आंखों से आंसू निकाल रहा नीर 

Submitted by UrbanWater on Sat, 06/01/2019 - 16:14
Source
दैनिक जागरण, 01 जून 2019

पानी को लेकर हर साल हम मुसीबत झेलते हैं, लेकिन उसको सहेजने के प्रति हमारी अन्यमनस्कता जा नहीं रही है। पानी का मोल प्यास लगने पर मालूम होता है। कोई इसका विकल्प नहीं बन सकता। इसलिए इस अनमोल प्राकृतिक संसाधन की एक-एक बूंद बचाइए, तभी हमारी पीढ़ियों का गला तर हो सकेगा। 

हैंडपंप ताल तलैया सूखे, रसातल में पानी

भीषण गर्मी के बीच मध्य प्रदेश में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। हैंडपंप, कुएं, ताल-तलैया आदि सूख गए हैं। कुछ संस्थानों स्थानों पर पानी के लिए खूनी संघर्ष भी सामने आया है। पिछले कई वर्षों से बेपरवाह पानी के दोहन और सरकारी व नागरिक स्तर पर इस समस्या के प्रति बेफिक्र रवैया से पानी की किल्लत आपदा में तब्दील हो गई है

वर्ष 2017 में मानसून से पहले दिल्ली का भूजल स्तर 1.13 मीटर से लेकर 99 मीटर तक था। बोर्ड द्वारा भूजल स्तर का पता लगाने के लिए लगाए गए 94 कुओं के जलस्तर के आधार पर यह बातें कही गई हैं जबकि यहां ऐसे 127 कुएं थे। कुछ इलाकों में भूजल स्तर इतना अधिक गिर गया है कि कुंअे सूख गए हैं। वर्ष 2007 की तुलना में वर्ष 2017 में 77 फीसद कुओं के जलस्तर में गिरावट दर्ज की गई। हालांकि 23 फीसद कुओं में जलस्तर दो से चार मीटर तक बढ़ा भी है।  

ग्वालियर-चंबल संभाग में पेयजल के प्राकृतिक जल स्रोत सूखने की कगार पर है। बांधों का पानी रसातल चला गया है। ग्रामीण इलाकों में भूजल स्तर गिरने से हैंडपंपों ने साथ साथ छोड़ दिया है। कुछ दिनों पूर्व छतरपुर के हरपालपुर में पानी भरने को लेकर खूनी संघर्ष में 4 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। मुरैना जिले के पहाड़गढ़, सबलगढ़ क्षेत्र में भूजल स्तर तीन सौ फीट नीचे है। पहाड़गढ़ के देवरा गांव के लोग 6 से 7 किमी पैदल चलकर पानी लाते हैं। इस क्षेत्र के सभी गांव में 70 से 80 फीसद हैंडपंप भूजल स्तर के नीचे जाने से बंद हो चुके हैं। अवैध रेत उत्खनन से सिंध नदी के किनारे के गांवों में वाटर लेवल लगातार कम हो रहा है। यहां के गांव में 250 फीट से नीचे पानी जा चुका है। गांव और शहरों में पुराने तालाबों पर कब्जे से पेयजल स्रोत खत्म हो गए हैं।

नर्मदा अंचल में भी कंठ प्यासे 

मालवा-निमाड़ में नर्मदा नदी के आसपास बसे जिले की जलसंकट से बेहाल हैं। होशंगाबाद जिले में बीते दो माह में भू-जलस्तर 18 फीट नीचे चला गया। भोपाल मे 4300 हैंडपंप में से 1800 सूख गए हैं। शहर में बड़ा तालाब का डेड स्टोरेज लेवल 1652 से नीचे चला गया है। बैतूल जिले के कई गांवों में ग्रामीण सूखी नदियों में बनाई गई झिरियों छोटी नाली और सूखे कुओं में रात भर में इकट्ठा होने वाला मटमैला पानी भरते हैं।

पंजाब में हर साल दो फीट से लेकर एक मीटर तक भूजल स्तर गिर रहा है। हालात यह हो गए है कि प्रदेश में कुल 141 ब्लॉक में से 107 अब डार्क जोन में पहुंच गए हैं। जिनमें से एक दर्जन के लगभग क्रिटिकल डार्क जोन में हैं। शेष जिन ब्लॉकों में भूजल स्तर ऊपर है वह पानी और सिंचाई योग्य नहीं है क्योंकि इसमें रासायनिक तत्वों की मात्रा तय मानकों से कई गुना ज्यादा है। मालवा के बठिंडा, मुक्तसर, मानसा, फरीदकोट आदि ऐसे जिले हैं। जहां पानी पीने योग्य नहीं है। 

डेरा बस्सी ब्लॉक के कई गांव में भूजल 12 सौ फीट तक नीचे चला गया है। राज्य सरकार को इस क्षेत्र के कई प्रोजेक्ट इसीलिए रद्द करने पड़े क्योंकि केंद्रीय जल बोर्ड ने अनुमति नहीं दी। दर्जन से ज्यादा ब्लॉकों में केंद्रीय जल बोर्ड से पूछे बगैर हैंडपंप तक नहीं लगाया जा सकता है। भूजल विभाग पंजाब के डायरेयक्टर अरुणजीत सिंह मिगलानी बताते हैं, प्रदेश में 149 फीसदी पानी का जमीन से दोहन किया जा रहा है। इससे आप भूजल के हालात के बारे में अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं। अगर हम आज नहीं चेते तो 25 साल बाद पंजाब को रेगिस्तान बनने से कोई नहीं रोक सकता। पंजाब सरकार ने इस ओर कदम उठाया है और अलग भूजल विभाग बना दिया है। पानी के संकट से उबरने के लिए शीघ्र ही रिपोर्ट सौंपी जाएगी।

जलस्तर गिरने से राजधानी में जहरीला हुआ जल

एक दशक में दिल्ली के कई इलाकों में चार मीटर से अधिक भोजन स्तर गिरा है। फिर भी भूजल रिचार्ज की तुलना में अत्यधिक दोहन जारी है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार भूजल स्तर गिरने से पानी की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। स्थिति यह है कि भूजल में सिर्फ भारी धातु ही नहीं, खतरनाक रसायनों के अलावा पेस्टिसाइड व सीवरेज की मौजूदगी भी पाई गई है, इसलिए भूजल जहरीला हो चुका है। 

बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 में मानसून से पहले दिल्ली का भूजल स्तर 1.13 मीटर से लेकर 99 मीटर तक था। बोर्ड द्वारा भूजल स्तर का पता लगाने के लिए लगाए गए 94 कुओं के जलस्तर के आधार पर यह बातें कही गई हैं जबकि यहां ऐसे 127 कुएं थे। कुछ इलाकों में भूजल स्तर इतना अधिक गिर गया है कि कुंअे सूख गए हैं। वर्ष 2007 की तुलना में वर्ष 2017 में 77 फीसद कुओं के जलस्तर में गिरावट दर्ज की गई। हालांकि 23 फीसद कुओं में जलस्तर दो से चार मीटर तक बढ़ा भी है।

भूगर्भ में उपलब्ध पानी का 76.23 फीसद हिस्सा खारा हो चुका है। सिर्फ 23.77 फीसद पानी ही साफ है। वार्षिक भूजल रिचार्ज दोहन से 4,872 हेक्टेयर मीटर कम है। यहां के भूजल में बाइकार्बोनेट, क्लोराइड, सल्फेट, नाइट्रेट, क्लोराइड, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम व पौटेशियम जैसे रसायन पाए गए हैं। भूजल में अमोनिया होने के कारण 100 से ज्यादा ट्यूबल फेल हो गए हैं। सात रेनीवेल भी बंद पड़े है। मौजूदा समय में 629 तालाब हैं, जिनमें से करीब 100 तालाबों में गंदा पानी भरा होता है।

जरूरत का आधा ही पानी उपलब्ध

गर्मियों में प्रतिदिन लगभग 2,111 मिलियन लीटर पानी की मांग होती है। लेकिन आपूर्ति इसकी आधी मात्रा कि ही हो पा रही है। इसमें लगभग आधी आपूर्ति नहरों द्वारा और आधी नलकूपों से होती है। दिक्कत यह है कि 58 फीसद भूमिगत जल भी पीने योग्य नहीं है। ऐसे में नहरी पानी पर निर्भरता अधिक है। भाखड़ा बांध और यमुना में जलस्तर कम होने से नहर के पानी की आपूर्ति भी आवश्यकता के अनुरूप नहीं हो पाती है। 

आठ जिलों में भूमिगत जल का स्तर काफी नीचे होने और उसमें नमक की मात्रा अधिक होने से पीने के योग्य नहीं होता। अंबाला, गुरुग्राम, कैथल, करनाल, कुरुक्षेत्र, महेंद्रगढ़, रेवाड़ी, यमुनानगर जिलों को डार्क जोन घोषित किया जा चुका है। सबसे खराब स्तिथि धान उत्पादक जिलों में है। यहां भूमिगत जल की निकासी 85 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। प्रदेश सरकार किसानों से अनुरोध कर रही है कि वे धान की खेती न करें। इसके लिए उन्हें अनुदान की घोषणा भी की गई है। प्रदेश में ठेके पर खेतों को लेकर धान की खेती को सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया है।

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