मध्य तथा दक्षिणी यूरोप, भूमध्य सागरीय प्रदेश, पश्चिमी तथा मध्य एशिया और दक्षिणी अफ्रीका हैं। आश्चर्यजनक तरीके से गर्म हुए इलाके उष्ण जलवायु में बढ़े हैं। भारी वर्षा की मात्रा भी प्रमुख उच्च अक्षांशीय क्षेत्र जैसे अलास्का, कनाडा, ग्रीनलैंड, आइसलैंड, उत्तरी यूरोप, पर्वतीय क्षेत्र, पूर्वी एशिया (चीन-जापान) आदि हैं। जिसके कारण से रन-अप की बढ़ोत्तरी, वर्षा की अधिक घटनाएँ, बहुत सारे प्रदेशों में जल संसाधन, भूमि उपयोग, खाद्य सुरक्षा, खाद्य उत्पादन आदि पर काफी प्रभाव पड़े हैं, जो हमारे लिये चिन्ता के विषय हैं।

पोलैंड में सम्पन्न कॉप-24 में कुछ आम राय तो जरूर बनी, मगर इनसे जुड़े समाधान में वित्तीय व्यवस्था की जरूरत और कार्बन न्यूनता को सत्यापित करने की विधि में दृढ़ राय की कमी रही, जिससे आईपीसीसी की रिपोर्ट में 2 डिग्री सेंटीग्रेड से घटाकर 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड तक घटाकर रखना कोरी कल्पना ही नजर आ रही है। अमेरिका का निराशाजनक रवैया इसमें और प्रमुख योगदान दे सकता है। मगर भारत, यूरोपीय यूनियन के देश और चीन की प्रतिबद्धता सराहनीय है। कोयले से चलने वाले पॉवर प्लांट पर रोक लगाकर ही इस दिशा में बहुमूल्य कदम रख सकते हैं। परन्तु इसमें कोई खास राय नहीं बन पाई। क्योटो प्रोटोकॉल के अन्तर्गत सीडीएम (क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म) की बात कही गई है, किन्तु आँकड़े सच से दूर हैं। अपने पहले 10 वर्ष में क्योटो प्रोटोकॉल में ग्रीन हाउस गैस की मात्रा 1.58 बिलियन टन कम किया मगर मानव क्रिया-कलाप द्वारा कार्बन उत्सर्जन में 10 बिलियन टन बढ़ोत्तरी हुई है। अन्तरराष्ट्रीय सौर का संगठन, जिसमें फ्रांस और भारत अग्रणी भूमिका अदा कर रहा है, जीवाश्म ऊर्जा (फॉसिल एनर्जी) को विकल्प बनाने की दिशा में बहुत पीछे हैं। पवन ऊर्जा की भी सीमित सम्भावनाएँ हैं। ऊर्जा ताप और परिवहन फ्यूल इन सब में ऊर्जा की पूर्ति कोयले से ही होती है। अमेरिका की कोयला लॉबी ने ही अपने देश (अमेरिका) को ‘पेरिस समझौते’ से हटने को बाध्य किया। हालांकि इस सम्बन्ध में 30 देशों ने सराहनीय निर्णय लिया है कि अब कोयले पर आधारित नए पावर प्लांट स्थापित नहीं करेंगे।

अति संवेदनशीलता और जोखिम को करें कम

जलवायु को अंगीकार करने के लिये हमें किसान और गाँवों के स्तर पर प्रयास कर अति संवेदनशीलता और जोखिम को कम करना होगा। सतत विकास के साथ-साथ गरीबी उन्मूलन पर ध्यान देना होगा, जिससे लोगों की क्षमता को बढ़ाया जा सके। इन सब अति संवेदनशीलता का गरीबों पर अधिक प्रभाव पड़ता है। हमें बहुआयामी जैसे; भौगोलिक, पर्यावरणीय, हरित तकनीक, आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक और संस्थागत आयामों को मजबूत बनाकर लोगों के खतरे को कम किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर भारत की राजधानी दिल्ली में पौधरोपण, मेट्रो लाइन का विस्तार, प्रदूषित उद्योगों को केन्द्र से दूर स्थापित करना, न्यून सल्फर फ्यूल (लो सल्फर फ्यूल), सीएनजी को व्यावसायिक परिवहन साधनों में अनिवार्य कर बहुत प्रभावी कदम उठाए गए हैं। शहरों में फ्लाइओवर्स का निर्माण भी वाहन से प्रदूषण को केन्द्रित होने से कम करने का प्रमुख प्रयास है। भारत में सौर ऊर्जा की अपार सम्भावनाएँ हैं। पवन ऊर्जा का भी भारत के पश्चिमी भाग, हिमालय के क्षेत्र, तटीय भाग आदि में प्रमुख सम्भावनाएँ हैं। इनको सरकारी योजनाओं के द्वारा प्रोत्साहन (इंटेंसिव) पैकेज की मदद से बढ़ाया जा सकता है। ऊर्जा क्षमता का प्रचार और प्रसार महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। एलईडी बल्ब आदि की तरफ लोगों का झुकाव काफी तेजी से बढ़ा है। ऊर्जा के पुन: उपयोग पर भी हमें जोर देना होगा। प्राविधिक नीति तथा कार्य-निष्पादन स्तर कुछ इलाकों के कार्बन के मूल्य निर्धारण पर भी योगदान दे सकते हैं। 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड पर तापक्रम को रोकने के लिये लोगों की जरूरतों को भी व्यावहारिक परिवर्तन के द्वारा कम करने का प्रयास होना चाहिए। जैसे; घरों की डिजाइन, परिवहन के साधनों, हरित उद्योगों की तरफ लोगों का झुकाव बढ़ाना होगा। हमारी सांस्कृतिक विरासत पर आधारित भवन निर्माण तथा परम्परागत पुन: उपयोग तथा बहुआयामी उपयोग आदि पर ध्यान देना होगा।

राष्ट्रीय आन्दोलन की तरह काम करना होगा

02 अक्टूबर 2016, इसी दिन भारत ने जलवायु परिवर्तन पर ‘पेरिस समझौते’ की पुष्टि की तब से अनगिनत प्रयास किये गए हैं। उस समय भारत ‘पेरिस समझौते’ पर सहमति देने वाला 62वां देश था। हम आर्थिक विकास के साथ-साथ स्वच्छ तथा वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के लिये प्रभावी कदम उठा रहे हैं। इस सन्दर्भ में यह ध्यान दिलाना भी अति आवश्यक है कि हमें मौसम पर पूर्वानुमान व जलवायु परिवर्तन अध्ययन के लिये आधुनिक उपकरणों आदि का जाल पूरे देश में बिछाना होगा। हिमालयी क्षेत्र में मुख्य रूप से इस पर ध्यान देने की जरूरत है। असामयिक घटनाएँ बाढ़ की समस्या खड़ी करती जा रही हैं। शहरी इलाकों का विस्तार, भूमि उपयोग में परिवर्तन आदि प्राकृतिक आपदाएँ प्रतिवर्ष की समस्या बन गई हैं। हमें मानसून की गतिविधियाँ तथा बहुआयामी प्रभाव का सटीक, टिकाऊ और पूर्व सूचना आदि की जानकारी में सुधार करना अति आवश्यक है।

जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिये राष्ट्रीय आन्दोलन की तरह काम करना होगा। हमें खाद्य प्रविधि के नये साधनों की खोज करते हुए किसानों की फसल का मूल्य बढ़ाने (वैल्यू एडिशन) की तरफ विभिन्न परियोजनाओं को लाना होगा। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जलवायु परिवर्तन को कम करने के उपाय जीविका के विभिन्न साधनों को बढ़ाने, जल के समुचित उपयोग, ऊर्जा का पुन: उपयोग, जैव विविधता के विकास और मानव स्वास्थ्य सुरक्षा से सम्बन्धित हैं। इन सबका समेकित अध्ययन और विकास भारत के लोगों की समृद्धि तथा भारत के विभिन्न स्थानों के विकास में मददगार साबित होगा।

(लेखक दिल्ली विवि महासचिव, अन्तरराष्ट्रीय भूगोल संघ के प्रोफेसर हैं।)

 

 

 

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