पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रकृति की भाषा समझें

Submitted by HindiWater on Thu, 09/12/2019 - 15:01
Source
हरिभूमि, 3 अगस्त 2019

फोटो स्त्रोत-डब्ल्यूबीएम फाउंडेशन।फोटो स्त्रोत-डब्ल्यूबीएम फाउंडेशन।

आधुनिकरण और औद्योगिकीकरण के चलते विश्वभर में प्रकृति के साथ बड़े पैमाने पर जो खिलवाड़ हो रहा है, उसके मद्देनजर आमजन को पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक करने की जरूरत अब कई गुना बढ़ गई है। कितना अच्छा हो, अगर हम सब प्रकृति के संरक्षण में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाने का संकल्प लेते हुए अपने-अपने स्तर पर ईमानदारी से अमल भी करें। दरअसल आज प्रदूषित हो रहे पर्यावरण के जो भयावह खतरे हमारे सामने आ रहे हैं, उनसे शायद ही कोई अनभिज्ञ हो और हमें यह स्वीकार करने से भी गुरेज नहीं करना चाहिए कि इस तरह की समस्याओं के लिए कहीं-न-कहीं जिम्मेदार हम स्वयं भी हैं।

हमें कपड़े या जूट का थैला साथ लेकर बाजार जाने के बजाए पॉलिथीन में सामान लाना ज्यादा सुविधाजनक लगता है। हम पॉलिथीन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को नजरअंदाज कर देते हैं। जहाँ तक गहराते जल संकट की बात है तो इसके लिए भी हम जिम्मेदार हैं। अक्सर देखा जाता है कि टूथपेस्ट करते समय या शेविंग करते समय हम नल खुला छोड़ देते हैं और पानी लगातार बहता रहता है।

पहले जान लें कि प्रकृति है क्या ? प्रकृति के तीन प्रमुख तत्व हैं जल, जंगल और जमीन, जिनके बगैर प्रकृति अधूरी है। यह विडम्बना ही है कि प्रकृति के इन तीनों ही तत्वों का इस कदर दोहन किया जा रहा है कि इसका सन्तुलन डगमगाने लगा है। प्रकृति के साथ हम बड़े पैमाने पर जो छेड़छाड़ कर रहे हैं, उसी का नतीजा है कि पिछले कुछ समय से भयानक तूफानों, बाढ़, सूखा, भूकम्प जैसी आपदाओं का सिलसिला तेजी से बढ़ा है। कोई भी बड़ी प्राकृतिक आपदा आने पर हम प्रकृति को कोसना शुरू कर देते हैं, लेकिन हम नहीं समझना चाहते कि प्रकृति तो रह-रहकर अपना रौद्र रूप दिखाकर हमें सचेत करने का प्रयास करती रही है। अगर हम अभी भी नहीं संभले और हमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया तो हमें आने वाले समय में इसके खतरनाक परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। प्रकृति हमारी माँ के समान है, जो हमें अपने प्राकृतिक खजाने से बहुमूल्य चीजें प्रदान करती हैं, लेकिन अपने स्वार्थों के चलते हम अगर खुद को ही प्रकृति का स्वामी समझने की भूल करने लगे हैं तो फिर भला प्राकृतिक तबाही के लिए प्रकृति को कैसे दोषी ठहरा सकते हैं। दोषी तो हम स्वयं हैं, जो इतने साधनपरस्त और आलसी हो चुके हैं कि अगर हम अपने घर के आस-पास के 100-200 मीटर के दायरे से भी घर के लिए कोई सामान लाना पड़े तो पैदल चलना हमें गवारा नहीं। हम सोचते ही नहीं कि छोटे-मोटे कार्यों की पूर्ति के लिए भी निजी यातायात के साधनों का उपयोग कर हम पेट्रोल, डीजल जैसे धरती पर ईंधन के सीमित स्रोतों को तो नष्ट कर ही रहे हैं। हमारे क्रियाकलापों के चलते ही वायुमंडल में कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन, पार्टिक्यूलेट मैटर, ओजोन प्रदूषण का मिश्रण इतना बढ़ गया है कि हमें वातावरण में इन्हीं प्रदूषित तत्वों की मौजूदगी के कारण सांस की बीमारियाँ जकड़ने लगी हैं। पेट्रोल, डीजल से पैदा होने वाले धुएँ ने वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड और ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को बेहद खतरनाक स्तर पर पहुँचा दिया है। पर्यावरणीय असंतुलन के बढ़ते खतरों के मद्देनजर हमें खुद सोचना होगा कि हम अपने स्तर पर प्रकृति संरक्षण के लिए क्या योगदान दे सकते हैं।
 
अगर हम वाकई चाहते हैं कि हम और हमारी आने वाली पीढ़ियाँ साफ-सुथरे वातावरण में बीमारी युक्त जीवन जीएँ तो हमें अपनी इस सोच को बदलना होगा कि यदि सामने वाला व्यक्ति कुछ नहीं कर रहा तो मैं ही क्यों करूँ ? हर बात के लिए सरकार से अपेक्षा करना भी ठीक नहीं। सरकार का काम है किसी भी चीज के लिए कानून या नियम बनाना और जन-जागरुकता पैदा करना है, लेकिन ईमानदारी से उका पालन करने की जिम्मेदारी तो हमारी ही है। सरकार और अदालतों द्वारा पर्यावरण के लिए गम्भीर खतरा बनी पॉलिथीन पर पाबंदी लगाने के लिए समय-समय पर कदम उठाए गए, लेकिन हम पॉलिथीन के आदी हो गए हैं। हमें कपड़े या जूट का थैला साथ लेकर बाजार जाने के बजाए पॉलिथीन में सामान लाना ज्यादा सुविधाजनक लगता है। हम पॉलिथीन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को नजरअंदाज कर देते हैं। जहाँ तक गहराते जल संकट की बात है तो इसके लिए भी हम जिम्मेदार हैं। अक्सर देखा जाता है कि टूथपेस्ट करते समय या शेविंग करते समय हम नल खुला छोड़ देते हैं और पानी लगातार बहता रहता है। हमें अपनी इन गलत आदतों को बदलना होगा। यदि हम वाकई प्रकृति का संरक्षण चाहते हैं तो अपने आस-पास के लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करना होगा।
 
अपनी छोटी-छोटी पहल से हम सब मिलकर प्रकृति के संरक्षण के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। प्रयास करें कि हमारे दैनिक क्रियाकलपों से कार्बन डाईऑक्साइड जैसी गैसों का उत्सर्जन कम-से-कम हो। पानी की बचत के तरीके अपनाते हुए जमीनी पानी का उपयोग भी केवल आवश्यकतानुसार ही करें। जहाँ तक सम्भव हो, वर्षा के जल को सहेजने के प्रबन्ध करें। प्लास्टिक की थैलियों को अलविदा कहते हुए कपड़े या जूट के थैलों का प्रयोग करें। बिजली बचाकर ऊर्जा संरक्षण में अपना अमूल्य योगदान दें। तमाम बिलों के ऑनलाइन भुगतान की व्यवस्था हो ताकि कागज की बचत की जा सके और वृक्षों पर कम-से-कम कुल्हाड़ी चले। प्रकृति के बार-बार अपनी मूक भाषा में चेतावनियाँ देकर हमें सचेत करती रही है, इसलिए स्वच्छ और बेहतर पर्यावरण के लिए जरूरी है कि हम प्रकृति की इस मूक भाषा को समझें और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अपना-अपना योगदान दें।

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