पर्यावरण पर ‘पुरस्कृत’ गंभीरता नहीं दिखी

Submitted by UrbanWater on Sat, 05/04/2019 - 11:20
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हस्तक्षेप, राष्ट्रीय सहारा

जलवायु परिवर्तन पर पूरी दुनिया में एक नई बहस छिड़ी हुई है। सोलह साल की ग्रेटा थनबर्ग ने जलवायु परिवर्तन के लिए स्कूल हड़ताल शुरू की जिसके बाद पूरी दुनिया में खासकर बच्चों और युवाओं ने पर्यावरण बचाने की लड़ाई को अपने हाथों में ले लिया। गीता सहित इन युवाओं का सबसे बड़ा आरोप है कि पूरी दुनिया में राजनीतिज्ञ और सत्ता में बैठे लोग जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। नई पीढ़ी अपने भविष्य को बर्बाद होते नहीं देख सकती।

इस कड़ी में भारत में भी कई प्रदर्शन हुए। इनमें सरकार पर पर्यावरण को बचाने के लिए गंभीर कदम नहीं उठाने के आरोप लगे। यदि हम वर्तमान नरेन्द्र मोदी की सरकार के पिछले पांच साल के कामकाज को देखते हैं, तो पाते हैं कि इन पांच सालों में कई ऐसे कदम उठाए गए जिनसे मोदी सरकार नियंत्रण स्तर पर पर्यावरण को लेकर प्रगतिशील छवि बनाने में कामयाब रही। इसी का नतीजा रहा कि यूएन तक ने प्रधानमंत्री मोदी को पुरस्कार तक दिया। पर्यावरण की नियंत्रण राजनीति में भारत आज अहम भूमिका निभाने की स्थिति में आ गया है। 2015 पेरिस समझौते में भारत की तरफ से सबसे महत्त्वाकांक्षी आईएनडीसी लक्ष्यों को रखा गया था,

पर्यावरण संरक्षण को लेकर मुखर राष्ट्रीय हरित अभिकरण (एनजीटी) को भी कमजोर करने की कोशिश की गई। दरअसल, पर्यावरण को नजरअंदाज करके, जिस पर लोगों का जीवन ही नहीं, बल्कि लाखों आदिवासियों की जीविका निर्भर है, कथित विकास के दौड़ में हिस्सा लेने का ही नतीजा है कि खुद पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर बयान देते हैं कि उन्होंने अपने 100 दिन के कार्यकाल में एक भी पर्यावरण मंजूरी को नहीं लटकाया। ऐसे बयान देते वक्त वह भूल गए कि पर्यावरण मंत्रालय को पर्यावरण और जंगलों को बेहतर बनाने के लिए बनाया गया है, न कि सिर्फ विभिन्न परियोजनाओं को हरी झंडी देने के लिए। सिर्फ तीन महीने में जावड़ेकर ने 240 परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी दे दी थी। 

भारत ने अंतर्राष्ट्रीय सोलर गठबंधन की स्थापना में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पेरिस समझौते के वक्त ही साफ हो गया था कि भारत दुनिया भर में चल रहे जलवायु परिवर्तन की बहस में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने की क्षमता रखता है। भारत ने 2030 तक 40 फीसद गैर-जीवाश्म ईधन और 33-35 फीसद तक उत्सर्जन तीव्रता में कमी लाने का लक्ष्य रखा है। रिपोर्ट बताती हैं कि भारत, अमेरिका से 50 प्रतिशत ज्यादा सौर और वायु ऊर्जा लगा रहा है। इतना ही नहीं, एलईडी लगाने के लिए भी सरकार ने योजनाएं शुरू की हैं। घरों और गलियों में लगे 770 मिलियन लाइट को एलईडी में बदला जा रहा है, जो ऊर्जा खपत को कम करती है। 2019 तक सभी लाइट को बदलने का भी लक्ष्य रखा गया है। इनके बदलने से भारत की 20 हजार मेगावॉट बिजली मांग में कमी आएगी, जिससे 80 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन कम होने की संभावना है। आगे चलकर इससे नये र्थमल पावर प्लांट लगाने की जरूरत भी कम होगी। जर्मनी में हुए संयुक्त राष्ट्र जलवायु बैठक में भी इस बात को स्वीकार किया गया और ‘‘चाइना एंड इंडिया मेक बिग स्ट्राई़्स ऑन क्लाईमेट चेंज’ नाम से एक रिसर्च रिपोर्ट भी प्रकाशित की गई। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देशों में चीन और भारत ही ऐसे देश हैं, जो अपनी प्रतिबद्धताओं से अधिक लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। 

सौर ऊर्जा और आम लोग

हालांकि सौर ऊर्जा की कई योजनाओं के होते हुए भी आम लोग सौर क्रांति का हिस्सा नहीं बन पा रहे हैं। अक्षय ऊर्जा मंत्रालय ने 2022 तक 40 गिगावॉट सोलर छत पर लगाने का लक्ष्य रखा है। दिसम्बर, 2016 तक यह सिर्फ एक गिगावॉट तक पहुंच पाया है। सोलर लगाने की गति धीरे होने की एक वजह यह भी है कि लोगों को यह पूरी प्रक्रिया जटिल लग रही है, और वे अफसरशाही में फंस रहे हैं। इसके अलावा, नेट मीटरिंग वैसे तो बहुत सारे राज्यों में है, लेकिन उसको ठीक से कम ही जगह लागू किया जा रहा है।

लेकिन स्वच्छ ऊर्जा की चुनौतियों से निपटने के साथ-साथ भारत के लिए जीवाश्म ईधन में कटौती करना भी बड़ी चुनौती है। भारत अभी भी बिजली के लिए मुख्यत: कोयले पर आधारित है, और फिलहाल सरकार ने कुछ ऐसे फैसले लिए हैं, जो कोयला आधारित बिजली को बढ़ावा देंगे। जब एक तरफ पूरी दुनिया में सौर ऊर्जा को किफायती बनाने की कोशिश की जा रही है, करीब 30 से ज्यादा देश में सौर ऊर्जा कोयले से ज्यादा सस्ती हो चुकी है, अमेरिका में भी जीवाश्म ईधन की बजाय सौर ऊर्जा क्षेत्र में ज्यादा रोजगार मिल रहा है।

हालांकि सौर ऊर्जा के अलावा अन्य मुद्दों पर मोदी सरकार बहुत कार्यशील नहीं दिख रही है। पिछले कई साल से भारत के कई शहर लगातार दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की शीर्ष सूची में अपनी जगह बना रहे हैं। रिपोर्ट बताती हैं कि साल 2017 में वायु प्रदूषण ने बारह लाख लोगों की जान ली। लंबे इंतजार के बाद पर्यावरण मंत्रालय ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम की घोषणा की जिसमें किसी तरह की कोई कानूनी जवाबदेही नहीं तय की गई। इसमें भी ज्यादातर प्रदूषित शहरों को शामिल ही नहीं किया गया और लक्ष्य भी काफी कम रखा गया है, जबकि वायु प्रदूषण न सिर्फ लोगों की सेहत, बल्कि अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरनाक बन चुका है।

वहीं, दूसरी तरफ मोदी सरकार ने आते ही यह संकेत कर दिया था कि वन अधिकार अधिनियम में बदलाव करेगी ताकि ‘‘डवलपमेंट प्रोजेक्ट’ के लिए जंगलों को काटने का रास्ता साफ हो सके। इसी साल सुप्रीम कोर्ट में वन अधिकार अधिनियम को डिफेंड करने के लिए सरकारी वकील का न होना इस बात को साबित भी करता है, जिसमें कोर्ट ने करीब दस लाख आदिवासियों को जंगल खाली करने का फरमान सुना दिया था। हालांकि बाद में इस पर स्टे लगा दिया गया। यह बात दुनिया भर में साबित हो चुकी है कि जंगल को बचाने में सबसे अहम भूमिका स्थानीय समुदाय की ही होती है। उन्हें वन अधिकार से वंचित कर दिया गया तो फिर जंगल को बचाना मुश्किल होगा। उल्लेखनीय है कि ऐतिहासिक वन अधिकार कानून को संप्रग सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में लागू किया था। 2006 में पारित और 2008 से लागू इस कानून को लाते वक्त कहा गया था कि यह सदियों से अन्याय के शिकार और अपने अधिकारों से बेदखल रहीं जनजातियों और जंगलवासियों को उनका अधिकार देने का प्रयास है। तत्कालीन संप्रग सरकार ने इस कानून को अपनी सरकार की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए इसे जनजातियों के भविष्य के लिए बदलावकारी कदम बताया था, लेकिन मोदी सरकार इन दलीलों को नजरअंदाज करते हुए वनाधिकार कानून को कमजोर करने की कोशिश कीं। 

मोदी सरकार ने जब दिया संकेत

मोदी सरकार ने अपने एक और निर्णय से पर्यावरण और लोगों के अधिकारों को महत्त्व न देने का संकेत दिया, जब नर्मदा बांध की ऊंचाई को बढ़ाने का निर्णय लिया गया। इस ऊंचाई के बढ़ने से करीब 2 लाख लोगों पर विस्थापित होने का खतरा मंडराने लगा है। इसके साथ ही अब 2 से 10 हजार हेक्टेयर सिंचाई परियोजनाओं के लिएकेंद्र द्वारा अनुमति की आवश्यकता को खत्म कर दिया गया और इतना ही नहीं अगर 2000 हेक्टेयर से कम सिंचाई परियोजना के लिए पर्यावरण मंजूरी के प्रावधान को ही खत्म कर दिया गया। इसी तरह सरकार ने प्रदूषणकारी वर्गीकरण में परिवर्तन लाते हुए वन अभ्यारणों के पांच किमी के दायरे में मध्य आकार के प्रदूषणकारी उद्योगों को अनुमति दे दी है, जबकि इस मामले में खुद उच्चतम न्यायालय ने 10 किमी की दूरी को मानक बनाया है। सरकार ने सबसे प्रदूषित औद्योगिक शहरों में नये उद्योग पर लगे प्रतिबंध को हटा लिया, इससे गुजरात, मध्य प्रदेश के सिंगरौली, उत्तर प्रदेश में सोनभद्र जैसे सबसे प्रदूषित शहरों में फिर से नये उद्योग लगाए जा सकेंगे।

इसी तरह पर्यावरण संरक्षण को लेकर मुखर राष्ट्रीय हरित अभिकरण (एनजीटी) को भी कमजोर करने की कोशिश की गई। दरअसल, पर्यावरण को नजरअंदाज करके, जिस पर लोगों का जीवन ही नहीं, बल्कि लाखों आदिवासियों की जीविका निर्भर है, कथित विकास के दौड़ में हिस्सा लेने का ही नतीजा है कि खुद पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर बयान देते हैं कि उन्होंने अपने 100 दिन के कार्यकाल में एक भी पर्यावरण मंजूरी को नहीं लटकाया। ऐसे बयान देते वक्त वह भूल गए कि पर्यावरण मंत्रालय को पर्यावरण और जंगलों को बेहतर बनाने के लिए बनाया गया है, न कि सिर्फ विभिन्न परियोजनाओं को हरी झंडी देने के लिए। सिर्फ तीन महीने में जावड़ेकर ने 240 परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी दे दी थी। 

1980 के बाद केंद्र सरकार ने विभिन्न परियोजनाओं के लिए 11,29,294 हेक्टेयर वन भूमि की मंजूरी दे दी है, और अब हमारे पास 69,790,000 हेक्टेयर वन भूमि ही है, जो राष्ट्रीय वन नीति द्वारा अनिवार्य 33 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र के मुकाबले सिर्फ 21.23 प्रतिशत ही है। स्पष्ट है कि अब हम और अधिक वनों को खत्म नहीं कर सकते। लेकिन लगातार डवलपमेंट प्रोजेक्ट के नाम पर पर्यावरण मंजूरी दी जाती रही और जंगलों को काटा जाता रहा। एक तरफ तो नियंतण्र स्तर पर पर्यावरण को लेकर मोदी सरकार ने नेतृत्वकारी छवि बनाई, लेकिन वहीं दूसरी तरफ पिछले पांच साल में घरेलू फ्रंट पर कई ऐसे निर्णय बताते हैं कि सरकार पर्यावरण की चिंताओं को लेकर बहुत गंभीर नहीं रह पाई।

साभारः ये लेख राष्ट्रीय सहारा के हस्तक्षेप के 4 मई 2019 के अंक में दिया गया है।

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