जल संगठन गतिविधियां

जन आंदोलन के बिना नहीं बच सकेगी यमुना

Source: 
जनसत्ता, 19 अगस्त 2010
Author: 
मनोज मिश्र

प्रबुद्ध नागरिकों से मुहिम में जुड़ने की अपील, गोष्ठी के जरिए लाएंगे जागरुकता


अब दिल्ली नागरिक परिषद ने यमुना बचाने के लिए दिल्ली के नागरिकों का जनांदोलन खड़ा करने का फैसला किया है। परिषद के अध्यक्ष वीरेश प्रताप चौधरी कहते हैं कि यमुना की दुर्दशा खुद नहीं हुई है। अगर इसके नैसर्गिक बहाव को रोका नहीं जाता तो यमुना दिल्ली के साथ कई शहरों की प्यास बुझाती। साथ ही लाखों एकड़ खेतों और जंगलों को आबाद करती। यमुना की यह दशा सरकारों के नाकारापन और स्वार्थ के कारण हुई है। इसलिए केवल सरकारों से यमुना को बचाने की उम्मीद करना गलत होगा। अभी इस अभियान में प्रबुद्ध नागरिकों को जोड़ने के लिए अनेक गोष्ठी आयोजित की जा रही है। इस कड़ी में पिछले महीने एक गोष्ठी हुई और अगले महीने 11 सितंबर को बीपी हाउस में पूरे दिन की गोष्ठी होने वाली है।

यमुना बचाओ अभियान के नाम से एक अपील

खासम-खास

आदर्श गांव कवठे पिरान

Source: 
वेब दुनिया हिन्दी, 16 अक्टूबर 2007
Author: 
निवेदिता पाठक
भारत के गाँवों को लेकर महात्मा गाँधी का एक सपना था, पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर, साफ़, सुंदर, और सपनों की कल्पना जैसा गाँव। महाराष्ट्र राज्य के सांगली ज़िले का कवठे पिरान गाँव शायद ऐसा ही एक गाँव है। इस गाँव की बदली तस्वीर के पीछे महाराष्ट्र सरकार की एक अनूठी परियोजना का हाथ है। गाँवों में बदलाव लाने के लिए राज्य सरकार ने महाराष्ट्र के जाने माने संतों के नाम से संत गाड़गे बाबा स्वच्छता अभियान और संत टुकड़ो जी महाराज स्वच्छता ग्राम नाम की स्पर्धा शुरु की है। निवेदिता पाठक इसी गाँव से एक दिन बिताकर लौटी हैं।

अलकनंदा की यह अनदेखी

वेब/संगठन: 
amarujala.com
Source: 
2 सितम्बर 2010
Author: 
जयसिंह रावत
देवप्रयाग पर भागीरथी और अलकनन्दा का संगमदेवप्रयाग पर भागीरथी और अलकनन्दा का संगम

प्रतिमत


पर्यावरणवादियों और कुछ साधु-संतों ने उत्तरकाशी जिले में 480 मेगावाट क्षमता की पाला मनेरी और 381 मेगावाट की भैरोंघाटी जल विद्युत परियोजनाओं को बंद कराने के बाद अब गंगोत्री के नजदीक उसी क्षेत्र में बन रही लोहारी नागपाला को बंद कराने के लिए भी केंद्र सरकार को झुका ही दिया। इस प्रकार सरकार जोगियों की हठ के आगे फिर नतमस्तक हो गई।

केंद्र सरकार ने उत्तरकाशी जिले में 600 मेगावाट की जिस लोहारी नागपाला को बंद करने की घोषणा की, उस पर लगभग 40 प्रतिशत सिविल कार्य पूरा हो चुका था और करीब 600 करोड़ रुपये भी खर्च हो गए थे। अब वहां बनी सुरंगों को बंद करने पर 2,000 करोड़ से अधिक खर्च करने होंगे। यही नहीं, इससे देश के भावी पावर हाउस के रूप में प्रचारित उत्तराखंड गंभीर बिजली संकट

निजीकरण को ठानी, अब मध्य प्रदेश का पानी

Source: 
विस्फोट.कॉम, 1 सितम्बर 2010
Author: 
सरिता अरगरे
वेतन-भत्तों और सुविधाओं के विस्तार को लेकर लगातार हाय तौबा करने वाले जनप्रतिनिधि अब जनता की बुनियादी ज़रुरतों से पल्ला झाड़कर औद्योगिक घरानों की ताल पर थिरकते दिखाई दे रहे हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पानी, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएँ जुटाने का ज़िम्मा सरकारों को सौंपा गया है। मगर सरकारें अब जनहित के कामों को छोड़कर एक के बाद एक योजनाओं को निजी हाथों में सौंपती चली जा रही है, फ़िर चाहे वो प्राकृतिक संसाधन हों, ज़मीन हो या आम जनता की सेवा से जुड़े मुद्दे हों। इसी कड़ी में अब नेताओं और उद्योगपतियों को पानी मुनाफ़े का सौदा नज़र आने लगा है।

सुखाड़ का शिकार हो गया बिहार

Source: 
विस्फोट.कॉम
Author: 
पंकज कुमार
उत्तरी बिहार के कुछ इलाकों में आए बाढ़ के बारे में टीवी चैनल पर खबर देखने या फिर किसी सामाचार पत्र में खबर पढ़ कर यह अंदाजा मत लगाइए कि बिहार में इस साल भी खूब बारिश हो रही है। दरअसल बिहार के कुछ इलाकों में आई बाढ़, नेपाल की नदियों से बहकर आया पानी है जिसकी वजह से कुछ क्षेत्र जलमग्न हो गए हैं। लेकिन इस पानी से किसानों का भला नहीं होने वाला है।

मेरा गांव

Source: 
गांधी मार्ग, मई-जून 2003
Author: 
सत्येन्द्र शर्मा
यह कैसी विडम्बना है कि किसी भी राष्ट्र जीवन के स्थूल और नकारात्मक चिह्न दूसरे देश, विशेषकर भारत में जितनी जल्दी दिखाई देने लगते हैं, शायद ही किसी दूसरे देश के जातीय जीवन में उतनी जल्दी दिखाई देते हों? यह बात इसलिए ज्यादा बल देकर रेखांकित करना जरूरी है क्योंकि हमारे राष्ट्रीय जन-जीवन में पर्यावरण के प्रतिगामी और विनाशकारी लक्षण जितनी तेजी से दिखाई पड़ रहे हैं, वैसी प्रवृत्तियां एक समृद्ध पर्यावरणीय चिन्तन वाले देश में पनपना आत्मवंचना का साक्षात प्रमाण है। अपने वर्तमान नगरीय आवास से मात्र 65-70 किलोमीटर दूरी पर स्थित जब-जब अपने गांव सिवान जाता हूं तो पहुंचते ही मुझे वह नाला दिखाई देता है, जिसमें मेरे शैशव और कैशौर्य ने कितने संक्रान्ति कालों में डुबकियां लगाकर देह और मन की तपन शान्त की है। कितनी वर्षा ऋतुओं में तट की वर्जनाओं को तोड़कर मन के उच्छल आवेग को तरंगायित होने का अवसर हाथ लगा है। यह नाला हमारे गांव की जीवन रेखा था।

सुनता रहता था, उस नाले का स्रोत केंद्र कोई अनाम छोटा सा झरना है और देखता रहता था कि उस अनाम झरने से प्रवाहित होने वाली अक्षय और अनन्त जलराशि अपने जनपद के मेरे सबसे बड़े गांव के मनुष्य सहित सभी जीवधारियों और खेतों की प्यास बुझाने वाली संजीवनी धारा है। इस नाले की आद्रता गांव के समूचे कुओं और तालाबों की धमनियों में भी रक्त संचार किए रहती थी। राष्ट्रीय स्वतंत्रता के विकास के पहले चरण अर्थात पांचवें दशक में अचानक गांव में पेयजल टंकी और नलों में उपलब्ध कराया जाने लगा। कुएं अनुपयोगी मानकर कचरों के भण्डार में तब्दील होने लगे और उपेक्षित पड़े तालाब अपना अस्तित्व खोने लगे।

नाराज हैं कंपनियां : मॉड बार्लो

Source: 
जनसत्ता 29 अगस्त 2010
Author: 
अफलातून
पानी के हक के लिए चले अभियान में सर्वाधिक चर्चित नाम है। आंदोलनकारी और लेखिका मॉड बार्लो का। कनाडा के सब से बड़े नागरिक संगठन काउंसिल ऑफ कैनेडियंस की अध्यक्ष हैं वे। यह संगठन अहिंसा और सिविल नाफरमानी में विश्वास करता है। दस विश्वविद्यालयों ने उन्हें सामाजिक सक्रियता के लिए मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया है। मुक्त व्यापार विरोधी होने के कारण कैथोलिक बिशप्स कांफ्रेंस से निकाले गए टोनी क्लार्क के साथ ‘वैकल्पिक नोबेल’ कहे जाने वाला ‘राइट लाइवलीहुड’ पुरस्कार भी उन्हें दिया गया है। चाहे बोलीविया के कोचाबांबा शहर की पानी व्यवस्था के खिलाफ चला आंदोलन हो या केरल के प्लाचीमाड़ा के ग्रामीणों का एक शी