यदि नदियाँ बचायेंगे तभी हम बचेंगे

Submitted by Hindi on Thu, 08/31/2017 - 10:05
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गौरतलब है कि देश में राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में आज से तकरीबन तीस साल पहले गंगा के शुद्धिकरण की शुरूआत हुई थी। तकरीबन दस-बारह साल पहले यमुना को टेम्स बनाने का वायदा किया गया था। मोदी सरकार आने के बाद 2014 में नमामि गंगे मिशन की शुरूआत हुई। उसके बाद उमा भारतीजी ने तवी नदी के उद्धार का बीड़ा उठाने का वायदा किया। लेकिन दुख है कि अभी तक कोई नतीजा सामने नही आया और गंगा-यमुना-तवी की स्थिति में भी कोई बदलाव नहीं आया।

बीते दिनों मुम्बई में जाने-माने अभिनेता ऋषि कपूर ने देश की नदियों को बचाने के लिये शुरू किये गए अभियान का शुभारम्भ करते हुए देशवासियों और अपने समर्थकों से आह्वान किया कि जिन नदियों ने लाखों सालों से हमें गले लगा रखा है, जो जीवनदायिनी कही जाती हैं, उन्हें मरने ना दें। दुख है कि आज हमारी जीवन-रेखा सदानीरा नदियाँ मर रही हैं। वे अब सदानीरा नहीं रह गई हैं। उनको हमीं ने इस हाल में पहुँचाया है। इसलिये हमारा दायित्व है कि हम उन्हें बचायें। मैं नदियों को बचाने हेतु शुरू किये गए अभियान का समर्थन करता हूँ। उन्होंने कहा कि असलियत यह है कि यदि ये नहीं रहीं, तो यह भी निश्चित है कि हम भी नहीं बचेंगे। दरअसल आजकल देश में नदियों की शुद्धि का सवाल सर्वत्र चर्चा का मुद्दा बना हुआ है। कहीं इस बाबत सभा-सम्मेलन हो रहे हैं, कहीं विचार गोष्ठियाँ हो रही हैं, कहीं यात्राएँ निकाली जा रही हैं और कहीं साधु-संत नदी रक्षा हेतु सिंहनाद करते दिखाई दे रहे हैं।

देश में नदियों की रक्षा हेतु आंदोलन नई बात नहीं है। देखा जाये तो देश में कभी गंगा बचाओ यात्रा, कभी यमुना बचाओ यात्रा, कभी नर्मदा बचाओ यात्रा आदि-आदि नदी बचाओ यात्राओं-आदोलनों-अनशनों का सिलसिला आज भी जारी है, थमा नहीं है। गंगा रक्षा हेतु युवा सन्यासी स्वामी निगमानंद सरस्वती जी का आमरण अनशन और बलिदान जगजाहिर है। स्वामी शिवानंद सरस्वती जी महाराज के गंगा में खनन माफिया के विरुद्ध संघर्ष, आंदोलन और अनशन से सभी परिचित हैं। गंगा पुत्र के नाम से विख्यात प्रोफसर जीडी अग्रवाल जी उर्फ स्वामी सानंद के गंगा की अविरलता हेतु किए गए आमरण अनशन को लोग अभी भूले नहीं हैं। यही नहीं श्री श्री रविशंकर जी भी कई बरस पहले यमुना की शुद्धि हेतु अभियान का शुभारम्भ कर चुके हैं। विडम्बना यह कि श्री श्री रविशंकर जी बीते साल दिल्ली में यमुना के प्रवाह क्षेत्र में भव्य आयोजन कर यमुना के प्रवाह क्षेत्र की तबाही का कारण भी बन चुके हैं। लेकिन हालात इस बात के सबूत हैं कि अभी तक नदियों की रक्षा की दिशा में किए गए सारे के सारे प्रयास नाकाम साबित हुए हैं।

इसमें दोराय नहीं कि नदियों के बिना मानव जाति ही नहीं, जीव-जन्तु यानी संपूर्ण प्राणी जगत अपूर्ण है। युग परिवर्तन के साथ-साथ नदियों के प्रति हमारे सोच में भी बदलाव आया है। नदियों की बदहाली उसी सोच का नतीजा है। वह बात दीगर है कि हमारे यहाँ नदियों की पूजा होती है। उन्हें माँ मानते हैं। अधिकांश मेले नदियों के तट पर ही लगते हैं। अर्द्धकुंभ, कुंभ इसके जीते-जागते सबूत हैं। इन्हें जीवनदायिनी-पुण्यसलिला माना जाता है। जहाँ तक गंगा का सवाल है, उसे तो मोक्षदायिनी माना गया है। जीवन के अन्तिम समय में गंगा जल की एक बूँद अगर मुँह में पड़ जाती है तो व्यक्ति को सीधे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ऐसी मान्यता है। लेकिन अब मानवीय स्वार्थ के चलते गंगा ही नहीं, देश की समस्त नदियाँ कूड़ाघर में तब्दील हो चुकी हैं। जिस गंगा में पर्वों पर डुबकी लगा कर मानव खुद को धन्य मानता था, उसी गंगा का जल अब पुण्य नहीं मौत का सबब बन चुका है। हालात की विकरालता का अंदाजा इसी से लग जाता है कि मौजूदा दौर में देश की अधिकांश नदियाँ प्रदूषित हैं। अब सद्गुरू स्वामी जग्गी वासुदेव जी भी ‘रैली फॉर रिवर्स’ नामक महाअभियान की शुरूआत तीन सितम्बर को कोयंबटूर से करने जा रहे हैं। यह सराहनीय ही नहीं बल्कि प्रशंसनीय भी है।

यहाँ अहम सवाल यह है कि किसी के भी प्रयास से हो, नदियाँ प्रदूषण मुक्त होनी चाहिए, वे अविरल बहनी चाहिए। यह बेहद जरूरी है। नदियाँ जितनी जल्दी शुद्ध हों उतना ही उनके और देश के भविष्य के लिये अच्छा है। लेकिन इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा देश की नदियों को बदहाली से उबारने की खातिर की गई लाख टिप्पणियों, सरकार को दी चेतावनियों और अधिकारियों को अपने दायित्व के ढंग से निर्वहन न किए जाने को लेकर बार-बार फटकारने के बावजूद नदियाँ और बदहाल होती चली गईं हैं। उनमें कोई सुधार नहीं आया है। वे और प्रदूषित हो गई हैं और असलियत में अब वे नाले का रूप अख्तियार कर चुकी हैं। कुछ का तो अब केवल नाम ही बचा है।

यहाँ पंजाब की काली बेई नदी अपवाद जरूर है जिसे संत श्री बलवीर सिंह सींचेवाल ने अपने साथियों के साथ न केवल प्रदूषण मुक्त किया बल्कि उसे अविरल भी बनाया। इस हेतु उनकी जितनी भी प्रशंसा की जाये वह कम है। ऐसा कर उन्होंने इतिहास रचा है। दुख इस बात का है कि किसी ने भी संत श्री बलवीर सिंह सींचेवाल से कुछ नहीं सीखा। बीते माह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक ने देश की नदियों की स्थिति पर गहरी चिंता जाहिर की है। उन्होंने इस तथ्य को स्वीकारा है कि आज देश में ऐसी कई नदियाँ हैं जो अपना अस्तित्व खो चुकी हैं, उनमें अब पानी नहीं रह गया है और उनका नाम केवल नक्शे पर ही बाकी रह गया है।

गौरतलब है कि देश में राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में आज से तकरीबन तीस साल पहले गंगा के शुद्धिकरण की शुरूआत हुई थी। तकरीबन दस-बारह साल पहले यमुना को टेम्स बनाने का वायदा किया गया था। मोदी सरकार आने के बाद 2014 में नमामि गंगे मिशन की शुरूआत हुई। उसके बाद उमा भारतीजी ने तवी नदी के उद्धार का बीड़ा उठाने का वायदा किया। लेकिन दुख है कि अभी तक कोई नतीजा सामने नही आया और गंगा-यमुना-तवी की स्थिति में भी कोई बदलाव नहीं आया। वह आज भी मैली हैं। ऐसे हालात में देश की अन्य नदियों की शुद्धि की आशा कैसे की जा सकती है। हाँ सदगुरू स्वामी जग्गी वासुदेव जी के प्रयास की सफलता की प्रार्थना ईश्वर से जरूर करते हैं। उनके प्रयास की सफलता नदियों के उज्जवल भविष्य का प्रतीक होगी।

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एक परिचय:


. 21 जनवरी 1952 को एटा, उ.प्र. में शिक्षक माता-पिता के यहाँ जन्म।

राजकीय इंटर कॉलेज, एटा से 12वीं परीक्षा उत्तीर्ण, सागर विश्वविद्यालय से स्नातक, छात्र जीवन में अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन, समाजवादी युवजन सभा और छात्र संघ से जुड़ाव रहा। राजनैतिक गतिविधियों में संलिप्तता के कारण विधि स्नातक और परास्नातक की शिक्षा अपूर्ण।

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