मुनाफे का बाजार

Submitted by editorial on Sat, 06/09/2018 - 15:37
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कादम्बिनी, मई, 2018

प्रकृति ने जो पानी हमें मुफ्त दिया था, बाजार ने उसे बिक्री की चीज बना दिया। यह समस्या पानी के निजीकरण से शुरू हुई और अब दुनिया का सबसे बड़ा मुनाफे का व्यापार बन गई है। बाजारीकरण ने पानी का संकट तो बढ़ाया ही, बोतलबन्द पानी के चलते प्लास्टिक कचरे का भी बड़ा खतरा पैदा कर दिया।

बोतलबन्द पानी का कारोबार आजकल सबसे ज्यादा मुनाफे के कारोबार का रूप लेता जा रहा है। यह कारोबार हर साल सौ फीसदी की रफ्तार से बेतहाशा बढ़ता ही जा रहा है। देखा जाए तो भले ही देश की बाकी अर्थव्यवस्था में मन्दी का माहौल हो, देश में गरीबी हो, भुखमरी हो, लोग जानलेवा बीमारियों की चपेट में हों, दवाओं के अभाव में बेमौत मर रहे हों, लेकिन देश में आज बोतलबन्द पानी का कारोबार सबसे अधिक फलता-फूलता कारोबार है।

मुफ्त में मिलने वाले पानी को बोतलों में बन्द करके दस-पन्द्रह रुपये में बेचने-जैसा मुनाफे वाला धन्धा आज देश में और कोई नहीं है। इस कारोबार में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने तो बाजी मार ही ली है, क्योंकि उन्हें तो इस काम में महारत हासिल है, देश की कम्पनियाँ और लघु उद्यमी भी इस कारोबार में पीछे नहीं हैं। असलियत में देखा जाए, तो यह उनके बुद्धि कौशल का परिचायक है।

बोतलबन्द पानी के इस कारोबार में कोका कोला शीर्ष पर है, जबकि उसके बाद पारले और फिर पेप्सी कम्पनी का नम्बर आता है। कोका कोला और पेप्सी ये दोनों ही कम्पनियाँ अमेरिकी प्रभुत्व वाली शीतलपेय बेचने वाली कम्पनियाँ हैं। शीतलपेय बेचते-बेचते इन्हें बोतलबन्द पानी बेचने का धन्धा इतना मुफीद लगा कि ये इस कारोबार में कूद पड़ी और अंततोगत्वा इस कारोबार की श्रेष्ठ कम्पनियों में इन्होंने अपना नाम दर्ज करा लिया।

कोका कोला ने इस कारोबार में उसकी देखा-देखी उतरी अन्य कम्पनियाँ जिनमें देश की प्रतिष्ठित कम्पनियाँ शामिल हैं, उनको भी बहुत पीछे छोड़ दिया। इसके लिये उसने कोई भी हथकंडा अपनाने में परहेज नहीं किया जो स्वाभाविकतः अपने उत्कर्ष और बाजार पर कब्जा जमाने के लिये कम्पनियाँ अपनाती हैं।

उदाहरण के तौर पर छोटी-छोटी कम्पनियों का अधिग्रहण, लगातार जारी रहने वाले बेतहाशा विज्ञापन, आक्रामक और अनैतिक बिक्री संवर्द्धन आदि तौर-तरीकों का इस्तेमाल। ऐसी हालत में देशी और छोटी कम्पनियाँ कहाँ टिक पातीं? वह बात दीगर है कि बोतलबन्द पानी के कारोबार के आगे, पैकेटबन्द जूस, फ्रूटी आदि का भी कारोबार लाभ के लिहाज से कम नहीं है, लेकिन पानी के कारोबार से वे आज भी बहुत पीछे हैं। इस कारोबार में आज भी कोका कोला की किनले, पारले की बिसलेरी और पेप्सी की एक्वाफिना का साम्राज्य कायम है, इसमें दो राय नहीं है।

अब सवाल यह है कि पानी के कारोबार में इतना उछाल कैसे और क्यों आया? और तो और इतने कम समय में इसका विस्तार इतने बड़े पैमाने पर कैसे हो गया? असलियत में यह सब विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष की सोची-समझी साजिश का योजनाबद्ध तरीके से क्रियान्वयन का नतीजा लगता है। जहाँ तक पानी के निजीकरण की मुहिम का सवाल है, मेरी दृष्टि में इसकी शुरुआत तो अंग्रेजों ने ही कर दी थी।

बड़े-बड़े बाँध, नहरों के जरिये पानी को बाँधने की पूरी कोशिश उसके स्वच्छन्द बहाव को घेरने की ही कवायद थी। विडम्बना यह है कि इस प्रक्रिया को आजाद हिन्दुस्तान की अपनी सरकारों ने भी बरकरार रखा। हमारे यहाँ इस धन्धे को बढ़ाने में भारतीय रेल की अहम भूमिका है। उसने तो 2002 से ही इस संस्कृति को सरकारी स्तर पर बढ़ावा देने का काम किया। बोतलबन्द पानी की संस्कृति ने प्लास्टिक कचरे की समस्या को और बढ़ाया ही है, इसे नकारा नहीं जा सकता। पर्यावरण की दृष्टि से अगर देखें, तो यह साफ है कि इसके दुष्परिणामस्वरूप हमारे जलसंग्रह पूरी तरह समाप्ति की ओर बढ़ते चले गये।

पानी जो 15-20 फीट गहराई पर मिल जाता था, वह दिन-ब-दिन गहरा होता चला गया और सैकड़ों फीट नीचे जा पहुँचा, यानी भूजल स्तर लगातार नीचे गिरता चला गया। सरकारी निजीकरण की नीति ने गरीबों और उनकी जमीनों का भरपूर शोषण किया। अगर डब्ल्यूटीओ की मानें तो उसके अनुसार पानी लोगों को मुफ्त में मिलता है, इससे लोग पानी की कीमत नहीं आंक पाते, अतः बाजार में इसकी कीमत तय की जानी चाहिए। डब्ल्यूटीओ का यह तर्क बिल्कुल गरीब विरोधी और थोथा है। इससे एक ओर गरीब पानी नहीं खरीद पाएगा, दूसरे असमानता में बढ़ोत्तरी होगी, तीसरे पानी की आपूर्ति कम होगी और माँग बेतहाशा बढ़ेगी। नतीजतन जिनके पास पैसा होगा, वे बहुतायत में पानी खरीदेंगे और बाकी जनता पानी के लिये तरसेगी।

दरअसल बोतलबन्द पानी का कारोबार दुनिया में काफी लम्बे अर्से से जारी है। हमारा देश इस मामले में दसवाँ सबसे बड़ा देश है जो बोतलबन्द पानी का इस्तेमाल करता है। हमारे यहाँ सबसे बड़ी कमी यह है कि यहाँ पानी का सार्वजनिक रूप से वितरण कर पाने में सरकारें, कहें या स्थानीय निकाय असमर्थ रहे हैं। यही वह अहम वजह है जिसके चलते बोतलबन्द पानी का इस्तेमाल बढ़ा है।

लोग पानी खरीदने को मजबूर हैं, क्योंकि जरूरत का पानी उन्हें सरकार दे नहीं पा रही है। मजबूरन वे महँगा पानी खरीद रहे हैं। कारण, उनके पास इसके सिवाय दूसरा विकल्प ही नहीं है। हमारे यहाँ कम्पनियाँ पानी भूमिगत जल के स्रोतों से लेती हैं और फिर उसको बोतलों में भरकर शहरों-कस्बों में बिकने भेज देती हैं। यह पूरा धन्धा बिना निवेश मोटा मुनाफा कमाने वाला है।

सच यह भी है कि एक लीटर पानी की बोतल जो बाजार में 15 रुपये की मिलती है, उसकी कुल मिलाकर कीमत, पानी की साफ-सफाई, अगर की भी जाती है, पानी छानने की प्रक्रिया की कीमत, प्लास्टिक की बोतल की कीमत, प्लांट से बिक्री स्थल तक पहुँचाने का खर्च व विज्ञापन आदि का खर्च मिलाकर कुल एक रुपया सत्तर पैसे से कम पड़ती है। जाहिर है इतना मुनाफा और किसी कारोबार में नहीं है, फिर इस बोतलबन्द पानी की गुणवत्ता की भी कोई गारंटी नहीं है जिसे साफ, शुद्ध और खनिज लवणों से युक्त मिनरल वाटर की संज्ञा दी जा रही है। क्या इसके बारे में कभी सोचा है?

अक्सर कम्पनियाँ बोरवेल के माध्यम से पानी खींच रही हैं। इसमें दो राय नहीं कि बोतल में मिलने वाला पानी टोंटी से मिलने वाले पानी से लेशमात्र भी किसी भी मायने में अलग नहीं है। फर्क बस इतना है कि वह आपको पाइपलाइन के बजाय बोतल में दिया जा रहा है। बोतलबन्द पानी की ब्रांडेड बोतलों के परीक्षण के बाद अब यह साफ हो चुका है कि यह पानी भी साफ नहीं है। अब तो छोटे-छोटे कस्बों-शहरों में घरों में लगे पानी के प्लांट सरकारी मशीनरी की मिलीभगत के चलते बोतलबन्द पानी की आपूर्ति धड़ल्ले से कर रहे हैं। उनकी गुणवत्ता की भी कोई गारंटी नहीं है। यह सार्वजनिक पेयजल व्यवस्था के असफल होने का जीता-जागता सबूत है। असल में यह भूमिगत जल का निजीकरण ही तो है।

इसमें दो राय नहीं कि जहाँ-जहाँ पानी का निजीकरण हुआ, वहाँ पानी की कीमतें अचानक सैकड़ों गुना बढ़ गईं। पानी का संकट गहराया और वहाँ पानी के लिये हाहाकार मच गया। पानी की मनमानी कीमत देनी पड़ी, सो अलग। अमेरिका का टैक्सास हो, बोलीबिया, चेकोस्लोवाकिया, फिलीपींस, जर्मनी हो, इंग्लैड, फ्रांस, ताइवान, अर्जेंटीना हो, ब्राजील, मैक्सिको, ऑस्ट्रेलिया या फिर कनाडा ही क्यों न हो, जहाँ-जहाँ पानी का निजीकरण किया गया, वहाँ पानी की कीमतों में सैकड़ों गुणा वृद्धि हुई।

ऑस्ट्रेलिया में तो अब सरकार समूची जल-व्यवस्था को अपने पास रखने पर विचार कर रही है। हालात इतने खराब हो गये कि लोग बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खिलाफ सड़कों पर उतरे, इंग्लैड में पानी की गुणवत्ता को लेकर प्रश्नचिन्ह लगे और डॉक्टरों ने वहाँ के पानी को स्वास्थ्य के लिये घातक तक करार दिया।

फिलीपींस व ताइवान में वहाँ के औद्योगिक समूहों तक ने निजीकरण का भारी विरोध किया। बोलीविया में इमर्जेंसी लगानी पड़ी। चेकोस्लोवाकिया में थक-हारकर पानी की व्यवस्था इंग्लैंड की एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी को देनी पड़ी। दरअसल पानी के निजीकरण का जबर्दस्त दुष्प्रभाव पड़ने वाला है। सरकार कहेगी कि उसके पास बजट नहीं है, अतः जल-व्यवस्था बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ देखेंगी। उस हालत में वह मनमानी कीमत पर पानी बेचेंगी, जिसका सबसे ज्यादा असर गरीबों और किसानों पर पड़ेगा। हमारे यहाँ 70 फीसदी पानी कृषि एवं खाद्य-व्यवस्था का ध्वस्त होना अवश्यम्भावी है।

इसमें दो राय नहीं कि पानी एक प्राकृतिक सम्पदा है। ऐसे समय में जबकि समूचा विश्व जल-संकट का सामना कर रहा है। वैज्ञानिक, उनके शोध-अध्ययन इसके ज्वलन्त प्रमाण हैं कि 2020 तक जल-संकट देश में गहरा जाएगा, इसलिये उसका संयमित तरीके से उपयोग बेहद जरूरी है। इस तरह हम उसे लम्बे समय तक संचित रख सकते हैं, लेकिन यदि उसका बाजार बन जाये और वह देशी-विदेशी कम्पनियों के मुनाफे की चीज बन जाए, तो निश्चित ही समस्या विकराल हो जाएगी। मौजूदा स्थिति में सरकार से समाधान की उम्मीद बेमानी है। अतः हमें ही कुछ करना होगा, तभी कुछ बात बनेगी।

(लेखक राष्ट्रीय पर्यावरण सुरक्षा समिति के अध्यक्ष हैं)

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एक परिचय:


. 21 जनवरी 1952 को एटा, उ.प्र. में शिक्षक माता-पिता के यहाँ जन्म।

राजकीय इंटर कॉलेज, एटा से 12वीं परीक्षा उत्तीर्ण, सागर विश्वविद्यालय से स्नातक, छात्र जीवन में अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन, समाजवादी युवजन सभा और छात्र संघ से जुड़ाव रहा। राजनैतिक गतिविधियों में संलिप्तता के कारण विधि स्नातक और परास्नातक की शिक्षा अपूर्ण।

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