क्या उज्ज्वला योजना बदलेगी घरेलू प्रदूषण की तस्वीर

Submitted by editorial on Mon, 01/21/2019 - 14:57
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वायु प्रदूषणवायु प्रदूषणघरेलू वायु प्रदूषण के खतरे बढ़ते जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ पर्यावरण कार्यक्रम (United Nations Environment Programme,UNEP) द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार घरेलू वायु प्रदूषण का बाहरी वायु प्रदूषण में 22 से 52 प्रतिशत तक का योगदान हो सकता है। इससे साफ है कि भारत, जहाँ घरेलू वायु प्रदूषण एक बड़ी समस्या है, से निपटने के प्रभावी उपाय ढूँढने होंगे।

देश में सफलता की इबारत लिख चुकी प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में राष्ट्रीय प्रजातान्त्रिक गठबंधन की सरकार द्वारा उठाया गया एक ऐसा ही कदम है। इस योजना का उद्देश्य घरेलू वायु प्रदूषण को कम करना है।

लान्सेट (Lancet), इंडियन कॉउन्सिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (Indian Council of Medical Research) व अन्य के सहयोग से ‘द इंडियन स्टेट लेवल डिजीज बर्डेन इनीशिएटिव (The Indian State Level Disease Burden Initiative) नामक एक रिपोर्ट जारी की गई। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में घरेलू वायु प्रदूषण के स्तर में थोड़ी कमी आई है।

यह सुखद है लेकिन, इसी रिपोर्ट के अनुसार भारत में वर्ष 2017 में वायु प्रदूषण से मरने वालों की तादाद 12,24000 रही जो देश में उसी वर्ष हुई कुल मौतों का 12.5 प्रतिशत था। इनमें से 6,70000 लोगों की मौत बाहरी वायु प्रदूषण जबकि 4,80000 मौतें घरेलू वायु प्रदूषण से हुईं।

लान्सेट और अन्य द्वारा जारी यह रिपोर्ट बताती है कि यदि देश में वायु प्रदूषण कम हो जाये तो लोगों की जीवन प्रत्याशा (Life Expectency) में 1.7 वर्ष की वृद्धि हो सकती है। परन्तु, स्थिति इतनी भयावह है कि लगभग 77 प्रतिशत लोग भारत में तयशुदा मानक 40 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर पीएम 2,5 से ज्यादा सघनता वाली हवा में साँस लेने को मजबूर हैं। राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में दिल्ली की हवा में पीएम 2.5 कणों की सघनता सबसे ज्यादा है। वहीं, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा के साथ ही राजस्थान, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल में भी इन कणों की सघनता तयशुदा मानक से काफी अधिक है।

यूएनईपी की रिपोर्ट से भी जाहिर है कि घरेलू वायु प्रदूषण एक बड़ी समस्या बन गया है जिसकी मुख्य वजह घरेलू ईंधन के तौर पर लकड़ी, कोयला, खेती और पशुओं के मल से पैदा हुए अवशेषों का इस्तेमाल किया जाना है। भारत में अभी भी लगभग 56 प्रतिशत घरों में जलावन के लिए परम्परागत साधनों का ही इस्तेमाल होता है। वहीं, झारखण्ड, बिहार और ओड़िशा के मामले में यह आंकड़ा 75 प्रतिशत तक पहुँच जाता है।

ठोस ईंधन यानि लकड़ी, कोयला सहित जलावन के अन्य साधनों का इस्तेमाल करने से घरों में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय मानक की तुलना में 10 से 100 गुना ज्यादा पीएम 2.5 कण पैदा होते हैं। मुलायम लकड़ी और खेती से पैदा हुए अवशेषों को जलाने पर घरों में प्रदूषण का स्तर और भी बढ़ता है। इसके अलावा लकड़ी के समुचित रूप से नहीं जलने के कारण कार्बन मोनोऑक्साइड, बेन्जीन, हाइड्रोकार्बन सहित अन्य हानिकारक गैस भी मुक्त होते हैं। इन सभी का प्रभाव घर के बच्चों और महिलाओं पर पड़ता है। बच्चे निमोनिया के साथ ही बौनेपन का शिकार हो जाते हैं जबकि महिलाओं में ब्रोंकाइटिस, टीबी, मोतियाबिन्द, कम वजन वाले बच्चों का जन्म जैसी शिकायतें आमतौर पर दिखाई देती हैं।

ग्रामीण और शहरी भारत में महिलाओं को केन्द्र में रखकर 1 मई 2016 को शुरू की गई प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत मार्च 2019 तक 5 करोड़ एलपीजी कनेक्शन बांटा जाना निर्धारित किया गया था। परन्तु, योजना की लोकप्रियता के कारण इस लक्ष्य को समय से आठ महीने पूर्व ही यानि अगस्त 2018 में ही पूरा कर लिया गया। अब सरकार ने इस योजना के अन्तर्गत हर गरीब परिवार को लाने का फैसला किया है जिसकी घोषणा केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 17 दिसम्बर, 2018 को की।

इस योजना के तहत एलपीजी कनेक्शन पाने की पात्रता रखने वाले लोगों को सरकार 1600 रूपए की वित्तीय सहायता देकर सिलिंडर मुहैया कराती है। वहीं, लाभुकों को सिलिंडर की रीफिलिंग और स्टोव की खरीद पर आने वाले खर्च को किस्तों में भुगतान करने की सुविधा भी दी जाती है। इन किस्तों की भरपाई लाभुकों को सिलिंडर की रीफिलिंग पर मिली सब्सिडी की रकम से की जाती है।

केन्द्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (Petroleum Planning and Analysis Cell) द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत के पूर्व देश में एलपीजी इस्तेमाल करने वाले घरों का प्रतिशत 62 था जो लगभग 6 करोड़ नए कनेक्शन के साथ इसी वर्ष अक्टूबर में बढ़कर 88. 5 प्रतिशत हो गया है। अब सरकार द्वारा इसकी पहुँच सभी गरीब परिवारों तक बनाने के उद्देश्य के साथ देश के सभी घरों को एलपीजी सुविधा प्रदान करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के अनुसार ही देश में एलपीजी कनेक्शन जारी किये जाने के ग्रोथ रेट में वर्ष 2017 की तुलना में इस वर्ष 2018 में गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2016 में इसका ग्रोथ रेट 11.9 प्रतिशत था जो 2017 में बढ़कर 19.6 प्रतिशत हो गया था। लेकिन वर्ष 2018 के अप्रैल तक 7.1 प्रतिशत की गिरावट के साथ यह 12.8 प्रतिशत ही रह गया था।

प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (Press Information Bureau) की साइट पर उपलब्ध फाइनेंसियल एक्सप्रेस में छपी एक लेख के मुताबिक प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का लाभ पाने वाले लाभुकों में केवल 30 प्रतिशत लोगों ने ही चौथी और पाँचवीं बार सिलिंडर की रीफिलिंग करवाया। हालांकि, इस योजना का सबसे अधिक लाभ पाने वाले राज्यों में से शामिल, बिहार में ऐसे लाभुकों का प्रतिशत 39 वहीं, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में यह क्रमशः 36 और 28 रहा।

केन्द्र सरकार की यह नीति देश में घरेलू प्रदूषण को कम करने का एक महत्त्वपूर्ण हथियार साबित हो सकती है लेकिन इसकी कुछ सीमाएँ हैं जिन्हें अभी पाटने की जरुरत है। इनमें पहला एलपीजी की रीफिलिंग पर आने वाली लागत और दूसरा बिना लागत के पर्याप्त मात्रा में ईंधन के अन्य स्रोत जैसे लकड़ी, खेती और जानवरों के मल से पैदा हुए साधन आदि का उपलब्ध होना।

एलपीजी की लागत में लगातार हो रही वृद्धि के कारण लाभुकों को रीफिलिंग पर आने वाली खर्च का एकमुश्त भुगतान करने में कठिनाई होती है जिससे वे इस सुविधा का समुचित इस्तेमाल नहीं कर पाते। वहीं, बिना किसी लागत के ईंधन की उपलब्धता भी एलपीजी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने में एक बड़ा रोड़ा है। हालांकि, इसके कई नुकसान हैं लेकिन अशिक्षा के कारण लोग परम्परागत ईंधन के इस्तेमाल से पैदा होने वाले स्वास्थ्यगत समस्याओं से अनजान हैं। इन खतरों के बारे में लोगों को शिक्षित करने से घरेलू वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है। सरकार द्वारा इस ओर भी पहल किये जाने की जरुरत है।

 

 

 

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