उत्तराखण्ड बनेगा जैविक प्रदेश

Submitted by HindiWater on Fri, 11/15/2019 - 16:36
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अमर उजाला 15 नवम्बर, 2019

फोटो - Hindustan

उत्तराखण्ड को जैविक कृषि प्रदेश बनाने के लिए प्रदेश में मंत्रिमंडल ने उत्तराखण्ड जैविक कृषि विधेयक 2019 को मंजूरी दे दी है। आगामी विधानसभा सत्र में विधेयक सदन के पटल पर रखा जाएगा।
 
विधेयक लागू होने के बाद प्रदेश के 10 ब्लॉकों को जैविक खेती के लिए अधिसूचित किया जाएगा। इन ब्लॉकों में रासायनिक और सिथेंटिक उर्वरक, कीटनाशक, खरपतवार नाशक, रासायनिक पशुचारा की बिक्री निषेध की जाएगी। अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर एक वर्ष का कारावास और एक लाख रुपए के जुर्माने का भी प्रावधान है। पायलट स्तर पर प्रयोग के बाद इसे पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में प्रस्तुत 30 प्रस्तावों में से 28 को मंजूरी मिली है। कैबिनेट मंत्री और शासकीय प्रवक्ता मदन कौशिक ने बताया कि कैबिनेट ने जैविक कृषि विधेयक को मंजूरी दी है। पहले चरण में चिन्हित ब्लॉकों में रासायनिक खाद्य और अन्य कृषि में इस्तेमाल होने वाले रसायन भी प्रतिबंधित रहेंगे। जैविक प्रमाणीकरण के लिए किसानों को हर तरह की सुविधाएँ मुहैया करवाई जाएगी। किसानों को प्रमाणीकरण, बीज, प्रशिक्षण, विपणन से लेकर हर तरह की मदद मिलेगी।
 
उत्तराखण्ड फल पौधशाला विधेयक को मंजूरी

प्रदेश में हार्टिकल्टर को बढ़ावा देने के लिए मंत्रिमंडल ने उत्तराखण्ड फल पौधशाला (नर्सरी) विधेयक को मंजूरी दी है। इसमें पौध नर्सरी खोलने के लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं। नर्सरी के पौधे की गुणवत्ता के लिए संचालक जिम्मेदार होगा। राज्य के बाहर से आने वाले पौधों को बेचने के लिए नियम कड़े रहेंगे। नए फलदार पौधों को पेटेंट करवाने की व्यवस्था रहेगी। तय मानकों के अनुसार पौधे नहीं पाए जाने पर 50 हजार रुपए जुर्माने और छह माह के कारावास का प्रावधान रहेगा।
 
स्टोन क्रशर लगाने की नीति में बदलाव

मंत्रिमंडल ने स्टोन क्रशर, स्क्रीनिंग प्लांट, मोबाइल स्क्रीनिंग प्लांट, हाट मिक्स प्लांट और मोबाइल स्टोन क्रशर की नीति में संशोधन प्रस्ताव को मंजूरी दी है। अब उन्हीं व्यक्तियों या फर्मों को स्टोन क्रशर आदि लगाने की इजाजत होगी, जिनके नाम पर खनन पट्टा होगा या उन्होंने पट्टाधारक से एमओयू हस्ताक्षरित कर रखा हो। वहीं, स्टोन क्रशर या प्लांट लगाने की अनुमति अब पाँच वर्ष के स्थान पर 10 वर्ष के लिए दी जाएगी। इसके लाइसेंस शुल्क में भी बढ़ोत्तरी कर दी गई है।
 
जैविक खेती के लिए बना सुरक्षा कवच

प्रदेश में आर्गेनिक एक्ट को मंजूरी देकर सरकार ने जैविक खेती को सुरक्षा कवच दिया है। इस एक्ट को पहले चरण में प्रदेश के 10 ब्लाकों में लागू किया जाएगा। जहाँ पर रसायनिक, सेथेंटिक उर्वरकों, कीटनाशक, खरपतवार नाशक, पशुचिकित्सा,दवाइयों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। इसका उल्लघंन करने पर एक लाख का जुर्माना व एक साल के कारावास का प्रावधान किया गया है। एक्ट में किसानों के लिए जैविक उत्पाद के प्रमाणीकरण और उत्पाद क्रय करने वाली कम्पनियों के पंजीकरण की प्रक्रिया को सरल किया गया है। वहीं, जैविक उत्तराखण्ड ब्रांड के रूप में प्रदेश के आर्गेनिक उत्पादों की राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मार्केटिंग को बढ़ावा दिया जाएगा।

पिछले डेढ़-दो साल से चल रही प्रक्रिया के बाद आखिरकार उत्तराखण्ड जैविक कृषि विधेयक पर बुधवार को कैबिनेट की मुहर लग गई है। पहली बार प्रदेश में इस एक्ट के लागू होने से जैविक खेती में सरकार को अच्छे संकेत मिलने की उम्मीद है। आर्गेनिक एक्ट में प्रमाणीकरण से लेकर मार्केटिंग और किसानों को उन्नत जैविक बीज उपलब्ध कराने का प्रावधान है। किसानों को उत्पाद के प्रमाणीकरण के लिए ऑनलाइन और ऑफ लाइन आवेदन की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। उत्पादों को खरीदने वाली कम्पनियों को पंजीकरण करना अनिवार्य होगा। इसके लिए कोई फीस नहीं ली जाएगी। बता दें कि आर्गेनिक कृषि योजना के तहत प्रदेश में 3900 जैविक क्लस्टर विकसित करने पर काम चल रहा है। इसके लिए केन्द्र सरकार की ओर से 400 करोड़ की राशि भी स्वीकृत की जा चुकी है।
 
जैविक राज्य मिशन के प्रयोग में लगे 13 वर्ष

सिक्किम देश का पहला जैविक राज्य है। छोटे से क्षेत्रफल के बावजूद इस मुकाम तक पहुँचने में राज्य को 13 वर्ष लगे। इस दौरान वहाँ किसानों ने कई दुश्वारियाँ झेली। कृषि उत्पादन गिरना बड़ी समस्या रही, वहीं दावों के अनुरूप ऊँचे दाम नहीं मिले। किसानों के सामने विपणन और स्टोरेज सबसे बड़ी समस्या पूर्ण जैविक राज्य बनने के बाद भी खत्म नहीं हुई। उत्तराखण्ड को पूर्ण जैविक प्रदेश बनने में नीति निर्धारकों को सिक्किम से सीख लेनी होगी।
 
सिक्किम ने वर्ष 2013 में जैविक मिशन शुरू किया। वर्ष 2016 में सिक्किम को पूर्ण जैविक प्रदेश घोषित किया गया। जैविक खेती की दिशा में बढ़ने वाले उत्तराखण्ड के अलावा नौ प्रदेश हैं। कर्नाटक, मिजोरम, केरल, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु और गुजरात में जैविक खेती को लेकर नीति या कानून है। उत्तराखण्ड ने काफी हद तक सिक्किम का मॉडल अपनाया है। सिक्किम के जैविक प्रदेश में तब्दील होने पर सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट ने वहाँ के चारों जिलों का सर्वेक्षण कर अपनी रिपोर्ट दी थी। यह रिपोर्ट जैविक खेती की ओर बढ़ रहे राज्यों के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकती है। इस रिपोर्ट में सबसे बड़ी समस्या किसानों के सामने कृषि उत्पादन गिरने के बताई गई है। रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग को खत्म करने से किसानों का उत्पादन तेजी से गिरा। कई जगह एक तिहाई रह गया।
 
विशेषज्ञ मानते हैं कि शुरूआती चरण में ऐसी समस्या होती है, लेकिन समय के साथ उसमें सुधार आ सकता है अगर सही तरीके से प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल किया जाए। सिक्किम सरकार ने इसके लिए पूरी व्यवस्था बनाई और किसानों के प्रशिक्षण दिया। उत्तराखण्ड को भी ऐसा करना होगा, लेकिन फसलों की उत्पादकता गिरने पर भरपाई के लिए कोई फार्मूला भी देना होगा। किसानों को भूमि प्रमाणिकता में दिक्कतें आई। इसके लिए भी ट्रेनिंग बेहद जरूरी है। सिक्किम ने चरणबद्ध तरीके से रसायनिक उर्वरक कम किए।
 
मिशन को शुरू करने के 11 वर्ष बाद 2014 में पूर्ण प्रतिबंध लगाया। इसके बाद बेचने पर दंड और सजा का प्रावधान किया। प्रदेश ने 10 हजार से अधिक केचुआ खाद और प्राकृतिक खाद के गड्ढे बनवाए। किसानों के सामने दूसरी समस्या कीटनाशकों का उपयोग नहीं होने से खेती पर लगने वाला कीट और खरपतवार रही। इसके अलावा विपणन की ठोस प्रणाली विकसित करने के लिए सिक्किम से सबक लेना होगा, जहाँ विपणन को लेकर किसान अब तक समस्याएँ झेल रहे हैं।
 
80 हजार किसान कर रहे जैविक खेती

उत्तराखण्ड में परम्परागत कृषि विकास योजना के तहत प्रदेश में 500 क्लस्टरों में करीब 80 हजार किसान आर्गेनिक खेती से जुड़े हैं। नैनीताल, पौड़ी, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, चम्पावत, देहरादून, टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली जिले के अलावा जैविक उत्पादन परिषद के क्लस्टरों में जैविक खेती की जा रही है। जिसमें मंडुवा, गहत, बासमती चावल, मक्की, चैलाई, सोयाबीन, काला भट्ट, रामदाना, राजमा, गेहूँ, मसूर, सरसों के अलावा सब्जी व मसालों का उत्पादन शामिल है। प्रदेश में 176279 क्विंटल जैविक कृषि उत्पादों का उत्पादन हो रहा है। जिसकी मार्केट वैल्यू करीब 4254 लाख रुपए हैं।
 
आर्गेनिक राज्य के रूप में विकसित होगा उत्तराखण्ड

कृषि मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि प्रदेश सरकार जैविक कृषि विधेयक ला रही है, जिसका उद्देश्य राज्य में जैविक खेती को बढ़ावा देना होगा और उत्तराखण्ड आर्गेनिक राज्य के रूप में विकसित हो सकेगा। उन्होंने कहा कि जिन आर्गेनिक उत्पादों का एमएसपी केन्द्र सरकार ने भी घोषित नहीं किया, उनका एमएसपी घोषित करने वाला उत्तराखण्ड बीज एवं तराई विकास निगम की बैठक ले रहे थे। उन्होंने कहा कि परम्परागत कृषि विकास योजना के तहत दो लाख एकड़ भूमि पर आर्गेनिक खेती की जा रही है। इसके तहत 10 ब्लाकों को आर्गेनिक घोषित किया जा चुका है। पहले चरण में इन बलाकों में किसी भी तरह के रसायन, कीटनाशक, खरपतवार नाशक की बिक्री पर पूरी तरह से पाबंदी लगाई गई है। उन्होंने कहा कि जिन आर्गेनिक उत्पादों का केन्द्र सरकार ने एमएसपी घोषित करने वाला उत्तराखण्ड देश का पहला राज्य बनेगा। उन्होंने बताया कि मंडी परिषद में रिवालविंग फंड जनरेट करने का निर्णय लिया गया है। फंड के माध्यम से पूरे आर्गेनिक उत्पाद को मंडी खरीदेगी और उसकी प्रोसेसिंग करने के बाद उसकी मार्केटिंग करेगी। जो लाभ होगा, उसे किसानों में बांट दिया जाएगा। उद्यानिकी क्षेत्र में नर्सरी को अधिनियम के दायरे में लाया जा रहा है।
 
प्रदेश में बंजर जमीन का हो सकेगा उपयोग

प्रदेश में बंजर और किसी उपयोग में नही लाई जा रही कृषि भूमि को 30 साल के अनुबंध के आधार पर अब भू स्वामी किसी अन्य को लीज पर दे सकेगा। इससे सम्बन्धित जमींदारी एवं भूमि विनाश अधिनियम के संशोधन को मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी है। पूर्व में इस संशोधन प्रस्ताव को प्रदेश सरकार ने अध्यादेश के रूप में राज्यपाल को भेजा था। राजभवन ने इसमें हैंप पर आपत्ति जताई थी। मंत्रिमंडल ने बुधवार को हैंप हटाकर इस संशोधन प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।
 
कैबिनेट से अनुमोदित प्रस्ताव के मुताबिक कृषि बागवानी, जड़ी-बूटी उत्पादन, बेमौसमी सब्जियाँ, औषधीय पौधों, सुगन्धित पौधों, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन आदि कार्यों के लिए किसी व्यक्ति, संस्था, न्यास समिति एवं स्वयं सहायता समूह को अधिकतम 30 साल के लिए शर्तें तय करते हुए लीज पर दिया जा सकेगा। यह लीज नगद, उपज या उपज के किसी अंश को शामिल करते हुए हो सकती है। इसी तरह मंत्रिमंडल ने अधिनियम की धारा 156 में संशोधन करते हुए लीज पर देने में कृषि एवं फल संस्करण, औद्योगिक, चाय बागान और प्रसंस्करण, वैकल्पिक ऊर्जा को भी शामिल कर लिया गया है।
 
मंत्रिमंडल के इस फैसले से प्रदेश में भूस्वामी अब अपनी अनुपयोगी कृषि भूमि को पट्टे पर दे सकेंगे। इससे वैकल्पिक ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आवेदन करने वालों को राहत मिलेगी। इसके लिए कई आवेदनकर्ताओं को अब जमीन उपलब्ध होगी। दरअसल किसी अन्य की जमीन पर प्लांट लगाने से इन्हें बैंकों स लोन नहीं मिल पा रहा था। अब एग्रीमेंट के आधार पर ये बैंकों से ऋण ले सकेंगे। हालांकि प्रदेश सरकार को इसमें भांग के औद्योगिक उत्पादन के मंसूबे से हाथ पीछे खींचना पड़ा है। राजभवन ने इस संशोधन में हैंप (भांग) की खेती को मंजूरी देने से मना कर दिया था।

आर्गेनिक खेतीः ब्रांडिंग और मार्केटिंग हैं असल चुनौती

त्रिवेन्द्र सरकार राज्य में आर्गेनिक खेती क बढ़ावा देने के लिए कानून तो बनाने जा रही है। लेकिन आर्गेनिक खेती का वातावरण तैयार करने के लिए सरकार व किसानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। आर्गेनिक खेती के सामने सबसे बड़ी चुनौती उत्पादों की ब्रैडिंग व मार्केटिग की है।
पिछले कई वर्षों से आर्गेनिक खेती का राग अलाप रहे उत्तराखण्ड अब तक अपना आर्गेनिक ब्रांड के तौर पर पहचान नहीं बना पाया है। पर्वतीय क्षेत्रों में भारी सम्भावनाओं के बावजूद मंडियों और कोल्ड स्टोरेज की अनुपलब्धता जैविक खेती की राह में बड़ी अड़चन है।
 
राज्य गठन के बाद से अब तक पर्वतीय क्षेत्रों में लघु और सीमांत किसानों के सामने कृषि उत्पादों की मार्केटिंग सबसे बड़ी समस्या रही है। विपणन की सुविधा न होने के कारण किसानों को उत्पाद का सही दाम नहीं मिल पाता है। प्रदेश में आर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कानून तो बना रही है। लेकिन उत्तराखण्ड को आर्गेनिक स्टेट बनाने की राह में कई तरह की चुनौतियाँ हैं। जो किसान जैविक विधि से खेती बाड़ी उत्पादन कर रहे हैं। उन्हें बाजार में सही दाम नहीं मिल रहे हैं। आम कृषि उत्पाद की तुलना में आर्गेनिक की कीमत ज्यादा है। राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर आर्गेनिक उत्पाद की माँग होने के बावजूद ही उत्तराखण्ड अपना आर्गेनिक ब्रांड तैयार नहीं  कर पाई हैं। वहीं, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की तर्ज पर प्रदेश के आर्गेनिक उत्पादों की पैकेजिंग नहीं है। जिससे किसानों के उत्पादों को वैश्विक बाजार में पहचान मिल सके। हालांकि आर्गेनिक एक्ट में सरकार ने आर्गेनिक उत्पादों की ब्रांडिंग का प्रावधान है।

उत्पादन कम फिर भी किसानों को फायदा

कृषि विभाग के एक आकलन के मुताबिक जैविक खेती में लागत अधिक है और उत्पादन भी कम है। इतना होने पर भी जैविक में अगर उत्पाद माँग के हिसाब से बिक जाए तो कुल मिलाकर किसान को लाभ होने का ही अनुमान है। कृषि विभाग ने हरिद्वार के कुछ क्षेत्रों में परम्परागत रूप से हो रही खेती और जैविक खेती का तुलनात्मक अध्ययन किया था। इस अध्ययन में पाया गया कि परम्परागत रूप से खेती करने पर धान की उत्पादकता 25.9 क्विंटल तथा जैविक धान की उत्पादकता 22.78 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पाई गई। कृषि विभाग ने माना कि कुल मिलाकर इससे किसानों को फायदा ही होगा।

प्रदेश में किसानों को घटिया फलदार पौधे बेचकर धोखाधड़ी करने पर अब नर्सरी संचालकों को जेल जाना पडेगा। राज्य के करीब 10 लाख किसानों के हितों को सुरक्षित करने के लिए उत्तराखण्ड फल पौधशाला विनियमन विधेयक (नर्सरी एक्ट) को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। नर्सरी संचालकों को पौधों की गुणवत्ता की गारंटी देनी होगी।
 
घटिया पौधे बेचने पर संचालक को छह माह की कैद और 50 हजार रुपए जुर्माना किया जाएगा। इस विधेयक को पारित करने के लिए आगामी सत्र में विधानसभा पटल पर रखा जाएगा। राज्य में सरकारी और निजी पौधशाला से किसान विभिन्न प्रकार के फलदार पौधे खरीदते हैं। तीन से चार साल की मेहनत करने के बाद जब पौधा फल देने के लायक होता है, तो कई बार पौधे पर फल ही नहीं लगते हैं। इससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। अब सरकार ने नर्सरी एक्ट बना कर किसानों के हितों को सुरक्षित किया है। किसान जिस नर्सरी से पौधे खरीदेंगे। संचालकों को उसकी उन्नत किस्म व गुणवत्ता की गारंटी देनी होगी। इसके बावजूद भी खरीदे गए पौधों पर फल नहीं लगते हैं तो संचालकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का प्रावधान एक्ट में किया गया है।
 
हर साल संचालकों को नर्सरी का नवीनीकरण करना होगा। इसके साथ ही पौधों के आयात-निर्यात, नई खोज का पेटेंट, उत्पादन, प्रबंधन समेत तमाम जानकारी का रिकॉर्ड रखना अनिवार्य होगा। एक्ट का पालन न करने पर लाइसेंस निरस्त किया जाएगा।

बिच्छू घास (कंडाली) के रेशे से बनी जैकेट

प्रदेश के जंगलों और गंदेरों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला बिच्छू घास यानी हिमालयन नेटल (पहाड़ी बोली में कंडाली) के रेशे से तैयार जैकेट पहनकर बुधवार को मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत और उनके मंत्री कैबिनेट की बैठक में पहुँचे। उद्योग विभाग के सहयोग से चमोली जनपद के मंगरौली और उत्तरकाशी के भीमताल में कंडाली के रेशे से जैकेट बनाई जा रही है। बाजार में इस जैकेट की कीमत 2000 से 3 हजार रुपए तक है। इस जैकेट की खास बात ये है कि पैरा बैंगनी किरणों से बचती है। वहीं, गर्मी व सर्दी दोनों ही मौसम में इसे पहना जा सकता है। प्रदेश के उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए बुधवार को मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों से इस जैकेट को पहनकर मंत्रिमंडल की बैठक में भाग लिया।
 

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