खासम-खास
गंगा पाप धोने की डिटर्जेंट नहीं है : अनुपम मिश्र
लोक भारती, नर्मदा समग्र, गंगा समग्र, दीनदयाल शोध संस्थान की पहल पर गंगा चौपाल का आयोजन किया गया। ग्रेटर कैलाश के इस्कॉन मंदिर में शनिवार 26 नवम्बर 2011 को हुए आयोजन में मुख्य अतिथि के तौर पर बोलते हुए प्रसिद्ध पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र
खतरे में हैं नमभूमियां और प्रवासी पक्षी
(19-22 जनवरी, 2012 के दौरान गुजरात में आयोजित द्वितीय ग्लोबल बर्ड वॉचर्स कांफ्रेंस पर आधारित लेख)
ठंड का मौसम पक्षी निहारकों के लिए सर्वाधिक रोमांचकारी होता है। इसी मौसम में विदेशों से आए प्रवासी पक्षी नदियों, झीलों और नमभूमियों (आर्द्रभूमि), (वेटलैंड) के आस-पास डेरा डाले होते हैं। जिसे करीब से देखना किसी भी पक्षी प्रेमी के लिए अद्भुत क्षण होता है। ऐसे अवसरों का सहारा लेकर अनेक राज्यों में इको-पर्यटन पर भी ध्यान दिया जा रहा है। इसी को बढ़ावा देने के मकसद से गुजरात सरकार तथा फिक्की के संयुक्त प्रयास से 19-22 जनवरी तक गांधीनगर में द्वितीय ग्लोबल बर्ड वॉचर्स कांफ्रेंस का आयोजन किया गया। जिसमें भारत के करीब 400 पक्षी प्रेमियों के अलावा 38 विभिन्न देशों से आए लगभग 100 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में जहां विशेष रूप से इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने की बात कही गई। वहीं इस बात पर भी ध्यान केंद्रित किया गया कि भौगोलिक सीमाओं से परे पक्षियों और मानव के मध्य एक अटूट संबंध है जिसे समझने की आवश्यकता है। अनेक पक्षी हजारों किलोमीटर की यात्राएं कर एक देश से दूसरे देश की यात्राएं करते हैं।उद्योगों हेतु पानी की कमी पर फिक्की की चिंता
पानी चाहिए, तो लेनदेन सुधारें उद्योग
भारत में ऐसे तमाम और संयंत्र, वर्षों से धकाधक पानी खींच रहे हैं। भूजल सूख रहा है। अपना कचरा सीधे धरती में डालकर लोगों को बीमार बना रहे हैं। प्राण ले रहे हैं। नदियां जहर बन रही हैं। धरती धसक रही है। एक्सप्रेस वे के नाम पर मशहूर एक समूह ने उत्तर प्रदेश में यमुना-गंगा को मारने से परहेज नहीं किया है। कई नामी समूह उनकी औद्योगिक जरूरत से ज्यादा जमीन हथिया कर भूमि हड़पो अभियान चला ही रहे हैं। पूरे भारत को व्यापार के कायदे सिखाने तथा अपनी जड़ों से जुड़ाव के लिए सम्मान से देखे जाने वाले मारवाड़ी समुदाय या शख्सियत का बयान आया कि इस मरूभूमि का तीर्थ इसके कुएं, जोहड़, बावड़ी, कुंड व झालरे हैं, न कि बढ़ते बीयर बार व दारू पार्लर?
आर्थिक विकास और समग्र विकास के बीच दूरियां बढ़ती ही जा रही हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि उद्योग, व्यापार और समाज एक-दूसरे के लिए हैं ही नहीं। अब उद्योग व समाज अक्सर आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। खासकर ग्रामसमाज। प्रचारित किया जाता है कि स्वयंसेवी संगठन विकास के दुश्मन हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। हकीकत में यह नतीजा है नीति व नीयत में समग्र विकास के प्राथमिकता में न होने का। नीतियों में सार्वजनिक से ज्यादा, निजी के प्रभाव का। कायदे से ज्यादा, फायदे के प्रति प्रतिबद्धता का। पानी के मामले में भी यही है। जल प्रबंधन, जलाधिकार, जल बंटवारे को लेकर किसी ठोस व सकारात्मक नीति के अभाव में पानी और विवाद का रिश्ता गहराता ही जा रहा है। दुआ कीजिए कि वर्ष-2012 में प्रस्तावित नई जलनीति इस अभाव को दूर करने वाली साबित हो। फिलवक्त तो नववर्ष के पहले पखवाड़े ने संदेश दे दिया है कि इस वर्ष का पूर्वाद्ध पानी पर संजीदगी से सोचने का समय है।साइंस में नए इनोवेशन से बदलेगी दुनिया
दुनिया भर की प्रयोगशालाओं से निकल रही नई तकनीकें आने वाले समय में लोगों के रहने और सोचने के तरीकों में भारी बदलाव कर सकती हैं। आईबीएम ने ऐसी कुछ चुनिंदा तकनीकों और इनोवेशंस के बारे में खुलासा किया है। अगले पांच वर्षों में ऐसे 3- डी डिवाइस बाजार में आ जाएंगे, जिनके जरिए आप अपने परिचितों और मित्रों के 3- डी होलोग्राम के साथ वास्तविक समय में इंटरैक्ट कर सकेंगे। सिनेमा और टीवी जगत धीरे-धीरे 3- डी फॉर्मेट की तरफ बढ़ रहा है। 3- डी तकनीकों में लगातार सुधार हो रहा है और होलोग्राफिक कैमरों के उन्नत होने से नई संभावनाएं पैदा हो रही हैं। ऐसे सूक्ष्म कैमरों को मोबाइल फोनों में फिट किया जा सकता है। इस इनोवेशन का नतीजा यह होगा कि आप बिल्कुल नए अंदाज में नेटसर्फिंग और अपने दोस्तों के साथ चैटिंग कर सकेंगे।
अक्षय ऊर्जा की ओर दस कदम
भारत में कुडनकुलम की चर्चा इन दिनों खूब है। कुडनकुलम की चर्चा के पीछे का राज हमारी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का तर्क है। हमारे पूर्व राष्ट्रपति और देश के सम्मानित वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम तक ने कहा है कि कुडनकुलम की परमाणु ऊर्जा परियोजना का विरोध बंद कर देना चाहिए क्योंकि वह हमारी ऊर्जा जरूरतों के लिए जरूरी है। अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए भारी भरकम और खतरों से भरी ऊर्जा परियोजनाएं लगाना क्या इतना जरूरी है? शायद नहीं। ऊर्जा की हमारी जरूरतें हमारे अपने साधनों से भी पूरी हो सकती हैं। कम से कम ग्रीनपीस की एक रिपोर्ट तो हमें उम्मीद की वही किरण दिखा रही है।
एपीजे अब्दुल कलाम ज्यादा दूर न जाकर उसी तमिलनाडु के ओदांथुराई पंचायत को देखें तो उन्हें कुडनकुलम के परमाणु ऊर्जा संयत्र के बारे में बयान देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। ग्यारह गावों की इस पंचायत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को जिस तरह पूरा किया है वह न केवल कलाम को जवाब है बल्कि पूरे देश में ऊर्जा के भविष्य का सुनहरा मॉडल भी है। सोलर, बायोगैस और पवन ऊर्जा के समुचित प्रयोग से उन्होंने अपनी 350 किलोवाट की ऊर्जा जरूरतों को आसानी से पूरा कर लिया है। इसके लिए उन्हें किसी बाहरी कंपनी को भारी भरकम बिल भी अदा नहीं करना पड़ता। केवल ओदांथुराई पंचायत ही नहीं बल्कि ऐसी दस कहानियों को जोड़कर ग्रीनपीस ने एक दस्तावेज ही तैयार कर दिया है। ग्रीनपीस का एक विभाग अक्षय ऊर्जा पर काम कर रहा है जिसके मुखिया रमापति कुमार है। विभाग देश में ऊर्जा व्यवस्था का ऑडिट कर रहा है। इसी कड़ी में उसने देशभर में ऐसे ऊर्जा प्रयोगों का एक संकलन तैयार किया है जिसमें वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों से ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की कहानियां। इन कहानियों में बिहार के प्रयोग भी शामिल हैं तो लेह लद्दाख की भी ऊर्जा गाथाएं हैं।जल साक्षरता सम्मेलन-2012
सिर्फ भाषणों से संभव नहीं जलसाक्षरता
सचमुच! ऐसे खुद करने लायक कार्यों को जानने व अपनाने की जरूरत हम सभी को है। चुनौतियां नईं हैं अतः समाधान भी नये संदर्भों के साथ सोचने व खोजने होंगे। चुनौतियां अब सिर्फ बाढ़ या सुखाड़ की नहीं हैं। अब चुनौतियां जानबूझकर किए प्रदूषण, शोषण, अतिक्रमण, जलाधिकार हनन व बाजार की भी हैं। ऐसी बेसमझी से निपटने के लिए सभी को जलसाक्षर होना जरूरी है- विद्यार्थी, किसान, फैक्टरी मालिक, नेता, अधिकारी, इंजीनियर और वकील से लेकर उस बायो टेक्नोलॉजिस्ट को भी, जो उन्नत के नाम पर अधिक पानी पीने वाली किस्में विकसित कर रहे हैं।
हमें नौचंदी जैसे मेले भी चाहिए और मेरठ में मीट के कमेले भी। उद्योग और खेती... दोनों के बिना विकास का कोई भी पैमाना अधूरा है। धातु के बिना अब ढांचागत निर्माण संभव नहीं और पानी के बिना कच्ची धातु का शोधन असंभव है। कल्पना कीजिए कि बिजली के बिना तो पूरे मीडिया पर ही ताला लग जायेगा। तब हमारी - आपकी मुलाकात इतनी आसान तो नहीं ही रह जायेगी। सबसे ज्यादा पानी पीने व प्रदूषण करने वाली चीनी, शराब, कागज, रसायन तथा उपकरण निर्माण फैक्टियों के बिना सोचिए कि जिंदगी कैसी होगी? जाहिर है कि हमें सब चाहिए, लेकिन नदी, तालाब, पहाड़, जंगल आदि का नाश करके नहीं। उद्योग के बिना सुविधाभोगी जीवन शैली संभव नहीं, लेकिन पानी के बिना तो जीवन ही संकट में पड़ने वाला है। उपभोग और संरक्षण के बीच संतुलन के बिना यह दुनिया चल नहीं सकती। अतः संतुलन जरूरी है।एक पौधा और एक कुआं
बिहार के गांवों के भ्रमण के सिलसिले में नीतीश कुमार ने भागलपुर जिले के धरहरा गांव में यह पाया कि वहां जब भी किसी लड़की का जन्म होता है तो लोगो उसकी याद में फल देने वाला एक वृक्ष अवश्य लगाते हैं। वहां यह देखकर उनके मन में यह विचार आया कि क्यों नहीं पूरे बिहार में नए वृक्षों का जाल बिछा दिया जाए। नीतीश कुमार का यह प्रयास निश्चय ही सराहनीय है। परंतु आवश्यकता इस बात की है कि केवल वृक्ष ही नहीं लगाए जाएं उसके साथ चापाकल भी लगाए जाएं जैसा कि निर्मला देशपांडे का विचार था।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने निस्संदेह बिहार को एक स्वच्छ प्रशासन दिया है। इस दिशा में उन्होंने कई अभिनव प्रयोग किए हैं। माफिया सरगनाओं को जेल में डाल दिया है। लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए स्कूल में जाने वाली हर लड़की को मुफ्त साइकिल दी है। लड़कियों के स्कूलों में शौचालय का प्रबंध किया है। पूरे बिहार में सड़कों का जाल बिछा दिया है। बिहार में तो उद्योगों का जाल भी बिछ जाता यदि वहां बिजली की उपलब्धता होती। कोयले की सारी खदान झारखंड के हिस्से में चली गईं। दुर्भाग्यवश इन खदानों से बिहार के बिजलीघरों को कोयला नहीं मिल रहा है। इसी कारण वहां पर्याप्त बिजली का उत्पादन नहीं हो रहा है। पीछे मुड़कर देखने से ऐसा लगता है कि बिहार का बंटवारा ही गलत था। राजनेताओं ने अपने स्वार्थ के लिए इस फूलते-फलते राज्य को दो भागों में बांट दिया और आज की तारीख में दोनों राज्य गरीबी के शिकार हैं। बात केवल कोयला खदानों और बिजलीघरों की ही नहीं है। बिहार के तीन-चौथाई जंगल झारखंड में रह गए। वहां भी ठेकेदार माफिया ने जंगलों का बुरी तरह दोहन किया है।







