युद्ध और शान्ति के बीच जल

Submitted by Hindi on Tue, 03/20/2018 - 18:11
Printer Friendly, PDF & Email

प्रख्यात पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह के वैश्विक जल अनुभवों पर आधारित एक शृंखला

विश्व जल दिवस, 22 मार्च 2018 पर विशेष


यह दावा अक्सर सुनाई पड़ जाता है कि तीसरा विश्व युद्ध, पानी को लेकर होगा। मुझे हमेशा यह जानने की उत्सुकता रही कि इस बारे में दुनिया के अन्य देशों से मिलने वाले संकेत क्या हैं? मेरे मन के कुछेक सवालों का उत्तर जानने का एक मौका हाल ही में मेरे हाथ लग गया। प्रख्यात पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह, पिछले करीब ढाई वर्ष से एक वैश्विक जलयात्रा पर हैं। इस यात्रा के तहत वह अब तक करीब 40 देशों की यात्रा कर चुके हैं। यात्रा को 'वर्ल्ड पीस वाटर वाॅक' का नाम दिया गया है। मैंने राजेन्द्र सिंह से निवेदन किया और वह मेरी जिज्ञासा के सन्दर्भ में अपने वैश्विक अनुभवों को साझा करें और वह राजी भी हो गए। मैंने, दिनांक 07 मार्च, 2018 को सुबह नौ बजे से गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान के कमरा नम्बर 103 में उनसे लम्बी बातचीत की। प्रस्तुत हैं राजेन्द्र सिंह जी से हुई बातचीत के कुछ महत्त्वपूर्ण अंश
जलपुरुष राजेन्द्र सिंह के साथ लेखक अरुण तिवारीजलपुरुष राजेन्द्र सिंह के साथ लेखक अरुण तिवारीइस वक्त जो मुद्दे अन्तरराष्ट्रीय तनाव की सबसे बड़ी वजह बनते दिखाई दे रहे हैं, वे हैं - आतंकवाद, सीमा विवाद और आर्थिक तनातनी। निःसन्देह, सम्प्रदायिक मुद्दों को भी उभारने की कोशिशें भी साथ-साथ चल रही हैं। स्वयं को राष्ट्रवादी कहने वाली ताकतें अपनी सत्ता को निवासी-प्रवासी, शिया-सुन्नी, हिन्दू-मुसलमान जैसे मसलों के उभार पर टिकाने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में यह कथन कि तीसरा विश्व युद्ध, पानी को लेकर होगा; आगे चलकर कितना सही साबित होगा?

पूरी दुनिया में वाटर वार की यह जो बात लोग कह रहे हैं; यह निराधार नहीं है। पानी के कारण अन्तरराष्ट्रीय विवाद बढ़ रहे हैं। विस्थापन, तनाव और अशान्ति के दृश्य तेजी से उभर रहे हैं। ये दृश्य, काफी गम्भीर और दर्द भरे हैं। पिछले कुछ वर्षों में पानी के संकट के कारण खासकर, मध्य एशिया और अफ्रीका के देशों से विस्थापन करने वालों की तादाद बढ़ी है।

विस्थापित परिवारों ने खासकर यूरोप के जर्मनी, स्वीडन, बेल्जियम पुर्तगाल, इंग्लैंड, फ्रांस, नीदरलैंड, डेनमार्क, इटली और स्विटजरलैंड के नगरों की ओर रुख किया है। अकेले वर्ष 2015 में मध्य एशिया और अफ्रीका के देशों से करीब 05 लाख लोग, अकेले यूरोप के नगरों में गए हैं। जर्मनी की ओर रुख करने वालों की संख्या ही करीब एक लाख है। जर्मनी, टर्की विस्थापितों का सबसे बड़ा अड्डा बन चुका है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, यूरोप के नगरों की ओर हुए यह अब तक के सबसे बड़े विस्थापन का आँकड़ा है।

गौर करने की बात है कि एक विस्थापित व्यक्ति, रिफ्यूजी का दर्जा हासिल करने के बाद ही सम्बन्धित देश में शासकीय कृपा के अधिकारी बनता है। अन्तरराष्ट्रीय स्थितियाँ ऐसी हैं कि विस्थापितों को रिफ्यूजी का दर्जा हासिल करने के लिये कई-कई साल लम्बी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। परिणाम यह है कि जहाँ एक ओर विस्थापित परिवार, भूख, बीमारी और बेरोजगारी से जूझने को मजबूर हैं, वहीं दूसरी ओर जिन इलाकों में वे विस्थापित हो रहे हैं; वहाँ कानून-व्यवस्था की समस्याएँ खड़ी हो रही हैं। सांस्कृतिक तालमेल न बनने से भी समस्याएँ हैं।

यूरोप के नगरों के मेयर चिन्तित हैं कि उनके नगरों का भविष्य क्या होगा? विस्थापित चिन्तित हैं कि उनका भविष्य क्या होगा? पानी की कमी के नए शिकार वाले इलाकों को लेकर भावी उजाड़ की आशंका से चिन्तित हैं। 17 मार्च को ब्राजील की राजधानी में एकत्र होने वाले पानी कार्यकर्ता चिन्तित हैं कि अर्जेंटीना, ब्राजील, पैराग्वे, उरुग्वे जैसे देशों ने 04 लाख, 60 हजार वर्ग मील में फैले बहुत बड़े भूजल भण्डार के उपयोग का मालिकाना अगले 100 साल के लिये कोका कोला और स्विस नेस्ले कम्पनी को सौंपने का समझौता कर लिया है। भूजल भण्डार की बिक्री का यह दुनिया में अपने तरह का पहला और सबसे बड़ा समझौता है। इस समझौते ने चौतरफा भिन्न समुदायों और देशों के बीच तनाव और अशान्ति बढ़ा दी है।

आप देखिए कि 20 अक्टूबर, 2015 को टर्की के अंकारा में बम ब्लास्ट हुआ। 22 मार्च को दुनिया भर में अन्तरराष्ट्रीय जल दिवस मनाया जाता है। 22 मार्च, 2016 को जब बेल्जियम के नगरों में वाटर कन्वेंशन हो रहा था, तो बेल्जियम के ब्रूसेल्स में विस्फोट हुआ। शान्ति प्रयासों को चोट पहुँचाने की कोशिश की गई। उसमें कई लोग मारे गए। 19 दिसम्बर, 2016 को बर्लिन की क्रिश्चियन मार्किट में हुए विस्फोट में 12 लोग मारे गए और 56 घायल हुए। यूरोपियन यूनियन ने जाँच के लिये विस्थापित परिवारों को तलब किया। ऐसा होने पर मूल स्थानीय नागरिक, विस्थापितों को शक की निगाह से देखेंगे ही। शक हो, तो कोई किसी को कैसे सहयोग कर सकता है?

विस्थापितों को शरण देने के मसले पर यूरोप में भेदभाव पैदा हो गया है। पोलैंड और हंगरी ने किसी भी विस्थापित को अपने यहाँ शरण देने से इनकार कर दिया है। चेक रिपब्लिक ने सिर्फ 12 विस्थापितों को लेेने के साथ ही रोक लगा दी। यूरोपियन कमीशन ने इन तीनों के खिलाफ का कानूनी कार्रवाई शुरू कर दिया है। ब्रूसेल्स और इसकी पूर्वी राजधानी के बीच, वर्ष 2015 के शुरू में ही सीरियाई विस्थपितों को लेकर लम्बी जंग चल चुकी है।

इटली और ग्रीक जैसे तथाकथित फ्रंटलाइन देश, अपने उत्तरी पड़ोसी फ्रांस और आॅस्ट्रेलिया को लेकर असहज व्यवहार कर रहे हैं। कभी टर्की और जर्मनी अच्छे सम्बन्धी थे। जर्मनी, विदेशी पर्यटकों को टर्की भेजता था। आज दोनों के बीच तनाव दिखाई दे रहा है। यूरोप के देश अब राय ले रहे हैं कि विस्थापितों को उनके देश वापस कैसे भेजा जाये। अफ्रीका से आने वाले विस्थापितों का संकट ज्यादा बढ़ गया है। तनाव और अशान्ति होगी ही।

इस तनाव और अशान्ति के मूल में पानी ही है। यह बात साबित करने के लिये आपके पास क्या तथ्य हैं?
यह साबित करने के लिये मेरे पास तथ्य-ही-तथ्य हैं। दक्षिण अफ्रीका के नगर केपटाउन के गम्भीर हो चुके जल संकट के बारे में आपने अखबारों में पढ़ा ही होगा। संयुक्त अरब अमीरात के पानी के भयावह संकट के बारे में भी खबरें छप रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ की विश्व जल विकास रिपोर्ट में आप जल्द ही पढ़ेंगे कि दुनिया के 3.6 अरब लोग यानी आधी आबादी ऐसी है, जो हर साल में कम-से-कम एक महीने पानी के लिये तरस जाती है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि पानी के लिये तरसने वाली ऐसी आबादी की संख्या वर्ष 2050 तक 5.7 अरब पहुँच सकती है। 2050 तक दुनिया के पाँच अरब से ज्यादा लोग के रिहायशी इलाकों में पानी पीने योग्य नहीं होगा। मैं सबसे पहले यहाँ सीरिया के बारे में कुछ तथ्य रखूँगा।

आगे की बातचीत शृंखला को पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें

युद्ध और शान्ति के बीच जल - भाग दो

युद्ध और शान्ति के बीच जल - भाग तीन

युद्ध और शांति के बीच जल - भाग चार

Comments

Add new comment

This question is for testing whether or not you are a human visitor and to prevent automated spam submissions.

3 + 5 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

कार्यवृत


श्रव्य माध्यम-

Latest