पानी को मरने न दें

Submitted by editorial on Sat, 06/09/2018 - 15:16
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कादम्बिनी, मई, 2018

पानी होने का एक ही अर्थ है- देना। यह देना ही उसे तीर्थ की श्रेणी में ला देता है। लेकिन हम अपने इस तीर्थ का कितना सम्मान कर रहे हैं? हमारे संस्कारों पर पाखंड हावी होता जा रहा है। हम भूल रहे हैं कि पानी के मरने पर कुछ शेष नहीं बचता, इसलिये आज जरूरत है कि हम कुछ देर ठहरकर सोचें, ताकि हम सबका भी ‘पानी’ बचा रह सके।

प्रतिदिन एक मंत्र पढ़ता हूँ, जो ‘आपो हिष्ठा मयोभुवः’ से प्रारम्भ होता है अर्थात- हे जल में रहने वाली शक्ति मेरे लिये कल्याणकारी बनी रहो और इसका अन्त होता है, इस पंक्ति से- ‘आपो जनयथा च नः’ ‘हे जलाधिष्ठात्री मुझे रचो’ और मैं अपने देश की विचित्र पानीदारी की स्मृति से रोमांचित हो उठता हूँ। जाने कितनी तो बाढ़ आती है, प्रलय ढाती हुई, कितनी तो वर्षा होती मूसलाधार और इस देश को पानी से वितृष्णा नहीं होती।

इस देश का खेतिहर तो बादल की बाट जोहता रहता है, आकाश में वह सिर्फ बादल के संकेत पढ़ता है या फिर समय का संकेत पढ़ता है, पानीदार तारों में लाल-पीले बादल आए, क्या बरसेंगे? कजरारे बादल आये, जरूर बरसेंगे, पर यहीं बरसेंगे या दूसरे गाँव, कुछ कहा नहीं जा सकता। उजले हाशिये वाले काले बादल आएँ, किसान प्रसन्न हो जाता है, वे कबूतरपंखा बादल बिना बरसे, बिना पूरा बरसे नहीं जाएँगे या फिर वह तारों की स्थिति में समय पढ़ता चौमचिया (खाटनुमा तारों का पुंज) सिर पर आ गई, आधी रात हो गई, सुकवा (शुक्र) क्षितिज में नीचे आ रहा है, सुबह होने वाली है।

इस देश का कवि-कलाकार-पंडित कलासृष्टि के देवता को भी जलधारा का नाम देता है, सरस्वती या सरस्वान नाम उस सिन्धु का है, जिसने भारत को हिन्दुस्तान बनाया, जिसमें वितस्ता, असिक्नी, रावी, विपाशा, शतद्रु का जल संभार सिमटता है, जिसकी घाटी हमारे इतिहास की साक्षी है। कला के देवता को जलधारा के रूप में देखने वाली आँख को मैं ध्यान से देखना चाहता हूँ।

पंडित कहते हैं, सरस्वती नाम सिंधु को पहले दिया गया, फिर एक अपार जल संभार-दिखा पश्चिम समुद्र की ओर जाने वाला, उसे भी सरस्वती नाम दिया, उसके किनारे ज्ञान के सत्र हुए, मंत्रों के प्रतीकों के अर्थ पर अनुसन्धान हुए, इसलिये ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी का नाम पड़ा- सरस्वती। पर मैं इससे सन्तुष्ट नहीं हो पाता, जिसके तट पर ज्ञान की साधना हुई, उसे सरस्वती कहने से कुछ बात जमती नहीं, कहीं बिना मझधार में पड़े, बिना मौजों का बहार लिये कोई रचना सम्भव है, सरस्वती नाम प्रवाह का है, तट का थोड़े ही है। फिर खयाल आता है- इस देश में सृष्टि के देवता कमल से उत्पन्न हैं, इस देश की लक्ष्मी समुद्रमंथन से उद्भूत हैं, इस देश के शिव अपने जटाजूट में गंगाधर लपेटे रहते हैं और नारायण तो जल में शयन करते हैं, जल समस्त सम्भावना का आगार है।

ऋग्वेद में वाग्देवता कहती हैं- ‘मम योनिरप्स्वंतः समुद्रे’ मेरा जन्म स्थान समुद्र की गहराई में बहुत भीतर है। जल अव्यक्त अनन्त आकार है, सरस्वती नाम उस अनन्त सम्भावना का है, जो प्रसुप्त है हममें से प्रत्येक के भीतर, जो हममें से प्रत्येक को भाषा के माध्यम से, भाव के माध्यम से एक-दूसरे से जोड़ती है, यह बतलाती हुई कि तुम सब जीवन-प्रवाह के अंग हो।

पानी हमारे देश का जीवन है। प्रत्येक व्यक्ति की लाचारी है कि एक पानी की छोटी धारा बने, प्रत्येक धारा की एक लाचारी है कि एक बड़ी धारा की अंग बने, बड़ी धारा की लाचारी है एक अनन्त में मिले, अनन्त की भी लाचारी है कि हर प्रकाश से तपे बिन्दु बिन्दु खिंचे, कभी भाप बने, भाप बनकर बादल बने, कभी बस पूर्णिमा के दिन धवल फेनों की झालरदार ज्वार-माला बन जाए। पानी होने का एक ही तो अर्थ है, दूसरे के लिये होना।

ऐसा पानी केवल द्रव नहीं है, वह दीप्ति भी है। हमारे देश के कविकुल गुरु कालिदास धूप को पानी के रूप में देखते हैं, सांझ होती है, झलमल रोशनी पेड़ों की चोटियों पर दिखती है, मोर उस रोशनी को बूँद-बूँद पीते हैं। अन्धकार पूरब की ओर से गहराता हुआ आता है, पर पश्चिम दिगंत में थोड़ी-सी रोशनी झलमलाती रहती है, ऐसा लगता है आकाश एक बड़ा सरोवर है जो सूख रहा है, करीब-करीब सूख ही गया है, बस थोड़ा-सा जल पश्चिम की ओर शेष रह गया है, सिमटती हुई धूप की यह प्यास जिस देश के कवि को होती है, मुहावरा ही कुछ दूसरा होता है।

यहाँ आँख में पानी भर जाए, तो आदमी समाज में निन्दा का पात्र बन जाता है, अगर मोती का पानी उतर जाए, तो उसकी कोई कीमत नहीं लगती, अगर चूने का पानी मर जाए, तो चूना पान का रंग बिगाड़ दे, अगर तलवार में पानी न चढ़ाया जाए, तो वह बस केवल एक पोशाक बनकर रह जाए, अगर आदमी अपने पानी की चिन्ता छोड़ दे, तो उसको कोई भी पूछेगा तक नहीं।

इस देश के रंग में पूरी तरह रंगकर ही रहीम ने कहा-

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरैं, मोती मानुस चून।।


हर जतन से पानी रखिए, पानी चले जाने पर फिर उबरने की कोई आशा नहीं रहती। कष्ट सहिए, पर पानी राखिए।

अभी दसेक दिन हुए जबलपुर गया था, जबलपुर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर एक बाँध बँध रहा है नर्मदा पर, जिसकी डूब में लगभग एक सौ साठ गाँव आएँगे और मंडला से लेकर वर्गी तक (वर्गी के पास ही बाँध बन रहा है) एक विशाल सरोवर में नर्मदा का और मेकल तथा कैमूर की पर्वत श्रेणियों से निकलने वाली छोटी-छोटी वन्य धाराओं का जल भरा जाएगा, आदमी की जरूरत जितनी होगी, उतना जल नियमित रूप से निकाला जाएगा।

बाँध के इंजीनियर मेरे बड़े स्नेहभाजन, स्वयं अच्छे कवि, उन्होंने बहुत विस्तार में पूरी योजना समझाई। मैं उनकी बात आधी समझ पाया, आधी नहीं, मैं बात के दौरान नर्मदा को देखता रहा, एक अनब्याही नदी के यौवन के आस्फाल की व्यर्थता की सार्थकता में रूपान्तरित होने की कल्पना करता रहा, पूरी बात सुन नहीं पाया। देश के स्वाधीन होने पर हमने पानी रखने के कितने बड़े-बड़े उपक्रम किये और करते चले जा रहे हैं, कितने उजड़ रहे हैं कि पानी बेकार न जाए, कहीं रखा जाए और काम आए। मन में बड़ा उल्लास भरा, मेरे मित्र ने कहा कि इस डूब के क्षेत्र में एक पुराना मन्दिर आता था, जिसमें नंदिकेश्वर प्रतिष्ठित थे, हम लोगों ने जनभावना का आदर करते हुए उन्हें सबसे ऊँची टेकड़ी पर लाकर पुनः प्रतिष्ठित किया है, जहाँ से पूरा परिवेश दिखाई पड़ता है।

एकाएक मेरे मन में एक प्रश्न कौंधा, क्या सचमुच पानी तुम रख पाए, इतने बाँध बनाए, इतनी ऊर्जा उस पानी के शक्तिपात से पैदा की, क्या तुम इस देश का पानी रख पाए? और कहीं लगा चारों ओर से ‘धिक्कार-धिक्कार’ की आवाज आ रही है। गंगा, यमुना, शोण, नर्मदा, तापी, दूर वितस्ता (झेलम), विपाशा (व्यास), शतद्रु (सतलज) कौन नदी बची है जिसका जल हमने दूषित न किया हो। हमने कानून बनाए, उन्हें किताब में रखा, बराबर तोड़ते रहे।

वृंदावन-मथुरा के पास यमुना ऐसी हैं यम कहना अधिक उपयुक्त लगता है, काशी तलवाहिनी ओंकार के आकारवाली, शंकर की चंद्रकला के आकारवाली गंगा की दुर्दशा और शोचनीय है, उसमें हमने अपनी समस्त अशुचिता इतनी मात्रा में डाल दी है कि उसमें फूल पड़ते हैं, तो वे सड़ान्ध बन जाते हैं, दीप जलाये जाते हैं, तो वे अन्धकार बन जाते हैं, आज गन्दे नालों को अपने प्रवाह में लेते-लेते वह नदी का रूप खो रही है, इस देश की पवित्रता का, इस देश की गतिशीलता का, इस देश के उत्सर्ग का ऐसा बड़ा पैमाना हमने छोटा कर दिया है। तापी और सोन को मैंने बीस वर्षों के अन्तराल में इतना बदलते देखा कि जहाँ पैसा डालिए तह में जाने तक दिखता रहता था, वहाँ एक जाने किस रासायनिक कचरे की सुर्ख लाल चादर पड़ी हुई है।

हमारे संस्कार वही हैं, हम अब भी जल को तीर्थ मानते हैं, जल हमें तारता है और उस तीर्थ को हम इस तरह बर्बाद कर रहे हैं। हमीं थे, जिन्होंने विजन में, प्रकृति के एकान्त में, ऊँचे पर्वतों में, दुर्गम घाटियों में निविड़ वनों के बीच उद्दाम रूप से दहाड़ने वाले झरनों में तीर्थों की कल्पना की, टेकड़ियों पर देवी के, शिव के स्थान बनाये, उनकी यात्रा के श्रम को हमने जीवन का धर्म माना, हमने नदियों के बलुहे तट को यज्ञस्थली बनाया और हम ही हैं जो अपने तीर्थों में ऊँची अट्टालिकाएँ बना रहे हैं, कचरे-कूड़े से तीर्थ पाट रहे हैं, किसी विजन को विजन नहीं रहने दे रहे हैं, दूर हिमालय की उपत्यका में ध्वनिविस्तारक यंत्र का शोर गुंजा रहे हैं, कैसा पानी रखने का यह संकल्प है? कैसी आत्मघातिनी यह प्यास है?

मैं कारण की मीमांसा में नहीं जाना चाहता, पर इतना जरूर लगता है कि एक और पानी था, वह हमने खो दिया, वह पानी अलेक्जेंडर जैसे विश्व विजेता की भेंट के प्रस्ताव की उपेक्षा कर सकता था- मुझे कुछ नहीं चाहिए, तुम मेरी रोशनी छेंके हुए हो, हट जाओ, वह पानी फतेहपुर सीकरी के निमंत्रण की उपेक्षा कर सकता था, वह पानी अभी हाल तक ऊँचे-से-ऊँचे सम्मान की उपेक्षा कर सकता था। मुझे सैकड़ों कहानियाँ याद हैं, जो बचपन में अपने बाबा से, नाना से सुनी हैं। ऐसे तेजस्वी पंडितों की कहानियाँ जो घोर दरिद्रता में रहे, पर कहीं हाथ पसारने नहीं गये। एक कहानी है उदयनाचार्य की, मिथिला के नैयायिक की, जिन्होंने किरणावली लिखी, ईश्वर सिद्धि लिखी और पुरी में जगन्नाथजी के मन्दिर पहुँचे, पर बन्द थे, तमककर बोले-

ऐश्वर्य मदमत्तोसि मामवज्ञाय तिष्ठसि।
पुनर्बौद्धे समायात मदधीना तव स्थितिः।।


ईश्वरता के मद में मतवाले हो, मेरी अवज्ञा करते हो, फिर बौद्ध दर्शन के आचार्य आएँगे और मैं तुम्हें रखूँगा, तो तुम रहोगे।

किन्तु, यह सब सपना है, खामखयाली है। हम आज बुद्धि की रोटी खाते हैं, बुद्धि की साधना थोड़े ही करते हैं, हम एक विशिष्ट वर्ग के हैं, बुद्धिजीवी वर्ग के, हम समाज के स्तम्भ हैं, हम राजनेता से विशिष्ट हैं साधारण-अपढ़ जनता से विशिष्ट हैं, घनिष्ठ वर्ग से विशिष्ट हैं, यही क्या कम है कि हम सबका समय-समय पर खयाल रखते हैं, राजनीति के गुलगुलों से… हमें परहेज नहीं है, साधारण जनता के दुख-दर्द की मीमांसा में ही तो हम रात-दिन मगज मारते रहते हैं और धनिक वर्ग का आदर-सत्कार अपना अधिकार मानकर करते हैं।

वैसे हम निर्लिप्त हैं, कमल-पत्र की की तरह, न हमें राजनीति से मतलब, न धन से, न जन से। हम कमल-पत्र के ऊपर खिले हुए कमल के फूल के ऊपर बैठे हुए हैं, हमीं तो विधाता हैं और यह सब दम्भ की बात जवाब के रूप में सुनता है कि भीतर एक धमाका होता है, एक बम फूटता है और सबकी नकाब उतरवा देता है, सब भय से संत्रस्त हो जाते हैं- ऐं, हम सुरक्षित नहीं हैं। हाँ आपकी सुरक्षा साधारण जन की सुरक्षा से कोई अलग सुरक्षा नहीं है। आप झूठे हैं, आप विधाता नहीं हैं। आप नकलची हैं और अच्छे नकलची भी नहीं, बार-बार गर्दन मोड़कर ताकते रहते हैं। आप अगली पंक्ति पढ़ते हैं, इतने में पिछली पंक्ति भूल जाते हैं।

ज्ञान पवित्र होता है, उसे कहीं से लिया जा सकता है, पर ज्ञान पवित्र होकर ही लिया जा सकता है। और यह पवित्रता बिना तप के, बिना एकाग्र साधना के, बिना ज्ञान को चरम मूल्य माने नहीं आती। आप अपने भीतर टटोलिए-आप में कितने हैं जिनके लिये ज्ञान चरम मूल्य है।

जमाने को पीछे लौटाने की बात मैं नहीं करता, पर जमाने को आगे ले जाने के लिये तो संकल्प लेना है, वह संकल्प क्या बिना पानी के, बिना समूल और अक्षत कुश के, बिना कुश की नोक की तरह निरन्तर तर्क की कसौटी पर तीक्ष्ण की गई बुद्धि के लिया जा सकता है?

इस प्रश्न के उत्तर में चेहरे निर्विकार हो जाते हैं, न कहीं उजास दिखती है, न कहीं छाया, एकदम सपाट चेहरे दिखते हैं, गीली मिट्टी- जैसे। बार-बार प्रश्न छोड़ता हूँ, आज इतना साहित्य लिखा जा रहा है और उसमें से कितना है जो आँखों में पानी भर सके, कितना है जो पूरी तरह भीतर से झकझोरकर रख दे, हर शिक्षा को झनझना दे और एक ही उत्तर मिलता है, वह ताप नहीं है जो द्रव की रचना करता है, वह तप नहीं है, जो पानी बनता है।

जो पूरे समाज की आर्थिक आवश्यकता की पूर्ति की बात करते हैं वे भी अपनी आवश्यकता काटकर नहीं। ऐसे हवा में टंगे हुए लोगों से गरीब रहीम क्या ‘पानी राखिए’ की बात करते हो, हमसे तो सही कहो, ‘हवा बाँधे रहो’, करो योगा का निर्यात, भौतिकी के चिन्तन को, उपनिषद की पंक्ति से जोड़ो, ‘पेड़ लगाओ’ को वेद के उद्धरण से जोड़ो।

पानी की बात आज बेमानी है, क्योंकि धूप एकदम सिमट गई है, हमारे क्षितिज का सरोवर पूरा का पूरा पंक हो गया है, एक ओस की बिन्दु भी कहीं झलझला नहीं रही है, क्या करोगे मोती की बात, क्या करोगे मानुष की बात, मानुष तो वही मानुष है जिसकी करुणा आँसू के मोती ठुरकाती है चुपचाप अनथम्हे, दुखाती रहती है, पूरी जमीन भीग जाती है, भीगकर दीपित हो उठती है।

कहाँ है वह करुणा की अन्तः सलिला जिसके न होने से सब सूख रहा है, सब गंदलाता जा रहा है, पूरे जीवन में तरने-तारने का भाव लुप्त हो रहा है, केवल एक प्यास बढ़ रही है, वह भी पानी की नहीं, और अधिक उत्ताप की, और अधिक ऐश्वर्य के विलास के मध्य की। यह सब सोचता हूँ, तो अपने को एक अभियुक्त के कटघरे में खड़ा पाता हूँ, मेरा प्रश्न मुझी को घूरता है और मैं चुप रहता हूँ। मैं उससे उबरने की बात करने लायक हूँ कहाँ? जीवन और जीवन की धार से कटा हुआ आदमी पानी की बात करे, इससे अधिक विडम्बना की बात और होगी क्या?

(‘रहिमन पानी राखिए’ से)

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