लखनऊ महानगर: वायु प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Air Pollution)

Submitted by Hindi on Mon, 03/12/2018 - 17:15
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शोध प्रबंध 'बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय पी.एच.डी. (भूगोल) उपाधि हेतु प्रस्तुत' भूगोल विभाग अतर्रा स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अतर्रा (बांदा) 2001

पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति का कारण उसके चारों ओर गैसों का घेरा है जिसे वायुमंडल कहते हैं। ‘‘पृथ्वी को चारों ओर से घेरने वाले अभिन्न अंगभूत गैसों के लिफाफे को वायुमंडल की संज्ञा दी जाती है यह सैकड़ों मील की ऊँचाई तक विस्तृत है।’’

‘वायुमंडल’ शब्द यूनानी शब्द Atmos से बना है, जिसका अर्थ होता है वाष्प (Vapour) लेकिन फिर भी इसे वाष्पमंडल नहीं कह सकते, क्योंकि वायुमंडल में प्राप्त सभी गैसें वाष्पयुक्त नहीं होती है। अत: वायुमंडल के विषय में यह कहा जाता है कि पृथ्वी को चारों ओर से गैसों की एक चादर गुरुत्वाकर्षण शक्ति के द्वारा घेरे हुए है, जिसे वायुमंडल कहते हैं।

हमारा वायुमंडल अनेक प्रकार की गैसों का समिश्रण है। वायुमंडल में नाइट्रोजन (78.09%), ऑक्सीजन (20.99%), ऑर्गन (0.93%), कार्बनडाइऑक्साइड (0.032%), नियॉन (18.0 पीपीएम), हीलियम (5.2 पीपीएम), कार्बन मोनोऑक्साइड (0.25 पीपीएम), ओजोन (002 पीपीएम), सल्फर डाइऑक्साइड (0.001 पीपीएम), नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (0.001 पीपीएम) आदि गैसें पाई जाती हैं। वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण क्रिया से मुक्त ऑक्सीजन के कारण स्थिर रहती है। परंतु पिछले 100 वर्षों में लगभग 24 लाख टन आॅक्सीजन वायुमंडल से समाप्त हो चुकी है तथा उसका स्थान 36 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड ले चुकी है।

वायु प्रदूषण : अर्थ एवं परिभाषा :


वायु प्रदूषण को परिभाषित करते हुए हेनरी एच. पार्किन्स1 (H. Parkins) ने कहा- ‘‘जब वायुमंडल में वाह्य स्रोतों से विविध प्रदूषक यथा- धूल, गैसें, दुर्गंध, धुंध, धुआँ और वाष्प आदि इतनी मात्रा में और अवधि में उपस्थित हो जाए कि उससे मानव स्वास्थ्य, सुखी जीवन और संपति को हानि होने लगे और जीवन की गुणवत्ता बाधित हो तो उसे वायु प्रदूषण कहते हैं।’’

स्पष्ट है कि सभी जीव एक निश्चित अनुपात वाली वायु के अभ्यस्त होते हैं। लेकिन जब अवांछनीय तत्व असंतुलित अनुपात में वायु के सम्पर्क में आते हैं तो उनकी कठिनाई बढ़ने लगती है। यह कठिनाई जान लेवा भी हो सकती है। अत: वायु प्रदूषण ऐसी वायु का प्रतीक है जो नुकसानदेह हो।

विश्व स्वास्थ्य संगठन2 के अनुसार- ‘‘प्रदूषण एक ऐसी परिस्थिति है जिसमें वाह्य वायुमंडल में ऐसे पदार्थों का संकेंद्रण हो जाता है जो मानव एवं उसके चतुर्दिक विद्यमान पर्यावरण के लिये हानिकारक होते हैं।’’

“Air pollution may be define as limited to situation in which the outdoor ambient atmosphere contains materials in concentration, which are harmful to man and his surrounding environment.”

‘‘वायु प्रदूषण वह अवस्था है जिसका प्रतिकूल प्रभाव मनुष्य के स्वास्थ्य पर और उसकी सम्पदा पर पड़ता है। इसका प्रभाव विभिन्न लोगों पर विभिन्न प्रकार से पड़ता है। किसान पर इसका प्रभाव उसकी फसल की क्षति, गृह स्वामिनी पर उसके वस्त्र और सामान्य जनता पर उसके स्वास्थ्य खराब हो जाने के रूप में पड़ता है।’’

वायु प्रदूषण नियंत्रण एवं निवारण अधिनियम 1981 की धारा-2 के अनुसार वायु प्रदूषण का अर्थ है- ‘‘वायुमंडल में किसी वायु प्रदूषक की उपस्थिति, जो ठोस तरल या गैसीय हो और जिसकी वायुमंडल में इतनी सांद्रता हो कि वह मानव के लिये या किन्हीं अन्य जीवित प्राणियों के लिये तथा वनस्पतियों के लिये या किसी सम्पदा के लिये या पर्यावरण के लिये हानिकारक हो, वायु प्रदूषण कहलाती है।’’

मनुष्य की गतिविधियों के कारण वायुमंडल में जब विभिन्न गैसें एवं धूल कण मिल जाते हैं, तो वे प्रदूषक बन जाते हैं, और यदि उनकी सांद्रता अधिक हो जाती है तो उसके परिणाम अनष्टिकारी हो जाते हैं। वायुमंडल में मानव उत्क्षेप वायुमंडल में विद्यमान प्रदूषकों से अधिक हानिकारक सिद्ध होते हैं। वायु में कुछ अशुद्धियाँ प्राकृतिक क्रियाओं के कारण भी मिल जाती है। इस प्रकार वायु का शुद्धतम रूप प्राप्त होना अत्यंत कठिन है। सल्फरडाइऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड, कार्बनमोनो ऑक्साइड, मीथेन आदि हानिकारक गैसें, ज्वालामुखी, वनस्पति का सड़ना गलना, जंगली अग्नियाँ तथा तूफान जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं के द्वारा वायुमंडल में मिलती रहती हैं। इन प्राकृतिक प्रक्रियाओं के द्वारा होनेवाले प्रदूषण को रोकने की सामर्थ्य मनुष्य में नहीं हैं। इन प्राकृतिक प्रदूषकों का प्रभाव गंभीर वायु प्रदूषण उत्पन्न नहीं करता है। इनका प्रभाव स्थानीय तथा अल्पकालिक होता है।

वायुप्रदूषण की गंभीर समस्या उत्पन्न करने में मानव का अधिक प्रभाव पड़ता है। इसके द्वारा जैविक र्इंधन का दहन, फसलों के उत्पादन एवं रक्षण के लिये कीटनाशकों उर्वरकों, खरपतवार नाशकों का प्रयोग, अणु ऊर्जा का शांतिपूण एवं युद्ध कार्यों के लिये विकास, रेलगाड़ी, स्वचलित वाहन, वायुयान, जलयान, रॉकेट, मिसाइल, तेल शोधक कारखाने, कच्चे माल को तैयार माल में परिवर्तित करना, भूमि की सफाई, मार्गों का निर्माण भवनों का तोड़ना एवं निर्माण, रासायनिक उत्पादों का निर्माण कार्य आदि मनुष्य द्वारा जो भी आराम दायक वस्तुओं का निर्माण किया जाता है। उन सभी निर्माण इकाइयों द्वारा किसी न किसी रूप में वायुमंडल में विषैली गैसों का उत्सर्जन होता है। उत्सर्जित गैसों तथा वायुमंडल में उपस्थित गैसों के साथ जटिल प्रतिक्रियाएँ होती हैं। सौर्यिक विकिरण से उत्पन्न प्रक्रियाएँ इन गैसों के यौगिक को और अधिक जटिल बना देती है। उदाहरणार्थ पेट्रोल चलित वाहनों से निकलने वाली गैसों से सौर्यिक विकिरण की क्रिया होने पर पेरोक्सी-एसिटाइल नाइट्रेट (PAN) उत्पन्न होता है जो बड़ा घातक प्रदूषक माना जाता है। वायु प्रदूषण का विस्तार अपने स्रोत से अधिक दूर तक आसानी से हो जाता है। यह नगर प्रांत, देश एवं महाद्वीप की सीमाएँ पार करके सम्पूर्ण ग्लोब में फैल जाता है। अंटार्कटिका जैसे निर्जन बर्फीले महाद्वीप में पाई जाने वाली पेग्विन चिड़ियाँ के लीवर एवं चर्बी में डीडीटी के जमाव पाये गये हैं, जो यह प्रमाणित करता है।

हम सभी जानते हैं कि गंदा खाने पीने से हम बीमार हो जाते हैं। अत: अशुद्ध तथा दूषित भोजन, जल आदि से बचते हैं इसी प्रकार शुद्ध वायु भी जीवन के लिये आवश्यक है। यह जानते हुए कि वायु प्रदूषित है और वहाँ पर सांस लेना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है हम सांस लेना बंद नहीं कर सकते हैं। वायु प्रदूषण के अंतर्गत प्रदूषकों, उनके वायुमंडलीय प्रतिरूपों और प्रदूषण स्तर का अध्ययन होता है। इसमें मानव, पौधों एवं पशुओं के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले कुप्रभावों का भी अध्ययन होता है। भूगोलवेत्ताओं द्वारा वायु प्रदूषण सम्बन्धी कार्य भारत में न्यून किंतु पश्चिमी देशों में अधिक हुए हैं।

अ. प्रमुख वायु प्रदूषक तत्व


वायु प्रदूषकों को उनकी प्रकृति के अनुसार तीन वर्गों में रखा जा सकता है,
1. गैसीय प्रदूषक,
2. कणकीय प्रदूषक,
3. गंध प्रदूषक

1. गैसीय प्रदूषक :


कार्बन डॉइऑक्साइड (CO2) - यह गैस वायु की महत्त्वपूर्ण घटक है तथा जैव मंडल के कार्बन चक्र का एक हिस्सा है। जैव र्इंधन के दहन (कोयला, तेल तथा गैस) से यह गैस भारी मात्रा में उत्पन्न होती है। अनुमानत: ग्लोबीय स्तर पर CO2 संकेंद्रण 0.7 PPM प्रतिवर्ष की दर से हो रहा है। यह गैस सूर्य की विकिरण ऊर्जा को सोखती है जिससे ग्रीन हाउस की स्थिति उत्पन्न होती है।

आज विश्व अर्थव्यवस्था में ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत जीवाश्म र्इंधन हैं जिसकी कुल भागीदारी 95 प्रतिशत है। वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन की अंत सरकारी सूची का निर्माण ‘संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम’ ‘विश्व मौसम विज्ञान संगठन3 के तत्वावधान में किया तथा निष्कर्ष में कहा कि जलवायु को ठीक रखने के लिये कार्बनडाइऑक्साइड के वर्तमान सांद्रण से 60 प्रतिशत की कटौती अपरिहार्य है।

जलवायु के कम्प्यूटर मॉडल4 बताते हैं कि धरती की सतह के औसत तापमान में अगले 100 वर्षों में 1.5 से 4.50C की वृद्धि होगी। पिछले 9000 सालों में हुए ऐसे किसी परिवर्तन की तुलना में यह सबसे अधिक तेज परिवर्तन होगा। कुछ शोधों के अनुसार यह स्पष्ट हो चुका है कि पिछले 100 वर्षों में धरती के औसत तापमान में 0.3-060C की वृद्धि हो चुकी है। जीवाश्‍म र्इंधन से कार्बनडाइ ऑक्साइड गैस वर्ष 1950 से वर्तमान समय तक 3.6 गुना बढ़ी है।

मीथेन (CH4) :- यह वायु मंडल में हरित भवन प्रभाव उत्पन्न करती है इसके स्रोत जैविक प्रक्रियाएँ यथा-पशुओं के खमीर, नम भूमि की वायु विहीन दशा, वायोमास र्इंधन दहन आदि है। समताप मंडल में मीथेन के सांद्रण में वृद्धि होने से जलवाष्प में वृद्धि होती है और हरित भवन प्रभाव उत्पन्न होता है। एक अनुमान के अनुसार 400×1012 से 765×1012 ग्राम मीथेन प्रतिवर्ष वायुमंडल में पहुँच रही है। मीथेन गैस कृषि क्षेत्र बदलने से, खासकर धान की खेती से, वनों के कटान से निकलती है। टुंड्रा क्षेत्र में मीथेन गैस मुक्त होने से आर्कटिक क्षेत्र भी मीथेन गैस के उत्सर्जन का कारण बन सकता है। यह गैस दूसरे रसायनों के साथ अभिक्रिया करके नष्ट हो जाती है तथा वायुमंडल में 10 साल तक उपस्थित रहती है।

कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO) - यह प्राकृतिक वायु का घटक नहीं है। यह कार्बन युक्त र्इंधन के अपूर्ण ज्वलन से उत्पन्न होती है। यह गैस नगरीय एवं ग्रामीण प्रदूषण का मुख्य अवयव है। वाहनों की वृद्धि इस गैस के व्यापक उत्सर्जन का कारण है। वायु में इसकी 100 PPM की मात्रा 1 घंटे में व्यक्ति को मूर्छित कर सकती है तथा 4 घंटे में उसकी जान ले सकती है।

भारतीय पेट्रोलियम संस्थान ने दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बंगलुरु में 1983-84 में वाहनों के उत्सर्जन का अध्ययन करके पता लगाया कि इनसे कार्बन मोनोऑक्साइड व हाइड्रोकार्बन की मात्रा क्रमश: 210.00 तथा 82000 टन प्रतिवर्ष थी। इसके 2001 तक 257 प्रतिशत बढ़ने की संभावना है।

कार्बन मोनो ऑक्साइड एक अनुमान के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष 6 बिलियन टन बढ़ती है जो वायु मंडल में स्थित प्रदूषकों के 50 प्रतिशत भाग का प्रतिनधित्व करती है। अकेले कोलकाता नगर प्रतिदिन 450 टन कार्बन मोनो ऑक्साइड वायुमंडल में विसर्जित करता है।

नाईट्रोजन पर ऑक्साइड (NO2) - नाईट्रोजन के महत्त्वपूर्ण ऑक्साइड जो वायु को प्रदूषित करते हैं। नाइट्रिक ऑक्साइड NO नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) तथा नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) है। ज्वलन प्रक्रिया के समय वायु मंडलीय नाइट्रोजन ऑक्सीजन से मिलकर नाइट्रोजन ऑक्साइड बनाती है। इस प्रकार स्टील संयंत्रों की भठ्ठियों तथा इंजनों से निकलने वाले उत्क्षेप सदैव नाइट्रोजन के ऑक्साइड का उत्पादन करते हैं। यह प्रकाश और हाइड्रोजन कार्बन्स की उपस्थिति में NO2 का अपघटन, प्रकाश तथा रासायनिक कोहरा उत्पन्न करता है। अनुमान के अनुसार 1 टन कोयला जलने पर 5 से 10 किग्रा. नाइट्रोजन ऑक्साइड का निर्माण होता है। 1 टन पेट्रोलियम जलने से 25 से 30 किग्रा. नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्पन्न होता है।

सल्फर ऑक्साइड्स (SO2) - सल्फर डाइऑक्साइडस (SO2) तथा सल्फर ट्राई ऑक्साइड (SO3) महत्त्वपूर्ण सल्फर ऑक्साइड्स है जो वायु प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। कोयले में 0.5 से 6 प्रतिशत तक सल्फर पाया जाता है। कोयला दहन के पश्चात यह SO2, SO3 के रूप में वायुमंडल में पहुँच जाता है नगरीय क्षेत्रों के वायुमंडल में नाइट्रोजन (5 से 20 प्रतिशत), सल्फ्यूरिक एसिड तथा सल्फेट्स पाये जाते हैं। हाइड्रोजन सल्फाइड भी (H2S) जो सड़े अंडे की महक देता है सल्फर का मुख्य स्रोत है। यह गैस दम घोटू होती है तथा स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।

ओजोन (O3) - ओजोन मंडल, वायुमंडल की विभिन्न पर्तों में विशिष्ट लक्षणों के कारण जीव जंतुओं पेड़-पौधों तथा मानव समुदाय के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ओजोन मंडल ओजोन गैस की 25 से 28 मिमी. मोटी परत है जो वायुमंडल में धरातल से लगभग 22 से 25 कि.मी. ऊपर स्थित है।8 ओजोन गहरे नीले रंग की एक प्रदूषक गैस है जो आॅक्सीजन का एक अपरूप है। ऑक्सीजन तथा ओजोन में मुख्य अंतर है की ओजोन के एक अणु में ऑक्सीजन के तीन परमाणु होते हैं जबकि सामान्य ऑक्सीजन के एक अणु में इसके दो परमाणु होते हैं। इसी अंतर के कारण ओजोन में पराबैगनी प्रकार को अवशोषित करने की क्षमता आ जाती है जिसके कारण यह जीव जगत के लिये वरदान है। यह पृथ्वी के लिये सुरक्षा कवच है जो सूर्य से आने वाली प्रचंड एवं प्रखर पराबैगनी किरणों (Ultra Violet rays) का 99 प्रतिशत भाग स्वयं अवशोषित करके मात्र 1 प्रतिशत भाग ही पृथ्वी तक पहुँचने देती है। इस कवच के अभाव में दिन में तापमान 130C और रात का तापमान 150C तक पहुँच जायेगा जैसा की चंद्रमा में होता है।

ओजोन परत के क्षय के बारे में सर्वप्रथम 1970 में इंग्लैंड के वैज्ञानिकों5 को पता चला कि वायुमंडल में ओजोन की परत धीरे-धीरे घटती जा रही है। 1974 में इंग्लैण्ड के वैज्ञानिकों को जानकारी मिली की अंटार्कटिका महाद्वीप के ऊपर इस परत में एक बड़ा छिद्र हो गया है। इसी प्रकार आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि ऊपरी वायुमंडल में कुछ महीनों के लिये छेद बन जाते हैं। 1970 से प्रतिवर्ष आधा प्रतिशत की दर से ओजोन की मात्रा में कमी हो रही है।

ओजोन मंडल के क्षय के उत्तरदायी कारकों में क्लोरोफ्लोरो-कार्बन वर्ग के रसायनों का उत्पादन जिनका उपयोग रेफ्रीजेरेटरों में प्रशीतन के लिये प्रयुक्त फ्रियॉन-11 तथा फ्रियॉन 12 नामक गैसें हैं। ये गैसें दीर्घ जीवी होती है। बैक्टीरिया के आक्रमण से भी यह नष्ट होती और धीरे-धीरे ऊपर बढ़ती जाती है और ओजोन के अणुओं से प्रतिक्रिया कर उन्हें सामान्य ऑक्सीजन में परिवर्तित कर देती है। इसका एक अणु ओजोन के एक लाख अणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है।6 एक अनुमान के अनुसार इन गैसों का वर्तमान की तरह उत्पादन एवं उपयोग होता रहा तो 2050 तक ओजोन का लगभग 18 प्रतिशत भाग समाप्त हो जायेगा। ओजोन क्षय के अन्य कारणों में वृक्षों का नष्ट होना तथा नाइट्रिक ऑक्साइड तथा क्लोरीन ऑक्साइड गैसें हैं जो वायुयान के इंजनों से उत्सर्जित होती है। परमाणु बमों का विस्फोट भी वायुमंडल में अत्यधिक ताप उत्पन्न करता है और नाइट्रिक ऑक्साइड बनाता है। यह गैस भी फ्रियान-11 तथा फ्रियान 12 की तरह ओजोन गैस को ऑक्सीजन में परिवर्तित कर देता है। वैज्ञानिकों के अनुसार 1 मेगाटन का परमाणु बम 5 हजार टन नाइट्रिक ऑक्साइड बनाता है जो 50 हजार टन ओजोन को सहज नष्ट कर देता है। अनुमानत: वायुमंडल में 4.00 अरब टन ओजोन गैस उपस्थित है जो 1000 मेगाटन परमाणु बमों के विस्फोट से समाप्त हो जायेगी। ओजोनपर्त को नष्ट करने वाले उपयोगों को पहले कम करने और फिर पूर्णतया बंद करने के लिये मॉन्ट्रियल प्रोटोकाल के लागू हो जाने से कमी की संभावना है, किंतु परिणाम बहुत विलंब से दिखेंगे।

फ्लोरीन (Fluorine) - कोयले में 0.7 प्रतिशत क्लोरीन और 0.01 प्रतिशत फ्लोरीन पायी जाती है जब कोयला जलाया जाता है तो ये दोनों गैसें हाइड्रोक्लोरिक एसिड (Hcl) और हाइड्रोजन फ्लोरिक (Haf) तथा सिलिकन ट्रेटा फ्लोराइड (Sif4) के रूप में वायु मंडल में पहुँच जाती है। जिन क्षेत्रों में चिमनियों का धुआँ ऊपर उठता है वहाँ की वायु में 0.04 मिग्रा./मी.3 की दर से फ्लोरीन के यौगिक मिलते हैं। फ्लोरीन वनस्पतियों, जल तथा मिट्टी में एकत्रित हो जाता है। यह पशुओं तथा मनुष्य के दाँतों को हानि पहुँचाता है।

अम्ल (Acids) यह कार्बनिक तथा अकार्बनिक दो प्रकार के होते हैं।

कार्बनिक अम्ल - यह र्इंधन के अर्द्धदहन प्रक्रिया से प्राप्त होता है। यह उद्योगों द्वारा उत्पन्न होता है। ऐसिटिक अम्ल, प्यूमिरिक अम्ल तथा टैनिक अम्ल चमड़ा रंगने के उद्योगों में प्रयुक्त होते हैं।

अकार्बनिक अम्ल - सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) सर्व सामान्य अकार्बनिक अम्ल है जो सल्फर डाइआॅक्साइड से उत्पन्न होता है। यह कोयला और पेट्रोलियम दहन से भी अल्प मात्रा में प्राप्त होता है। जल से मिलने पर भी नाइट्रोजन ऑक्साइड भी नाइट्रिक एसिड बन जाता है। इसके अतिरिक्त हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा हाइड्रोफ्लोरिक अम्ल भी कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं द्वारा उत्पन्न होते हैं। यह सभी हानिकारक है।

2. कणकीय प्रदूषक


वायूढ़ कण (Aerosois) - एक माइक्रोन से 10 माइक्रोन आकार वाले सूक्ष्मकणों को एयरोसॉल कहते हैं। इनका अविर्भाव कारखानों, बिजली घरों स्वचालित वाहनों, आवासों को गर्म करने तथा कृषि कार्यों से होता है। अन्य दूसरे वायूढ़ कणों में धुओं, कालिख, धूल, कुहासा राख आदि हैं जो वायु में तैरते रहते हैं। ये कण सूर्य से आने वाले विकिरण को रोकते हैं, परावर्तित करते हैं और छितराते हैं। सौर्यिक विकिरण में व्यवधान के कारण ये पर्यावरणीय दुष्प्रभाव उत्पन्न करते हैं तथा मानव स्वास्थ्य को हानि पहुँचाते हैं।

धुआँ (Smok) - यह कालिख, बारीक राख तथा अन्य ठोस एवं तरल कणों (0.075 इंच से 1/30,000 इंच आकार वाले) से बना होता है। इन्हें सूक्ष्मदर्शी से देखना भी कठिन प्रतीत होते हैं। र्इंधन की प्रकृति एवं ज्वलन शीलता के आधार पर अनेक गैस तथा अम्ल धुएँ के साथ रहते हैं धुआँ कई वर्णों में काला, नीला, श्वेत, भूरा एवं पीत हो सकता है। रंग जलाये गये पदार्थ की प्रकृति एवं रंग के आधार पर निर्भर करता है। कोयले के धुएँ में कार्बन अधिक मात्रा में होता है तथा उसका रंग काला होता है। इसमें टैरी हाइड्रोकार्बन होते हैं जो कालिख को चिमनी तथा अन्य वस्तुओं पर जमाने में सहयोग करता है। वायुमंडल में धुआँ एक से दो दिन तक रहता है। यह भवनों तथा श्वसन क्रिया द्वारा अंदर जाकर स्वास्थ्य को हानि पहुँचाता है जो टीबी का कारण बनता है।

धूम्र कुहासा (Smog) - यह धुएँ एवं कुहासे का सम्मिलित रूप है। यह दो प्रकार का होता है -

1. जिन स्थानों पर कोयला मुख्य र्इंधन के रूप में प्रयुक्त होता है वहाँ धूम्र कुहासा रात्रि में अथवा ठंडे दिनों में जब तापमान 100C से नीचे होता है वायुमंडल में छा जाता है। इस धूम्र कुहासे के मुख्य घटक सल्फर के यौगिक, धुआँ राख आदि होते हैं। इस कुहासे से मृत्यु दर बहुत उच्च हो जाती है।

2. अन्य प्रकार का धूम्र कुहासा प्रकाश व रासायनिक उत्पत्ति का होता है जो बड़े नगरों में उत्पन्न होता है जहाँ भारी संख्या में स्वचालित वाहन चलते हैं तथा मौसमी दशाएँ स्वतंत्र वायु प्रवाह को रोकती है। इस प्रकार का धूर्म कुहासा ओलफिनिक हाइड्रोकार्बन और आक्सीडेंटस की सौर्यिक विकिरण के समय प्रक्रिया से उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार के धूम्र कुहासे के मुख्य घटक नाइट्रिक ऑक्साइड, पेरोक्सी नाईट्रेट, हाइड्रोकार्बन्स, कार्बन मोनोऑक्साइड और ओजोन हैं। इससे दृश्यता में कमी, आँख में किरकिराहट, वनस्पति को हानि, रबर का चटक जाना आदि परिणाम होते हैं।

राख (Ash) - यह एक ज्वलनहीन ठोस पदार्थ है। जब र्इंधन जल जाता है तब यह स्वतंत्र रूप से वायुमंडल में पहुँच जाती है। उड़ने वाले लाल एवं गर्म कर्ण भी वायुमंडल में पहुँच जाते हैं। यह वायुमंडल में सौर्यिक विकिरण को छितराने में सहायक होते हैं।

दुर्गंध युक्त धुआँ (Fumes) - दुर्गंध युक्त धुआँ अत्यंत सूक्ष्म कणों के रूप में होता है यह रासायनिक रंगों रबर एवं धातु उद्योगों से भस्मीकरण एवं आसुतीकरण अथवा ठोस पदार्थों के अवस्था संक्रमण उत्पादों के संघनन को बढ़ावा देने वाले रासायनिक कार्यों से उत्पन्न होते हैं। बदबू से युक्त धुएँ के कण एक माइक्रॉन व्यास वाले होते हैं तथा सामान्य तथा धातुओं एवं धात्विक ऑक्साइड एवं क्लोराइडस के बने होते हैं। ये धातु उद्योगों से नि:स्रित होते हैं।

धूल (Dust) - कटाई एवं परिष्करण उद्योगों से, पत्थरों के तराशने से, सीमेंट की खानों, बोन क्रशिंग, पत्थरों को तोड़ने, स्प्रे कार्यों आदि से धूल निकलती हैं, जो रासायनिक प्रक्रियाओं में उत्प्रेरक का कार्य करती है। फ्लोरीन युक्त धूल जो किसी भी उद्योग से निकल सकती है वनस्पति को हानि पहुँचाती है तथा पशुओं में फ्लोरोसिस उत्पन्न कर देती है। खानों की खुदायी, कोयला, चूना, खड़िया तथा रासायनिक पाउडरों के निर्माण से धूल कणों का उत्सर्जन होता है।

धात्विक धूल कण पदार्थों का खनन, निर्माण एवं धातु शोधन कार्य से सम्बन्धित होती है। जिसमें एल्यूमिनियम सीसा, तांबा, लोहा, जस्ता आदि के कण आते हैं।

3. गंध प्रदूषक


गंध (Odours) - ये उद्योगों के उत्पादों के सड़ने-गलने से वायु में मिल जाती है और वायुमंडल में दुर्गंध उत्पन्न कर देती है। अवांछित गंध से वमन एवं नींद में परेशानी उत्पन्न हो जाती है। दुर्गंध की समस्या, माँस मंडियों, मछली मंडियों, मुर्गी पालन केंद्रों, पेंटिंग केंद्रों, नालों आदि के निकट तथा सीवरों के फार्म के निकट पायी जाती है।

ब. लखनऊ महानगर में वायु प्रदूषण के स्रोत एवं स्थिति


लखनऊ महानगर अपनी विशेषताओं को खोकर हमें दु:खद जीवन जीने के लिये पर्यावरण प्रस्तुत कर रहा है। जो नगर बगीचों का नगर कहलाता था, अपने स्वच्छ पर्यावरण के लिये एक मिशाल था, अपनी रंगीन शाम, महिलाबादी आम, चिकन के काम, हिंदू-मुस्लिम संस्कृति की एकता, शतरंज की मौजमस्ती, इक्का घोड़ों की टाप, तबले की थाप, इमामबाड़ों, पहलवानों के अखाड़ों, ऐतिहासिक भवनों, नवाबों की ‘नजाकत और नफासत’ के लिये प्रसिद्ध था आज उसी महानगर को टैम्पों के धुएँ से भरी शाम, महँगे आम, सांप्रदायिक-जातीय दंगों, उजड़े बागों, विज्ञापनों के अतिविस्तार, अश्लील धुनों अस्सी किमी/घंटा की गति से दौड़ती गाड़ियों के शोर और धुएँ ने उदरस्थ कर लिया है।

लखनऊ नगर के वायुमंडल में फैली जहरीली गैसों और धुएँ की काली धुंध अपने चरम पर है। यह धुंध शीतकाल तथा प्रात: 9 से 11 तथा शायं 4 से 7 बजे तो दम घोटने वाली स्थिति पैदा कर देती है। राजधानी की सड़कों पर हजारों, प्रदूषण कारी वाहनों एवं अनियंत्रित यातायात व्यवस्था से दिनों दिन गहराते वायु प्रदूषण ने नवाबी उपवन नगर को निगल लिया है तथा नगर को पर्यावरणीय त्रासदी की अग्रिम पंक्ति पर ला खड़ा किया है। प्रदूषण मापन के सुरक्षित मानक बहुत पीछे छूट गये हैं यहाँ की विषैली हवाओं के कारण श्वास, नेत्र, त्वचा, हृदय के रोग, एलर्जी आदि शहरवासियों में तेजी से फैल रही हैं।

लखनऊ नगर की प्रदूषण की समस्या नगरीकरण की वृद्धि के साथ ही प्रारम्भ हो जाती है। विगत दस बारह वर्षों से प्रदूषण की स्थिति का आकलन विविध संस्थाओं द्वारा किया जाता रहा है। जिनमें से ‘‘औद्योगिक विष विज्ञान केंद्र, राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान केंद्र इंजीनियरिंग कॉलेज’’ राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र, लखनऊ विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज, संगध पौधा अनुसंधान केंद्र आदि नामित किये जा सकते हैं। वायु प्रदूषण की विगत पाँच वर्षों से समस्या अधिक बढ़ती जा रही है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े लोगों को आगाह करते रहे हैं। किंतु ‘प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ को प्रशासन तथा उत्तरदायी संस्थाओं का सहयोग न मिल पाने से जहरीली हवाओं के आंकड़ों पर अंकुश नहीं लगाया जा सका। उत्तरदायी संस्थाएँ, परिवहन विभाग यातायात विभाग, जिला एवं नगर प्रशासन संवेदनशील दस्तावेजों के प्रति अचेत बने रहे।

वायु प्रदूषण के स्रोत : वायु प्रदूषण के विभिन्न स्रोत हैं यहाँ पर वायु प्रदूषण के कतिपय स्रोतों पर विचार किया गया है।

प्राकृतिक स्रोत -


ज्वालामुखी- ज्वालामुखी के उद्गार से धूल, राख, धूम्र, कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन तथा अन्य गैसें निकलती है। इन गैसों द्वारा वातावरण प्रदूषित होता है।

पृथ्व्येत्तर या ग्रहेत्तर - पृथ्वी तथा अन्य बाहरी विशाल वृहदाकार वस्तुओं जैसे अस्टेरायड, मिटियोरायड तथा कामेट की टक्कर के कारण उत्पन्न प्रलयकारी घटना को या ग्रहेत्तर प्रकोप की संज्ञा दी जाती है। पृथ्वी के बाहरी वस्तुओं के टक्कर से अपार धूल राशि का उद्गार होता है। महासागरों में ज्वारीय तरंगे उत्पन्न होती है, भू-तल पर गर्तों एवं क्रेटरों का निर्माण होता है। सागर तल में परिवर्तन होता है। जलवायु में परिवर्तन होता है, विभिन्न जीव प्रजातियों का विलोप होता है और ज्वालामुखी क्रियाओं तथा स्थलाकृतियों में परिवर्तन होता है।

अनेक भू-वैज्ञानिकों की अवधारणा है कि पृथ्वी के विगत इतिहास में पृथ्वी तथा बाहरी वस्तुओं के टक्कर के कम से कम 120 प्रमाण प्राप्त किये जा चुके हैं। डायनासोर के सामूहिक विलोप का कारण पृथ्वी तथा एक वृहदाकार अस्टेराएड के बीच टक्कर था। आरजे हूगेट7 के अनुसार पृथ्वी की कक्षा से होकर गुजरने वाले ऐसे ज्ञात कामेटों की संख्या 50 है। इस प्रकार की घटनाएँ जैव मंडल को हानि पहुँचाती रहती हैं।

हरे पौधों से उत्पन्न प्रदूषण - पेड़ पौधों की पत्तियों से वाष्पोत्सर्जन द्वारा निस्सृत वाष्प, फूलों के पराग तथा पौधों के श्वसन द्वारा निर्मुक्त कार्बन डाइऑक्साइड, वनों में आग लगने से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड, वृक्षों के काटने से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड से वायुमंडल में सतत गर्म होने की वृति बढ़ती जा रही है।

कवक से उत्पन्न प्रदूषण - कवक के बीजाणु वायरस आदि प्रदूषण के कारण बनते हैं।

स्थलीय सतह से उत्पन्न प्रदूषण - पवन के द्वारा धरातलीय सतह से उड़ायी गयी धूल तथा मिट्टियों के कण, सागरों तथा महासागरों की लवण फुहार आदि वायु प्रदूषण के प्राकृतिक स्रोतों में प्रमुख है।

मानवजनित स्रोत :


वर्तमान में मानव ही प्रदूषण का प्रमुख स्रोत है। उसके द्वारा वायु प्रदूषण निम्न प्रकार से वायुमंडल में फैलता है।

1. गृहजनित स्रोत
2. स्वचालित वाहन
3. औद्योगिक इकाइयाँ
4. नगरीय अपशिष्ट पदार्थ
5. सीवर, घरों की नालियों, मेन होल तथा एकत्र कचरे से निस्सृत गैसें।
6. व्यापारिक क्रियाएँ पेट्रोल पम्प, कीटनाशक तथा कृषि रसायन।
7. नाभिकीय संयंत्रों, नाभिकीय र्इंधनों तथा नाभिकीय विस्फोटकों से निस्सृत रेडियो ऐक्टिव तत्व।
8. तेल शोधक कारखानें, रासायनिक उद्योग विटामिंस र्इंधन, एल्यूमिनियम कारखानों, कपास की धुनाई, चर्बी एवं तेल के तापीय अपघन से निस्सृत गैसें एवं ऊष्मा।
9. घरों में वानस्पतिक तेल, पैराफीन, कैरोसीन, कोयला और कुकिंग गैस।

गृह जनित स्रोत : घरेलू र्इंधन के ज्वलन से वायु प्रदूषण एक प्राचीन चिर परिचित समस्या है। भोजन पकाने में हम विभिन्न प्रकार के र्इंधनों का उपयोग करते हैं। वायु प्रदूषण की समस्या विशेष रूप से लकड़ी, उपले और कोयले को जलाने से उत्पन्न होती है। नगर की लगभग 10 प्रतिशत जनसंख्या की भोजन व्यवस्था इस व्यवस्था के अंतर्गत है लखनऊ नगर में चिह्नित की गयी 700 मलिन बस्तियों8 में र्इंधन के रूप में प्रदूषणकारी पदार्थों को उपयोग में लाया जाता है।

कुकर से रसोई घर में नाइट्रोजन गैस घुलती है कोयला या गोबर जलाने से ‘कास्सीनोजन बेंजो’ नामक विषैली गैस रिसती है जो जानलेवा भी हो सकती है। स्टोव से ‘पाराऑक्साइड सल्फर डी ऑक्साइड’ गैसें उत्पन्न होती है। यहाँ तक की कार्बन मोनोऑक्साइड भी पाई गई। एल्यूमिनियम के बर्तन में ताप के प्रभाव से व्यंजन की तह पर ऑक्साइड की तह जम जाती है जो गुर्दे की बीमारी का कारण बनती है। नानस्टिक बर्तन में कारसीनोजन रसायन व्यंजनों में लिपट जाता है जो घातक विष है। घरों में रंगाई, पेंट, ऑटोमेटिक बैट्रियों से भी सीसा की जहरीली गैसें उठती हैं। सीसा एक जहरीला खनिज है जो स्वास्थ्य के लिये बहुत ही हानिकारक है। हरा रंग जो आकर्षक होने के कारण दीवारों में पुताई के लिये प्रयोग किया जाता है जिसमें संख्या का अधिक मात्रा में प्रयोग किया जाता है। उमस के दिनों में संख्या रसायन जहरीली गैस छोड़ते हैं। घरेलू कीटनाशक दवाओं से 2 से 11 वर्षीय बच्चों को कैंसर तक हो सकता है। यह विचार कैलीफोर्निया स्थित डेविडग्रांट मेडिकल सेंटर ने लंदन से प्रकाशित विज्ञान पत्रिका लेनस्ट9 में प्रकट किया है। शिशु चिकित्सा विभाग के विशेषज्ञ डॉ. जैरी रीब की अध्यक्षता में कैंसर अध्ययन के बाद दावा किया आर्गनोफॉस्फेट, मेलाथियान, काब्रेमेट, प्रोपोकर आदि अत्यंत जहरीले रसायनों से बने कीटनाशक दवाओं की घातक गंध में अगर दो मिनट को बच्चों को बैठा दिया जाए तो उन्हें जानलेवा बीमारी अपना शिकार बना लेगी। बच्चों के रक्त में होमोग्लोबिन में अप्रत्याशित कमी आ जाती है। अस्थिमज्जा में विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती है। रक्त के सफेद कण लाखों में बँट जाते हैं। लालकणों का बनना रूक जाता है और अविकसित रक्त कणों का निर्माण तेजी से होने लगता है।

तम्बाकू से बने उत्पादों में सिगरेट, पीने वालों से अधिक पास रहने वाले को प्रभावित करती है। अमेरिकी मेडिकल अनुसंधानकर्ताओं का दावा है कि सिगरेट के धुएँ से अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित 60 हजार व्यक्तियों की मृत्यु होती है। यह हृदय को सर्वाधिक प्रभावित करता है। आस्ट्रेलिया के सार्वजनिक क्षेत्र के बस संचालक ने सरकार पर दावा किया कि बस के यात्रियों के धूम्रपान करने से उसे कैंसर हुआ है तथा उसने चिकित्सा के 60 लाख रुपये का दावा सरकार पर किया। तम्बाकू के रसायन में उपस्थित हानिकारक रसायन कई तरह से हृदय प्रणाली को क्षति पहुँचाते हैं तम्बाकू के धुएँ में उड़ती कार्बन मोनोऑक्साइड लाल रक्त कोशिकाओं से ऑक्सीजन हटा देती है जिससे हृदय को कम ऑक्सीजन मिलती है। धुएँ से रक्त में थक्का जमने की आशंका पनपती है। ‘निकोटीन’ हृदय का दौरा पड़ने की संभावना बढ़ाती है। सिगरेट न पीने वाले सिगरेट के धुएँ में बराबर रहने वालों से 30 प्रतिशत अधिक जोखिम उठाते हैं।

एअर कंडीशनरों के सम्बन्ध में आस्ट्रेलिया के कॉमनवेल्थ डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ के डॉक्टर कैटी एर्ल्ड9 की सलाह से अगर कमरे में एअर कंडीशन चालू रखें तो कम से कम एक खिड़की थोड़ी अवश्य खुली रखें। ताकि स्वच्छ वायु अंदर आ सके। नियमित फिल्टर साफ करें तथा तीन फिट दूर हटकर सोएँ। इसी प्रकार का नियम दीवार घड़ी के लिये है। न्यूयार्क की वैज्ञानिक पत्रिका ‘माइक्रोवेव न्यूज’ में अमेरिका रेडिशन सम्बन्धी सलाहकार समिति ‘द नेशनल कांउशिल ऑफ रेडियेशन प्रोटेक्शन रिपोर्ट’ का निष्कर्ष है कि विद्युत तारों और विद्युत उपकरणों से उत्पन्न विद्युत चुंबकीय विकिरण (इलेक्ट्रो मेगेनेटिक रेडिएश) के समीप रहने वाले को कैंसर जैसी बीमारी घेर लेती है। ‘अमेरिकी एनवायरनमैंटल प्रोडेक्शन एजेंसी’ ने भी इसे प्रमाणित किया है।

कोलंबिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक रेबा एम गुडमैन और न्यूयार्क के सिटी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एन हैंडशन का मत है कि घरों में ही टीवी, प्रेस, रेडियों, हीटर, मिक्सीओवन और वाशिंग मशीन सहित मामूली विद्युत उपकरण काफी खतरनाक है। यह हमारी जीन कोशिकाओं द्वारा विकसित प्रोटीनों को कुप्रभावित करता है तथा मस्तिष्क में पिनियल ग्रंथि के हॉर्मोन मैलेटानिन को जकड़ता है। इससे महिलाओं को स्तन कैंसर होता है। रक्त तथा मस्तिष्क कैंसर भी उत्पन्न होता है। 400 किलोवाट की पावर लाइन से 25 मी. की दूरी पर 4 माइक्रोटेसला तीव्रता का विद्युत चुंबकीय क्षेत्र होता है। घरेलू उपकरणों की बिजली से उत्पन्न 5 से 10 माइक्रोटेसला तीव्रता का विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र बनता है। इसी प्रकार कम्प्यूटर टेलीविजन, सीडी प्लेयर्स, हाई-फाई सिस्टम, रेडियो और माइक्रोओवन से उत्पन्न विद्युत चुंबकीय किरणों से कैंसर का भय रहता है। माइक्रोओवन के निकट नहीं रहना चाहिए, कम्प्यूटरों से सर्वाधिक इएलएफ रेडिएशन निकलती है। इंडो अमेरिकी साइंस अपडेट ने कई विस्तृत अध्ययन किए ‘नेशनल फांउडेशन’ की रिपोर्ट के अनुसार कम्प्यूटर के ‘मॉनीटर को 30 सेंटीमीटर की दूरी से परखना चाहिए कि कहीं 2 मिलीगेज (मायक) ईएलएफ रेडियशन से अधिक तो नहीं निकल रही। ‘अन्तरराष्ट्रीय कैंसर जर्नल’ ने लिखा है कि वीडियो डिस्प्ले टर्मिनलों के आगे काम करने वाली महिलाओं को दिमागी कैंसर की पाँच गुना अधिक संभावना रहती है तथा गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है। टेलीवीजन वीडियो बंद कमरे में देखने से तथा अंधेरे में देखने से मृत्यु तक हो जाती है और आँखों की घातक बीमारी होती है। एक शोध की रिपोर्ट बताती है कि फोटो कॉपी मशीनें ओजोन गैस छोड़ती है। ओजोन के निकटतम प्रभाव से सिर दर्द होने लगता है। मोटर ग्रांइडर, इलेक्ट्रानिक रेजर, हेअर ड्रायर वगैरह चालू करते ही इलेक्ट्रो-मैगनेटिज्म का उत्पादन शुरू हो जाता है। इससे आँखों में मोतियाबिंद तक उतरने की संभावना बढ़ जाती है।

ब्रिटेन, अमेरिका और आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने मोबाइल फोन के खिलाफ जोरदार चेतावनी प्रदान की है। शोधकर्ताओं के अनुसार मोबाइल फोन के लगातार प्रयोग से कैंसर और अस्थमा रोग होता है। फोन के रेडियो ट्रांस मीटर से निकलने वाली माइक्रो तरंगे मस्तिष्क के लिये खतरा है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के स्नायुरोग विशेषज्ञों द्वारा चूहों पर किये प्रयोग से प्रमाणित किया है कि माइक्रो तरंगों से मस्तिष्क में डीएनए को हानि पहुँचती है और तन्तु प्रभावित होते हैं। केवल ब्रिटेन में 50 लाख भयभीत उपभोक्ताओं ने अपने-अपने मोबाइल फोन कम्पनी को वापस करने की तैयारी कर ली है फोन उद्योग ने 8750 लाख रुपये शोध के लिये निर्धारित किए हैं। चिकित्सा से परहेज बेहतर है। अत: हमें अपनी जीवनशैली बदलने की जगह पर्यावरण मैत्री जीवन शैली अपनाने की आवश्यकता है। ताकि हम कम से कम घरेलू प्रदूषण से अपनी रक्षा कर सकें।

नगर की बर्तन बनाने, बेल्डिंग करने, विभिन्न प्रकार के रसायन तैयार करने वाली औद्योगिक इकाइयों धातुओं के कणों द्वारा वायुमंडल में प्रदूषण उत्पन्न होता है। सीसा, जिंक, निकिल, एण्टीमनी, वायुमंडल को प्रदूषित करते हैं। उ.प्र. की धातुनगरी मुरादाबाद तीन दिनों तक विषाक्त कुहरे से ढकी रही लगभग आधे निवासी बीमार पड़े मुक्ति पाने के पूर्व 32 की मृत्यु हो गयी। विशेषज्ञों के अनुसार इस दुर्गंध का कारण कारखानों से उत्सर्जित जिंक के कण थे।

विद्युत आपूर्ति में बाधा उत्पन्न होने से नगर के कार्यालयों एवं घरों में विद्युत उत्पादन करने के लिये जनरेटरों के चलाने से राजधानी के प्रमुख बाजारों के इर्द-गिर्द वायु प्रदूषण में जबर्दस्त इजाफा हो जाता है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुश्रवण रिपोर्ट के मुताबिक मुख्यत: शाम व रात में विद्युत आपूर्ति ठप होने के कारण व्यावसायिक क्षेत्रों में दुकानदारों द्वारा जनरेटर का प्रयोग किये जाने से वायु व ध्वनि प्रदूषण में 8 से 14 प्रतिशत की वृद्धि पाई गई है। बोर्ड द्वारा 15 से 18 जनवरी 2000 के विद्युत आपूर्ति के बाधित होने के दिनों में की गई मॉनीटरिंग में अमीनाबाद, हलवासिया मार्केट, बीएनरोड व खाला बाजार में दिसंबर माह में की गई मॉनीटरिंग की अपेक्षा वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ा हुआ मिला है।

बोर्ड द्वारा दिसम्बर माह में की गई मॉनीटरिंग में अमीनाबाद में एसपीएम (निलंबित कणकीय पदार्थ) की मात्रा 384 μg/m3 सल्फर डाइऑक्साइड 35 μg/m3 और नाइट्रोजन ऑक्साइड 38 μg/m3 रिकॉर्ड की गई थी, जो हड़ताल के दौरान बढ़कर क्रमश: 429, 40 व 43 μg/m3 हो गई है। कमोबेश यही स्थिति हलवासिया मार्केट की है। यहाँ पर एसपीएम की मात्रा 369 से बढ़कर 405 μg/m3 हो गई है, जबकि सल्फर डाइऑक्साइड 32 से बढ़कर 36 और नाइट्रस ऑक्साइड 36 से बढ़कर 40 μg/m3 दर्ज की गई है। इसी प्रकार खाला बाजार में एसपीएम की जो मात्रा 406 μg/m3 घन मी. रिकॉर्ड की गई थी। वह हड़ताल के दौरान 462 μg/m3 रिकॉर्ड की गई है। सल्फर डाइऑक्साइड व नाइट्रोजन ऑक्साइड जो क्रमश: 36 और 40 मापे गये थे बढ़कर 42 व 46 μg/m3 पहुँच गये हैं। खाला बाजार में एसपीएम की मात्रा सबसे अधिक 462 μg/m3 रिकार्ड की गई है जो मानक (220 μg/m3) के मुकाबले दोगुना अधिक है। यहाँ सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा भी सबसे अधिक क्रमश: 42, 46 μg/m3 रिकॉर्ड किया गया है।

स्वचालित वाहन :


लखनऊ महानगर में वायु प्रदूषण के लिये उत्तरदायी वाहनों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ती गयी है। परिवहन विभाग के आंकड़ों के अनुसार 1990 में महानगर लखनऊ में एक लाख 70 हजार वाहनों की संख्या थी और छ: वर्षों के अंतराल में लगभग 3 लाख से अधिक पहुँच गयी है। वर्ष 1989-90 में दोपहिया वाहनों की संख्या एक लाख 54 हजार थी। जो अब बढ़कर दो लाख 10 हजार तक पहुँच गयी है। इसी प्रकार जीप व कारों की संख्या इन छ: वर्षों के अन्तराल में 20,800 से बढ़कर 36000 पहुँच चुकी है। राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान केंद्र ने अपने अध्ययन में पाया की लखनऊ विश्वविद्यालय मार्ग पर ही दो घंटे की अवधि में 4387 से 7995 तक वाहनों का आवागमन होता है। अशोक मार्ग और हुसैनगंज मार्ग पर गुजरने वाले वाहनों का औसत 4 से 5 हजार है। इसी अध्ययन में आलमबाग और आरडीएसओ पर क्रमश: 4835 व 4618 वाहन, फैजाबाद मार्ग पर 3130 वाहन तथा शाहमीना रोड पर 2616 वाहन दो घंटे की अवधि में सड़कों पर दौड़ते पाये गये।

तालिका 4.1 लखनऊ महानगर में पंजीकृत वाहनों की संख्यामार्च 1999 तक नगर में पंजीकृत वाहनों की स्थिति इस प्रकार रही। 10 पहियों वाले 76 ट्रक, 5591 भारी ट्रक, 3131 हल्के माल वाहक ट्रक, 381 डिलीवरी वैन, 1396 बसें, 503 मिनी बसें, 3958 टैक्सी, 7464 टैम्पो, 42760 मोपेड, 267664 स्कूटर/मोटर साइकिलें, 37484 कारें, 10,046 जीपें, 889 ट्रैक्टर, 851 ट्रेलर व 2490 अन्य वाहन।

वाहनों की द्रुत गति से वृद्धि का परिणाम है कि आज लगभग 100 टन से अधिक प्रदूषक तत्व व गैसें इन वाहनों से निकल कर नगरीय वायु में घुल जाती हैं। इन प्रदूषकों में मुख्य रूप से हाइड्रोकार्बन, कार्बन मोनो ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइ ऑक्साइड, धुएँ के निलम्बित कण, वेंजीन और सीसा आदि उत्सर्जित होते हैं। वाहनों व कारखानों से निकलने वाले धुएँ से हो रहे वायु प्रदूषण की नवीनतम अनुश्रवण स्थिति से हवा में कार्बन मोनो ऑक्साइड गैस अपने निर्धारित मानक से 5 से 23 गुना तक अधिक है। भारत सरकार की पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार लखनऊ में वाहनों से प्रतिदिन 41.07 टन कार्बन मोनोऑक्साइड, 18.75 टन हाइड्रोकार्बन तथा 18.07 टन हाइड्रोजन धुएँ के साथ उत्सर्जित हो रहा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दस्तावेजों के अनुसार लखनऊ की हृदयस्थली हजरतगंज में धुएँ का विषैला कुहासा गहराता जा रहा है।

तालिका 4.2 लखनऊ महानगर में वायु प्रदूषण में वृद्धितालिका- 4.2 से स्पष्ट है कि 1991 से अब तक के वायु प्रदूषण के आंकड़े सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर ही चढ़ते जा रहे हैं। अगर 1991 से 1996 तक वर्ष वार औसत आंकड़ों पर तुलनात्मक नजर डाली जाए तो एसपीएम 354.63 μg/m3 से बढ़कर 1998 में 600 तक के ऊँचे स्तर पर पहुँच चुके हैं। अधिकतम वृद्धि 1993 के बाद 1994 में हो जाती है। सर्वाधिक अंतराल इसी समय देखने में आता है।

इसी प्रकार सल्फरडाइऑक्साइड इस अवधि में 16.45 के स्तर से बढ़कर 33.40 μg/m3 पहुँची 1991 की तुलना में 1996 में सल्फर डाइऑक्साइड में दोगुना की वृद्धि होती है। नाइट्रोजन ऑक्साइड का स्तर 15.3 से बढ़कर लगभग दोगुना की वृद्धि हो गयी जो 30.50 μg/m3 तक पहुँच चुकी है। यह वृद्धि लगभग 4 से 5 μg/m3 प्रति वर्ष की दर से बढ़ती है।

राजधानी के क्षेत्रवार वायु प्रदूषण के आंकड़ों के अनुसार सल्फर डाइऑक्साइड नाइट्रोजन ऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी विषैली गैसों सहित वायु में कणकीय पदार्थों का प्रदूषण स्तर दिल्ली महानगर की तुलना में 2 से पाँच गुना अधिक है। इसी प्रकार हवा में सीसे की मात्रा एनबीआरआई के अनुसार सुरक्षित स्तर 0.5 से 1 μg/m3 के मुकाबले कैसरबाग में 4.54 आलमबाग में 2.96, हुसैनगंज तथा आरडीएसओ के पास 2.07 अशोक मार्ग पर 1.43 तथा विश्वविद्यालय मार्ग पर 1.35 μg/m3 है। रिपोर्ट में परियोजना के वैज्ञानिकों ने हवा में एसपीएम और सीसे की मात्रा में वृद्धि का कारण वाहनों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि बतायी गयी।

तालिका 4.3 लखनऊ महानगर के विभिन्न क्षेत्रों की वायु में सीसे की मात्राराजधानी के महानगर क्षेत्र से लेकर कृष्णानगर, चौक, गोमती नगर, हाईकोर्ट, मेडिकल कॉलेज व कैंट क्षेत्रों की वायु में स्कूटर, मोटर साइकिल व पेट्रोल चलित मोटरकारों द्वारा मुख्य रूप से उत्सर्जित अति विषैली कार्बन मोनोऑक्साइड गैस का प्रभाव सदैव बना रहता है। सम्पूर्ण नगर में 2 लाख 10 हजार स्कूटर व मोटरसाइकिलें तथा लगभग 26 हजार मोटर कारें दौड़ रही है जो कार्बन मोनो ऑक्साइड के उत्सर्जन का प्रमुख स्रोत है। उ.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 1995 से कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे महत्त्वपूर्ण पैरामीटर की मॉनीटरिंग पर प्रतिबंध लगा दिया, इस स्थिति के अध्ययन के लिये यदि हम 1992, 1993 और 1994 के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो लखनऊ नगर में कार्बन मोनो ऑक्साइड गैस निर्धारित मानक के मुकाबले कई गुना अधिक है।

संवेदनशील क्षेत्रों के लिये कार्बन मोनोऑक्साइड की एक हजार μg/m3 मात्रा तथा आवासीय क्षेत्रों के लिये दो हजार μg/m3 मात्रा सुरक्षित मानी जाती है। इन मानक स्तरों के विपरीत यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा की गयी मॉनीटरिंग की रिपोर्ट जून 1994 के आंकड़े चौंकाने वाले हैं संवेदनशील क्षेत्र की परिधि में आने वाले मेडिकल कॉलेज, हाईकोर्ट व कैंट में इसका स्तर क्रमश: 16 गुना 15 गुना व कैंट में नौ गुना से अधिक एलार्मिंग दायर में पाया गया। मॉनीटरिंग रिपोर्ट में महानगर में कार्बनमोनोऑक्साइड निर्धारित सीमा से लगभग 7.5 गुना, निशातगंज में सात गुना, बनारसी बाग में 5.5 गुना, ऐशबाग में 7.5 गुना, मवैया में 7.0 गुना तथा कृष्णा नगर में 7.5 गुना से अधिक की रेंज में मापा गया।

तालिका 4.4 लखनऊ महानगर के विभिन्न क्षेत्रों में कार्बन मोनो ऑक्साइड की मात्रा 1994उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जब कभी महानगर की प्रदूषित वायु के अध्ययन के लिये विशेष अभियान लागू किया तब-तब प्रदूषित वायु के आंकड़े बहुत ऊँचे दिखे प्रथमत: अध्ययन के लिये जिन आवश्यक मानकों का होना आवश्यक है। उन्हें बदलकर प्रस्तुत किया जाता है जिसके कारण वस्तु स्थिति का आकलन ठीक नहीं हो पाता है। बोर्ड द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले मानकों और राष्ट्रीय मानकों में विरोधाभाष है। यह महत्त्वपूर्ण है कि यदि बोर्ड द्वारा संकलित आंकड़ों को राष्ट्रीय मानकों की तुलना में देखा जाए तो महानगर में प्रदूषण की स्थितियाँ बहुत विस्फोटक नजर आयेंगी। द्वितीयत: प्रदूषण के वास्तविक पैरा मीटरों का बोर्ड द्वारा अध्ययन ही समाप्त कर दिया गया है। वायु प्रदूषण के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित नगरों की सूची में विश्व स्वास्थ्य संगठन को दिल्ली, मुंबई व कोलकाता के साथ-साथ लखनऊ नगर का नाम सम्मिलित करने पर विवश होना पड़ा। वायु प्रदूषण अनुश्रवण करने वाली संस्था प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वाहनों की नियमित चेकिंग की जोरदार सिफारिस की। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नगर के 10 प्रमुख चौराहों (हजरतगंज, चौक, चारबाग, निशातगंज, मेडिकल कॉलेज, हुसैनगंज, अमीनाबाद, आलमबाग, कपूरथला, आईटी कॉलेज) पर सघन अनुश्रवण कार्य किया। अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार चारबाग, निशातगंज, आईटी कॉलेज, हुसैनगंज चौराहों पर वायु प्रदूषण के बेहिसाब वृद्धि से शासन सतर्क होकर उचित कदम उठाने को विवश हुआ तथा अन्य कुछ चौराहों पर धुंध पायी गयी। राष्ट्रीय मानकों पर अगर स्थितियों का आकलन किया जाए तो विद्यालय, चिकित्सालय और न्यायालय के 1000 मीटर की परिधि में आने वाले क्षेत्र को संवेदनशील/शांत मानते हुए सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड गैस की सुरक्षित सीमा 15 μg/m3 रखी गयी और एसपीए (धुएँ में निलंबित धुएँ के कण) के लिये मानक सीमा 70 μg/m3 है। जबकि आवासीय क्षेत्रों के लिये ये मानक 60 μg/m3 और सल्फर डाइऑक्साइड के लिये 140 μg/m3 है। जो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों से मेल नहीं खाते हैं। आंकड़ों का अध्ययन किया जाए तो संवेदनशील श्रेणी के चौराहों, मेडिकल कॉलेज, आईटी कॉलेज और हजरतगंज में प्रात: 6 बजे से रात 10 बजे के अंतराल में एसपीएम 10 से 11 गुना यानि 712 से 799 माइक्रोग्राम घन मीटर की एलार्मिंग रेंज में पाया गया इसी प्रकार अत्याधिक प्रदूषित सल्फरडाइऑक्साइड ढाई गुना से ज्यादा की सीमा (38 से 43 μg/m3) तक मापा गया हानिकारक नाइट्रस ऑक्साइड गैस भी खतरे की सीमा से बहुत अधिक मिली जिसका स्तर 37 से 40 μg/m3 के मध्य अंकित किया गया। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि नगर में प्रदूषित हवाओं के काले बादलों ने स्थायी रूप ले लिया।

सर्वाधिक व्यस्त चौराहा चारबाग है जहाँ एसपीएम 876 सल्फर डाइऑक्साइड 42 μg/m3 तथा नाइट्रस ऑक्साइड 48 μg/m3 मापा गया। अन्य चौराहों पर भी स्थिति काफी चिंताजनक ही रही। रिपोर्ट के अनुसार रात्रिकाल में की गयी मॉनीटरिंग के आंकड़े भी सुरक्षित मानकों के स्‍तर से अधिक पाये गये। गैसीय और धूल प्रदूषण लगातार गहराता जा रहा है। यह हमारे पेड़ पौधों, जंतुओं और यहाँ तक की हमारे लिये खतरा उत्पन्न करते हैं। एक अध्ययन के अनुसार हमारे देश में कुल प्रदूषण की 40 प्रतिशत जड़ केवल धूल कण होते हैं। लखनऊ नगर कभी बगीचों का नगर था किन्तु आज स्थिति बदल गयी है। कुछ घंटों घूमना धूल में स्नान के बराबर है। धूल प्रदूषण की स्थिति को ध्यान में रखकर एक अध्ययन किया गया।

लखनऊ नगर में धूल प्रभाव का आकलन करने के लिये विभिन्न दिशाओं के विभिन्न वनस्पति के बारह क्षेत्र चुने गये जिनमें से प्रथम 9 क्षेत्र कम वनस्पति वाले थे और 10 से 12 घनी वनस्पति वाले, धूलकणों का भार प्रतिटन प्रतिवर्ग कि.मी. प्रतिमास की दर से मापा गया। अध्ययन से पता चला कि मई के महीनों में प्राय: आने वाले तूफानों से धूलकणों की उपस्थिति अधिकतम होती है। इस समय उर्मिला पुरी में अधिकतम धूलकणों का स्तर पाया गया। यह ध्यान देने की बात है कि यह वनस्पति रहित है। सबसे कम धूल कणों की उपस्थिति खदरा क्षेत्र में पायी गयी। यहाँ मुख्य मार्ग के किनारे घने वृक्ष है। घनी वनस्पति के क्षेत्रों में धूल का प्रभाव 75 प्रतिशत तक कम हो जाता है। तालिका 4.5 से स्पष्ट है कि प्रतिवर्ग सेमी. की पत्तियों की सतह पर धूलकणों के आकलन के लिये 10 प्रजाति के पौधों को लिया गया जिनकी पत्तियों में धूलकण रोकने की संरचना थी उनमें सबसे अधिक धूलकण पाये गये। चांदनी जिसकी पत्तों की सतह चिकनी होती है पर सबसे कम धूल कण पाये गये।

इस अध्ययन से पता चला कि धूल कणों की उपस्थिति नगर क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग है नगर में धूल और धुएँ से ग्रसित पक्षियों के पंखों एवं बंदरों की त्वचा का अध्ययन किया गया जिसमें तथ्य सामने आये कि नगर में सड़कों के किनारे पेड़ों में विश्राम करने वाले पक्षी एवं बंदर भी कई प्रकार की बीमारियों से ग्रसित है।10तालिका 4.5 लखनऊ महानगर के विभिन्न क्षेत्रों में धूलकणों का पतनदशहरा और दीपावली के त्यौहारों की अवधि में नगर निवासियों के द्वारा बड़े उत्साह के साथ ज्वलनशील विस्फोटक पटाखे-खिलौने जलाए जाते हैं जिससे नगरीय वायु मंडल में विभिन्न प्रकार के अवांक्षणीय कण उत्सर्जित होते हैं और सम्बन्धित क्षेत्र के वायुमंडल में उपस्थित वायु की गुणवत्ता को नष्ट कर देते हैं। इससे लोग एलर्जी तथा दमा के शिकार होते हैं। इन धूल कणों के अध्ययन के लिये आईटीआरसी ने विगत वर्षों में अध्ययन किया। यह अध्ययन काल 1981 से 1984 के मध्य था।

तालिका-4.6 का विश्लेषण करने से स्पष्ट होता है कि वायु में कणों की सांद्रता दीपावली में पहले की तुलना में दोगुना से अधिक हो जाता है। वर्ष 1982-83 के दौरान धूल कणों का स्तर सबसे अधिक रहा। दीपावली के पश्चात भी पूर्व की अपेक्षा वायुमंडल में धूलकण अधिक रहते हैं। वर्ष 1984 के दौरान विस्फोटकों के उपयोग एवं प्रयोग में कानूनी प्रतिबंध लगाया गया परिणाम स्वरूप विगत वर्षां की तुलना में वायुमंडल में धूल कणों का प्रभाव कम रहा जबकि पहले और पश्चात के दिवसों में विगत वर्षों के अपेक्षा पतित धूल कणों की अधिकता रही। इस प्रकार नगरीय पर्यावरण को हमारे सांस्कृतिक त्यौहार भी क्षति पहुँचाते रहते हैं। दीपावली त्यौहार की समयावधि में धूल कणों के आकार के बारे में व्याख्या से ज्ञात हुआ कि इनका आकार 3.3 माइक्रोग्राम था। यह कण 65.5 से लेकर 68.0 प्रतिशत तक बारूदी विस्फोटक वाले क्षेत्रों में पाये गये इन क्षेत्रों में धूल की मात्रा अनुमोदित मात्रा से अधिक पायी गयी।11

तालिका 4.6 लखनऊ महानगर में दशहरा-दीपावली के दौरान हवा में लटकते धूलकणलखनऊ महानगर में वायु में वायु प्रदूषण के स्तर का अलग-अलग क्षेत्रों में अध्ययन किया गया जिसमें कि एसपीएम, सल्फरडाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे प्रदूषक तत्वों का नियमित अध्ययन किया गया। इसमें आवासीय, व्यापारिक और औद्योगिक तीनों प्रकार के क्षेत्र लिये गए। परिशिष्ट 4.1 के अध्ययन से पता चलता है कि आवासीय क्षेत्र में वायु प्रदूषण में SPM वर्ष 1991 से वर्ष 1992, 1993 में बढ़ गया है जो निर्धारित मानक से आगे है। इसी प्रकार व्यापारिक क्षेत्र में निर्धारित मानक से दोगुना तक बढ़ गया है। मोहन होटल में दोगुना से भी अधिक हो गया है। जबकि SO2, NO2 निर्धारित मानक तक ही सीमित रहा। जबकि वर्ष 1991 की अपेक्षा वर्ष 1994-95 में बढ़ गया, औद्योगिक स्तर S.P.M. अपनी निर्धारित सीमा के लगभग रहा। अमौसी औद्योगिक क्षेत्र में वर्ष 1991 की अपेक्षा पर S.P.M. 1995 में निर्धारित सीमा को पार कर गया और SO2, NO2 निर्धारित सीमा के अंतर्गत रहे।

उपर्युक्त अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है। कि नगर में आवासीय/व्यापारिक क्षेत्रों में प्रतिवर्ष प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ता जाता है। यहाँ तक कि वर्ष 1991 से वर्ष 1993 के मध्य तक ही SO2, NO2 में दो गुने की वृद्धि हुई है। अत: निकट भविष्य में वायुप्रदूषण का प्रभाव बड़ी द्रुत गति से बढ़ेगा। औद्योगिक क्षेत्रों में भी वृद्धि की दर लगभग यही बनी हुई है। तीन वर्षों में ही औद्योगिक क्षेत्र अमौसी में S.P.M. लगभग 100 मी.3 की दर से बढ़ा पाँच वर्षों में दो गुना हो गया यह नगर में बढ़ते वायु प्रदूषण के संकट का द्योतक है। (परिशिष्ट-33)

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जून 94 की रिपोर्ट के अनुसार संवेदनशील परिधि के अंतर्गत आने वाले लखनऊ के मेडिकल कॉलेज, हाईकोर्ट व कैंट क्षेत्र में विषैली कार्बन मोनोऑक्साइड का स्तर निर्धारित मानक से क्रमश: 16 गुना, 15 गुना व 9 गुना अधिक था। यदि एसपीएम सल्फर डाइऑक्साइड व नाइट्रसऑक्साइड का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो पाँच वर्षों के अन्तराल में प्रदूषण का स्तर दो गुना तक बढ़ गया है।

तालिका 4.7 लखनऊ नगर के हजरतगंज में कपूर होटल में की गई वायु गुणवत्ता का अध्ययनलखनऊ नगर का हृदय कहे जाने वाले तथा नगर के मध्य में व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र हजरतगंज है। यहाँ पर कपूर होटल में उ.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के द्वारा लगातार एसपीएम, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड पैरामीटरों की मॉनीटरिंग की जाती है। वर्ष 1996 में अगर हम वायु प्रदूषण के स्तर का आकलन करें तो पता चलता है कि ग्रीष्म काल में वायु में धूल कणों का स्तर सर्वाधिक हो जाता है। जुलाई मास में यह स्तर तीन गुना के लगभग पहुँच जाता है। जब की अन्य महीनों में दो गुना के लगभग रहता है। इसी प्रकार मार्च 1997 में प्रदूषण का स्तर और अधिक बढ़ता दिखाई दे रहा है तापमान के बढ़ने पर तथा कम होने पर एसपीएम पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता जबकि वर्षा और नमी के प्रभाव से धूल कणों का प्रभाव कम होता है।

सल्फर डाइऑक्साइड प्राय: एसपीएम के बढ़ने के साथ बढ़ता है और कम होने पर कम हो जाता है जुलाई माह में सामान्य तापमान पर सल्फर 32.17 तक पहुँचता है। इसी प्रकार शीतकाल में जनवरी 1997 को सल्फर का स्तर 39.71 तक पहुँच गया यह भी सामान्य तापमान के स्तर पर ही था। सल्फर की न्यूनतम सीमा से अधिकतम सीमा में 16 अंग का अंतर आता है। प्राय: वर्षा की अवधि में सल्फर का स्तर नीचे गिरा है जबकि शीतकाल में बढ़ता है। मार्च में एसपीएम सर्वाधिक है तो सल्फर भी अधिक मात्रा में वायुमंडल में बढ़ता गया है।

इसी प्रकार नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा और सल्फर की मात्रा दोनों एक साथ बढ़ती है और एक साथ घटती है। इससे दोनों का सीधा सम्बन्ध ज्ञात होता है दोनों का सीधा सम्बन्ध स्थापित है। दोनों के उत्सर्जन के स्रोत एक है।

नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा वर्षाकाल में सबसे कम रहती है तथा नवंबर माह के दौरान उसमें अधिक रहती है। सर्वाधिक नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा मार्च 1997 में पायी गयी है। यह वृद्धि वर्षाकालीन मौसम की अपेक्षा दोगुना से भी अधिक बढ़ कर ढाई गुना तक हो जाता है। इस प्रकार नगर में प्रदूषण मौसमी प्रभाव से बढ़ता रहता है। शीत काल में वायुमंडल में धरातल से ऊँचाई पर वायुदाब की एक सीमा रेखा बन जाती है जिससे ऊपर वायुमंडल में धूल धुएँ के कण नहीं जा पाते हैं। और धरातल के परित: एक सीमा में ये कण तैरते रहते हैं। उस समय नगर में वायु प्रदूषण की स्थिति बहुत गंभीर हो जाती है। प्रात: 9 से 11 बजे तथा शायं 3 से 7 बजे के लगभग सड़कों में सांस लेने में बहुत कष्ट होता है। और आँखे दुष्प्रभावित होती है। यहाँ पर ध्यान देने योग्य है कि बोर्ड के मानक राष्ट्रीय मानकों से चार गुना अधिक है। इसलिये इसके अध्ययन में त्रुटियाँ आ जाती है और वास्तविक मूल्यांकन नहीं हो पाता है। ऐसा लगता है कि हमारी नीतियाँ और नियम ही हमें वास्तविक स्थिति तक पहुँचाने से वंचित रखते हैं। प्रकृति के प्रति हमारी अपराधी वृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है, और राष्ट्र के नागरिकों और भविष्य की पीढ़ी को हम खतरे में डाल रहे हैं। तालिका-4.7 को राष्ट्रीय मानकों में रख कर स्पष्ट करना चाहे तो नगर में वायु प्रदूषण की स्थिति बहुत बुरी नजर आती है। संवेदनशील क्षेत्रों में एसपीएम 100 μg/m3 के विपरीत साढ़े पाँच गुना अधिक है। न्यूनतम सीमा भी पाँच गुना से कम नहीं है।

लखनऊ महानगर के वायु प्रदूषण अनुश्रवण 1998 दिसंबर के आंकड़ों पर यदि ध्यान दिया जाए तो पता चलता है कि महानगरीय वायु में एसपीएम निर्धारित मानक से चार गुना अधिक है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार 200 μg/m3 के विपरीत नगरीय वायु में एसपीएम की मात्रा औसतन 800 μg/m3 है। राष्ट्रीय मानक से अगर तुलना की जाए तो नगरीय वायु 114 μg/m3 के विपरीत 6 गुना से अधिक प्रदूषित हो चुकी है। नगर के मेडिकल चौराहें पर जो कि सुरक्षित संवेदनशील क्षेत्रों में आता है। राष्ट्रीय मानक 100 के मुकाबले 797 है जो आठ गुना प्रदूषित वायु की दिशा में संकेत करता है। नगर के सर्वाधिक आवागमन वाले चारबाग चौराहे की वायु में एसपीएम की मात्रा सर्वाधिक पायी गयी।

तालिका 4.8 महानगर लखनऊ के प्रमुख चौराहों की वायु गुणता की स्थितिएसपीएम की मात्रा को मुख्य चौराहों से दूर वाले स्थानों पर देखें तो 200 μg/m3 का अंतर आता है। यद्यपि यह अंतर मुख्य चौराहों से काफी कम है किंतु राष्ट्रीय मानकों की तुलना में नौ गुना अधिक है। और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों की तुलना में छ: गुना अधिक है। ध्यान देने योग्य है कि चौराहों से एक किमी. की दूरी के स्थान आवासीय है। आवासीय क्षेत्रों में प्रदूषण का यह स्तर अत्यंत चिंताजनक है। चारबाग चौराहे से एक किमी. की दूरी पर एसपीएम की मात्रा राज्य प्रदूषण बोर्ड के मानक 200 μg/m3 के विपरीत 600 μg/m3 से अधिक है अर्थात मानक के विपरीत तीन गुना प्रदूषण बना हुआ है। मेडिकल कॉलेज जो संवेदनशील क्षेत्रों में आता है। एसपीएम की मात्रा में बहुत कम अंतर प्रदर्शित है। इस प्रकार हम आंकड़ों के आधार पर कह सकते हैं कि नगर में वायु प्रदूषण लगातार बढ़ना ही है।

नगरीय वायु गुणवत्ता अनुश्रवण विशेष अभियान के अन्य प्रमुख पैरामीटरों में सल्फर डाइऑक्साइड का नगर के प्रमुख चौराहों में औसतन 45 μg/m3 है। यद्यपि यह राज्‍य प्रदूषण बोर्ड के मानक से काफी कम है। राष्‍ट्रीय स्‍तर के मानक से तुलना करें तो संवेदनशील क्षेत्रों की वायु में तीन गुना अधिक सल्‍फर डाइऑक्‍साइड की मात्रा पायी जाती है तथा राजकीय मानक से भी अधिक सल्फर की मात्रा चौराहों में पायी जाती है। चौराहों से दूर जाने पर भी मानक की तुलना में 15 के मुकाबले 30 μg/m3 है अर्थात दो गुना अधिक वायु प्रदूषण पाया जाता है।

नाइट्रोजन ऑक्साइड की मात्रा चौराहों में औसत 40 μg/m3 पायी गयी जो संवेदनशील क्षेत्रों के निर्धारित मानक से दो गुना अधिक है। मुख्य चौराहों से 1 किमी की दूरी पर भी औसत मात्रा में केवल 12 μg/m3 का अंतर आता है और निर्धारित मानक से दो गुना की अधिक मात्रा पायी जाती है। इस प्रकार सारणीगत निष्कर्षों के आधार पर कहा जा सकता है कि नगरीय वायु को सुरक्षित मानकों में वापस लाने के लिये यथा शीघ्र प्रयासों को पूरा करना अत्यंत आवश्यक हो गया है।

तालिका 4.9 लखनऊ महानगर में वायु गुणवत्ता अनुश्रवण स्थिति सितम्बर 1996 (04.09.1996 से 14.09.1996)तालिका- 4.9 में सितंबर 1996 में वायु की गुणवत्ता के अनुश्रवण की स्थिति का आकलन किया गया है। इसमें नगर में वाहन बाहुल्य वाले 10 स्थानों का चयन किया गया है। प्रथम स्थान निशातगंज जो नगर के गोमती पार क्षेत्र का प्रमुख स्थल है। यहाँ प्रात: कालीन वायु की गुणवत्ता में धूल कणों का स्तर 726.14 है जो निर्धारित मानक से चार गुना अधिक है। दोपहर से रात 10 बजे तक यहाँ की स्थिति पर ध्यान दिया जाए तो पता चलता है कि यह प्रात: काल से अधिक प्रदूषित रहता है। रात्रि कालीन अवधि में काफी सुधार होता है और लगभग इस समय दोपहर की अपेक्षा ढाई गुना एसपीएम में कमी आती है। फिर भी प्रदूषण मानक से डेढ़ गुना अधिक रहता है, यहाँ रात्रि की वायु भी जीवन के लिये जहरीली है। इसी बात को अगर हम राष्ट्रीय मानक से तुलना करें तो प्रदूषण का स्तर छ: गुना से आठ गुना तक बढ़ जाता है। रात में भी ढाई गुना वायु प्रदूषित होती है।

नगर के अन्य अनुश्रवण स्थानों में हजरत गंज आता है। यहाँ एसपीएम प्रात:काल 786 रहता है दो बजे के बाद 799 तक रहता है। रात में 298 μg/m3 की मात्रा है जो राज्य प्रदूषण बोर्ड के मानक से आठ गुना अधिक है। रात्रिकाल में यह मात्रा घटकर मानक से लगभग डेढ़ गुना रह जाती है। हजरतगंज में ही अस्पताल तथा विद्यालयों की स्थिति है। अत: इस स्तर को संवेदनशीलता की दृष्टि से देखा जाए तो रात्रिकाल में तीन गुना तथा ट्रैफिक के समय दिवस में आठ गुना से अधिक है जो राष्ट्रीय मानक पर लगभग 10 से 11 गुना अधिक रहता है।

आईटी कॉलेज में दिन के समय प्रात: से रात 10 बजे तक के समय में कोई विशेष अंतर नहीं आता। रात्रि में भी कपूरथला के बाद सबसे कम प्रदूषित, किन्तु मानक के साढ़े तीन गुना अधिक है। चारबाग नगर का सबसे अधिक प्रदूषित क्षेत्र है। प्रात: काल एसपीएम 876 μg/m3 है। दोपहर बाद 868 तथा रात्रिकाल में 317 μg/m3 है जो मानक से साढ़े चार गुना अधिक है। रात्रि में डेढ़ गुना अधिक वायु प्रदूषित रहती है यह नगर का परिवहन की दृष्टि से सर्वाधिक घनत्व वाला क्षेत्र भी है। रेल, बस, टैक्सी, टैम्पो तथा विक्रम, सेवाएँ नगर के सभी स्थानों से ही नहीं प्रदेश और देश से जोड़ती है। अत: यहाँ पर निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि नगर में सर्वाधिक प्रदूषण वाहनों की अधिकता से सम्बन्धित है।

मेडिकल कॉलेज संवेदनशील क्षेत्र में आता है किंतु प्रदूषण की मार से कम प्रभावित नहीं है। यहाँ प्रात: से दोपहर दो बजे तक का स्तर तथा दोपहर से रात 10 बजे तक का स्तर 732.32 तथा 751.42 रहता है। जो मानक 200 μg/m3 से अधिक है। रात्रि में भी 282.14 μg/m3 रहता है जो मानक से अधिक है। इसी प्रकार चौक, अमीनाबाद, हसनगंज तथा आलमबाग क्षेत्रों में भी एसपीएम की मात्रा का औसत प्रात: से लेकर रात दो बजे तक लगभग 200 के मुकाबले 800 है जो निर्धारित राज्य प्रदूषण बोर्ड के मानक से चार गुना अधिक है। यदि इसे केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड के मानक से तुलना करें तो 160 μg/m3 की तुलना में 800 μg/m3 है जो पाँच गुना अधिक है। रात्रि का स्तर दो गुना तक बना रहता है। कपूरथला चौराहे के प्रदूषण स्तर को आंकड़ों की दृष्टि से देखा जाए तो एसपीएम अन्य सभी स्थानीय अनुश्रवण केंद्रों से सबसे कम है। फिर भी 200 के मुकाबले दिवस में 652 तक पाया जाता है जो साढ़े तीन गुना है, तथा राष्ट्रीय मानक से चार गुना अधिक और रात्रि में डेढ़ गुना तक रहता है।

इस प्रकार नगर के सितंबर 1996 के आंकड़ों को ध्यान में रखकर देखें तो एसपीएम की मात्रा नगर के सभी भागों में तेजी से बढ़ती चली जा रही है जो नगरीय पर्यावरण के संकट की भयंकरता की ओर संकेत दे रहा है।

नगर की प्रदूषित वायु में सल्फर की मात्रा ट्रैफिक की अधिकता के समय में ही बढ़ती है। सर्वाधिक सल्फर की मात्रा चारबाग में है। जो 58.84 μg/m3 की तुलना में अन्य स्थानों से अधिक है। सबसे कम कपूरथला में है जो 40.49 μg/m3 है। इस प्रकार अधिकतम और न्यूनतम मात्रा में औसत लगभग 20 μg/m3 का अंतर है। मानकों की दृष्टि से 80 μg/m3 की तुलना में कम किंतु राष्ट्रीय मानक सीमा से कुछ ही कम है। यदि संवेदनशील स्तर से देखें तो उ.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानक से 30 μg/m3 के मुकाबले 40 से 60 μg/m3 है जो डेढ़ से दो गुना अधिक है। राष्ट्रीय मानक पर 15 के अनुपात में तीन से चार गुना अधिक है। इसी मानक पर रात 10 बजे के बाद के समय में भी मानक के अनुपात में अधिक है। दिन और रात के अनुपात में दो से तीन गुना का अंतर अधिक है, अर्थात सल्फर की मात्रा भी नगर में राष्ट्रीय मानक की संवेदनशीलता पर भारी पड़ती है।

नाईट्रोजन ऑक्साइड की मात्रा नगरीय वायु में मापी गयी जो नगर के विविध क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न है। नाइट्रोजन की अधिकतम मात्रा चारबाग में 48.32 तक पायी गयी। यही सीमा प्रात: से लेकर रात 10 बजे तक रही। सबसे कम मात्रा कपूरथला क्षेत्र में पाई गयी जिसका स्तर 32.49 μg/m3 रहा, दिन और रात्रि की मात्रा को अलग-अलग देखा जाए तो लगभग सभी स्थानों में स्तर लगभग आधे से कम रहता है। रात्रि में यह मात्रा चारबाग से अधिक चौक, अमीनाबाद तथा हसनगंज में रहती है। मानकों के आधार पर देखा जाए तो सभी स्थानों पर मात्रा 80 μg/m3 से काफी कम है। किंतु राष्ट्रीय मानक के निकट है। राष्ट्रीय मानकों के संवेदनशील स्तर पर देखें तो 15 μg/m3 पर औसतन 40.00 μg/m3 है जो दो से ढाई गुना अधिक है। यहाँ तक की रात्रिकाल के शांत वातावरण में भी 15 के अनुपात में 18 तक पायी गयी नाइट्रोजन की मात्रा वातावरण में घातक सीमा के निकट पहुँचती जा रही है। अत: शीघ्र ही पर्यावरण में सुधार के लिये प्रयास की आवश्यकता है।

एसपीएम, सल्फर डाइऑक्साइड तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड के तुलनात्मक स्तर पर विचार करें तो पता चलता है कि सल्फर की मात्रा के बढ़ने के साथ नाइट्रोजन की मात्रा भी बढ़ती जाती है। दोनों में 5 से 6 μg/m3 का अंतर आता है। नाइट्रोजन की मात्रा सल्फर से नीचे रहती है। यही अंतर लगभग रात्रि काल में भी बना रहता है। प्राय: एसपीएम की मात्रा के बढ़ने पर सल्फर की मात्रा बढ़ती है। किंतु कहीं पर नाइट्रोजन की मात्रा अधिक बढ़ती है जबकि सल्फर की स्थिति सामान्य रहती है कहीं एसपीएम के बढ़ने पर सल्फर नहीं बढ़ता जबकि नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है जैसा की हजरतगंज में होता है। यद्यपि सम्बन्ध धनात्मक अधिक है। एक के साथ दूसरा बढ़ता है। नगर के जिन मार्गों पर वाहनों का आवागमन बढ़ता है। वहाँ धूल कणों सल्फर तथा नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है। इसी प्रकार रात्रि में जहाँ पर वाहनों की मात्रा कम रहती है। वहाँ वायु के स्तर में अंतर आता है। जैसा कि हजरतगंज और आईटी कॉलेज में होता है।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि भारत के 60 करोड़ लोग वायु प्रदूषण से प्रभावित हैं। वायु प्रदूषण का सबसे अधिक असर नगरों व महानगरों के यातायात पुलिस कर्मियों पर देखने को मिलता है। 8 घंटे की सेवा के पश्चात यातायात पुलिस कर्मियों के फेफड़ों में 100 से अधिक सिगरेट के पीने के बराबर विष भर जाता है। प्रतिवर्ष स्वचालित वाहनों तथा कलकारखानों द्वारा लगभग 2 करोड़ 60 लाख टन विषैले पदार्थ वायुमंडल में घोल दिये जाते हैं। 60 प्रतिशत वायु प्रदूषण केवल मोटर वाहनों द्वारा होता है। सभी स्वचालित वाहन, कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड कई प्रकार के हाइड्रोकार्बन, सीसा, सल्फर डाइऑक्साइड एवं नाइट्रोजन के ऑक्साइड छोड़ते रहते हैं। कम तथा तेज गति से चलने पर ईंजन से जो गैसें निकलती हैं, वे उन गैसों से अपेक्षाकृत अधिक हानिकारक होती है, जो ईंजन के निर्धारित गति से चलने पर उत्पन्न होती है। वाहनों से निकलने वाली जहरीली गैसों में लगभग 40 से 50 प्रतिशत मात्रा कार्बन मोनो ऑक्साइड की होती है जो रक्त के हीमोग्लोबिन से क्रिया करती है और अनेक प्रकार की बीमारियों को जन्म देती है।

‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ के अनुसार संसार के शहरी क्षेत्रों में बसे लोगों में से 62.50 करोड़ लोग ऐसे क्षेत्रों में है जहाँ SO2 की मात्रा औसत से अधिक है। मिलान, लंदन, तेहरान, पेरिस, वीझिंग, मेड्रिड आदि नगरों के वातावरण में SO2 की मात्रा अत्यधिक हैं। यह वर्षा जल के साथ मिलकर जैविक अजैविक दोनों को प्रभावित करता है। वाहनों की वृद्धि के साथ-साथ वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की मात्रा बढ़ जाती है। जिसके परिणाम स्वरूप तापमान बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार 2100 तक सम्पूर्ण पृथ्वी का तापमान 4.50C तक बढ़ जायेगा।

मोटर गाड़ियों से निकलने वाले निर्वातकों से नाइट्रोजन के ऑक्साइड हाइड्रोकार्बन तथा अन्य प्रदूषक सूर्य के प्रभाव से प्रकाश रासायनिक धूम्र कोहरा उत्पन्न करते हैं। सूर्य के चमकीले प्रकाश की उपस्थिति में ये प्रदूषक अन्य पदार्थों जैसे ओजोन पर आक्सीऐसीटिल नाइट्रेट पर आक्सीवे जाइल नाइट्रेट, ऐरोसोल तथा अन्य द्वितीयक प्रदूषकों में परिवर्तित होकर प्रकाश रासायनिक धूम्र कोहरा बनाते हैं जो श्वसन तंत्र को स्थायी रूप से प्रभावित करती है। यह वनस्पति, फल, फूलों को भी प्रभावित करता है। पेट्रोल में ट्रैटाइथाइल लैड नामक यौगिक मिलाया जाता है। यह एंटीमॉक मैटीरियल है यह इंजन में पेट्रोल जलने के पश्चात एक्जास्ट के साथ बाहर आता है और वायु में मिल जाता है, तथा साथ में मिट्टी एवं वनस्पतियों के ऊपर भी जमा हो जाता है। लैड की मात्रा शरीर में यकृत गुर्दे तथा मस्तिष्क को नुकसान पहुँचा सकती है।

स्वचालित वाहनों से निकलने वाले प्रदूषक तत्व :


स्वचालित वाहनों से कार्बन मोनो ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फरडाइऑक्साइड, हाईड्रोकार्बन, एल्डीहाइडस, एशेट एल्डीहाइडस, सीसा के यौगिक, कालिक और धुआँ, कार्बन डाइऑक्साइड हाईड्रोजन, नाइट्रोजन, जलवाष्प प्रमुख प्रदूषक तत्व सम्मिलित रहते हैं। डीजल ईंजनों से धुआँ और पेट्रोल इंजनों से धुआँ रहित गैसें निकलती है। डीजल प्रचालित वाहन पेट्रोल प्रचालित वाहन की तुलना में जहरीले प्रदूषक तत्वों का उत्सर्जन कम करते हैं जो स्वास्थ्य को कम प्रभावित करते हैं। कारसे पैराफीन, ओलफीन तथा एसिटीलीन जिन्हें हाइड्रोकार्बन में सम्मिलित करते हैं। सीसा जैसे हानिकारक पदार्थ निकलते हैं। सीसा ऐसा पदार्थ है जो वायुमंडल में आने पर वर्षा द्वारा पानी या वनस्पति के माध्यम से शरीर में पहुँचता है तथा शरीर में पहुँचकर दीर्घकाल तक फेफड़ों एवं रक्त में बना रहता है। एक लीटर पेट्रोल में 1 ग्राम सीसा टेट्रामिथाइल तथा टैट्रा इथाइल के रूप में रहता है। र्इंधन की टंकी और कारव्यूरेटर से 20 प्रतिशत हाइड्रोकार्बन तथा एक्जास्ट सिस्टम से 60 प्रतिशत हाइड्रोकार्बन, 100 प्रतिशत CO2 तथा 100 प्रतिशत NO2 निकलती है। खड़ी सामान्य मोटर वाहन से भिन्न मात्रा में गैसें निकलती है। (परिशिष्ट- 34)

आस्ट्रेलिया के रॉयल मेलबोर्न इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी के प्रो. सुरेश के. भार्गव ने आईटीआरसी लखनऊ में वाहन उत्सर्जन पर व्याख्यान देते हुए बताया कि एक कार औसतन बीस हजार किमी के अपने सफर में पर्यावरण में 750 किग्रा. कार्बन मोनोऑक्साइड और 30 किग्रा. हाइड्रोकार्बन प्रदूषण उत्सर्जित करती है। उन्होंने ट्रांसपोर्ट सेक्टर को 60 फीसदी वायु प्रदूषण के लिये जिम्मेदार बताया गया है।

नगरों में प्रचालित वाहनों में कई प्रकार के वाहन हैं। दो पहिया से छ: पहिया वाहन व दो से चार स्ट्रोक वाले वाहन भारी मात्रा में चलते हैं। महानगरों में औसतन 10 से 25 वाहन प्रतिदिन बढ़ते हैं। एक सामान्य पेट्रोल वाहन का औसत कार्बन 46, हाइड्रोकार्बन 200, नाइट्रोजन ऑक्साइड 4.900, एल्डीहाइड 500, मिलीग्राम तथा डीजल चलित वाहन से 700 कार्बन, 600 हाइड्रो कार्बन 293 नाइट्रोजन ऑक्साइड, 21 मिलीग्राम एल्डिहाइड निकलता है। जापान के एक सर्वेक्षण के अनुसार महानगरों में 0.78 से 11.17 μg/m3 सीसे की मात्रा पायी जाती है जहाँ पर पेट्रोल चलित कारें अधिक हैं वहाँ पर सीसे की मात्रा वायुमंडल में अधिक है। सीसे की मात्रा मौसम के अनुसार बदलती रहती है। अधिकांश नगरों में सीसे की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन की मात्रा से 2 μg/m3 से अधिक है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार दिल्ली जैसे महानर में औसतन प्रतिदिन 400 किग्रा. सीसा हवा में वाहनों द्वारा मिलाया जाता है।

लखनऊ महानगर के प्रदूषण का प्रमुख कारण सड़कों पर भारी संख्या में दौड़ते वाहन है। एक अनुमान के अनुसार लखनऊ महानगर में लगभग 30 हजार स्कूटर/मोटर साइकिलें अर्थात दोपहिया वाहन हैं। 10 हजार से अधिक चारपहिया वाहन है और 7 हजार टैम्पो है। जनवरी 97 में सतत प्रयास से नगर में सीसा रहित पेट्रोल की पूर्ति अनिवार्य कर दी गयी और प्रदूषण रहित प्रमाण पत्र पर ही पेट्रोल डीजल की पूर्ति के आदेश दिए गए किंतु सार्थक परिणाम नहीं प्राप्त किए जा सके। उ.प्र. प्रदूषण नियंत्रण की एक रिपोर्ट के अनुसार नगर में सड़क परिवहन के कारण वायु प्रदूषित है। जिसके लिये 80 पतिशत डीजल चालित वाहन और 20 प्रतिशत पेट्रोल चालित वाहन जिम्मेदार है। डीजल चालित वाहनों में 90 प्रतिशत टैम्पों हैं। शेष जीपें कारें व बड़े वाहन हैं। इस आधार पर अनुमान लगाया गया कि 70 प्रतिशत नगरीय प्रदूषण का कारण टैम्पों हैं। प्रदूषण नियंत्रण विभाग के प्रभारी डॉ. जीएन मिश्र बताते हैं कि लखनऊ में प्रदूषणकारी ठोस कणों की मात्रा स्वीकृत स्तर से दोगुने से भी अधिक है। टैम्पों से सर्वाधिक समस्या धूम्र प्रदूषण की है। नगर का धूम्र प्रदूषण उच्च ट्रैफिक समय में इतना अधिक होता है कि सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है।

नगर में धूम्र प्रदूषण फैलाने वालों में टैम्पों हैं इस समय नगर में साढ़े छ: हजार पंजीकृत टैम्पों चल रहे हैं तथा अनुमानत: एक हजार से अधिक टैम्पों बिना पंजीयन के नगर की सड़कों पर दौड़ रहे हैं। इनमें से मात्र 430 टैम्पों पेट्रोल चालित हैं। 57 टैम्पों डीजल के हैं, शेष सभी विक्रम टैम्पों हैं। आरटीओ कार्यालय के अनुसार लगभग 4000 टैम्पों पंजीयन की प्रतीक्षा में है। इस समय लगभग 42 मार्गों पर टैम्पों चल रहे हैं। एक मार्ग पर औसतन लगभग 200 टैम्पों हैं। ग्रामीण क्षेत्रों का जोड़ने वाले मार्गों पर कम टैम्पों चलते हैं, जब कि प्रमुख महानगरीय मार्गों में टैम्पों का औसत स्तर नगर औसत स्तर पर काफी अधिक है। इन टैम्पों के 36 स्टैंड हैं इनमें से 27 स्टैंड छोटे हैं। प्रमुख मार्गों को जोड़ने वाले 9 बड़े स्टैंड हैं इन पर प्रदूषण का स्तर अन्य स्थानों से अधिक रहता है।

भारत सरकार की पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार लखनऊ महानगर में वाहनों से प्रतिदिन 41.07 टन, कार्बन मोनोऑक्साइड, 18.75 टन नाइट्रोजन हाइड्रोजन तथा 18.07 टन धुएँ के कण उत्सर्जित हो रहे हैं। राजधानी में क्षेत्रवार वायु प्रदूषण के आंकड़ों के आधार पर सल्फर डाइऑक्साइड नाइट्रोजन ऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी विषैली गैसों सहित कणकीय पदार्थों का प्रदूषण स्तर दिल्ली के अनुपात में दो से पाँच गुना अधिक है।

राजधानी में जिस तेज गति से जनसंख्या बढ़ी उससे भी तेज गति से वाहनों की संख्या बढ़ी है। 1951 में जनसंख्या पाँच लाख थी 1991 में 20 लाख हो गयी, इस समय नगर की जनसंख्या 25 लाख हो चुकी है। यहाँ 1985 से 1991 के मध्य वाहनों की संख्या 82167 से बढ़ कर 215547 पहुँच गयी इस समय पंजीकृत वाहनों की संख्या 5 लाख तक है। इसके अलावा अन्य जिलों से आने वाले तथा बिना पंजीकृत वाहन हैं। तेज वाहनों की संख्या के साथ 28 प्रतिशत वाहन धीमी गति के हैं। वर्ष 1989-90 में नगर में 32 हजार साइकिल और रिक्शे थे, 150 तांगे थे। इसके बाद तीन वर्षों में ही 15 हजार साइकिलें और रिक्शे बढ़ गये तथा 40 तांगों की संख्या में गिरावट आयी। इस समय में 14 तरह के भारी, हल्के, तेज, मध्यम तथा धीमी गति के वाहन हैं।

लखनऊ में टैम्पों तथा टैक्सियों द्वारा फैलाये जाने वाले प्रदूषण समस्या के संदर्भ में एक सर्वेक्षण 10 जून से 20 जून, 95 को पर्यावरण संरक्षण विधि विभाग लखनऊ विवि की ओर से कराया गया जिसमें कुछ आश्चर्यजनक तथ्य उभरकर सामने आये कि लखनऊ के प्रदूषण के स्रोत जो टैम्पों को माना जा रहा है। उनमें 60 प्रतिशत टैम्पों 5 वर्ष से अधिक चल चुके हैं। इसी प्रकार 80 प्रतिशत टैम्पों वे हैं जो 50000 किमी अधिक की दूरी तय कर चुके हैं। अगर मरम्मत कार्य से सम्बन्धित प्रश्न पर विचार करें तो पता चलता है कि 50 प्रतिशत लोग ही 6 माह के मध्य मरम्मत कार्य कराते हैं। इसी प्रकार प्रदूषण मुक्त प्रमाण पत्र आधे से अधिक लोग लेते ही नहीं उन्हें उसकी कोई उपयोगिता ही नहीं समझ में आती है। 5 प्रतिशत चालकों को प्रदूषण की कोई जानकारी ही नहीं है तथा 10 प्रतिशत लोग ऐसे चालक हैं जिन्हें प्रदूषण सम्बन्धी आवश्यक जानकारी नहीं है। प्रशासनिक स्तर पर भी जागरूकता का अभाव प्रतीत होता है क्योंकि किसी को भी प्रदूषण उत्पन्न करने के सम्बन्ध में दंडित नहीं किया गया है। लखनऊ नगर में 70 प्रतिशत वाहन ऐसे हैं जिनके पास प्रदूषण मुक्त प्रमाण पत्र नहीं है। यदि हैं तो वह भी अवैध रूप से ही प्राप्त कर लिया जाता है। (परिशिष्ट- 35)

नगरीय औद्योगिक इकाइयाँ


लखनऊ नगर के नादरगंज परिक्षेत्र में कैमिकल फैक्ट्रियों और प्लास्टिक मिलों से निकलने वाले जहरीले धुएँ से व गंदे जल से आस-पास के लोगों की समस्याएँ बढ़ जाती है क्योंकि यहाँ फैक्ट्रियों में वायु और जल शोधन संयंत्रों की स्थापना नहीं की जा सकी। इस क्षेत्र में कैमिकल फैक्ट्रियों में तेजाब फैक्ट्री, आरगेनो, आनर्स कैमिकल्स के अलावा 8 प्लास्टिक रबर फक्ट्रियाँ हैं। इसके अतिरिक्त बोरे बनाने वाली फैक्ट्री सहित चार दाल मिलें, हिंदुस्तान स्टील, मोटर वाडी फैक्ट्री, ऑटोमेक्स, टैम्पों वाडी, सहित स्कूटर इंडिया की 36 इंपलरी पार्ट फैक्ट्रियों में 25 इसी क्षेत्र में है। इनसे उड़ने वाले बुरादे की डस्ट, निकलने वाले जहरीले धुएँ से आस-पास के निवासियों को परेशानी पड़ती है। साथ ही गंदे जल के आस-पास फैलने से भूमि की दश खराब होती जा रही है।10

वायु प्रदूषण के कारण वाहनों के अतिरिक्त औद्योगिक इकाइयाँ, अपशिष्ट वाहक नाले, सीवर, अपशिष्ट निस्तारण स्थल भी हैं (परिशिष्ट- 27, 31) अगले चरण में वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव तथा लखनऊ के नागरिकों के जन जीवन पर यहाँ की प्रदूषित वायु के दुष्प्रभाव का अध्ययन किया गया है।

स. वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव


वायु प्रदूषण मानव सहित सभी जीवधारियों में संकट उत्पन्न कर रहा है। पौधे अपनी स्वाभाविक गुणवत्ता खो रहे हैं और मानव जीवन के लिये आवश्यक ऑक्सीजन गैस प्रदूषित होकर अनेक बीमारियों को जन्म दे रही है। महानगरों की विषैली हवा मानव स्वास्थ्य और संपत्ति के लिये प्रश्न चिह्न बनती जा रही है। अम्ल वर्षा का व्यापक प्रभाव वनस्पतियों, पशुओं और मनुष्यों पर पड़ रहा है परिणामत: मानव स्वास्थ्य का ह्रास निरंतर होता जा रहा है। ऊपरी वायुमंडल में क्लोरोफ्लोरो कार्बन ओजोन मंडल को नष्ट कर रहे हैं जिससे तापमान में लगातार वृद्धि होती जा रही है। वायु प्रदूषण का दुष्प्रभाव भवनों धातु के संयंत्रों फसलों और मौसम में भी दिखाई दे रहा है।

वायु प्रदूषण के अजैविक एवं जैविक संघटकों पर पड़ने वाले प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभावों को चार वर्गों में रखा जा सकता है -

1. मौसम तथा जलवायु पर प्रभाव
2. मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव
3. जैविक समुदाय पर प्रभाव
4. सामाजिक व आर्थिक क्षेत्र पर प्रभाव

1. मौसम तथा जलवायु पर प्रभाव -
वायुमंडल में एअरकंडीशनर, रेफ्रीजरेटर, फोम प्लास्टिक, हेयर ड्रायर, स्प्रेकैन डिसपेंसर, अग्निशामक तथा कई प्रकार की प्रसाधन की सामग्रियों से उत्सर्जित क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) तथा सुपरसोनिक जेट विमानों से निर्मुक्त नाइट्रोजन ऑक्साइड से समताप मंडलीय ओजन परत में अल्पता के कारण धरातलीय सतह पर सूर्य की पराबैंगनी किरणों की अधिक मात्रा के कारण और निचले वायुमंडल तथा धरातलीय सतह के तापमान में वृद्धि के कारण पार्थिव एवं वायुमंडलीय विकिरण एवं ऊष्मा संतुलन में अव्यवस्था उत्पन्न हो जायेगी और इससे जलसंसाधन सर्वाधिक प्रभावित होंगे, वर्षण प्रभावित होगा। भूजल भंडारों में कमी आयेगी, सूखा और बाढ़ की विषम घटनाएँ होंगी। वर्षण में 10 प्रतिशत की कमी तापमान में 10-20C की वृद्धि और शुष्क नदी घाटी क्षेत्रों में 40 प्रतिशत से 70 प्रतिशत की कमी आयेगी।

‘इंटरगबर्नमेंटल पैनल आनक्लाइमेट चेंजर (आईपीसीसी)12’ के अनुसार यदि ग्रीन हाउस गैसों के उर्त्सजनों को कम करने के प्रभावी कदम नहीं उठाए जाते तो तापमान में 1.5-4.50C की वृद्धि होगी और 21000 तक समुद्रतल के 65 सेमी ऊपर उठने की संभावना बढ़ जायेगी। यह दर 6 सेमी प्रतिवर्ष होगी।

लखनऊ महानगर के वायुमंडल को गर्म करने में गोमती नदी, तालाब व झीलों से निकलने वाली मीथेन गैस महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत कर रही है। राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान के एक शोध अध्ययन के अनुसार गोमती नदी धरती पर तापमान बढ़ाने वाली ‘मीथेन गैस’ को शहर के वातावरण में बड़ी मात्रा में उत्सर्जित कर रही है। शोधपत्र के अनुसार ग्रीष्मकाल में गोमती के जलीय सतह से प्रतिदिन 81 मिग्रा. प्रतिवर्ग मी. प्रति घंटा की दर से ग्रीन हाउस गैस का तीव्र गति से उत्सर्जन हो रहा है। गोमती नदी के अतिरिक्त कचरे से पाटी जाने वाली मोतीझील के जल से भी पर्यावरण को क्षति पहुँचाने वाली मीथेन गैस बड़ी मात्रा में उत्सर्जित होकर नगर के वातावरण में फैल रही है। इसी आशय की पुष्टि नेडा ने भी की है। अध्ययन में बटलर पैलेस हुसैनाबाद, नवाबगंज, बुद्धापार्क, एनबीआरआई, सूरजकुंड तालाब तथा झील से भी मीथेन उत्सर्जन के स्पष्ट प्रमाण मिल चुके हैं।

अप्रैल 1995 से अप्रैल 1998 के मध्य भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा पोषित तीन वर्षीय परियोजना ‘इन्वेस्टीगेशन ऑफ मीथेन इन्फ्लक्स फ्रॉम वाटर बॉडीज’ के अनुसार एनबीआरआई ने 10 मॉनीटरिंग स्थलों पर तीनों मौसमों में मीथेन उत्सर्जन की दर की माप की इसमें नगर के वायुमंडल में मीथेन गैस की वार्षिक औसत मात्रा का एक लेखा जोखा तैयार किया गया। संस्थान के पर्यावरणीय जैव प्रयोगशाला के प्रभारी बताते हैं कि जलस्रोतों में उपस्थित वानस्पतिक कवच के द्वारा काफी अधिक मीथेन वातावरण में पहुँचता है। गोमती नदी के पश्चात मोतीझील से 49 mg/I प्रतिवर्ग मी. प्रति घंटा मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है।

इस शोध अध्ययन में यह भी बताया गया कि जिन जल स्रोतों में सीवेज और औद्योगिक कचरे अथवा घरेलू कचरे से जनित कार्बनिक पदार्थ अधिक होते हैं, वहाँ मीथेन गैस अधिक उत्सर्जित होती है। अध्ययन के अनुसार मोतीझील में 600-700 टन कचरा प्रति दिन डाला जाता है और गोमती में 18 करोड़ लीटर सीवेज उत्प्रवाह सीधे गिराया जाता है। इनमें बायोकेमीकल ऑक्सीजन डिमोड अधिक होने से मीथेन का उत्सर्जन भी अधिक होता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग में मीथेन गैस की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। यद्यपि कार्बनडाइऑक्साइड के अनुपात में मीथेन की मात्रा काफी कम है किंतु इन्फ्रारेडिएशन को सोखने की क्षमता इसमें 25 प्रतिशत अधिक है इसलिये मीथेन की वृद्धि से गर्मी में अतिशय वृद्धि होती है। डॉ. सिंह के अनुसार स्थिर जल में उपस्थित जीवाणु व पौधे ऑक्सीजन को सोख लेते हैं। और जलीय सतह पर ऑक्सीजन का ह्रास होने से और मीथेनोजेनिक बैक्टीरिया दिन रात जलीय पौधे के माध्यम से मीथेन गैस को वातावरण में उत्सर्जित करते रहते हैं। यह गैस जल में घुलनशील होने के कारण पौधों की जड़ों से होकर वायुमंडल में पहुँचती है।

गोमती नदी में तीनों ऋतुओं में सर्वाधिक मीथेन के उत्सर्जन का कारण नदी जल में प्रदूषण का बढ़ता दबाव है। इस प्रकार कार्बनिक पदार्थों के बढ़ने से मीथेन भी अत्यधिक मात्रा में उत्सर्जित होकर नगर के तापमान को बढ़ा रही है।

तालिका 4.10 लखनऊ महानगर गोमती नदी और झीलों से उत्सर्जित मीथेन गैस मिलीग्राम/वर्ग मीटर प्रति घंटा मेंनगरों के औद्योगिक क्षेत्रों के ऊपर धुएँ से युक्त कोहरे को सामान्यतया धूम्र कोहरा या नगरीय धूम कोहरा कहते हैं। नगरों की चिमनियों का धुआँ हवा की दिशा और गति से प्रभावित होता है हवा जिस दिशा की ओर बहती है। उस ओर धूम्र कणों की वर्षा होती है। हवा की गति अधिक होने से इसका प्रभाव दूर तक होता है। नगरीय क्षेत्रों में जहाँ भी ऐसी चिमनियाँ हैं। इनका प्रभाव देखा जा सकता है। लखनऊ नगर में चारबाग रेलवे स्टेशन लोकोशेड तथा कारखानों के निकट के भवनों के रंग से भी इसका अनुमान लगाया जा सकता है। नादरगंज जो एक औद्योगिक क्षेत्र हैं इस क्षेत्र के परित: आवासीय कॉलोनियाँ इसकी समस्या से ग्रसित हैं। ऐशबाग, तालकटोरा, राजाजीपुरम, डालीगंज में भी यह समस्या गंभीर रूप धारण कर रही है।

शीतकाल में प्रात: और सायंकाल घरेलू धुआँ तथा वाहनों से निकलने वाले धुएँ के कारण नगर में यात्रा करना कठिन हो जाता है। आँखों की कड़ुवाहट के कारण सिरदर्द भी होना स्वाभाविक सा है। दिन के समय यह समस्या कुछ कम होती है। यह प्रदूषक पृथ्वी तल से कुछ ऊपर उठ जाते हैं। परंतु चिमनी की ऊँचाई उससे अधिक हो, तो ऐसी स्थिति में प्रदूषक या धुआँ चिमनी के शिखर के ऊपर उठता है और पृथ्वी इसके दुष्प्रभाव से कम प्रभावित होती है। इसी प्रकार व्युत्क्रमण ऊँचाई पर है जो तो धुएँ की मात्रा पृथ्वी पर सीधे कुछ दूरी के बाद आती है।

भारत के मौसम विज्ञान संस्थान13 ने देश के कुछ प्रमुख नगरों में इस व्युत्क्रमण की स्थिति का आकलन किया जिसमें 8 नगरों को सम्मिलित किया। ये अहमदाबाद, मुंबई, कोलकाता, गोहाटी, जोधपुर, चेन्नई, दिल्ली और लखनऊ है। लखनऊ नगर की स्थिति को यहाँ के चलने वाले पवन की गति और व्युत्क्रमण की स्थिति को भी प्रस्तुत किया गया है।

वर्ष के 12 मासों में 4 माह को छोड़कर 75 प्रतिशत धूम्र नगर में रहता है। 4 माह 75 प्रतिशत से अधिक रहता है और जो नगर की धूम्र व धूम्र कोहरे की भयावह दशा को दर्शाता है।

औद्योगिक चिमनियों, घरेलू कार्यों, वाहनों आदि से निकलने वाले धुएँ से नगरीय वायुमंडल प्रदूषित होता है। वायुमंडल के यह प्रदूषक वर्षाजल के साथ पुन: धरातल पर वापस आकर जन जीवन और वनस्पतियों में दुष्प्रभाव उत्पन्न करते हैं। वनस्पतियों के स्वाभाविक विकास में बाधा आती है। मानव तथा जीव जंतुओं पर विभिन्न प्रकार के दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं। इसमें विभिन्न प्रकार की गैसें और धातुओं के अंश उपस्थित रहते हैं। लखनऊ महानगर में होने वाली वर्षा के कुछ नमूनों का परीक्षण किया गया जिसमें पाया गया कि लोहे की मात्रा 700 माइक्रोग्राम तक उपस्थिति रहते हैं जो कि जल की 300 माइक्रोग्राम की न्यूनतम मात्रा से अधिक है। तालिक - 4.11 से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि एक वर्षा के पश्चात अगली वर्षा का अंतराल कम है तो हानिकारक धातुओं की मात्रा कम हो जाती है। वर्षा की मात्रा के साथ अंतराल अधिक है तो हानिकारक धातुओं की मात्रा वर्षा जल में बढ़ती है। मैग्नीज की मात्रा 10 से 40 तक पायी गयी। यह मात्रा हानिकारक सीमा से कम रही, जिंक की मात्रा भी कम रही, क्रोमियम की मात्रा केवल एक में अधिक पायी गयी शेष में औसत मात्रा मानक से कम रही, सीसे की औसत मात्रा भी कम रही।

तालिका 4.11 लखनऊ महानगर में वर्षाजल में उपस्थित प्रदूषक तत्वजलवर्षा के साथ अम्ल के अवपात को अम्लवर्षा कहते हैं। वर्षा का जल भी पूर्ण तथा शुद्ध नहीं होता है क्योंकि वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड का वर्षाजल में विलय हो जाता है इसलिये उसमें अम्लीयता आ जाती है। वर्षाजल में अम्लीय पीएच मान सामान्य रूप से 5 होती है। 7.0 पीएच मान वाला जल तटस्थ जल 0.7 से कम अम्लीय और अधिक होने पर क्षारीय हो जाता है। जब जल का पीएच 4 से कम हो जाता है। तो वह जल जैविक समुदाय के लिये हानिकारक हो जाता है मानव जनित स्रोतों से निस्सृत सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) वायुमंडल में पहुँच कर जल से मिलकर सल्फेट तथा सल्फ्यूरिक एसिड (H2SO4) का निर्माण करती है। जब यह एसिड वर्षा के जल के साथ नीचे गिरता हुआ धरातलीय सतह पर पहुँचता हो तो उसे अम्ल वर्षा कहते हैं।

सर्वप्रथम 1952 में राबर्टएंगस स्मिथ ने मैनचेस्टर में अम्लवर्षा की घटना की खोज की। अम्ल वर्षा पर्यावरणिक समस्या है। अम्ल वर्षा का पूरी पारिस्थितिक व्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है। अम्ल वर्षा से वनों, नदियों, खेतों, झीलों आदि में खनिज संतुलन गड़बड़ा जाता है, जिसका पारिस्थितिक व्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है। आर्द्र अम्ल वर्षा से झीलों तथा नदियों में अम्लता बढ़ जाती है। निकटस्थ मिट्टी से एल्यूमिनियम, मैग्नीज जस्ता, लोहा, गिलेट आदि धातुओं के अंतर्दाह से हानिकारक पदार्थ निकलकर मिलते हैं।

लखनऊ महानगर में जून से दिसंबर 1980 में प्रेक्षणों द्वारा पता लगा कि लखनऊ में अम्लवर्षा की कोई घटना नहीं हुई। वर्षा जल के रासायनिक संघटक में एक बौछार से दूसरी बौछार में अंतर था, जिसमें क्षारीय बाई कार्बोनेटे की मात्रा उपस्थित थी। कुछ नाइट्रेट की आपेक्षित उच्च सांद्रता (6 से 8 मिग्रा./लीटर थी) लोहे की मात्रा सबसे अधिक 26.5 माइक्रोग्राम प्रतिलीटर थी। जस्ता, स्ट्रोसियम, तांबा और मैग्नीज की मात्रा घटती गयी। 1981 के वर्षाजल का पीएच मान 7.45 था जिससे स्पष्ट होता है कि अम्लवर्षा की संभावना नहीं है। परंतु यहाँ प्रदूषक प्राकृतिक और मानवीय दोनों कारणों से उत्पन्न होते हैं। औद्योगिक कारणों से जिंक, कोबाल्ट व चांदी उत्पन्न होते हैं। मिट्टी में कोबाल्ट और निकिल होते हैं।

2. वायु प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव


रेल मंत्रालय की स्वायत्तशासी संस्था ‘राइट्स’ ने लखनऊ की जन परिवहन प्रणाली की संभावना में यह जानकारी दी कि लखनऊ में वाहनों के द्वारा यहाँ के वायु मंडल में घुले धुएँ को जाने अनजाने हम लगभग 81 टन की मात्रा को सांस के माध्यम से अपने फेफड़ों तक पहुँचाते हैं परिशिष्ट-36 में नगर के विभिन्न महत्त्वपूर्ण चौराहों में उपस्थित सांस द्वारा लिये गए धूल कणों की मात्रा तथा सल्फर और नाइट्रोजन ऑक्साइड की मात्रा को प्रस्तुत किया गया है। 3 और 4 जून 1977 की उपलब्ध स्थिति से पता चलता है कि अपराह्न 2 से 10 बजे के समय में आरएसपीएम की मात्रा सर्वाधिक होती है। रात के समय सबसे कम होती है। यहाँ एक बात स्पष्ट है कि नगर में वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण यहाँ चलने वाले वाहन हैं। जो रात में कम हो जाते हैं। इसलिये रात और दिन का अंतर दोगुने से अधिक है। आईटीआरसी गेट के पास रात में आरएसपीएम 98.21 और अपराह्न में 205.29 μg/m3 रहता है। नगर के 12 अनुश्रवण केंद्रों में आरएसपीएम का घनत्व चारबाग में सबसे अधिक रहता है जिसका कारण रेलवे, बस, टैक्सी तथा टैम्पों स्टैंड हैं। चारबाग और तालकटोरा दोनों स्थानों में प्रात: काल भी आरएसपीएम मात्रा अधिक रहती है। तालकटोरा औद्योगिक केंद्र है, चारबाग परिवहन साधनों का केंद्र है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आरएसपीएम के मानक 150 के अनुपात में यहाँ दोगुने से अधिक है। इसी क्रम में आलमबाग का स्थान आता है, जहाँ प्रात: कालीन समय में 280 से 292 μg/m3 आरएसपीएम रहता है। प्रात: 6 से अपराह्न 2 बजे की समय अवधि के दौरान चारबाग, हजरतगंज तथा तालकटोरा में आरएसपीएम की मात्रा अधिक रहती है।

आएसपीएम की मात्रा लखनऊ नगर के नागरिकों द्वारा सांस के माध्यम से फेफड़ों तक पहुँचाए गए धूल कणों को प्रदर्शित करता है। चूँकि इनकी मात्रा बोर्ड द्वारा निर्धारित मानक से तीन गुने तक हैं कहीं-कहीं यह मात्रा चार गुने के निकट तक है। सांस के माध्यम से जितने ही घातक पदार्थ फेफड़ों तक पहुँचते हैं उनका दुष्प्रभाव उतना ही अधिक हो जाता है। सल्फर ऑक्साइड की मात्रा 30 से 76.50 μg/m3 मात्रा बोर्ड के मानक 30 से अधिक है। औद्योगिक क्षेत्रों की मात्रा से अधिक नहीं है। फिर भी घातक सीमाओं में इसे रखा जाता है। नाइट्रोजन ऑक्साइड की मात्रा 30 से 90 μg/m3 तक पायी गयी। क्षेत्रीय वितरण के अनुसार यदि ध्यान दें तो चारबाग, आलमबाग, केसरबाग, सीतापुर रोड में सल्फर ऑक्साइड की मात्रा अधिक रहती है। नगर के इन भागों में यातायात के साधनों का दबाव अधिक रहता है। यही स्थिति नाइट्रोजन ऑक्साइड की रहती है। इसकी मात्रा निशातगंज क्षेत्र में भी बढ़ती हैं और हजरतगंज का भी इसी क्रम में स्थान रहता है। (परिशिष्ट- 36)

वाहनों के धुएँ से उत्सर्जित हवा में तैरते धूल व कार्बन के सूक्ष्म विषैले कण मानव शरीर में सुरक्षित सीमा के विपरीत तीन गुने से अधिक मात्रा में प्रत्येक दिन नगरवासियों की सांस में घुल कर फेफड़ों तक पहुँचते हैं। इनके प्रभाव से खांसी, जुकाम, एलर्जिक, ब्राकाइटिस, ब्रॉन्कियल अस्थमा व सांस के विभिन्न प्रकार के विकारों का तीव्रगति से प्रभाव फैलता जा रहा है। केजी मेडिकल कॉलेज के चेस्टरोग विशेषज्ञ एवं विभागाध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद कहते हैं कि प्रदूषण से निश्चित रूप में ऐसी बीमारियाँ बढ़ी हैं। ब्रॉन्कियल, अस्थमा, ब्रान्काइटिस व एलर्जी रोगों की तेजी से वृद्धि हुई है।

एक वरिष्ठ रेडियो लॉजिस्ट के अनुसार सामान्य प्रतीत होने वाले व्यक्तियों के सीने के एक्सरे में 80 से 85 प्रतिशत लोगों के फेफड़ों में काले धुएँ के धब्बे, ब्रान्कोवेस्कुलर मार्किंग व हाइलर शैडो सामान्य रूप से पाये गये। इसी प्रकार एक अन्य अध्ययन में केजीएमसी रोग विशेषज्ञ ने पाया कि 48 प्रतिशत वाहन चालकों और 55 प्रतिशत फेरीवालों में नेत्र व फेफड़ों से सम्बन्धित बीमारियाँ है। वैज्ञानिकों व चिकित्सकों ने काले धुएँ, हानिकारक कार्बन मोनोऑक्साइड व नाइट्रोजन ऑक्साइड गैसों का दुष्प्रभाव जिस गति से नगर निवासियों के फेफड़ों व श्वसन तंत्र की नलिकाओं में देखने को मिलता है। इससे चिकित्सक अच्छे खासे आश्चर्य चकित है।

लखनऊ के प्रसिद्ध चिकित्सालय बलरामपुर के हृदय एवं चेस्ट रोग विशेषज्ञ डॉ. टीपी सिंह का कहना है कि अस्पताल में भर्ती होने वाले अधिकतर धूम्रपान करने वाले रोगियों के फेफड़ों में वही लक्षण मिलते हैं जो कि धुएँ के प्रभाव से ग्रसित व्यक्तियों में। डॉ. सिंह के अनुसार फेफड़ों की महीन नलियों के अंदर की सतह में सूजन का होना एक आम समस्या बन गयी है। डॉ. सिंह के अनुसार इन सब का कारण राजधानी की वायु में उपलब्ध कार्बन व धुएँ के नन्हें कण हैं।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वैज्ञानिकों के अनुसार राजधानी की वायु में उपस्थित अधजले र्इंधन से निकलने वाले हाइड्रोकार्बन का विषैला प्रभाव लोगों को सुस्त बनाता जा रहा है। वहीं इसके दीर्घ कालिक एक्सपोजर से कैंसर व अन्य गम्भीर बीमारियों की वृद्धि होती जा रही है। वैज्ञानिकों का यह भी मत है कि सीसा युक्त पेट्रोल के प्रयोग से रक्तचाप सिर दर्द व तनाव जैसे सामान्य कहे जाने वाले रोग बढ़ते जा रहे हैं।

नगर के मार्गों पर दौड़ने वाले वाहनों में सबसे अधिक दो पहिया वाहनों की संख्या है जिनसे सर्वाधिक अधजले हाइड्रोकार्बन के साथ अत्यधिक घातक प्रभाव डालने वाला सीसा उपस्थित रहता है। साथ ही पाइरोबैन्जीन भी बड़ी मात्रा में उत्सर्जित होती है। डीजल चलित टैम्पो, बस व जीप से अधिक मात्रा में निकलने वाली नाइट्रोजन ऑक्साइड गैस के कारण ही नागरिकों में सांस की परेशानियों के साथ दमा आदि की परेशानियाँ बढ़ती जा रही है। एनवीआरआई की वायु में उपस्थित सीसे की मात्रा की अनुश्रवण स्थिति के अनुसार चारबाग 2.07 (1995) की तुलना में 1997 को 7.55 लगभग चार गुना बढ़ गयी नगर के 7 अन्य अनुश्रवण स्थलों में भी लगभग इसी क्रम की उपस्थिति रही। (तालिका 4.12) सीसे की मात्रा में वृद्धि पेट्रोल वाहनों के कारण होती है। एक अनुमान के अनुसार नगर में परिवहन क्षेत्र में प्रतिदिन 39 लाख लीटर पेट्रोल की खपत पहुँच चुकी है। मानव स्वास्थ्य पर सीसा का दुष्प्रभाव सबसे घातक होता है। लखनऊ नगर के कुछ प्रतिष्ठित चिकित्सकों के अनुसार वायु में सीसे की अत्यधिक मात्रा से खून की कमी (एनीमिया) नसों का सूखना जैसे रोग बढ़ रहे हैं। यह श्वसन तंत्र में पहुँच कर गुर्दे, हृदय सांस तंत्रिका तंत्र पाचन तंत्र, रक्त अलपता, सिर दर्द की बीमारियाँ उत्पन्न करते हैं तथा इसके दूरगामी प्रभाव से बच्चों की मानसिक दक्षता में भी गिरावट की स्थिति के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

तालिका 4.12 लखनऊ महानगर की वायु में सीसे की उपस्थित मात्राएनबीआरआई के सर्वेक्षण के पश्चात नगर की वायु में उपस्थित सीसे की मात्रा यह लक्षित करती है कि आगामी वर्षों में यदि इसी गति से सीसे की मात्रा बढ़ती गयी तो सांस लेना और जीना मानव के साथ समस्त जैव जगत के लिये कठिन हो जायेगा।

नगर के प्रदूषित वातावरण की दशा का अनुमान केजीएमसी के नेत्र विभागाध्यक्ष डॉ. वीबी प्रताप एवं आईटीआरसी के वैज्ञानिक डॉ. आरसी श्रीवास्तव द्वारा संयुक्त रूप से किये एक अध्ययन ‘‘वाहनों से निर्गत वायु प्रदूषण का मानव नेत्रों तथा फेफड़ों पर पड़ने वाले प्रभाव तथा उनका भौतिक तथा विषशास्त्रीय अध्ययन’’ ‘इफेक्ट ऑफ इन्वायरन्मेंटल पॉल्यूशन (आटोइक्जास्ट) ऑन ह्यूमन आईज एंड लंग्स-क्लीनिकल एंड टाक्सीलॉजिकल इवेल्यूशन’ में प्रस्तुत किया गया है। प्रबुद्ध वैज्ञानिकों ने दो वर्ष तक लखनऊ नगर के वायु प्रदूषण के प्रभाव का अध्ययन किया। इस अध्ययन में लखनऊ को चार भागों में बाँटा गया प्रथम में नगर के तीन टैक्सी स्टैंडों को रखा गया जहाँ वाहनों द्वारा सर्वाधिक प्रदूषण फैलता है। इनमें अमीनाबाद, महानगर और चौक टैक्सी स्टैंड रखे गए। द्वितीय में अमीनाबाद बाजार, चारबाग चौराहा, महानगर व हजरतगंज को रखा गया जहाँ यातायात का घनत्व 1500 से 2000 वाहन प्रतिघंटा था, तृतीय में ठाकुरगंज, इंदिरा नगर, अलीगंज व तालकटोरा को रखा गया जहाँ यातायात का घनत्व 500 से 800 वाहन प्रति घंटा था। चतुर्थ श्रेणी में सदरबाजार और गोमती नगर को रखा गया जहाँ यातायात का घनत्व 300 वाहन प्रति घंटा था।

नगर के सबसे अधिक प्रदूषित और वाहनों वाले क्षेत्रों के अध्ययन में प्रथम वर्ग में रखे गए, अमीनाबाद, महानगर तथा चौक टैक्सी स्टैंड पर खतरनाक रासायनिक तत्वों की मात्रा निर्धारित मात्रा से अधिक थी यहाँ एसपीएम की मात्रा क्रमश: 678.38, 653.76 तथा 678.78 माइक्रोग्राम प्रतिमिली मीटर पायी गयी। सल्फरडाइऑक्साइड की मात्रा क्रमश: 66.47, 59.01 तथा 61.21 पायी गयी। नाइट्रोजन के ऑक्साइड की 72.01, 69.81 तथा 72.86 पायी गयी, फार्मेल्डिहाइड 61.70, 50.51 तथा 53.81 μg/ml पायी गयी। (तालिका- 4.13)

नगर के अमीनाबाद, महानगर चौक आदि टैक्सी स्टैंडों पर घातक रासायनिक तत्वों की मात्रा अपनी निर्धारित सीमा से कहीं अधिक थी, फार्मेल्डिहाइड की मात्रा अमीनाबाद में 61.70 μg/ml नगर में सर्वाधिक रही, दूसरे स्थान पर भी अमीनाबाद बाजार का स्थान रहा, इसका कारण यहाँ पर वाहनों का घनत्व तथा जन घनत्व ही है। टैक्सी स्टैंड के साथ यहाँ निजी दो पहिया और चार पहिया वाहनों की अधिकता रहती है। यही स्थिति अन्य प्रदूषकों के सम्बन्ध में रही।

तालिका 4.13 लखनऊ महानगर वायु प्रदूषण एक स्वास्थ्य संकटअध्ययन के आंकड़ों से स्पष्ट है कि नगर में वायु प्रदूषण की स्थिति घातक है। इस घातक स्थिति के प्रभाव का अध्ययन करने के लिये नगर के सर्वाधिक प्रदूषित क्षेत्रों चारबाग, अमीनाबाद चौक, इंदिरानगर, ठाकुरगंज तथा सदर के चौराहों के निकट रहने वाले नागरिकों के रक्त में नगर की वायु में पाये जाने वाले घातक प्रदूषक सीसा, सल्फरडाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा फार्मेल्डिहाइड जैसे रासायनिक तत्व पाये गए।

पर्यावरण निदेशालय के सौजन्य से केजीएमसी कॉलेज के नेत्र विभाग प्रमुख डॉ. वीबी प्रताप तथा आईटीआरसी के वैज्ञानिक आरसी श्रीवास्तव ने अपने दो वर्षों के अध्ययन में पाया कि राजधानी के 62 प्रतिशत टैम्पों ड्राइवर 56 प्रतिशत, सड़क किनारे दुकानें रखने वाले, वेंडर, 68 प्रतिशत यातायात नियंत्रित करने वाले पुलिस कर्मचारी फेफड़ों और आँखों की अनेक बीमारियों से ग्रस्त है।

इस अध्ययन के लिये वैज्ञानिकों ने राजधानी के 1012 टैम्पों चालकों, पटरी दुकानदारों तथा यातायात पुलिस कर्मियों के नेत्रों, फेफड़ों एवं रक्त की जाँच की, इस अध्ययन में यह भी पाया कि 93.20 प्रतिशत ड्राइवर, 74.07 प्रतिशत वेंडर एवं 77.47 प्रतिशत यातायात पुलिसकर्मी आँखों में जलन, 51.45 प्रतिशत ड्राइवर 44.44 प्रतिशत एवं 74.77 प्रतिशत यातायात पुलिसकर्मी आँखों में निरंतर पानी आने से तथा 33.49 प्रतिशत ड्राइवर, 21.29 प्रतिशत वेंडर एवं 26.26.12 प्रतिशत पुलिसकर्मी आँखों में दर्द एवं लालीपन से ग्रस्त हैं। इसके अतिरिक्त परीक्षण के दौरान यह भी पाया कि इन लोगों की आँखों की रोशनी में निरंतर कमी तथा सिरदर्द की भी शिकायत रहती थी। आँखों की रोशनी की शिकायत करने वालों में 25 प्रतिशत ड्राइवर, 20.37 प्रतिशत वेंडर तथा 13.5 प्रतिशत यातायात पुलिस कर्मी थे। इस प्रकार भयंकर सिर दर्द से 56.79 प्रतिशत ड्राइवर, 52.77 प्रतिशत वेंडर तथा 63.06 प्रतिशत यातायात पुलिसकर्मी प्रभावित पाये गए।

इसी अध्ययन में डॉ. प्रताप एवं डॉ. श्रीवास्वत द्वारा फेफड़ों की जाँच के पश्चात यह पाया कि 39.80 प्रतिशत ड्राइवर, 32.40 प्रतिशत वेंडर तथा 57.65 प्रतिशत पुलिसकर्मी भयंकर खाँसी के शिकार है। इसी प्रकार 24.51 प्रतिशत ड्राइवर, 24.70 प्रतिशत वेंडर तथा 9.9 प्रतिशत यातायात पुलिसकर्मी सांस फूलने एवं दमा से ग्रस्त पाये गए। इसके अतिरिक्त इसी अध्ययन में पाया गया कि 41.99 प्रतिशत ड्राइवर 23.14 वेंडर, 17.11 पुलिस कर्मियों को खाँसी के साथ बलगम की भी शिकायत थी।

इस अध्ययन के लिये 25 से 50 वर्ष आयु वर्ग के ऐसे लोगों को लिया गया जो प्रतिदिन 6 से 8 घंटे तक विभिन्न कारणों से वाहनों के धुएँ में समय व्यतीत करते थे। यह अध्ययन नवंबर 1995 से 1997 के मध्य नगर के विभिन्न क्षेत्रों में किया गया।

तालिका 4.14 लखनऊ महानगर में यातायात प्रदूषण का दुष्प्रभावइस प्रकार राजधानी की प्रदूषित हवा नगर नागरिकों के जीवन का खतरा बनती जा रही है। प्रदूषण के जितने भी दुष्प्रभाव जाने जाते हैं नगर में सभी फैल चुके हैं।

तालिका 4.15 लखनऊ महानगर में वायु प्रदूषण से उत्पन्न परेशानियाँ एवं प्रभावी क्षेत्रनगर के बढ़ते वायु प्रदूषण को क्षयरोग (टीबी) का भी उत्तरदायी माना गया है। प्रदूषित हवा में उपस्थित कार्बन मोनोऑक्साइड अमोनिया और अन्य विषैली गैसों की परतः नशे की प्रवृत्ति और प्रदूषित वातावरण में निवास आदि फेफड़ों तथा सांस की बीमारी के प्रमुख कारण हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (सिविल) अस्पताल के चिकित्सक डॉ. आरपी सिंह कहते हैं- कि विषैली गैसें श्वास नली द्वारा फेफड़ों में पहुँचकर डी ऑक्सीजनेट होती है फलत: फेफड़ों की कोशिकाओं को ऑक्सीजन के साथ ही इन गैसों को भी अपचयित करना पड़ता है जो फेफड़ों में विभिन्न प्रकार के विकार उत्पन्न कर देती है। इसी विकार के कारण मनुष्य फेफड़ों के कैंसर, निमोनाइटिस, ब्राकाइटिस, दमा, टीवी (ट्यूबर क्लोसिस) जैसी जानलेवा बीमारियों का शिकार हो जाता है। यह बीमारी थूकने तथा बलगम द्वारा दूसरों को भी संक्रमित हो जाती है।

राजधानी के बढ़े हुए प्रदूषण के कारण प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन औसतन 10 सिगरेट के बराबर निकोटिन रोजग्रहण करता है। यह प्रवृत्ति झोपड़-पट्टियों तथा मलिन बस्तियों में निवास करने वाली जनसंख्या पर अधिक है। शराब, बीड़ी, सिगरेट के धुओं के कारण इनके शरीर में पहुँचने वाले हानिकारक पदार्थों की मात्रा 20 से 25 गुना बढ़ जाती है आवास स्थलों के निकट की गंदगी बिखरे कूड़े के ढेर, बजबजाती नालियाँ जलभराव आदि बीमारी के कीटाणुओं के सहज स्रोत हैं इसका परिणाम टीवी जैसी बीमारी से ग्रसित होकर भुगतना पड़ जाता है। इस बीमारी में यह भी महत्त्व का है कि अधिक श्रम और कम उम्र में विवाह करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी कम हो जाती है जो टीबी के संक्रमण का मुकाबला नहीं कर पाती है। लखनऊ नगर के आस-पास क्षेत्र के टीबी अस्पतालों के बाह्यरोगी कक्ष में टीवी के रोगियों की भारी संख्या है। एक अनुमान के अनुसार अस्पतालों में पहुँचने वाले मरीजों की एक हजार की संख्या में से दस से अधिक मरीज टीबी की बीमारी से पीड़ित होते हैं। जनवरी 1997 से 25 अक्टूबर 97 तक चिकित्सालय में इलाज के लिये सोलह हजार रोगी वाह्य रोगी कक्ष में पंजीकृत हो चुके हैं। यह स्थिति पंजीकृत (ओपीडी) होने वालों की है। इसके अतिरिक्त नगर में कई अन्य चिकित्सालय हैं। अपनी निजी चिकित्सा व्यवस्था पर निर्भर रोगियों की संख्या भी अधिक है जिनका अनुमान यहाँ पर सम्मिलित नहीं किया जा सका। इन सब दशाओं से प्रदूषण के दुष्प्रभाव की स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। नगर में 300 से अधिक आरामशीनों पर काम करने वाले मजदूरों के स्वास्थ्य की जाँच के कार्य अभियान में आईटीआरसी के वैज्ञानिकों ने 114 आरामशीनों पर काम करने वाले 500 से अधिक लोगों पर किए गए सर्वेक्षण के दौरान यह पाया कि 2.2 प्रतिशत लोगों में नियमित रूप से अपने फेफड़े को खोलने या श्वांस लेने में बाधा हो रही थी जबकि इनकी औसत आयु 26 वर्ष के निकट थी। ये विगत 8 वर्षों से आरामशीनों में कार्य कर रहे थे। ये लोग अपने शारीरिक बल का प्रयोग करते समय एक अवरोध का अनुभव कर रहे थे। 28.4 प्रतिशत लोग स्पष्ट रूप से सांस लेने में कष्ट का अनुभव कर रहे थे।14

ऐसा ही कार्य वेल्डिंग की दुकानों में कार्य करने वाले 19 लोगों पर किया गया। अध्ययन में पाया गया कि 31.5 प्रतिशत लोग वेल्डिंग के विषैले धुएँ से उनके रक्त में सामान्य स्तर से अधिक निकिल की मात्रा पायी गयी 16 प्रतिशत लोगों में तो निकिल की मात्रा बहुत अधिक पायी गयी और 10 प्रतिशत लोगों के रक्त में बहुत अधिक मैग्नीज, सीसा और निकिल पाया गया। एक के रक्त में मैग्नीज की बहुत ही अधिकता थी। 6 में से 2 के शरीर पर त्वचा के क्षतिग्रस्त होने के चिह्न पाये गए।15

कारखानों में क्रोमधातु की एलेक्ट्रो प्लेटें बनाने वाले लोगों की जाँच की गयी और उनके रक्त की धातु विषाक्तता के अध्ययन में पाया गया कि रक्त में क्रोमियम का स्तर काफी ऊँचा है। यह धातु कारीगरों के फेफड़ों से होकर रक्त में प्रवेश करती है। क्रोमियम के अतिरिक्त दूसरी धातुएँ भी रक्त में पायी गयीं जिसमें की जस्तें की प्रधानता थी।16

मेडिकल कॉलेज के न्यूरोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. देविकानाग द्वारा किए गए सर्वेक्षण में 25 पेट्रोल पम्प, कर्मी और 20 ड्राईक्लीनर्स और पेंटर्स को केजीएमसी के 20 व्यक्तियों से तुलना की गयी जो पेट्रोलियम पदाथों के सम्पर्क में नहीं रहते। डॉ. नाग ने आईटीआरसी की चल रही बायोलॉजिकल मॉनीटरिंग ऑफ कैमिकल एक्सपोजन रिपोर्ट में बताया कि पेट्रोल पम्प में कार्यरत कर्मचारियों में फिनॉल की मात्रा मानक से अधिक पायी गयी है जो शरीर में पेट्रोलियम विषाक्तता को इंगित करती है। ड्राईक्लीनर्स जो कि ट्राइक्लोरो एथिलीन के सम्पर्क में रहते हैं सिर दर्द और सुस्ती से पीड़ित रहते हैं। इनमें तंत्रिका तंत्र के रोग पाये जाते हैं। पेट्रोल पम्प में कार्यरत 32 प्रतिशत कर्मचारी सिर दर्द की शिकायत से पीड़ित है। इनमें 8 प्रतिशत की बुद्धिअल्पता के साथा याददास्त में कमी आयी।17

इसी प्रकार वायु प्रदूषण की समस्या से ग्रस्त नगर के तिपहिया वाहन चालकों के स्वास्थ्य पर केजीएमसी के फिजीयोलॉजी विभाग के डॉ. नरसिंह वर्मा ने 1 वर्ष तथा 1 वर्ष से अधिक तथा इससे भी अधिक समय से वाहन न चला रहे चालकों के रक्त में ‘कारटीसॉल हारमोन’ की जाँच करने की बात सोची जिसमें कि चालकों के हारमोन की मात्रा को मापा गया और पाया कि 1 वर्ष और इससे अधिक समय से चला रहे वाहनों के चालकों के रक्त में हारमोन्स की मात्रा अधिक पायी गयी। यह स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।18

नगर के वायुमंडल में सीसे की भारी मात्रा उपलब्ध है। जैसा कि तालिका- 4.3 में दिया गया है। सीसे के दुष्प्रभाव से ग्रसित 100 मजदूरों का मनोवैज्ञानिक परीक्षण किया गया जिनमें कि हाथों की स्थिरता, हाथों की सुस्पष्टता, स्मरण एवं खोज, चिमटी से उखाड़ने की दक्षता, कार्ड छटाई आदि का परीक्षण किया गया, इसमें 50 अप्रभावित मजदूरों को भी सम्मिलित किया गया। परीक्षण में पाया गया कि सीसे से ग्रसित मजदूर विस्तृत समन्वय और स्मृति ह्रास की स्थिति में हैं।19

नवीन खोजों के अनुसार हवा को घातक रूप से प्रदूषित करने में सीसा सबसे आगे है। सीसा मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव डालता है। शरीर के अंदर तक जाने वाले सीसे का 60 प्रतिशत भाग स्थायी रूप से शरीर में ही रह जाता है। सीसे का सर्वाधिक प्रभाव लीवर, गुर्दे और बच्चों के मस्तिष्क में पड़ता है। यह शरीर की आनुवांशिक संरचना भी बदल सकता है और इसके प्रभाव से प्रजनन क्षमता भी प्रभावित होती है। औद्योगिक विष विज्ञान अनुसंधान केंद्र में ‘‘सीसा, पारा, आर्सेनिक तथा मैग्नीज जैसी भारी धातुएँ और जनसंख्या तथा उच्च जोखिम’’ आयोजित कार्यशाला में सीसे के जोखिम पर बोलते हुए डॉ. सोनवाल ने कहा कि वर्तमान के वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि गाड़ियों एवं वाहनों के धुएँ तथा जल में घुला सीसा शरीर में खून सम्बन्धी अनेक बीमारियों को जन्म देता है। आर्सेनिक की विषाक्तता पर बोलते हुए डॉ. फाउलर20 ने कहा कि शरीर में आर्सेनिक के बढ़ने से फेफड़े तथा त्वचा के रोग हो जाते हैं। त्वचा कैंसर, वृक्क तथा यकृत की क्षति, पेरी फेरल न्यूरोपैथी, एक्ट्रीमीरीज ऑफ ग्रैग्रीन (ब्लैक फोर्ड रोग) हो सकते हैं।

पारा (HG) की विषाक्तता पर डॉ. स्कोनी20 ने बताया कि मर्करी केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। वृक्क तथा श्वसन सम्बन्धी समस्या भी मर्करी से उत्पन्न होती है। इसका सर्वाधिक प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। मछली खाने वालों व अन्य जलीय समुद्री जीवों का सेवन करने वाले लोगों पर भी मर्करी का प्रभाव पड़ता है। मैग्नीज के दुष्प्रभाव पर डॉ. माइकल डेविस ने कहा कि यह भारी धातु तंत्रिका तंत्र को स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त करती है।

लेड तथा धातुओं पर आधारित इंडो यूएस कार्यशाला में आयोजित ‘‘लेड तथा अन्य भारी धातुओं से संवेदन शील जनसंख्या खतरे में’’ किंग जार्ज मेडिकल में न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. देविका नाग18 ने आईटीआरसी के वैज्ञानिक सत्र में आयोजित मानव स्‍वास्‍थ्‍य पर कुप्रभाव डालने वाले भारी धातु के रूप में लेड के संदर्भ में कहा कि भारतीय संदर्भ में इस धातु के गैर परम्परागत तथा गैर व्यावसायिक एक्सपोजर के कारण ही फेफड़े, त्वचा तथा गैस्ट्रोइंट्रेस्टाइनल ट्रैक्ट के माध्यम से होता है। इन विषाक्त धातुओं के संदर्भ में यह भी काफी महत्त्व का है कि पोषण की अवस्था, आयु तथा वह किस रूप में विषाक्त धातुओं के सम्पर्क में है इसके साथ मौसम, यकृत की कार्यप्रणाली, अवधि तथा एक्सपोजर के प्रकार पर भी निर्भर करता है। डॉ. नाग ने बताया कि वायु में पेट्रोलियम पदार्थों के जलने से उपस्थित सीसा खाद्य पदार्थ के भंडारण में उपस्थित सीसा या तो तांबे अथवा टीन की डेगची पर एकत्रित हो जाता है अथवा सेरामिक पोटरीज पर। इसके अतिरिक्त बच्चों के लिये आइसक्रीम में खाद्य अपमिश्रक के रूप में, सफेद अपमिश्रक का मिलाया जाना, देशी शराब तथा जड़ी बूटी युक्त पेय के माध्यम से भी यह शरीर में पहुँचता है। उन्होंने यह भी बताया कि खिलौनों पेंसिलों तथा प्रसाधन सामग्रियों में सिंदूर के माध्यम से लेड शरीर में पहुँचता है। लाल कुमकुम के माध्यम से भी लेड शरीर में पहुँचता है। डॉ. नाग ने बताया कि इसके शरीर में पहुँचने से मानसिक दुर्बलता, सिरदर्द, मानसिक परेशानी, अंधापन, बहरापन, पैर तथा कलाइयों में दर्द, पेट में दर्द आदि की शिकायत हो जाती है इसके अतिरिक्त असामान्य किडनी प्रणाली, कब्ज तथा हृदय आदि की असामान्य बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती है। एनआईएन हैदराबाद के डॉ. कृष्णास्वामी20 ने अपना तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा कि औद्योगिक और शहरीकरण से धातु विषाक्तता वायुमंडल में बढ़ी है तथा कमजोर पोषण से शरीर में इनका प्रभाव शीघ्र और अधिक पड़ता है।

केजीएमसी के नेत्र विभागाध्यक्ष के एक अध्ययन में चार सौ से अधिक लोगों के रक्त में लेड सुरक्षित सीमा दस माइक्रोग्राम प्रति डेसीमल के विपरीत बीस माइक्रोग्राम प्रति डेसीमल से अधिक पाई गई। नगर की वायु में यह मात्रा सुरक्षित सीमा एक ग्रा. प्रति घन मी. के मुकाबले 7.55 ग्राम प्रति घन मी. मापी गई।

प्रजनन अनुसंधान केंद्र में पिछले 10 वर्षों से देश के विभिन्न भागों के 1500 व्यक्तियों के शुक्राणुओं से सम्बन्धित आंकड़े उपलब्ध हैं। इसने प्रारंभिक अध्ययन से शुक्राणुओं की गुणवत्ता में गिरावट के आने के अनेक संकेत मिले हैं। संस्थान के उपनिदेशक डॉ. कमला गोपाल कृष्णन20 के अनुसार इसका मुख्य कारण हवा में उपस्थित प्रदूषित कण हैं तथा विभिन्न प्रकार की गैसें हैं। डॉ. कृष्णन के अनुसार 1988 से 1995 तक किए गए इस अध्ययन में शुक्राणुओं की संरचनात्मक गुणवत्ता में 30 प्रतिशत की गिरावट पायी गई है। इसी प्रकार शुक्राणुओं की औसत संख्या में इस दशक में 30 से 40 प्रतिशत की गिरावट आंकी गयी। इसी अध्ययन में यह भी निष्कर्ष प्राप्त हुए कि शुक्राणुओं की गतिशीलता में 10 से 30 प्रतिशत की गिरावट आयी, तथा शुक्राणुओं की मात्रा में भी अल्प गिरावट आयी। डॉ. गोपाल कृष्णनन के अनुसार, भारत के अलावा विश्व के अन्य भागों से शुक्राणुओं की औसत संख्या और गुणवत्ता में गिरावट आने की रिपोर्ट प्राप्त हुई है।

डॉ. गोपाल कृष्णन ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की ओर से प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में कहा है कि शुक्राणुओं की गुणवत्ता में गिरावट आने की घटनाएँ केवल मानव एवं उसकी प्रजनन क्षमता में देखी गयी है। इन घटनाओं का सम्बन्ध मुख्यतौर पर वायु प्रदूषण से है। ‘‘डिक्रीजिंग स्पर्म कांउट फैक्ट और फिक्शन’’ शीर्षक से प्रकाशित डॉ. गोपाल कृष्णन की इस रिपोर्ट के अनुसार विदेशों में किये गए अन्य अध्ययनों से पता चला कि समुद्री दुग्धरोधी पेंट से प्राप्त ट्राईयूटीरिन नामक यौगिक समुद्री प्रजातियों में नपुंसकता उत्पन्न करता है समुद्र में रसायनों एवं तेल से समुद्री जीव जंतुओं एवं वनस्पतियों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव स्पष्ट है।

डॉ. कृष्णन के अनुसार जल प्रदूषण के बढ़ने से जलीय जीवों की जननग्रंथि के आकार में गिरावट होने की स्थिति बराबर बढ़ती जा रही है। इसी प्रकार जनन क्षमता में गिरावट आने की समस्या पर्यावरण प्रदूषण के अतिरिक्त मानसिक तनाव, धूम्रपान गलत खान-पान एवं रहन-सहन तथा यौन संचारित रोगों के कारण बढ़ी है।

औद्योगिक विष विज्ञान अनुसंधान केंद्र द्वारा किए गए सर्वेक्षण से यह पता चला कि खाना पकाने के लिये जो महिलाएँ जलावनी लकड़ी व उपले का प्रयोग करती हैं, उनमें 35.30 प्रतिशत महिलाओं में श्वसन सम्बन्धी बीमारियाँ होती है जब कि कुकिंग गैस का प्रयोग करने वाली 10.7 प्रतिशत महिलाओं में सांस की समस्या पाई जाती है। संस्थान के निदेशक डॉ. पीके सेठ21 ने अनुसंधान केंद्र के 33वें स्थापना दिवस में बोलते हुए आगे कहा कि लखनऊ नगर में घरेलू प्रदूषण की स्थितियाँ निम्न आय वर्ग के लोगों में अधिक बढ़ती है शीतकाल में वाहनों का धुआँ घरों में प्रवेश कर जाता है। इसलिये शीतकाल में यह स्थिति अधिक घातक बनती है। शीत से बचने के लिये नगरीय लोगों द्वारा घातक, कचरा, वाहनों के टायर ट्यूब जलाए जाते हैं। यह कोहरे के साथ मिलकर और अधिक घातक रूप ले लेते हैं। इसलिये इस समय आँखों में जलन, चर्मरोग, मोतियाबिंद, रक्तचाप, कैंसर, दमा, टीवी मानसिक विकलांगता, भूख न लगने जैसी बीमारियाँ वायु में उपस्थित गैसों के कारण बढ़ जाती है।

विषैली वायु के कारण चिकित्सकों का अनुमान है कि राजधानी का प्रत्येक का दूसरा व्यक्ति सांस की किसी न किसी बीमारी की चपेट में है। टैम्पों से निकलने वाले धुएँ से सांस की समस्याएँ उत्पन्न होती है। यहाँ के लोगों में दमा, ब्रान्काटिस आम बीमारी बनती जा रही है। चेस्ट रोग विशेषज्ञों का कहना है कि टैम्पों के विषैले धुएँ के कारण एक्सरे में से 90 प्रतिशत मामलों में फेफड़ों में ब्रन्कोवेस्कुलर मार्किंग हाइलर शेडो व धब्बे देखे जा रहे हैं। विगत तीन चार वर्षों से यह समस्याएँ अधिक द्रुत गति से बढ़ी है। लखनऊ मेडिकल कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. एके त्रिपाठी18 कहते हैं- कि विषैली गैसों व धुएँ के कारण एलर्जी, खांसी ब्रांकाइटिस, दमा, क्षय रोग, उच्च रक्तचाप आदि रोग शहर के सभी उम्र के लोगों पर अपना शिकंजा कसते जा रहे हैं। ‘एलर्जिक ब्रान्काइटिस’ तो अब एक बीमारी के रूप में पनप रही है। सीसा की उपस्थिति से एनीमिया व ‘नसो का सूखना’ जैसे मामले प्रकाश में आए चिकित्सकों का अनुमान है कि प्रदूषण पर अंकुश न लगने से पेल्मोनरी फ्राइब्रोसिस (फेफड़े की जड़ता) जैसी लाइलाज बीमारियाँ नगरवासियों में फैल जाएगी।

श्वसनतंत्र में धूलकणों का जमाव और उनका प्रभाव - वायुमंडल में 10 से 25 माइक्रोन के धूल कण कुछ समय तक तैरते रहते हैं। 5 से 10 माइक्रोन के धूलकण नाशिका द्वार में फँस जाते हैं। 5 माइक्रोन से छोटे धूल कण फेफड़े की कूपिकाओं में अवशोषित होकर या श्वेत रक्त कोशिकाओं (डब्लूबीसी) द्वारा रक्त वाहनियों में प्रवेश कर जाते हैं अथवा श्वासनली व सहायक ग्रंथि में घुसकर तंतुशोध, सिलिकोसिस, नयूमोनोकोसिस व अन्य श्वास सम्बन्धी बीमारियाँ उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार हमारे स्वास्थ्य को धूल कणों की सांद्रता और आकार व श्वसनीय कण के संघटन भी प्रभावित करते हैं।

हमारे वातावरण में उपलब्ध प्रदूषक जैसे बैक्टीरिया, फफूंदी, परागकण, एलर्जन, धातुएं, कार्बनिक गैसें, मीथेन, फार्मेल्डिहाइड, सल्फरडाइऑक्साइड (SO2), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO2), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) जैसी गैसें मानव स्वास्थ्य को हानी पहुँचाती है। सल्फर डाइऑक्साइड अतिघुलनशील गैस हैं जो ऊपरी श्वसनीय तंत्र की नमीवाली सतह में घुल जाती है। अधिक समय तक इसके सम्पर्क में रहने से सांस लेने में परेशानी, छाती में खिंचाव, ब्राकाइटिस, खांसी, सर्दी, जुकाम जैसी बीमारियाँ हो सकती है। वायुमंडल में उपस्थित भारी धातुएँ जैसे कैडमियम, लेड, आर्सेनिक आदि शरीर पर विषैले प्रभाव डालते हैं तथा जोड़ों में दर्द, हृदय व मस्तिष्क तथा तंत्रिका तंत्र की बीमारियाँ फैलाते हैं। लेड के कारण शरीर की विटामिन बी-12 को अवशोषित करने की क्षमता कम हो जाती है इससे रक्त हीनता और दिल की अन्य बीमारियाँ उत्पन्न होती है। जिंक ऑक्साइड के द्वारा फेफड़ों में खराबी होने का खतरा होता है। एंटीमनी से गले में खराश व आँखों की जलन व क्रोमियम धातु द्वारा चर्म रोग फेफड़ों का कैंसर (क्रोमअल्सर), नाक, कान व गले की बीमारी तथा फेफड़ों में जलन हो सकती है। कीटनाशक पदार्थों द्वारा चर्म रोग, फेफड़ों, पेट व हृदय रोग तथा स्नायुतंत्र के विकार हो सकते हैं। (परिशिष्ट- 37)

तालिका 4.16 हानिकारक श्वसन कणों का बढ़ता स्तरलखनऊ नगर में हानिकारक श्वसनीय कणों की स्थिति का अभिकलन तालिका- 4.16 के अनुसार करने पर पता चलता है कि स्वास्थ्य के लिये सुरक्षित मानक से ढाई से चार गुना की हानिकारक तादाद में धूल व कार्बन के नन्हें श्वसनीय कण (आरएसपीएम) शहरी निवासियों के फेफड़ों में पहुँच रहे हैं। तनाव को जन्म देने वाली हाइड्रोकार्बन-1 पीपीएम की मान्य सीमा से लगभग 3 से 5 गुना ज्यादा पाया गया है। खतरनाक कार्बनमोनोक्साइड 1000 μg/m3 की सुरक्षित सीमा की तुलना में लगभग 1100 से 1790 μg/m3 के हानिकारक स्तर पर मापा गया। सीसा रहित पेट्रोल की आपूर्ति से वातावरण में घातक लेड के कम होने किंतु खतरनाक हानिकारक कैंसर का जनक बेंजीन फैलने का खतरा बढ़ने लगा है।

वाहनों की संख्या में वृद्धि को देखते हुए अनुमान लगाया जाता है कि नगर के वाहनों में औसतन सवा लाख लीटर पेट्रोल व डेढ़ लाख लीटर से अधिक डीजल की खपत हो रही है। इससे कार्बनडाइऑक्साइड की 300 ग्रा., हाइड्रोकार्बन 25 ग्रा., नाइट्रस ऑक्साइड 14 ग्रा. पर्टीकुलेटमैटर 1.5 ग्राम, सल्फरडाइऑक्साइड 1 ग्रा. पहुँचते हैं ये आंकड़े एलार्मिंग संकेत हैं।

मेडिकल कॉलेज के चेस्ट रोग विशेषज्ञ डॉ. सूर्यकांत18 ने बताया कि वायु प्रदूषण की अधिकता से आँखों में एलर्जिक कंजक्टिवाइटिस की शिकायतें बढ़ी हैं। एलर्जिक राइनाइटिस व ब्रॉन्काइटिस के मरीजों की संख्या बढ़ी है साथ ही नगर में ब्रान्कियल अस्थमा से पीड़ित लोगों में अस्मैटिक अटैक की तीव्रता व दर दोनों में वृद्धि हुई है।

वाहनों के धुएँ से हवा में कार्बनमोनोक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें रक्त में पहुँचती हैं तो वे हीमोग्लोबिन में समा जाती है और रक्त की ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता को कम कर देती है। इसका कुप्रभाव मस्तिष्क और यकृत व गुर्दों पर पड़ने लगता है। साथ ही एकाग्रता व स्मरण में कमी होने लगती है। प्रदूषण के कारण युवाओं में भी अस्थमा रोग बढ़ता जा रहा है।

किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज के पीड्रेट्रिक विभाग की डॉ. शैली अवस्थी, ‘औद्योगिक विष विज्ञान अनुसंधान केंद्र’ के वैज्ञानिकों तथा अमेरिका के हारवर्ड मेडिकल स्कूल और पेनसिलवेनिया विश्व विद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा राजधानी में किये गये संयुक्त सर्वेक्षण में सामने आये। यह अपनी तरह का पहला सर्वेक्षण था जिसमें यह पता चला कि लकड़ी कण्डे, कोयला, आदि बायोमास र्इंधन के जलने से निकले धुएँ की वजह से घरों में ‘इंडोर पॉल्युशन’ हो जाता है। खाना बनाते समय माँ के साथ रहने की वजह से पाँच वर्ष से कम उम्र के प्री-स्कूल बच्चे इस धुएँ में सांस लेते हैं। जिसकी वजह से बच्चों में कई तरह की सांस की बीमारियाँ जैसे नाक बहना, सांस, लेने की आवाज आना, गले में घरघराहट, हफनी, सांस फूलना, खांसी आदि हो जाती है।

शोध के लिये लखनऊ और उसके आस-पास की 261 रजिस्टर्ड आंगनबाड़ी केंद्रों से 28 केंद्रों को चुना गया। हर केंद्र से तीस एक महीने से लेकर साढ़े चार साल तक की उम्र के बच्चे छाटे गये। इस प्रकार 664 प्रीस्कूल बच्चे शोध के लिये इनरॉल किये गये। इनमें 372 लड़के और 292 लड़कियाँ थीं। एक घर से एक से अधिक बच्चा नहीं चुना गया। इसके बाद हेल्थ वर्कर के साथ शोध टीम जाकर इन बच्चों की माताओं से घर में खाना पकाने के लिये प्रयोग होने वाले र्इंधन, कितनी देर तक खाना रोज पकाया जाता है, उक्त वक्त बच्चा माँ के साथ रहता है या नहीं, बाप सिगरेट-बीड़ी पीता है कि नहीं, यदि पीता है तो घर में प्रति दिन कितनी पीता है, एक कमरे में घर के कितने लोग रहते हैं आदि के बारे में जानकारी हासिल की। डॉक्टर के द्वारा बच्चों की सांस की बीमारियों की जाँच की गयी। सर्वेक्षण के दौरान 66.7 प्रतिशत बच्चों में नाक बहना, 33.3 प्रतिशत बच्चों की सांस लेने में आवाज 21.5 प्रतिशत बच्चों को खांसी, सीने में घरघराहट, 8.6 प्रतिशत बच्चों के गले में खराश और 19.4 प्रतिशत बच्चों में हँफनी, सांस फूलना आदि पाया गया। सबसे अधिक 56 प्रतिशत घरों में खाना पकाने के लिये लकड़ी का इस्तेमाल होता है। 24.2 प्रतिशत घरों में मिट्टी का तेल, 19.2 प्रतिशत घरों के कण्डे और 15.4 प्रतिशत घरों में गैस का प्रयोग होता है। 23.4 प्रतिशत घरों में लकड़ी और कण्डे दोनों का इस्तेमाल होता है। 76.3 प्रतिशत बच्चों के पिता घर के अंदर बीड़ी-सिगरेट आदि पीते हैं। बच्चों के वजन व लिंग का सांस की बीमारी में कोई प्रभाव नहीं दिखा जिन घरों में कण्डे जलाये जाते हैं और अधिक लोग एक कमरे में साथ सोते हैं और बाप बीड़ी पीते हैं उन घरों में बच्चों में सांस की बीमारी अधिक तीव्र अवस्था में दिखी। जिन घरों में कण्डे जलाये जाते हैं और ज्यादा लोग एक कमरे में साथ सोते हैं और बाप बीड़ी पीते हैं, उन घरों में बच्चों में सांस की बीमारी ज्यादा तीव्र अवस्था में दिखी। सितंबर से अप्रैल के बीच हुई इस स्टडी के दौरान 22 बच्चों को निमोनिया हो गया और 19 बच्चों की इस दौरान मृत्यु हो गयी। मरने वालों में चार लड़के और पंद्रह लड़कियाँ थीं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार घरों के अंदर धुएँ की वजह से होने वाला इंडोर पॉल्युशन वाह्य वातावरण की अपेक्षा एक हजार गुना लोगों के फेफड़ों के लिये अधिक नुकसानदेह है। भारत में लगभग तीस फीसदी बच्चे हर साल सांस की बीमारी की वजह से मौत के मुँह में समाते हैं। इनमें से 23 प्रतिशत बच्चे पाँच साल कम उम्र के होते हैं। विश्व के पाँच करोड़ बच्चे हर साल सांस की बीमारियों की वजह से मरते हैं विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति वर्ष 5,89,000 लोग इंडोर पॉल्युशन की वजह से मरते हैं, यह आंकड़े विश्व के सभी देशों में सबसे अधिक है।

तालिका 4.17 गृह जनित विभिन्न ईंधनों से उत्सर्जित प्रदूषकों की मात्रापौधे प्रकाश-संश्लेषण द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके ऑक्सीजन हवा में अवमुक्त करते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग प्रकाश संश्लेषण द्वारा हरी वनस्पतियाँ करती है, फिर पशु करते हैं। वातावरण में कार्बनडाइऑक्साइड का उत्सर्जन लकड़ी के र्इंधन और उत्सखनित र्इंधन के दहन से होता है। वस्तुत: मानव द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन इतना अधिक है कि पेड़ पौधे वातावरण में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड को उतनी अधिक मात्रा में प्रयोग नहीं कर पाते कि वे उसे प्रयोग कर ऑक्सीजन अवमुक्त करें। इसी असंतुलन से हरित गृह प्रभाव का कारण उत्पन्न हो जाता है।

वायु प्रदूषकों को पौधे या तो सीधे वायुमंडल से गैसों के एकांतरण द्वारा या मिट्टी से ग्रहीत नमी द्वारा ले जाते हैं। वायु-प्रदूषक मिट्टी में पानी के साथ घुल जाते हैं। विशेषकर अम्लीय वायु-प्रदूषक सतही नमी या वर्षा जल में आसानी से घुल जाते हैं। वायु-प्रदूषण स्रोत के हट जाने पर भी घुले हुये पदार्थ वहाँ बढ़ रहे पौधे को प्रभावित करते हैं। पत्तियों के स्टोमेटा (छिद्र) द्वारा गैसीय प्रदूषक पौधों में प्रविष्ट हो जाते हैं। ये प्रतिवेशित वायुमंडल में गैसों, जैसे ऑक्सीजन जलवाष्प और कार्बन डाइऑक्साइड से विनिमय करते रहते हैं। पौधों से तंतु में प्रवेश कर ये गैसीय वायु प्रदूषक अंतर कोशिकीय जल में घुल जाते हैं। इसके बाद अम्ल, कोशिका की संरचना पर आक्रमण करता है। यही कारण है कि पत्ती की नमी में सुगमता से घुलनशील वायु प्रदूषक जैसे सल्फर डाइऑक्साइड, हाइड्रोक्लोरिक एसिड और हाइड्रोफ्लोरिक एसिड आदि अत्याधिक विषाक्त होते हैं।

ठोस कण पौधों की सतह के लिये कम विषाक्त होते हैं। क्योंकि यह पत्तियों की सख्त चिकनी सतह के कारण नीचे गिर जाते हैं या फिर अंदर प्रवेश नहीं कर पाते। पत्तियों में जमें प्रदूषक ग्रस्त पौधों को यदि पशु खाते हैं तो उनके शरीर पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है। वृक्षों की बढ़वार भी मंद पड़ जाती है। वायु प्रदूषण से पत्तियों में अनेक लक्षण दृष्टिगोचर हो जाते हैं। जिनमें पत्तियों के किनारे परिगलन या अस्थि क्षय क्लोरोफिल क्षय या हरित रोग, पत्तियों की ऊपरी सतह पर चित्ती या दाग पड़ना वनस्पतियों पर प्रदूषकों के प्रभाव परिशिष्ट-38 द्वारा समझ सकते हैं।

राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में पिछले अनेक वर्षों से सामान्य जाति के अनेक पौधों पर वायु प्रदूषकों के प्रभाव का अध्ययन किया जा रहा है। इसका उद्देश्य इन प्रदूषकों की मॉनीटरिंग और उपशमन में पौधों की भूमिका का मूल्यांकन करना है। इस प्रकार के सभी अध्ययनों को तीन प्रमुख क्षेत्रों में वर्गीकृत किया गया।

1. ताप विद्युत घर और कोयला प्रज्वलित उद्योग।
2. शहर और औद्योगिक धूल।
3. आटोमोबाइल निर्वातक।

प्रथम वर्ग में लखनऊ के तालकटोरा विद्युत घर के आस पास21 के क्षेत्रों में पौधों का सर्वेक्षण किया गया। सर्वेक्षण के अंतर्गत विविध प्रकार के पौधों की प्रजातियों का संग्रह और उनकी पहचान तथा संबद्ध मैदानी आंकड़ों का संग्रह किया गया। यह कार्य वर्ष में कई बार दोहराया गया। सर्वेक्षण के द्वारा सामान्य आर्थिक व सजावटी पौधों को वायु-प्रदूषकों से होने वाली क्षति का मूल्यांकन किया गया है। इस क्षेत्र में उगने वाली 250 प्रजातियों का संग्रह किया गया तथा पौधों की वृद्धि, पुष्पन और फल लगने पर प्रदूषकों से होने वाले प्रभाव के अतिरिक्त उन्हें क्लोरोसिस, नेक्रोसिस, सिरा (अग्रभाग) का सूखना आदि जैसे लक्षणों की उपस्थिति और अनुपस्थिति के आधार पर संवेदनशील अथवा सहनशील पौधों में वर्गीकृत किया गया।

अध्ययन में पाया गया कि वायु प्रदूषकों के सम्पर्क में आने से पूर्व पौधों में जैव-रासायनिक परिवर्तन होते हैं। अनेक शोधकर्ताओं द्वारा क्लोरोफिल, प्रोटीन, एमीनोअम्लों और एस्कॉर्बिक अम्ल के स्तरों में परिवर्तन पाया गया। सल्फर के प्रभाव में आने वाले अनेक पौधों की विभिन्न प्रजातियों में से अधिकांश पौधों में पर्ण घाव के लक्षण विकसित हुए। उड़ने वाली राख के प्रति क्रियाशीलता के अध्ययनार्थ प्रयोगशाला स्तर पर प्रयोग किया गया जिसमें पाया गया कि अनेक प्रजातियों पर उड़नराख की अल्पमात्रा से सामान्यत: पौधों को लाभ मिला क्योंकि इससे पौधों की वृद्धि हुई, किंतु अधिक मात्रा पर पौधों को क्षति पहुँची और इनमें अवांछनीय परिवर्तन भी देखा गया।

पौधों में पत्तियों की पृष्ठीय संरचनाएँ सबसे ऊपरी सतह पर होने के कारण अन्य ऊतकों की अपेक्षा जोखिम से भरे वायु प्रदूषकों के सम्पर्क में अधिक आती है। इस प्रकार वायु प्रदूषण तनाव जैसी प्रतिक्रिया का शीघ्र ही प्रदर्शन करती हैं। अत: ये प्रदूषण के संसूचक और प्रशामक दोनों रूपों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। अध्ययन से यह भी ज्ञात हुआ कि अनेक पत्तियों के पृष्ठीय अभिलक्षण वायु प्रदूषण के प्रति संवेदनशीलता प्रदर्शन करते हैं और वे वायु प्रदूषण के जैव सूचक के रूप में काम आ सकते हैं।

नगरीय व औद्योगिक धूल का द्वितीय वर्ग में अध्ययन किया गया। औद्योगिक क्षेत्रों की धूल नगर के भीतर और बाहर वायुमंडलीय धूल के साथ मिल कर मनुष्यों में विभिन्न प्रकार के रोगों के संचार के साथ पेड़ पौधों और वनस्पतियों में भी दुष्प्रभाव डालती है। लखनऊ नगर में धूलपतन की माप के लिये नगर के 12 स्थलों के पर्यावरण में उपस्थित धूल का सापेक्षिक भार मापा गया। इन स्थानों पर वनस्पति आच्छादन भिन्न-भिन्न था। इनमें से नौस्थल खुले में थे, तीन स्थान घने वनस्पति स्थलों में अध्ययन से ज्ञात हुआ कि अधिकतम धूल भार खुले मैदानों में पाया गया जहाँ वनस्पति आच्छादन की कमी थी और न्यूनतम भार उन स्थानों में पाया गया जहाँ मुख्य सड़क के दोनों ओर घने और ऊँचे वृक्षों की कतार थी। अध्ययन से यह ज्ञात हुआ कि घने वनस्पति आच्छादन वाले क्षेत्रों में कणिकाओं की सकल गतियों में लगभग 45 प्रतिशत की कमी तो आती ही है। और इसी दर से उनमें वृद्धि और पुष्पित-फलित होने की दशा में सुधार होता है।

मोटरवाहनों से निकलने वाले प्रदूषकों का दोनों किनारों पर लगाए गए वृक्षों और अन्य पेड़ पौधों की पत्तियों में सल्फर और सीसा के संचयन के मध्य संभावित सहसम्बन्धन स्थापित करने की दृष्टि से लखनऊ शहर में अध्ययन22 कार्य पूरा किया गया। इस कार्य के लिये नगर की दस सड़कों को चुना गया। उन पर चलने वाले वाहनों की संख्या भिन्न-भिन्न थी। सभी कार्यस्थलों पर सामान्य रूप से पाये जाने वाले 21 पौधों की प्रजातियों का संग्रह किया गया। इन सभी स्थलों पर SO2 एसपीएम और सीसा की वायुगुणता की मॉनीटरिंग भी की गयी। आलमबाग कार्य स्थल पर 2 घंटे में 4835 वाहनों की संख्या थी। प्रदूषण भार SO2 202, एसपीएम 1080 सीसा 2.96 μg/m3 रिकॉर्ड किया गया। पत्तियों के नमूनों में सल्फेट और लेड का मूल्यांकन किया गया। अध्ययन में यह पाया गया कि पेड़ पौधों की पत्तियों में सल्फर और सीसे का दुष्प्रभाव है। अल्प यातायात घनत्व वाली सड़कों के किनारे के पौधों पर यह प्रभाव कम था।

वनस्पतियों में मुख्य रूप से सीसा हानि पहुँचाता है यह भूमि के ऊपरी भाग में वनस्पतियों की पत्तियों में पाया जाता है। फलों और फूलों में सीसे की कुछ मात्रा में उपस्थिति पायी जाती है। Motto23 (1970) ने सूचित किया कि गाजर, मक्का, आलू और टमाटर के खाए जाने वाले भागों में सीसा उपस्थित रहता है बंदगोभी (पत्ता गोभी) की ऊपरी पत्तियों में सीसे की मात्रा पायी गयी।

इलेक्ट्रॉनिक सूक्ष्मदर्शी24 के प्रयोग द्वारा पाया गया कि नारियल वृक्ष के फलों में रोगग्रस्त भागों में सीसे की भारी उपस्थिति रहती है। पत्तियों में सीसे की उपस्थिति पत्तियों की संरचना, वायु की दिशा तथा स्थान विशेष पर निर्भर करती है। चौड़ी पत्ती वाले पालक में इसकी मात्रा अधिक रहती है। उगने वाली घासों के संदर्भ25 में सीसे की मात्रा और सांद्रता सर्दियों में सबसे अधिक रहती है। सीसे के प्रभाव से कुछ वृक्ष अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं। वृक्षों के ऊपरी छाल में सीसे की सबसे अधिक मात्रा पायी जाती है। Ostrolucka26 के अनुसार सीसे की उपस्थिति 4.5 गुना पत्तियों में, 2.2 गुना बीजों में, 1.2 गुना पराग कणों में और 1.1 गुना मादा प्रजाति के फूलों में वृद्धि बाधित करती है।

सीसे का दुष्प्रभाव पौधे को किसी भी अवस्था में प्रभावित कर सकता है। यहाँ तक की बीज के जमाव को भी प्रभावित कर सकता है। बीज से निकलने वाली मूल जड़ों को नष्ट करता है। सोयाबीन, सूरजमुखी के पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया 50 प्रतिशत तक कम हो जाती है। जब शुष्क हवा में सीसे की सांद्रता 193 माइक्रोग्राम तक थी। वृक्ष के ऊपरी छाल पर सीसे का अधिक दुष्प्रभाव रहता है। सीसे के दुष्प्रभाव को सहने की क्षमता काष्ठ प्रदान करने वाले वृक्षों की अपेक्षा झाड़ीदार वृक्षों में अधिक पायी जाती है।

लखनऊ महानगर के उत्तरपूर्वी भाग27 पर जहाँ पर फैजाबाद मुख्य मार्ग और रिंग रोड एक दूसरे से मिलते हैं वहाँ पर स्थित पौधों पर अध्ययन किया गया। अध्ययन के लिये दूसरा स्थान 17 किमी. दूर वनस्पति शोध संस्थान के दूसरी जाति के पौधे लालकनेर को लिया गया और पाया कि पत्तियाँ प्रदूषित स्थान पर मुरझा गयी थी क्योंकि पत्तियों की सबसे बाहरी परत पर स्थित कोशिकाएँ मृतप्राय हो रही थी। स्वस्थ स्थान पर उसी पौधों की पत्तियाँ काफी स्वस्थ और आकार में दोगुनी थी। कार्बन मोनोऑक्साइड और धूल कण जो एक दूसरे से युक्त होते हैं। पौधों के विकास को कम करते हैं प्रदूषित स्थान में वाहनों की संख्या 1161 प्रति घंटा और 312.93 μg/m3 घनत्व था। प्रदूषण रहित स्थान पर वाहन रहित स्थित थी जहाँ 116.92 μg/m3 SPM की मात्रा थी।

भाटिया और चौधरी ने28 (1991) सड़कों के किनारे झाड़ियों में प्रयोग करके पाया कि दोनों ओर 30 मी. की दूरी पर पौधे खतरनाक स्थिति से गुजरते हैं। इन क्षेत्रों पर मनुष्य का रहना अधिक घातक है। पत्तियाँ धूल कणों और मोटी धूल से ढकी होती है। और प्रकाश संश्लेषण क्रिया प्रभावित होती है।

लखनऊ के गांधी भवन के निकट से खुले सीवर आदि की स्थिति होने पर अरंड का पौधा लिया गया जिसमें पाया गया कि H2S तथा CH4 गैसों का प्रभाव था। पत्तियों के स्टोमेटा की अस्वाभाविक वृद्धि हुई तथा वाह्य त्वचा की कोशिकाओं की आवृत्ति में वृद्धि हुई। पौधे की वाह्य त्वचा में क्षति पायी गयी। स्टोमेटा के मध्य खुले रंध्रों का स्थान बढ़ गया।

डीजल से निकलने वाले धुएँ से 15 से 65 प्रतिशत अनेकों प्रकार के रासायनिक पदार्थ होते हैं। जो श्रृंखला बद्ध प्रक्रिया में कार्बन माइक्रोस्फेयर के रूप में पत्तियों या अन्य किसी स्थान की ऊपरी सतह में जम जाते हैं। डीजल से उत्सर्जित धुएँ में कई सौ कार्बनिक यौगिकों की पहचान की गयी है। इनमें से तो कार्सिनोजेनिक के रूप मे जाने जाते हैं। डीजल के धुएँ से उत्सर्जित अतिसूक्ष्म कण अपने संसजक गुण के कारण पत्तियों की सतह पर इस प्रकार चिपट जाते हैं कि हवा और वर्षा से पृथक नहीं होते। इलेक्ट्रॉनिक सूक्ष्मदर्शी से ज्ञात हुआ कि स्वस्थ्य पौधों की पत्तियों को हानि पहुँचती है जिससे पौधे की पत्तियों में श्वसन क्रिया और विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इन पदार्थों में सिलीसिया जल अडिटेनियम डाई की मात्रा सर्वाधिक है। डीजल का धुआँ अधिक ऊपर न जाकर नीचे की तहों एवं हवा की दिशा में अधिक प्रभाव डालता है।

द. लखनऊ नगर में वायु प्रदूषण नियंत्रण के उपाय


वायु प्रदूषण के उपचार के सबसे महत्त्व का उपाय है वनों का बचाव और संरक्षण तथा उनके रोपण की दिशा में प्रभावी कदम उठना। दूसरा उद्योग लगाते समय प्रदूषण की समस्या से बचाव के लिये उपयोगी रणनीति तैयार करना अर्थात प्रदूषण उत्सर्जन केंद्र पर ही प्रदूषकों का उपचार करना। वायु प्रदूषण के उपचार के लिये मौसम की दशाओं तथा उसके प्रकार तथा वायुमंडल में घटित होने वाली बारंबारता से भी गहरा सम्बन्ध रहता है। वायु प्रदूषण की समस्याओं से लोगों को अवगत कराना, सरकार में जागरूकता उत्पन्न करना, नगरीय और औद्योगिक क्षेत्रों का सघन सर्वेक्षण एवं मॉनीटरिंग द्वारा वस्तु स्थिति से जन सामान्य को अवगत कराना तथा प्रशासनिक स्तर पर वायु प्रदूषण रोकने के लिये कानून बनाने की आवश्यकता है। वायु प्रदूषण रोकने के लिये विभिन्न प्रकार के उपाय किए जा सकते हैं..

1. ऊर्जा का संरक्षण
2. धूल कणों को वायुमंडल में पहुँचने से रोकना,
3. ग्रीन हाउस गैसों के उत्पादन में कमी करना,
4. वाहनों की दशा एवं रख रखाव में सुधार करना,
5. मार्गों की दशा में सुधार करना।

1. ऊर्जा का संरक्षण - वायु प्रदूषण में नियंत्रण के लिये ऊर्जा की बचत और संरक्षण की आवश्यकता को महसूस करते हुए भारत सरकार ने इस दिशा में कुछ सकारात्मक कदम उठाए हैं। ऊर्जा नीति समिति रिपोर्ट (1994) के माध्यम से भारत सरकार ने इस क्षेत्र में पहल की। ऊर्जा नीति पर वर्किंग ग्रुप का गठन 1976 में किया गया तथा 1981 में ऊर्जा के उपयोग और संरक्षण पर मंत्रालय स्तर पर एक और वर्किंग ग्रुप का गठन किया गया। इस दिशा में सबसे महत्त्वपूर्ण कदम भारत सरकार द्वारा सितंबर 1982 में अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत विभाग डीएनईएस की स्थापना की गयी। भारत सरकार ने 1983-88 में ऊर्जा सलाहकार बोर्ड 1989 में ऊर्जा प्रबंध केंद्र की स्थापना की गयी।

ऊर्जा नीति द्वारा 20-25 प्रतिशत तक ऊर्जा खपत बचा पाने की सम्भावनाएँ हैं। इसके लिये आवश्यकता होगी, विभिन्न प्रकार के उपयोग की विधियों एवं उपकरणों में परिवर्तन की, और भवन निर्माण विधियों पर समुचित तकनीकी के उपयोग की।

भवन निर्माण विधियों में सुधार - कार्यालयों एवं घरों में प्रकाश व्यवस्था एवं ठंडा एवं गर्म करने के लिये समुचित तकनीक की आवश्यकता होती है। घरों, दफ्तरों तथा व्यावसायिक भवनों का निर्माण कराते समय वास्तुकला तथा तकनीकी बनावट में परिवर्तन लाना चाहिए, ताकि प्रकाश, भवन गर्म करने और ठंडा करने में विद्युत उपकरणों का प्रयोग कम करना पड़े। इसके लिये सौर ऊर्जा का प्रयोग किया जा सकता है। सौर वास्तुकला (सोलर आर्किटेक्चर) का प्रयोग करना चाहिए। साथ ही सौर निष्क्रिय तापन (सोलर पैसिव हीटिंग) द्वारा भवनों को गर्म रखने की तकनीकि का प्रयोग किया जाना चाहिए। भवनों की छतों पर ताप अवरोधकों का प्रयोग किया जा सकता है। खिड़कियों में दोहरे काँच का प्रयोग किया जा सकता है।

भारत में भवनों पर होने वाले ऊर्जा व्यय के प्रबंधन पर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली में ‘गारनोट मिंकी’ नामक कंपनी ने ऐसी इमारत का निर्माण किया है जिसमें ‘फनेल’ सिद्धांत का प्रयोग एक तरह से सौर चिमनी के विकास में किया गया है। इस सिद्धांत द्वारा ढाँचे को प्राकृतिक तौर पर ही ठंडा रखने में मदद मिलती है। नई दिल्ली के जनपथ होटल में सौर प्रकाश वोल्टीय पैनलों तथा सौर संग्राहकों की मदद से तापन, संवातन एवं वातानुकूलन से सम्बन्धित बहुत सा काम लिया जा रहा है। भवन निर्माण की दिशा में मुंबई स्थित ‘सीएमसी हाउस’ पुणे में ‘टाटा रिसर्च डेवलवपमेंट एंड डिजाइन सेंटर’, (टीआरडीडीसी) नई दिल्ली की एफसीआई इमारत तथा दि कैपिटल कोर्ट ऐसे भवन हैं जो ऊर्जा संरक्षण की दिशा में बहुत महत्त्व के हैं। पुणे स्थित टीआरडीडीसी में 45 प्रतिशत, मुंबई के सीएमसी भवन में 25 प्रतिशत विद्युत की बचत होती है।

वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का प्रयोग - विद्युत उपकरणों से विद्युत उपयोग और क्षरण को कम करने के लिये काम्पेक्ट फ्लोरोसेंट लैंप (सीएफएल) का प्रयोग उपयोगी है। ग्रामीण क्षेत्रों या नगर के उन क्षेत्रों में जहाँ कोयले, उपलों तथा लकड़ी का प्रयोग किया जाता है बायोगैस तथा उन्नत चूल्हों का प्रयोग अधिक उपयोगी है। इससे र्इंधन की बचत और प्रदूषण पर नियंत्रण होगा। पानी गर्म करने के लिये सोलर वाटर हीटर का प्रयोग भी किया जा सकता है।

उद्योग - नगरीय क्षेत्रों में ऊर्जा की सर्वाधिक खपत और प्रदूषण उद्योगों द्वारा होता है। उद्योगों में तापीय ऊर्जा का उपयोग होता है। जिससे वायु प्रदूषण उत्पन्न होता है। उद्योगों में प्रयुक्त होने वाले संयंत्रों में भी सुधार की आवश्यकता है। उद्योगों की अधिक ऊर्जा वाली भट्टियों जिनमें प्रदूषण नियंत्रण के लिये चिमनी युक्त प्रणाली लगी हो, के विकास द्वारा ऊर्जा की बचत और प्रदूषण पर नियंत्रण किया जा सकता है। टाटा ऊर्जा अनुसंधान संस्थान के अनुमान के अनुसार उद्योगों में खपने वाली 30 प्रतिशत ऊर्जा की बचत की जा सकती है।

2. धूलकणों पर नियंत्रण - नगरीय और औद्योगिक क्षेत्रों में सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और निलंबित कणकीय पदार्थों (एसपीएम) के स्तर को अनेक संस्थाओं द्वारा मापा गया। शुष्क कणकीय पदार्थ निम्नलिखित प्रकार से अलग किये जा सकते हैं।

1. गुरूत्वाकर्षण द्वारा
2. दूसरे पदार्थों पर चिपकाकर
3. विद्युत शक्ति/विद्युत क्षेत्र द्वारा

उद्योगों में कणकीय पदार्थ से भरी प्रदूषित वायु चक्रवात में तीव्र गति से प्रवाहित की जाती है। इस यंत्र की बनावट के कारण यह प्रदूषित वायु एक चक्र में घूमने लगती है जिसके कारण भारी कण सेंट्रीफ्यूगल बल के कारण चक्रवात की दीवारों में चिपक जाते हैं तथा अति सूक्ष्म कण जिनकी मात्रा कुल मात्रा की 0.03 से 0.05 प्रतिशत होती है वे ही इस चक्रवात संयंत्र में बाहर निकल कर वायुमंडल में प्रवेश कर पाती है। इस प्रक्रिया द्वारा ठोस कणों से अधिकतम भाग वायु मंडल में प्रवेश करने में रोक लिया जाता है।

बैग फिल्टर - इस प्रकार के उपकरण में कणकीय पदार्थ से प्रदूषित वायु एक मजबूत थैले से प्रवाहित की जाती है। थैला विशेष पदार्थ जैसे नाइलोन, पीवीसी पॉलिस्टर आदि का बना होता है। इसमें भी अधिकतम कण थैले की दीवार पर चिपककर रह जाते हैं और केवल 0.05 से 0.1 प्रतिशत कण ही वायुमंडल में प्रवेश कर पाते हैं। कणकीय पदार्थों से युक्त धुआँ फिल्टर के सिलैंडर से गुजरता है जैसे बेलनाकार बैग से बाहर निकल जाती है जबकि कणकीय पदार्थ नीचे बैठ जाते हैं।

इलेक्ट्रोस्टेटिक प्रेसिपिटेटर : इस प्रकार के उपकरण में बहुत से इलेक्ट्रोड प्लेटे लगी होती है। जिन पर उच्च विद्युतीय प्रवाह बना रहता है। इन प्लेटों के माध्यम से जब कणकीय पदार्थ से प्रदूषित वायु प्रवाहित की जाती है तब कण प्रवाह प्लेटों पर एकत्र हो जाते हैं तथा केवल 0.02 से .05 प्रतिशत कण ही वायुमंडल में प्रवेश कर पाते हैं। इस प्रकार उपकरणों द्वारा उद्योगों से निकलने वाली गैसों में मिश्रित कणकीय पदार्थ को पृथक कर लिया जाता है तथा वायुमंडल में उत्सर्जित कणकीय प्रदूषण नियंत्रित हो जाता है।

3. गैस प्रदूषण नियंत्रण - गैसों के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिये या तो पानी का सहारा लिया जाता है अथवा अन्य रासायनिक पदार्थों के साथ रासायनिक क्रिया करके उन प्रदूषक गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित किया जाता है। इसके लिये कुछ प्रमुख संयंत्र प्रयोग में लाए जाते हैं।

स्प्रेटावर्स - इसमें पानी का दाब नोजल द्वारा सूक्ष्म स्प्रे तैयार किया जाता है तथा विपरीत दिशा से इसमें धीमी गति से गैस प्रवाहित की जाती है। इस प्रकार घुलनशील गैसें पानी में घुल जाती हैं तथा गैस रहित वायु वायुमंडल में प्रवेश पाती हैं।

वेंचुरी कलेक्टर - इसमें दूषित वायु अति तीव्र गति से एक अति सूक्ष्म छिद्र द्वारा प्रवाहित की जाती है और छिद्र के पास ही दूषित गैस को पानी भी उपलब्ध कराया जाता है जिससे दूषित वायु की तीव्र गति के कारण पानी का बहुत सूक्ष्म स्प्रे बन जाता है। इसमें वायु से घुलनशील गैंसे और कणकीय पदार्थ दोनों अलग हो जाते हैं।

पैक्डटावर - इसमें गैसों को रासायनिक प्रक्रिया द्वारा रासायनिक पदार्थ जैसे चूना आदि पर सोख लिया जाता है। पैक्डटावर में चूना पत्थर, कोयला जैसे पदार्थ भर दिये जाते हैं। उसमें एक ओर से दूषित वायु और दूसरी ओर से जल प्रवाहित किया जाता है। इस प्रकार गैस पैक किये गए रासायनिक पदार्थ पर सोख ली जाती है और प्रदूषक गैस रहित वायु ही वायु मंडल में प्रवेश करती है।

4. वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करना - पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों से धुएँ के कारण उत्पन्न वायु प्रदूषण को रोकने के लिये भारी वाहनों का नगरीय सीमाओं में प्रवेश के लिये अनुकूल समय सीमा का निर्धारण करने की आवश्यकता होती है तथा उनके द्वारा उत्सर्जित प्रदूषण की मॉनीटरिंग की आवश्यकता रहती है। लखनऊ राजधानी नगर होने के साथ बड़ा व्यापारिक तथा औद्योगिक नगर भी है। अत: नगर के आंतरिक भागों में वाहनों का प्रवेश तो होना ही है। ऐसी स्थिति में केवल कठोर और युक्ति संगत कानून बनाकर बड़े वाहनों से होने वाले प्रदूषण से बचा जा सकता है। बड़े वाहनों की गति सीमा और वाहनों में भार सीमा पर भी नियंत्रण करने की आवश्यकता है।

सेतु निर्माण - नगर में ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार द्वारा वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम किया जा सकता है। नगर के बड़े चौराहों में लाल बत्ती का शीघ्र प्रयोग प्रदूषण का कारण बनता है। यद्यपि नगर में रेलवे व्यवस्था क्रॉसिंग में उपरिगामी सेतु बनाए गए हैं फिर भी वाहनों के भारी दबाव को देखते हुए सदर से हजरतगंज मार्ग, तालकटोरा मार्ग, राजाजीपुरम, निरालानगर तथा कैंट रोड में भी उपरिगामी सेतु बनाए जाने की आवश्यकता है।

मार्ग अतिक्रमण को दूर करना - नगर के अधिकतम चौराहों में अवैध निर्माण एवं अतिक्रमण के कारण यह समस्या है तथा नगर के 2/3 मार्ग पर दुकानदारों तथा ग्राहकों के वाहनों के खड़े हो जाने से आवागमन में बाधा उत्पन्न होती है। यह समस्या नगर के बड़े बाजारों और चौराहों में अधिक है। अमीनाबाद, आलमबाग, शिवाजी मार्ग, महात्मा बुद्ध मार्ग, स्वामी रामतीर्थ मार्ग, नेताजी मार्ग, नक्खास, तुलसी दास मार्ग, चौक सदर जैसे चौराहों और मार्गों में यह समस्या अधिक है। इसके लिये अवैध निर्माण और अतिक्रमण को हटाने के लिये कानूनी प्रयास करना तथा वाहनों के लिये पार्किंग की अति आवश्यकता है जिनके निर्माण के लिये भूमिगत स्थलों का निर्माण किया जा सकता है। अमीनाबाद में पार्किंग स्थल पार्कों के भूतल में निर्मित हो सकता है।

वाहन प्रतीक्षा गृहों का निर्धारण :


टैक्सी, टैम्पों, सिटी बस स्वचालित दो पहिया, वाहनों के लिये सुविधा की दृष्टि से स्टैंडों का निर्माण करना चाहिए। लखनऊ नगर में प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण यहाँ मार्गों में दौड़ने वाले 7 हजार विक्रम हैं। इनके द्वारा नगर वासियों को जहाँ आवागमन की सुविधाएँ उपलब्ध करायी जाती हैं। वहीं मार्ग दुर्घटना के भी सबसे बड़े कारण हैं यही स्थिति नगरीय बसों की है। क्योंकि इनके पार्किंग का कोई भी नियम स्थान नहीं है। कहीं भी कभी भी सवारी उठाते उतारते हैं इसमें सभी को परेशानी होती है और प्रदूषण भी बढ़ता है। अत: इनके लिये नियत स्टैंड की व्यवस्था अति आवश्यक है।

मार्गों की चौड़ाई बढ़ाना - नगर के आंतरिक भागों में सड़कें बहुत संकरी हैं। इसलिये वाहनों की गति में कमी आती है और प्रदूषण बढ़ता है। इससे बचने के लिये अलग-अलग प्रकार के वाहनों के लिये अलग-अलग लेन का महत्त्व अधिक है। यद्यपि यह व्यवस्था पूरी करना बहुत कठिनाई के साथ संभव है। फिर भी इसकी बहुत सम्भावनाएँ हैं। नयी कॉलोनियों और बाजारों में ऐसे मार्गों का निर्माण किया जा सकता है। महानगरों से अन्य बड़े नगरों की ओर जाने वाले मार्गों में भी इसकी सम्भावनाएँ है। कानपुर मार्ग, सीतापुर मार्ग, फैजाबाद मार्ग, हरदोई मार्ग, रायबरेली मार्ग, सुल्तानपुर मार्ग, कुर्सी मार्ग, मोहान मार्ग में ऐसे सुधार किए जा सकते हैं।

कार्यालयों के समय का विभाजन - लखनऊ महानगर में सरकारी, सहकारी, निजी, औद्योगिक व्यापारिक, पर्यटन, कृषि तथा राजनीतिक सभी प्रकार के कार्यालय हैं जिनसे सम्बन्ध रखने वाली 70 प्रतिशत जनसंख्या है। यदि इनके समय विभाजन पर कुछ महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किया जाए तो प्रदूषण समस्या कम हो सकती है। प्रात: 7-2 और सायं उसे 3 का 6 घंटों का विभाजन किया जा सकता है। विद्यालयों के समय को और आर्थिक कारोबार से सम्बन्धित कार्यालयों के समय को अलग रखा जा सकता है। इससे मार्गों पर वाहनों का दबाव कम होगा और प्रदूषण भी कम होगा।

मार्ग विभाजकों का निर्धारण : मार्गों का विभाजन करके भी वाहनों की गति को बढ़ाया जा सकता है। ट्रैफिक को कम किया जा सकता है। जिससे समय अपव्यय और प्रदूषण दोनों स्थितियों में कमी आयेगी।

नगरीय बस सेवा का संचालन : नगर में विक्रम वाहनों की बढ़ती संख्या को कम करने के लिये अधिक क्षमता की बसों को नगरवासियों की सेवा में लगाया जा सकता है। इससे एक बस दस विक्रम से अधिक का बोझ कम करेगी, साथ ही प्रदूषण की दशा में भी सुधार होगा। मार्ग दुर्घटनाएँ भी कम होगी मार्गों में भारी भीड़ कम होगी, परिवहन व्यवस्था सस्ती होगी और निजी वाहनों में भी कमी आयेगी। इनके रूकने का स्थान और चलने का समय नियमित किये जाने से जन जीवन में सुधार आयेगा और विश्वास बढ़ेगा।

बेंजीन तथा सीसा रहित पेट्रोल की पूर्ति - वाहनों से निकलने वाले धुएँ पर नियंत्रण किया जा सकता है। लेड हाइड्रोकार्बन और कार्बन और कार्बन मोनो ऑक्साइड मुख्यत: पेट्रोल इंजनों की निकास गैसों में निकलते हैं तथा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड भारी वाहनों तथा अन्य डीजल से चालित वाहनों द्वारा उत्पन्न धुएँ से निकलते हैं। साइलेंसर के धुएँ में मुख्यत: कार्बन के कण लेड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, हाइड्रो कार्बन नाइट्रोजन डाइऑक्साइड व बेंजीन है। बेंजीन तथा लेड की मात्रा को कम करने के लिये बेंजीन तथा लेड रहित पेट्रोल की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकती है।

कैटेलिटिक कनवर्टर का प्रयोग - कार्बन मोनोऑक्साइड को कार्बन डाइऑक्साइड में और नाइट्रोजन के ऑक्साइडों में परिवर्तित करने की विधि का प्रयोग करके तथा मोटर वाहनों के निकलने वाले धुएँ के तापक्रम को ध्यान में रखते हुए ‘नीरी’ ने मोटर वाहन प्रदूषण पर नियंत्रण करने के लिये कैटेलिटिक कनवर्टर का विकास किया है। इस विधि को साइलेंसर के साथ जोड़ा जाता है जिससे वाहनों से निकलने वाले प्रदूषकों की मात्रा में भारी कमी हो जाती है।

कानून बनाना - मोटर वाहनों से निकलने वाले धुएँ का मानक भी केंद्रीय मोटर वाहन नियम 1989 के अंतर्गत निर्धारित किया गया है। इसके अनुसार धुएँ की अधिकतम सीमा 65 हर्ट्ज तथा कार्बन मोनो ऑक्साइड की अधिकतम सीमा 3 प्रतिशत निर्धारित की गयी है। नीरी ने वाहनों के धुआँ मापने वाले स्मोक मीटर को विकसित करने में एक निजी लघु उद्योग को परामर्श देकर उसे पूर्णतया विकसित कर दिया।

धूल कणों का नियंत्रण - कणकीय पदार्थ के श्वसनीय भाग (10 माइक्रोन से कम आकार के कण) को दूषित वायु से अलग कर उसका मापन करने की विधि तथा संयंत्र का विकास नीरी ने किया एक संयंत्र में दूषित वायु पहले एक साइक्लोन में प्रवेश करती है। जहाँ पर 10 माइक्रोन से बड़े कण साइक्लोन में एकत्रित हो जाते हैं तथा छोटेकण अलग फिल्टर पेपर में एकत्रित हो जाते हैं दोनों भागों को अलग-अलग तोल लिया जाता है तथा वायुमंडल में उनका अनुपात मालूम कर लिया जाता है। इस संयंत्र का उपयोग, कोयला खानों, सीमेंट मिलों, मैगनीज कारखानों, चूना भट्टियों आदि में सफलता पूर्वक परीक्षण किया जा चुका है। इस संयंत्र को उपलब्ध कराने के लिये उनकी तकनीक एक निजी कम्पनी को हस्तांतरित कर दी गयी है।

विक्रम वाहनों की संख्या में नियंत्रण - लखनऊ महानगर में वायु प्रदूषण समस्या का प्रमुख स्रोत यहाँ के मार्गों में दौड़ने वाले विक्रम हैं जिनकी संख्या 7 हजार से अधिक है। लखनऊ नगर में विक्रम वाहनों को प्रचलन से हटाने से नगर के वायु प्रदूषण में 50 प्रतिशत से अधिक का सुधार हो जायेगा। 25, 26, 27 सितंबर 97 को लखनऊ महानगर में विक्रम वाहनों की हड़ताल रही उस समय नगर में 98 प्रतिशत विक्रम वाहन मार्गों में नहीं चले। इस समय मार्गों में धुएँ की समस्या नहीं थी साथ ही मार्गों की व्यस्तता भी बहुत कम रही। इसलिये धूल कणों की समस्या भी नहीं रही। इसी अवसर का लाभ उठाकर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नगर के प्रमुख 5 चौराहों की मॉनीटरिंग करायी जो प्रदूषण के प्रमुख स्रोत विक्रम की स्थिति को स्पष्ट करते हैं।

मॉनीटरिंग रिपोर्ट के अनुसार हवा में लटकते धूल कणों के स्तर में 50 प्रतिशत तक कमी आयी जो मानक की साह्य क्षमता से कम पाया गया। सल्फर डाइऑक्साइड में हजरतगंज जैसे व्यस्तम क्षेत्र में 86 प्रतिशत तक गिरावट आयी। इसी प्रकार अन्य चौराहों में भी 50 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आयी। लगभग यही स्थिति नाइट्रोजन ऑक्साइड की रही।

तालिका 4.18 लखनऊ महानगर में वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोत विक्रमवाहन प्रदूषण निरीक्षण : महानगरों के पर्यावरण को स्वस्थ बनाए रखने के लिये परिवहन विभाग द्वारा वाहनों को स्वस्थता प्रमाणपत्र जारी करने से पूर्व उनकी प्रदूषण मानकों के अंतर्गत जाँच करके उन्हें प्रदूषण मुक्त होने का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य है। इसके लिये विभाग कार्यालय द्वारा जनपदीय कार्यालयों में स्मोक डेसिटीमीटर एवं गैस एनालाईजर्स उपलब्ध कराये गये। इसी में लखनऊ के लिये दो स्मोक डेसिटीमीटर तथा दो गैस एनालाइजर्स उपलब्ध कराये गये।

परिवहन विभाग द्वारा प्रदेश में अप्रैल 94 से मार्च 95 तक प्रदूषण की दृष्टि में संयंत्रों द्वारा 56527 गाड़ियों को चेक किया गया तथा उनमें से 11.121 गाड़ियों का चालान किया गया। चालान के फलस्वरूप 98,235 शमन शुल्क के रूप में वसूल किया गया।

परिवहन विभाग द्वारा लखनऊ के लिये धुआँ मापन के 18 केंद्रों को मान्यता दी गयी जिसमें की 6 मोबाइल्स केंद्रों को मान्यता दी गई। वर्ष 1994-95 में विभाग द्वारा 6565 वाहन चेक किये गये जिनमें से 1260 वाहनों को नोटिस तथा चालान किया गया। तथा 2427 को प्रमाणपत्र जारी किया गया। इसी सम्बन्ध में वर्ष 1995-96 में 8000 से अधिक का लक्ष्य रखा गया जिसमें 14121 वाहनों को चेक किया गया 9339 को प्रमाण पत्र दिया गया तथा 2256 वाहन सही पाये गये।

लखनऊ नगर के स्वस्थ पर्यावरण के लिये उ.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के परामर्श के अनुसार लखनऊ परिवहन पंजीकरण कार्यालय ने धुएँ की माप के लिये कुछ अलग दलों का गठन किया है। इनके द्वारा सतत वाहनों के धुआँ मापन का कार्य 28 केंद्रों में किया जाता है। इसके प्रभावशाली कदम से नगर के पर्यावरण में सुधार लाया जा सकता है तथा इनके माध्यम से अनुमान लगाया जा सकता है कि नगर में प्रदूषित धुआँ फेंकने वाले वाहनों का औसत कितना है। (परिशिष्ट- 39, 40)

लखनऊ महानगर में वायु प्रदूषण की समस्या के साथ-साथ ध्वनि प्रदूषण की समस्या भी लगातार गहराती जा रही है। राजधानी नगर होने के कारण प्रशासनिक अधिकारियों की अधिकता है। इन अधिकारियों के वाहनों में सरकारी विभाग की गाड़ियों में उच्च ध्वनि के हार्न लगे हुए हैं। इसके साथ ही सामान्य और अन्य विशिष्ट नागरिक उच्च ध्वनि के हार्न लगाने की होड़ में पीछे नहीं है। इस प्रकार नगर में ध्वनि प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है। अगले अध्याय में लखनऊ महानगर में बढ़ती ध्वनि प्रदूषण की दशा का अध्ययन किया जायेगा।

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लखनऊ महानगर एक पर्यावरण प्रदूषण अध्ययन (Lucknow Metropolis : A Study in Environmental Pollution) - 2001


(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

पर्यावरण प्रदूषण की संकल्पना और लखनऊ (Lucknow Metro-City: Concept of Environmental Pollution)

2

लखनऊ महानगर: मृदा प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Soil Pollution)

3

लखनऊ महानगर: जल प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Water Pollution)

4

लखनऊ महानगर: वायु प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Air Pollution)

5

लखनऊ महानगर: ध्वनि प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Noise Pollution)

6

लखनऊ महानगर: सामाजिक प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Social Pollution)

7

लखनऊ महानगर: प्रदूषण नियंत्रण एवं पर्यावरण प्रबंध (Lucknow Metro-City: Pollution Control and Environmental Management)

 

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