जल प्रदूषण, जानकारी ही बचाव है

Submitted by editorial on Fri, 09/07/2018 - 18:55
जल प्रदूषणजल प्रदूषण (फोटो साभार - विकिपीडिया)जल सभी जीवित प्राणियों के जीवन का आधार है। आधुनिक मानव सभ्यता के विकास के साथ, जल प्रदूषण की गम्भीर समस्या उत्पन्न हो गई है। औद्योगीकरण एवं शहरीकरण की प्रवृत्ति बढ़ रही है। गाँवों के आसपास तेजी से विभिन्न उद्योगों की स्थापना के साथ ही वे कस्बों एवं शहरों में तब्दील होते जा रहे हैं जिससे जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन एवं प्रदूषण हो रहा है। जब विभिन्न प्रौद्योगिकियों का विकास नहीं हुआ था तो लोग प्रकृति की गोद में रहते हुए जीवन का आनन्द लेते थे, लेकिन तेजी से हुए विकास एवं औद्योगीकरण के साथ ही जल प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुँच गया है।

शहरों में लगातार बढ़ रही जनसंख्या के कारण बड़ी संख्या में फ्लैटों के निर्माण हो रहा है, ताकि ज्यादा-से-ज्यादा जनसंख्या को आवास उपलब्ध कराया जा सके। फ्लैटों में पानी की आवश्यकता बहुत अधिक होती है और इस वजह से भूजल स्रोतों पर दबाव बढ़ रहा है। डीप बोरिंग किये जा रहे हैं जिससे भूजल दोहन बड़े पैमाने पर हो रहा है। भूजल के दोहन से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है और भूमि की सतह पर नमक की परत जम जाती है। इस प्रक्रिया को निक्षालन (leaching) कहते हैं।

औद्योगिक और शहरी कचरे का निपटारा

औद्योगिक इकाइयों की संख्या बढ़ने और बड़ी मात्रा में उनसे निकलने वाला दूषित जल और रासायनिक कचरा नदियों के साथ ही भूजल को भी प्रदूषित कर रहा है। घरों से निकलने वाले अपशिष्ट से भी नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं। यदि जल प्रदूषण को नियंत्रित करना है तो हमें इस समस्या से निपटने के लिये कमर कसनी होगी। नदियों में गन्दे जल को बिना साफ किये नहीं डालना होगा। हर औद्योगिक इकाई को प्रदूषित जल साफ करने के लिये वाटर ट्रीटमेंट प्लांट की व्यवस्था को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। बड़े अथवा छोटे सभी शहरों में वाटर ट्रीटमेंट और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट अनिवार्य रूप से लगाया जाना चाहिए। जल प्रदूषण रोकने के लिये नालियों को नियमित रूप से साफ किया जाना आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों में पक्की नालियों का निर्माण आवश्यक है क्योंकि ग्रामीण पानी मनमाने ढंग से इधर-उधर बहाते हैं।

नियम हों सख्ती से लागू

वैधानिक व्यवस्थाएँ, जैसे जल अधिनियम 1974 या प्रदूषण का निवारण और नियंत्रण एवं पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986 जैसे कानून तो हैं लेकिन उन्हें प्रभावपूर्ण ढंग से कार्यान्वित नहीं किया जा रहा है इसलिये हमें जल प्रदूषण के प्रभावी रोकथाम के लिये इन कानूनों को कड़ाई से लागू कराना होगा। जल उपकर अधिनियम 1977 (Water Cess Act 1977) एक अन्य महत्त्वपूर्ण कानून है जिसका उद्देश्य प्रदूषण कम करना एवं उसका प्रभावी रोकथाम करना है। हालांकि इस कानून का प्रभाव भी सीमित ही रहा है।

जल पुनर्चक्रण

जल प्रदूषण को रोकने के कुछ अन्य तरीकों में जल का पुनर्चक्रण एवं पुनः उपयोग भी सम्मिलित है। इससे स्वच्छ एवं मीठे जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद मिलती है। कम गुणवत्ता वाले जल जैसे कि गन्दे पानी को शोधित करने के पश्चात प्राप्त जल को हम विभिन्न उपयोग में ला सकते हैं। शोधित जल को हम वाहनों की धुलाई, औद्योगिक कार्यों आदि में इस्तेमाल कर सकते हैं। हमें स्वच्छ एवं मीठे जल का इस्तेमाल सिर्फ पीने के लिये करना चाहिए। वर्तमान में जल का पुनर्चक्रण सीमित मात्रा में किया जा रहा है इसीलिये हमें जल प्रदूषण को रोकने के लिये जल के पुनर्चक्रण की तकनीक को गम्भीरता से अपनाने की जरूरत है।

मिट्टी के कटाव की रोकथाम

जल को प्रदूषित होने से बचाने के लिये मिट्टी का कटाव को रोकना भी आवश्यक है। अगर हम मृदा संरक्षण करें तो कुछ हद तक जल प्रदूषण को रोक सकते हैं। हमें मिट्टी के कटाव को रोकने के लिये और अधिक पेड़ पौधे लगाने होंगे। हमें इस तरह के तरीके अपनाने होंगे जिनसे मिट्टी का कटाव रुके एवं पर्यावरण के स्वास्थ्य में सुधार लाया जा सके।

स्वच्छ भारत अभियान हो सकता है एक जरिया

स्वच्छ भारत अभियान को पूरी समग्रता से लागू करने के लिये भारत को पूरी तरह से खुले में शौच से मुक्त बनाना आवश्यक है। वर्तमान में, सार्वजनिक स्थानों में कचरे को जहाँ-तहाँ फेंकना एवं खुले में शौच की समस्या बदस्तूर जारी है। जब बारिश होती है तो ये सभी अपशिष्ट एवं मलमूत्र नदियों या तालाबों में जा मिलते हैं और इस प्रकार जलस्रोतों को प्रदूषित कर देते हैं। लोग खुद भी उचित जल निकासी की व्यवस्था के अभाव में नदियों एवं तालाबों में अपशिष्ट पदार्थों को प्रवाहित कर देते हैं। तालाबों और नदियों का इस्तेमाल स्नान एवं कपड़े धोने के उद्देश्य से भी बड़े पैमाने पर होता है जिनकी वजह से गन्दगी और प्रदूषण बढ़ता है। धार्मिक अनुष्ठानों के लिये भी नदी के घाटों के इस्तेमाल से होने वाले जल प्रदूषण के प्रति भी लोगों को जागरूक बनाए जाने की जरुरत है।

जलस्रोतों एवं समुद्र तटों की सफाई

नदियों एवं तालाबों की नियमित अन्तराल से सफाई आवश्यक है क्योंकि मनुष्यों ने इन्हें बुरी तरह से गन्दा कर दिया है। यहाँ तक कि भूजल को भी प्रदूषित कर दिया गया है और समुद्र के पानी में भी इंसान प्रदूषण फैला रहे हैं। समुद्री मार्गों से यात्राएँ एवं समुद्र तट के पास रहने के लिये होड़ मची हुई है और इसी वजह से समुद्र तटों के पास कई छोटी एवं बड़ी बस्तियाँ बस चुकी हैं और ये बस्तियाँ समुद्र के पानी को प्रदूषित करने में अपना योगदान दे रही हैं जो गम्भीर चिन्ता का विषय है। अपनी आजीविका के लिये भी कई लोग समुद्र तटों पर खासकर खाने-पीने की चीजों का व्यापार करते हैं जिससे प्रदूषण फैलता है। जहाजों से निकला तेल भी प्रदूषण की एक प्रमुख वजह है। इसका जीव-जन्तुओं पर बहुत बुरा असर पड़ता है। ई-कचरा की डम्पिंग भी समुद्र में की जाती है जो खतरनाक है।

जैविक खेती को अपनाने की है आवश्यकता

उत्पादकता बढ़ाने के लिये खेतों में अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग एवं फसलों पर कीटनाशकों के छिड़काव को रोकना होगा। ये सभी रासायनिक पदार्थ बारिश के पानी के माध्यम से तालाबों और नदियों में चले जाते हैं एवं जल निकायों को बुरी तरह प्रदूषित कर देते हैं। अतः किसानों को जैविक खेती के तरीकों को अपनाने की आवश्यकता है।

जल प्रदूषण नियंत्रण के अन्य तरीकों पर एक नजर

1. कचरे से उपयोगी वस्तुएँ बनाने की तकनीक को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। रुड़की स्थित सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट ने थर्मल विद्युत संयंत्रों से निकलने वाले राख से ईंट बनाने की तकनीक विकसित किया है।

2. घरों में पानी को रोगाणु मुक्त करने के लिये क्लोरीन की गोलियों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

3. कार्बनिक पदार्थों के निपटान से पहले उनका ऑक्सीकरण किया जाना चाहिए।

4. प्राकृतिक जल प्रणाली के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए।

5. समुद्र में परमाणु परीक्षण पर प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए।

6. जल प्रदूषण के उत्पन्न खतरों के बारे में समाज को जागरूक बनाया जाना चाहिए।

7. प्रदूषित पानी को उर्वरक बनाने के लिये इस्तेमाल किया जाना चाहिए क्योंकि उनमें फास्फोरस, पोटेशियम और नाइट्रोजन अधिक मात्रा में होती है।

8. हमें पानी में जलकुम्भी लगाना चाहिए जो प्रदूषित जल के उपचार में कारगर साबित हो सकते हैं। इनमें प्रदूषित जल से भारी धातुओं को अवशोषित करने की क्षमता होती है।


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प्रेम पेशे से स्वतंत्र पत्रकार और जुझारु व्यक्ति हैं, विभिन्न संस्थानों और संगठनों के साथ काम करते हुए बहुत से जमीनी अनुभवों से रूबरू हुए। उन्होंने बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की।

 

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