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पारिस्थितिकी तंत्र एवं पर्यावरण प्रदूषण

Author: 
कु. आस्था दीवान
Source: 
पर्यावरण विमर्श, मई 2014
आधुनिक युग में विकास के नाम पर मानव प्रकृति से छेड़छाड़ करने पर तुला है, परिणामस्वरूप मृदा, जल और वायु के भौतिक और रासायनिक गुणों में परिवर्तन दिखाई दे रहा है। इस परिवर्तन का असर सभी जैविक घटकों पर पड़ रहा है। ये परिवर्तन ही प्रदूषण का निर्माण करते हैं। रसायनयुक्त जल के सेवन से मानव में डायरिया, पीलिया, त्वचा रोग, फ्लोरोसिस, विकलांगता, नेत्र विकार, यूरेनिया आदि रोग हो जाते हैं। विविध प्रकार के वातावरण में भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव पाए जाते हैं। सभी जीव, अपने चारों ओर के वातावरण से प्रभावित होते हैं। सभी जीव अपने वातावरण के साथ एक विशिष्ट तंत्र का निर्माण करते हैं, जिसे पारिस्थितिकी तंत्र कहते हैं। जीवों और वातावरण के इस संबंध को पारिस्थितिकी कहा जाता है।

सन् 1965 में ओड़म ने पारिस्थितिकी के लिए प्रकृति की संरचना तथा कार्यों का अध्ययन नाम नई परिभाषा दी। विभिन्न वैज्ञानिकों ने पारिस्थितिकी तंत्र की भिन्न-भिन्न परिभाषाएं दी हैं। सबसे सरल परिभाषा है, ‘प्राणियों एवं वनस्पतियों के परस्पर संबंधों और इनके पर्यावरण से संबंधों का अध्ययन।’

इको-सिस्टम या पारिस्थितिक तंत्र क्या है? इसे समझने के लिए हम कल्पना करें एक तालाब की, जहां मछलियां, मेंढ़क, शैवाल, जलीय पुष्प और अन्य कई जलीय जीव रहते हैं। ये सभी न केवल एक-दूसरे पर आश्रित हैं, अपितु जल, वायु, भूमि जैसे अजैविक घटकों के साथ भी पारस्परिक रूप से जुड़े हुए हैं। समुदाय का यह पूर्ण तंत्र, जिसमें अजैविक घटकों तथा जैविक घटकों का पारस्परिक संबंध ही पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करता है।

पारिस्थितिकी तंत्र की विशेषताएं


1. पारिस्थितिकी तंत्र एक कार्यशील क्षेत्रीय इकाई होता है, जो क्षेत्र विशेष के सभी जीवधारियों एवं उनके भौतिक पर्यावरण के सकल योग का प्रतिनिधित्व करता है।
2. इसकी संरचना तीन मूलभूत संघटकों से होती है- (क) ऊर्जा संघटक, (ख) जैविक (बायोम) संघटक, (ग) अजैविक या भौतिक (निवास्य) संघटक (स्थल, जल तथा वायु)।
3. पारिस्थितिकी तंत्र जीवमंडल में एक सुनिश्चित क्षेत्र धारण करता है।
4. किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र का समय इकाई के संदर्भ में पर्यवेक्षण किया जाता है।
5. ऊर्जा, जैविक तथा भौतिक संघटकों के मध्य जटिल पारिस्थितिकी अनुक्रियाएं होती हैं, साथ-ही-साथ विभिन्न जीवधारियों में भी पारस्परिक क्रियाएं होती हैं।
6. पारिस्थितिकी तंत्र एक खुला तंत्र होता है, जिसमें ऊर्जा तथा पदार्थों का सतत् निवेश तथा उससे बहिर्गमन होता रहता है।
7. जब तक पारिस्थितिकी तंत्र के एक या अधिक नियंत्रक कारकों में अव्यवस्था नहीं होती, पारिस्थितिकी तंत्र अपेक्षाकृत स्थिर समस्थिति में होता है।
8. पारिस्थितिकी तंत्र प्राकृतिक संसाधन होते हैं (अर्थात् यह प्राकृतिक संसाधनों का प्रतिनिधित्व करता है)
9. पारिस्थितिकी तंत्र संरचित तथा सुसंगठित तंत्र होता है।
10. प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में अंतर्निमित नियंत्रण की व्यवस्था होती है। अर्थात् यदि पारिस्थितिकी तंत्र के किसी एक संघटक में प्राकृतिक कारणों से कोई परिवर्तन होता है तो तंत्र के दूसरे संघटक में परिवर्तन द्वारा उसकी भरपाई हो जाती है, परंतु यह परिवर्तन यदि प्रौद्योगिकी मानव के आर्थिक क्रियाकलापों द्वारा इतना अधिक हो जाता है कि वह पारिस्थितिकी तंत्र के अंतर्निर्मित नियंत्रण की व्यवस्था की सहनशक्ति से अधिक होता है तो उक्त परिवर्तन की भरपाई नहीं हो पाती है और पारिस्थितिकी तंत्र अव्यवस्थित तथा असंतुलित हो जाता है एवं पर्यावरण अवनयन तथा प्रदूषण प्रारंभ हो जाता है।

पारिस्थितिकी तंत्र के प्रकार


1. निवास्य क्षेत्र के आधार पर वर्गीकरण – निवास्य क्षेत्र, जीव मंडल के खास क्षेत्रीय इकाई के भौतिक पर्यावरण की दशाएं, जैविक समुदायों की प्रकृति तथा विशेषताओं को निर्धारित करता है। चूंकि भौतिक दशाओं में क्षेत्रीय विभिन्नताएं होती हैं, अतः जैविक समुदायों में भी स्थानीय विभिन्नताएं होती हैं। इस अवधारणा के आधार पर पारिस्थितिकी तंत्रों को दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जाता है-

(क) पार्थिव पारिस्थितिकी तंत्र – भौतिक दशाओं तथा उनके जैविक समुदायों पर प्रभाव के अनुसार पार्थिव या स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्रों में विभिन्नताएं होती हैं। अतः पार्थिव पारिस्थितिकी तंत्रों को पुनः कई उपभागों में विभाजित किया जाता है यथा (अ) उच्चस्थलीय या पर्वत पारिस्थितिकी तंत्र (ब) निम्न स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र, (स) उष्ण रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र तथा (द) शीत रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र। विशिष्ट अध्ययन एवं निश्चित उद्देश्यों के आधार पर इस पारिस्थितिकी तंत्र को कई छोटे भागों में विभाजित किया जाता है।

(ख) जलीय पारिस्थितिकी तंत्र – जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को दो प्रमुख उपभागों में विभाजित किया जाता है – (अ) ताजे जल वाले-ताजे जल वाले पारिस्थितिकी तंत्रों को पुनः कई भागों में विभाजित किया जाता है-सरिता पारिस्थितिक तंत्र, झील पारिस्थितिकी तंत्र, जलाशय पारिस्थितिकी तंत्र, दलदल पारिस्थितिकी तंत्र, आदि। (ब) सागरीय पारिस्थितिकी तंत्र-सागरीय पारिस्थितिकी तंत्रों को खुले सागरीय पारिस्थितिकी तंत्र, तटीय ज्वानद मुखी पारिस्थितिकी तंत्र, कोरलरिफ पारिस्थितिकी तंत्र आदि उप-प्रकारों में विभाजित किया जाता है। सागरीय पारिस्थितिकी तंत्रों को दूसरे रूप में भी विभाजित किया जा सकता है। यथा-सागरीय पारिस्थितिकी तंत्र तथा सागर-नितल पारिस्थितिकी तंत्र।

2. क्षेत्रीय मापक के आधार पर वर्गीकरण- क्षेत्रीय मापक या विस्तार के आधार पर विभिन्न उद्देश्यों के लिए पारिस्थितिकी तंत्रों को अनेक प्रकारों में विभाजित किया जाता है। समस्त जीवमंडल वृहत्तम पारिस्थितिकी तंत्र होता है। इसे दो प्रमुख प्रकारों में विभाजित किया जाता है – (अ) महाद्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्र, (ब) महासागरीय या सागरीय पारिस्थिकी-तंत्र। आवश्यकता के अनुसार क्षेत्रीय मापक को घटाकर एकाकी जीव (पादप या जंतु) तक लाया जा सकता है। उदाहरण के लिए जीवमंडलीय पारिस्थितिकी तंत्र, महाद्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्र, पर्वत, पठार, मैदान पारिस्थितिकी तंत्र, सरिता, झील, जलाशय पारिस्थितिकी तंत्र, फसल क्षेत्र पारिस्थितिकी तंत्र, गोशाला पारिस्थितिक तंत्र, एकाकी पादप पारिस्थितिकी तंत्र, पेड़ की जड़ या ऊपरी वितान का पारिस्थितिकी तंत्र।

3. उपयोग के आधार पर वर्गीकरण- विभिन्न उपयोगों के आधार पर पारिस्थितिकी तंत्रों को कई प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए ई.पी. ओड्म (1959) ने नेट प्राथमिक उत्पादन तथा कृषि विधियों के उपयोग के आधार पर पारिस्थितिकी तंत्रों को दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया है-

(अ) कृषित पारिस्थितिकी तंत्र- कृषित पारिस्थितिकी तंत्रों को प्रमुख फसलों के आधार पर कई उप-प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है। यथा-गेहूं क्षेत्र पारिस्थितिकी-तंत्र, चारा क्षेत्र पारिस्थितिकी तंत्र आदि।

(ब) अकृषित पारिस्थितिकी तंत्र- अकृषित पारिस्थितिकी तंत्रों को वन पारिस्थितिकी तंत्र, ऊंची, घास पारिस्थितिक तंत्र, बंजर-भूमि पारिस्थितिकी तंत्र, दलदल क्षेत्र पारिस्थितिकी तंत्र आदि।

पर्यावरण प्रदूषण


‘संरक्षण जहां असफल होता है, वहीं प्रदूषण की शुरुआत होती है।’ आधुनिक युग में विकास के नाम पर मानव प्रकृति से छेड़छाड़ करने पर तुला है, परिणामस्वरूप मृदा, जल और वायु के भौतिक और रासायनिक गुणों में परिवर्तन दिखाई दे रहा है। इस परिवर्तन का असर सभी जैविक घटकों पर पड़ रहा है। ये परिवर्तन ही प्रदूषण का निर्माण करते हैं।

वायु प्रदूषण-


कल कारखानों का धुआं, ईंधन का धुआं, वाहनों का धुआं, धूल के कण और जलवाष्प आदि वायुमंडल में एकत्रित हो जाते हैं, जिससे वायु की गुणवत्ता नष्ट हो जाती है। उसे ही वायु प्रदूषण या प्रदूषित वायु कहा जाता है।

वायु प्रदूषण के कारण-


1. धुआं – घरेलू ईंधन से धुआं, कारखानों से निकलने वाला धुआं, कचरा जलाने से धुआं, वाहनों से निकलता धुआं। इस धुएं में हाइड्रोकार्बन, कार्बन के कण, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड आदि उपस्थित रहते हैं। ये सभी कण मानव के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालते हैं। पेड़ों की पत्तियों और शाखाओं में जमकर उन्हें भी क्षतिग्रस्त करते हैं।

2. स्वचालित वाहन- ट्रैक्टर, ट्रक, कार, स्कूटर, टैंपों, बस आदि वाहनों में डीजल या पेट्रोल के जलने से विषैली गैस निकलकर वातावरण को प्रदूषित करती है। चलती हुई वाहन की अपेक्षा चालू वाहन में खड़े वाहन से निकलता धुआं ज्यादा खतरनाक होता है, क्योंकि इस धुएं में प्रदूषक की सांद्रता होती है।

3. औद्योगीकरण- बढ़ती हुई जनसंख्या ने गरीबी को और गरीबी ने प्रदूषण को जन्म दिया है। बढ़ती हुई जनसंख्या ने विकास के नाम पर औद्योगीकरण को भी जन्म दिया है। कारखानों की चिमनियों से निकलने वाले धुएं में पारा, जिंक, सीसा, आर्सेनिक जैसे धातुओं के सूक्ष्म कण होते हैं, इसके अलावा प्रदूषक गैस भी होती है।

4. कृषि क्षेत्र- फसल को कीटों के आक्रमण से बचाने तथा अधिक उत्पादन के लिए किसान खेतों में विभिन्न प्रकार के रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं। ये रासायनिक पदार्थ जल में घुलकर भूमि को तथा नदी-नालों में जल को प्रदूषित करते हैं।

5. खरपतवार- गाजर घास और कुछ खरपतवारों के परागकण वायुमंडल में बिखरकर प्रदूषक का कार्य करते हैं। इससे दमा की बीमारी होती है। महानीम वृक्ष के पुष्पों के परागकण भी प्रदूषण फैलाते हैं।

वायु प्रदूषण के प्रभाव


वायु प्रदूषण का प्रभाव न केवल जैविक घटकों पर, अपितु इमारतों, पर, कपड़ों एवं धातुओं पर भी पड़ता है। मानव में श्वास तथा त्वचा संबंधी रोग तो होते ही हैं, शरीर से हिस्टामाइन रसायन का त्वचा के माध्यम से रिसाव होने लगता है। पत्तियों का पीला पड़ जाना, जल जाना, चकत्ते पड़ जाना, कलियों का बिना खिले ही सूख जाना, फलों का धब्बेदार हो जाना, पशुओं का चारा विषाक्त हो जाना, यह सब वायु प्रदूषण का ही प्रभाव है।

वायु प्रदूषण का नियंत्रण


वायु प्रदूषण का नियंत्रण आज एक प्राथमिक आवश्यकता है। लोगों में जागरूकता उत्पन्न कर, सामाजिक चेतना द्वारा, कानूनी कार्रवाई द्वारा प्रदूषण पर नियंत्रण का प्रयास किया जा रहा है, पर उस प्रदूषण का क्या करें, जो मानव द्वारा मानव के नाश के लिए किया जा रहा है।

श्रमिकों को कारखाने के अंदर मास्क लगाकर जाना अनिवार्य होना चाहिए। वायु प्रदूषण के नियंत्रण का सबसे सहज उपाय वृक्षारोपण है। बरगद की पत्तियों में ज्यादा प्रदूषण सोखने क क्षमता होती है तथा पाइंस के वृक्ष नाइट्रोजन के ऑक्साइड का अवशोषण करते हैं। ऐसे वृक्ष कारखानों के समीप और सड़क के किनारे लगाने चाहिए। जिससे कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण और ऑक्सीजन का विमोचन करता है। घर में तुलसी का पौधा लगाना अच्छा माना जाता है। मदार, कनेर, वोगनवेलिया ये पौधे भी प्रदूषण को अवशोषित करते हैं।

जल प्रदूषण


जल-जीवन अमृत जल जीवनदायिनी तत्व है। जीवन की शुरुआत ही जल से हुई है। जल बिना जीवन का अस्तित्व ही नहीं है। जब जल के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में परिवर्तन हो जाए और इस परिवर्तन का असर समस्त जल मंडल और जीव मंडल पर पड़े, तब यह जल प्रदूषित जल कहलाता है।

जल प्रदूषण के कारण-


1. औद्योगिक विकास – प्रगति के नाम पर मानव नए-नए उद्योग धंधों का विकास कर रहा है। इन उद्योग-धंधों में रासायनिक, कीटनाशी, पीड़कनाशी बनाए जाते हैं, कहीं चमड़े का शोधन होता है तो कहीं इस्पात का कारखाना है। इन सबसे जल इतना दूषित हो जाता है कि इसमें वनस्पति नष्ट हो जाती है। इसी जल को व्यक्ति नहाने तथा पीने में उपयोग करते हैं और अनेक बीमारियों से ग्रसित होते हैं।

2. अपमार्जक विकास- आज हर घर में नहीने, कपड़े धोने और बर्तन धोने के लिए विभिन्न प्रकार के साबुन का उपयोग किया जाता है। सिर्फ विम, निरमा जैसे कई डिटरजेंट इनके उदाहरण हैं। धुलने के पश्चात् इन पदार्थों को जल में विसर्जित कर दिया जाता है। साबुन युक्त जल नदी-नालों और तालाब के जल को दूषित करते हैं तथा जीवधारियों को नुकसान पहुंचाते हैं।

3. कीटनाशी- फसलों को उन्नत बनाने के लिए कीटनाशी रसायनों का उपयोग किया जाता है, ये रसायन में घुलकर खेतों के माध्यम से नदी-तालाबों तक पहुंचते हैं और जल को प्रदूषित करते हैं।

जल प्रदूषण का प्रभाव


पृथ्वी पर जल का वितरण असमान तरीके से होता है। किसी क्षेत्र में अत्यधिक जल तो कहीं सूखा, परिणामस्वरूप वायु की अपेक्षा जल प्रदूषण गंभीर मसला है।

रसायनयुक्त जल के सेवन से मानव में डायरिया, पीलिया, त्वचा रोग, फ्लोरोसिस, विकलांगता, नेत्र विकार, यूरेनिया आदि रोग हो जाते हैं। पीड़कनाशी के जल में घुलने पर खाद्य श्रृंखला के माध्यम से, फसलों के माध्यम से मानव व अन्य प्रणियों पर प्रदूषित जल का हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

जल प्रदूषण का नियंत्रण


पीने के पानी को फिटकरी या क्लोरीन से शुद्ध करना चाहिए। कीटनाशी का प्रयोग सावधानी से और तनु रूप में किया जाना चाहिए तथा बाजार की सब्जियों को पोटाश के जल में धोकर फिर उपयोग में लाना चाहिए। सीवेज उपचार यंत्रों तथा सेप्टिक टैंक का प्रयोग उत्तम है। सड़ी हुई या मृत वस्तुओं को जल में न बहाकर जला देना चाहिए।

भारत सरकार द्वारा जल अधिनियम, 1974 का कड़ाई से पालन करना चाहिए और इस कार्य में शासन को पूर्ण सहयोग देना चाहिए।

इसके अतिरिक्त अन्य कई कारण हैं – मृदा प्रदूषण, सागरीय प्रदूषण, शोर प्रदूषण, तापीय प्रदूषण, नाभिकीय प्रदूषण आदि।

संदर्भ


1. पर्यावरण प्रदूषण और प्रबंधन, अशोक प्रधान, नीलकंठ प्रकाश, महरौली, नई दिल्ली।
2. भौतिक भूगोल, डॉ. सविंद्र सिंह, वसुंधरा प्रकाशन, गोरखपुर।
3. भूगोल, डॉ. चतुर्भुज मामोरिया, डॉ. बी.एल. शर्मा, साहित्य भवन पब्लिकेशंस।
4. राजनीति विज्ञान, डॉ. बी.एल. कड़िया, साहित्य भवन पब्लिकेशन, 2004
कला एवं वाणिज्य कन्या महाविद्यालय देवेंद्रनगर, रायपुर (छ.ग.)

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