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जल संगठन गतिविधियां

जल संगठन गतिविधियां

कोका कोला के विरोध को अन्ना का समर्थन

Author: 
प्रवीन कुमार भट्ट
सरकार द्वारा कोकाकोला प्लांट लगाने के मनमाने फैसले को बिना देरी किए वापस लेना चाहिए। उत्तराखंड राज्य के जल, जंगल और ज़मीन ही यहां की जनता की पूँजी है और सरकार खुले हाथों से इस पूँजी को लुटा रही है। ऐसे में तो सबकुछ जनता के हाथ से निकल जाएगा। उत्तराखंड के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिमालय नीति, जल नीति सहित अनेक मसौदे राज्य सरकार को सौंपे हैं लेकिन उन पर सरकार ने कभी कोई पहल नहीं की। सुरेश भाई ने टीम अन्ना को छरबा गांव के लोगों के संघर्ष और सरकार द्वारा लुटाए जा रहे जंगल की उनके लिए उपयोगिता भी समझाई। देहरादून के छरबा गांव में कोकाकोला प्लांट स्थापित किए जाने के खिलाफ चल रहा संघर्ष एक और कदम आगे बढ़ गया है। 14 मई को आंदोलन को समर्थन देने छरबा गांव में पहुंचे समाजसेवी अन्ना हजारे ने ग्रामीणों के आंदोलन को हरसंभव सहयोग का भरोसा दिलाया। जनतंत्र यात्रा के दूसरे चरण के पहले दिन छरबा गांव पहुंचे अन्ना ने कहा कि लोकतंत्र का मौजूदा मॉडल फेल हो गया है। बकौल अन्ना गांधी जी ने देश की आज़ादी के समय तक ही कांग्रेस का समर्थन किया था। गांधी चाहते थे कि आज़ादी के बाद देश में दलविहीन जनतंत्र की स्थापना की जाए। अगर ऐसा होता तो देश में दलीय राजनीति और संसद के बजाय जनसंसद की भूमिका अधिक होती। आज राजनीतिक दल देश में विकास के जिस मॉडल को बढ़ावा दे रहे हैं वह भी देश की बहुसंख्यक जनता के लिए विनाश का माध्यम बन रहा है।

एक संसद नदी की

‘अरवरी संसद’ एक ऐसी मिसाल है, जो कुशासन के इस दौर में भी सुशासन की उम्मीद जगाती है। अकाल में भी सजल बने रहना इस बात का स्वयंसिद्ध प्रमाण है कि यदि कोई समुदाय स्वअनुशासित होना तय कर ले, तो वह दुर्दिन भी सुदिन की भांति टिका रह सकता है। संवाद, सहमति, सहयोग, सहकार और सहभाग - यह मिसाल संचालन के इन पांच प्रक्रियाओं के सातत्य और सक्रियता के नतीजे भी बताती है। क्या कभी देश की संसद इससे सीखेगी?

राजस्थान, जिला अलवर की तहसील थानागाजी में कभी गाजी का थाना था। प्रतापगढ़ में कभी अनाज की मंडी थी। इससे एक बात तो तय है कि यह इलाक़ा कभी पानीदार था। 1984 के साल में यहां पहुंचे राजेन्द्र सिंह ने इसे बेपानी पाया। सरकार के रिकार्ड में डार्कजोन! आखिर क्यों सूखे होंगे यहां के जोहड़? कैसे टूटी होंगी मेड़बंदियां? कैसे उजड़ी होंगी सरिस्का जैसे विशाल जंगल की समृद्धि? इन सवालों के जवाब में गोपालपुरा के मांगू पटेल ने जो कहा, वह मुझे कभी नहीं भूला - “आज़ादी के आई भाईसाब!.. म्हारी तो बर्बादी आगी। पैली लड़ाई बाहरी थी। मैं एकजुट था। मुट्ठी बंधी थी। फेर लड़ाई भित्तर की होगी। बंद मुट्ठी खुलगी। नियम-क़ायदा सब टूटगा। एक-दूसरे को रौंद के आगे बढ़वा के चक्कर में हम पिछड़ गे। पैली समाज टूटा, फेर खेतां की मेड़बंदियां और जोहड़ा की पालें। भगवाण को नी लाया छ, हम लाये छ इस इलाके में अकाल।’’

जॉब / नौकरी

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खासम-खास

जड़ें

Source: 
गांधी मार्ग, मई-जून 2013

आधुनिक दौर में, अपनी जड़ों से कट कर हमने जो विकास किया, उसके बुरे नतीजे तो चारों तरफ बिखरे पड़े हैं। स्थूल अर्थों में भी और सूक्ष्म अर्थों में भी। ढंका हुआ भूजल, खुला बहता नदियों, तालाबों का पानी और समुद्र तक बुरी तरह से गंदा हो चुका है। विशाल समुद्रों में हमारी नई सभ्यता ने इतना कचरा फेंका है कि अब अंतरिक्ष से टोह लेने वाले कैमरों ने अमेरिका के नक्शे बराबर प्लास्टिक के कचरे के एक बड़े ढेर के चित्र लिए हैं। लेकिन अभी इस स्थूल और सूक्ष्म संकेतों को यहीं छोड़ वापस उदारीकरण की तरफ लौटें।

कुछ शब्द ऐसे हैं कि वे हमारा पीछा ही नहीं छोड़ते। क्या-क्या नहीं किया हमने उन शब्दों से पीछा छुड़ाने के लिए। तब तो हम गुलाम थे। फिर भी हमने गुलामी की जंजीरों को तोड़ने की कोशिश के साथ ही अपने को दुनिया की चालू परिभाषा के हिसाब से आधुनिक बनाने का भी रास्ता पकड़ने के लिए परिश्रम शुरू कर दिया था। आजाद होने के बाद तो इस कोशिश में हमने पंख ही लगा दिए थे। हमने पंख खोले पर शायद आंखें मूंद लीं। हम उड़ चले तेजी से, पर हमने दिशा नहीं देखी।

अब एक लंबी उड़ान शायद पूरी हो चली है और हमें वे सब शब्द याद आने लगे हैं, जिनसे हम पीछा छुड़ा कर उड़ चले थे। अभी हम जमीन पर उतरे भी नहीं हैं लेकिन हम तड़पने लगे हैं, अपनी जड़ों को तलाशने।

यों जड़ें तलाशना, जड़ों की याद अनायास आना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन इस प्रयास और याद से पहले हमें इससे मिलते-जुलते एक शब्द की तरफ भी कुछ ध्यान देना होगा। यह शब्द है- जड़ता। जड़ों की तरफ मुड़ने से पहले हमें अपनी जड़ता की तरफ भी देखना होगा, झांकना होगा। यह जड़ता आधुनिक है।

पानी सहेजने का अनुपम तरीका

Source: 
यू-ट्यूब

आज हम पानी के परंपरागत जल स्रोत कुएँ, बावड़ियां, टांके, झालरे, जोहड़, नाड़ियां, बेरियों, तालाब और जलाशयों जैसे पानी के स्रोत को बिसरा चुके हैं। जो अभी भी हमारे लिए जल संग्रहण का काम कर रहे हैं और लोगों के लिए लाइफ लाइन साबित हो सकते हैं।
इस खबर के स्रोत का लिंक: 

https://www.youtube.com

उद्गम शेष

Author: 
विमल भाई
Source: 
माटू जनसंगठन
अधिसूचना में जहां बड़े बांधों पर पूरी तरह से रोक की बात है वहीं 25 मेगावाट से छोटे बांधों को पूरी तरह से हरी झंडी देने का प्रयास है। अस्सीगंगा में 4 जविप निर्माणाधीन हैं जो 10 मेगावाट से छोटी हैं। जिनमें एशियाई विकास बैंक द्वारा पोषित निमार्णाधीन कल्दीगाड व नाबार्ड द्वारा पोषित अस्सी गंगा चरण एक व दो जविप भी है। उत्तरकाशी में भागीरथीगंगा को मिलने वाली अस्सीगंगा की घाटी पर्यटन की दृष्टि से ना केवल सुंदर है वरन् घाटी के लोगो को स्थायी रोज़गार दिलाने में भी सक्षम है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की ताजी अधिसूचना के अनुसार गौमुख से उत्तरकाशी तक भागीरथीगंगा के लगभग 100 किलोमीटर लम्बे 4179.59 वर्ग किलोमीटर के संपूर्ण जल संरक्षण क्षेत्र को भागीरथीगंगा के पर्यावरणीय प्रवाह और परिस्थितिकी को बनाए रखने के लिए पारिस्थितिकीय और पर्यावरणीय दृष्टि से पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया गया है। इसके साथ ही उत्तराखंड में खासकर उत्तरकाशी के इस क्षेत्र में फिर से धरने प्रर्दशन चालू हो गए।

पूर्व के जी.डी. अग्रवाल और वर्तमान में स्वामी सानंद के उपवास से आस्था के नाम पर बांध रोकने के प्रयासों पर यह पक्की मोहर है। उत्तराखंड सरकार ने नवंबर 2008 पाला-मनेरी व केन्द्र सरकार ने 2010 में लोहारीनाग-पाला बांध रोका था। यह जानते हुए भी कि केन्द्र की कांग्रेस सरकार और राज्य की बीजेपी सरकार के ही द्वारा यह बांध रुके हैं। स्थानीय स्तर पर बांध समर्थन में आंदोलन करके वोट बटोरने की खूब कोशिशें चली हैं। राजनीतिक दलों ने चाहे वह कांग्रेस हो या बीजेपी पिछले लोकसभा, विधानसभा और नगर निगम चुनावों में इसका भरपूर राजनीतिक फायदा उठाया।

जैव विविधता संरक्षण मंत्र : जीओ और जीने दो

अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस (22 मई) पर विशेष


दरअसल हमने अपने लालच इतने बढ़ा लिए हैं कि हर चीज कम पड़ गई है सिवाय गेहूं और कपड़ों के! इस बार मराठा सूखे में पानी का टोटा रहा, लेकिन रोटी की कोई कमी आज भी नहीं है।’’ कभी रोटियां कम पड़ जाती थीं, पेट भरने के लिए। अब बोरे कम पड़ गये हैं अनाज भरने के लिए। कभी कपड़े कम पड़ जाते थे, तन ढकने के लिए। अब कपड़े हैं, पर हम तन ढँकना नहीं चाहते।’’ दिलचस्प है कि कीमतें फिर भी कम नहीं होती। खैर! यह काल्पनिक बात नहीं कि धरती, पानी, हवा, जंगल, बारिश, खनिज, मांस, मवेशी... कुदरत की सारी नियामतें अब इंसानों को कम पड़ने लगी हैं। इंसानों ने भी तय कर लिया है कि कुदरत की सारी नियामतें सिर्फ और सिर्फ इंसानों के लिए है।

औरों को क्या कहूं, पहले मैं दिल्ली के जिस मकान में रहता था, वह मकान छोटा था, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था। क्योंकि वह मकान नहीं, घर था। उस में चींटी से लेकर चिड़िया तक सभी के रहने की जगह थी। अब मकान थोड़ा बड़ा हो गया है। धरती से हटकर आसमां हो गया है। लेकिन इसमें अब इंसान के अलावा किसी के लिए और कोई जगह नहीं है। मंज़िलें बढ़ी हैं; लेकिन साथ-साथ रोशनदानों पर बंदिशें भी। मेरी बेटी गौरैया का घोसला देखने को तरस गई है। कबूतर की बीट से नीचे वालों को भी घिन आने लगी है। चूहे, तिलचट्टे, मच्छर और दीमक ज़रूर कभी-कभी अनाधिकार घुसपैठ कर बैठते हैं। उनका खात्मा करने का आइडिया ‘हिट’ हो गया है। हमने ऐसे तमाम हालात पैदा करने शुरू कर दिए हैं कि यह दुनिया..दुनिया के दोस्तों के लिए ही नो एंट्री जोन में तब्दील हो जाए। ऐसे में जैव विविधता बचे, तो बचे कैसे? ग़ौरतलब है कि अब इंसानों की गिनती, दुनिया की दूसरी कृतियों के दुश्मनों में होने लगी है। खल्क खुदा का! जैव विविधता इंसानी शिकंजे में!!

जल संकट ने आंखों में उतारा पानी

Author: 
प्रसून लतांत
Source: 
जनसत्ता रविवारी, 19 मई 2013
यों भारत में इतनी बारिश होती है कि अगर उसका कारगर ढंग से रखरखाव किया जाए तो पानी के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ेगा। लेकिन कुप्रबंधन, उदासीन नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों में इच्छाशक्ति की कमी ने पूरे देश में जल संकट पैदा कर दिया है। पेयजल का व्यवसायीकरण होने से भी स्थिति विषम बनी हुई है। पानी की कहानी बयान कर रहे हैं प्रसून लतांत।

पानी के लिए सामने खड़ी समस्याओं के लिए हम और हमारी सरकारें भी पूरी तरह जिम्मेवार हैं। हमने अपने पूर्वजों के अनुभव और उनके तौर-तरीकों को पिछड़ा बता कर बड़े-छोटे बांध और तटबंध बनाने के नाम पर नदियों के प्रवाह से खिलवाड़ किया और उसमें कारखाने का रासायनिक डाल कर उसे प्रदूषित किया। बाकि बचे झील-तालाबों और कुओं में मिट्टी डाल उस पर दुकानें बना लीं। इन सब कारणों से अब धरती के ऊपरी सतह पर उपलब्ध पानी के ज्यादातर स्रोत सूख रहे हैं। देश की ज्यादातर नदियां सूख रही हैं। इसके कारण खेतों की सिंचाई नहीं हो पा रही है। पीने के पानी की किल्लत देश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही है। पानी के बढ़ते संकट के कारण सभी के आंखों में पानी उतरने लगा है। पानी का सवाल अकेली दिल्ली या देश के किसी एक राज्य और उसकी राजधानी और उनके जिलों भर का मामला नहीं है, यह देश दुनिया में व्याप गया है। नमक से कहीं ज्यादा जरूरी इस प्राकृतिक साधन पर खतरे मंडरा रहे हैं। इस साधन को सहेजने, संवारने और बरतने वाले आम आदमी का हक इस पर से टूटता जा रहा है और इसे हड़पने वाली कंपनियां दिनोंदिन मालामाल होती जा रही हैं और ऐसे में केवल सरकार है, जिससे उम्मीद की जाती है तो वह भी इसका कारगर हल खोजने के बदले कहीं तमाशबीन तो कहीं शोषकों के खेल में भागीदार बन कर लोगों के संकट को बढ़ा रही है। इन सभी कारणों से आम आदमी का भरोसा टूटा है और उनके आंदोलन शुरू हो गए हैं। इसी के साथ पानी से जुड़े सभी पुराने सरोकार और इस पर आधारित संस्कृति का ताना-बाना भी छिन्न-भिन्न हो गया है, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी और कभी होगी तो उसमें काफी समय लग जाएगा।

जंगल-ज़मीन बचाने के लिए सतपुड़ा में आंदोलन

जल, जंगल, ज़मीन और जीवन बचाओ की इस रैली में रंगबिरंगी पोशाकों में महिलाएं रैली की अगली पंक्ति में चल रही थीं। सुंदर क्यारी सी सजी उनकी टोली आकर्षण का केंद्र थी, जिसमें बुजुर्ग महिलाओं से लेकर स्कूली बच्चियां भी शामिल थीं। एक पिता अपने छोटे बेटे को लेकर आया था जिसकी वह अंगुली पकड़कर जुलूस में चल रहा था। साथ में उनके बेटा भी मुट्ठी बांध कर हवा में हाथ नारा लगा रहा था। रैली में आदिवासी खुद चंदा करके अपने गाँवों के ट्रेक्टर-ट्राली से आए थे, जैसे नर्मदा स्नान करने जाते हैं। इन दिनों सतपुड़ा के जंगलों के आदिवासी आंदोलित हैं। इसकी एक झलक होशंगाबाद में जब दिखाई दी तब आदिवासियों के जोशीले नारों से यहां की गलियाँ गूँज उठीं। दूरदराज के गाँवों से सैकड़ों की तादाद में यहां आकर आदिवासियों ने जता दिया कि शेर पालने के नाम पर उनकी रोजी-रोटी पर लगाई जा रही रोक उन्हें मंज़ूर नहीं है। इसका पूरी ताकत से विरोध किया जाएगा। इस जुलूस का फौरी असर यह हुआ कि कलेक्टर को अपने लोहे के गेट खोलकर आदिवासियों को बातचीत के लिए बुलाना पड़ा और अब खबर आई है कि मुख्यमंत्री ने भी कहा है कि अगर स्थानीय लोग प्रस्तावित कानून का विरोध कर रहे हैं तो इस पर विचार किया जाएगा। और जरूरत पड़ी तो इसे बदला जाएगा। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में गत 3 मई को नर्मदा किनारे से जब आदिवासियों की रैली शुरू हुई और छोटी गलियों व सड़क से होती हुई कलेक्टर कार्यालय पहुंची। इतनी बड़ी संख्या में ग्रामीणों को देखकर शहरवासी भौचक्के रह गए। वे अपने मकानों और दुकानों से आदिवासियों को देखने बाहर निकल आए।

मेंढा गांव की गल्ली सरकार

Author: 
मिलिंद बोकील
Source: 
गांधी मार्ग, मई-जून 2013
1984 में चंद्रपुर-गडचिरोली में ‘जंगल बचाव-मानव बचाव’ आंदोलन शुरू हुआ। आंध्रप्रदेश में गोदावरी नदी पर इंचमपल्ली में तथा पास के बस्तर जिले में इंद्रावती नदी पर भोपालपट्टनम् में बांध बनाने की योजना थी। इस क्षेत्र में वैनगंगा और इंद्रावती ये मुख्य नदियां हैं; दोनों गोदावरी की उपनदियां। इंद्रावती महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के बीच की सीमारेखा है, तो वैनगंगा चंद्रपुर और गडचिरोली जिलों के बीच की सीमारेखा है। दोनों प्रकल्प महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश की सीमा पर थे; फिर भी गडचिरोली जिले का काफी जंगल और आदिवासी क्षेत्र डूबने वाला था। 27 अप्रैल 2011। गांव मेंढा, तहसील धानोरा, जिला गडचिरोली के बाहर का मैदान। समय दोपहर साढ़े बारह था। चिलचिलाती धूप। तपी हुई जमीन। ऊपर चमकता आसमान। मैदान में बड़ा-सा शामियाना खड़ा है। सभा चल रही है। मंच पर नेताओं और अफसरों का हुजूम। दिल्ली से केंद्रीय वनमंत्री आए हैं। उनके साथ योजना आयोग की सचिव भी। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री भी तीन काबीना मंत्रियों- वनमंत्री तथा आदिवासी विकास मंत्री- के साथ बिराजे हैं। तीन स्थानीय विधायक भी मौजूद हैं। जिला परिषद के अध्यक्ष भी। वन तथा राजस्व विभाग के वरिष्ठ अफसरों की तो पूरी पलटन ही हाजिर है। उनके सामने जिला स्तर के अफसर बौने लग रहे हैं। क्यों इकट्ठा हुए हैं ये सब? दिल्ली और मुंबई की सरकारें मेंढा-लेखा गांव में आई हैं, मेंढा की ग्रामसभा को उनके जंगल में पैदा होने वाले बांस की बिक्री का अधिकार सुपुर्द करने के लिए। दो साल पहले ही 2006 के वन अधिकार कानून ने मेंढा को उसके 1800 हेक्टेयर वन-जमीन पर स्वामित्व-अधिकार दिया था। महाराष्ट्र के राज्यपाल ने खुद आकर उस अधिकार का कागज गांव को सौंपा था।

हे भगवान प्लास्टिक

Author: 
सुसान फ्रिंकेल
Source: 
गांधी मार्ग, मई-जून 2013
आज पूरी दुनिया, नई, पुरानी, पढ़ी-लिखी, अनपढ़ दुनिया भी इन्हीं प्लास्टिक की थैलियों को लेकर एक अंतहीन यात्रा पर निकल पड़ी है। छोटे-बड़े बाजार, देशी-विदेशी दुकानें हमारे हाथों में प्लास्टिक की थैली थमा देती हैं। हम इन थैलियों को लेकर घर आते हैं। कुछ घरों में ये आते ही कचरे में फेंक दी जाती हैं तो कुछ साधारण घरों में कुछ दिन लपेट कर संभाल कर रख दी जाती हैं, फिर किसी और दिन कचरे में डालने के लिए। इस तरह आज नहीं तो कल कचरे में फिका गई इन थैलियों को फिर हवा ले उड़ती है, एक और अंतहीन यात्रा पर। फिर यह हल्का कचरा जमीन पर उड़ते हुए, नदी नालों में पहुंच कर बहने लगता है। पिछले दिनों देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा कि हमारा देश प्लास्टिक के एक टाईम बम पर बैठा है। यह टिक-टिक कर रहा है, कब फट जाएगा, कहा नहीं जा सकता। हर दिन पूरा देश कोई 9000 टन कचरा फेंक रहा है! उसने इस पर भी आश्चर्य प्रकट किया है कि जब देश के चार बड़े शहर- दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता ही इस बारे में कुछ कदम नहीं उठा रहे तो और छोटे तथा मध्यम शहरों की नगरपालिकाओं से क्या उम्मीद की जाए? कोई नब्बे बरस पहले हमारी दुनिया में प्लास्टिक नाम की कोई चीज नहीं थी। आज शहर में, गांव में, आसपास, दूर-दूर जहां भी देखो प्लास्टिक ही प्लास्टिक अटा पड़ा है। गरीब, अमीर, अगड़ी-पिछड़ी पूरी दुनिया प्लास्टिकमय हो चुकी है। सचमुच यह तो अब कण-कण में व्याप्त है - शायद भगवान से भी ज्यादा! मुझे पहली बार जब यह बात समझ में आई तो मैंने सोचा कि क्यों न मैं एक प्रयोग करके देखूं- क्या मैं अपना कोई एक दिन बिना प्लास्टिक छूए बिता सकूंगी। खूब सोच समझ कर मैंने यह संकल्प लिया था। दिन शुरू हुआ। नतीजा आपको क्या बताऊं, आपको तो पता चल ही गया होगा। मैं अपने उस दिन के कुछ ही क्षण बिता पाई थी कि प्लास्टिक ने मुझे छू लिया था!