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पर्यावरण प्रदूषण (Environment Pollution)

Author: 
महेन्द्र प्रताप सिंह
Source: 
अनुसंधान (विज्ञान शोध पत्रिका) अक्टूबर 2014

खतरनाक स्तर पर वायु प्रदूषण प्राचीन काल में प्रकृति और मानव के बीच भावनात्मक संबंध था। मानव अत्यंत कृतज्ञ भाव से प्रकृति के उपहारों को ग्रहण करता था। प्रकृति के किसी भी अवयव को क्षति पहुँचाना पाप समझा जाता था। बढ़ती जनसंख्या एवं भौतिक विकास के फलस्वरूप प्रकृति का असीमित दोहन प्रारम्भ हुआ। भूमि से हमने अपार खनिज सम्पदा, डीजल, पेट्रोल आदि निकाल कर धरती की कोख को उजाड़ दिया। वृक्षों को काट-काट कर मानव समाज ने धरती को नग्न कर दिया। वन्य जीवों के प्राकृतवास वनों के कटने के कारण वन्य-जीव बेघर होते गए। असीमित औद्योगीकरण के कारण लगातार जहर उगलती चिमनियों ने वायुमण्डल को विषाक्त एवं निष्प्राण बना दिया। हमारी पावन नदियाँ अब गंदे नाले का रूप ले चुकी हैं। नदियों का जल विशाक्त होने के कारण उसमें रहने वाली मछलियाँ एवं अन्य जलीय जीव तड़प-तड़प कर मर रहे हैं। बढ़ते ध्वनि प्रदूषण से कानों के परदों पर लगातार घातक प्रभाव पड़ रहा है। लगातार घातक रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग भूमि को उसरीला बनाता जा रहा है। पृथ्वी पर अम्लीय वर्षा का प्रकोप धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है तथा लगातार तापक्रम बढ़ने से पहाड़ों की बर्फ पिघल रही है जिससे पृथ्वी का अस्तित्व संकटग्रस्त होता जा रहा है।

पर्यावरण प्रदूषण आज विभिन्न घातक स्वरूपों में विद्यमान है जो मानव सभ्यता के अस्तित्व को चुनौती दे रहा है। स्थिति यहाँ तक आ गई है कि सृष्टि का भविष्य संकटग्रस्त है। पर्यावरण प्रदूषण के प्रमुख स्वरूप निम्न प्रकार हैं-

1. वायु प्रदूषण


मानव को प्रकृति प्रदत्त एक नि:शुल्क उपहार मिला है और वह है- वायु। यह उपहार सभी जीवों का आधार है। मानव बिना भोजन एवं बिना जल के कुछ समय भले ही व्यतीत कर ले, बिना वायु के वह दस मिनट भी जीवित नहीं रह सकता। यह अत्यंत चिन्ता का विषय है कि प्रकृति प्रदत्त जीवनदायिनी वायु लगातार जहरीली होती जा रही है। शहरों का असीमित विस्तार, बढ़ता औद्योगीकरण, परिवहन के साधनों में लगातार वृद्धि तथा विलासिता की वस्तुएं (जैसे- एयरकन्डीशनर, रेफ्रिजरेटर आदि) वायु प्रदूषण को लगातार बढ़ावा दे रही हैं।

मानव 24 घण्टे में लगभग 22,000 बार साँस लेता है तथा इसमें प्रयुक्त वायु की मात्रा लगभग 35 गैलन या 16 किग्रा है। ऐसी वायु जो हानिकारक अवयवों से मुक्त हो, उसे शुद्ध वायु कहते हैं। वायु के मुख्य संघटकों में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन एवं कार्बन डाइ ऑक्साइड हैं। उक्त के अतिरिक्त वायुमण्डल में थोड़ी मात्रा में आर्गन या नियॉन जैसी विरल गैसें भी पाई जाती हैं। वायुमण्डल में प्रमुख गैसों की सान्द्रता निम्न प्रकार है-

 

1.

नाइट्रोजन

79.20 प्रतिशत

2.

ऑक्सीजन

20.60 प्रतिशत

3.

कार्बन डाइ ऑक्साइड

0.20 प्रतिशत

4.

अन्य

अति सूक्ष्म रूप में

 

आधुनिक युग में उद्योगों की चिमनियों, बढ़ते वाहनों एवं अन्य कारणों से वायुमण्डल में अनेक हानिकारक गैसें मिश्रित हो रही हैं जिनमें सल्फर डाइ ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, नाइट्रोजन के विभिन्न ऑक्साइड, क्लोरो फ्लोरो कार्बन एवं फार्मेलिडहाइड मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त सड़कों पर चल रहे वाहनों से निकला सीसा (लेड), अधजले हाइड्रोकार्बन और विषैला धुआँ भी वायुमण्डल को लगातार प्रदूषित कर रहे हैं। वायुमण्डलीय वातावरण के इस असंतुलन को ‘वायु प्रदूषण’ कहते हैं।

अत्यधिक वायु प्रदूषण के कारण आसमान अब भूरा दिखाई देता है। विषाक्त वायु को अवशोषित करने वाले वृक्षों के कटान से वायुमण्डल में प्राणवायु ऑक्सीजन की लगातार कमी हो रही है तथा दूषित गैसों का दबाव बढ़ रहा है।

विभिन्न वायु प्रदूषक स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होते हैं। वायुमण्डल में इन विषाक्त गैसों की उपस्थिति के कारण स्मॉग (स्मोक + फॉग) का निर्माण होता है। लंदन एवं लॉस एंजेल्स में स्मॉग निर्माण से अनेक लोगों की मृत्यु हो चुकी है। हमारे देश में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में मिथाइल आइसो सायनाइड गैस से वायु इतनी प्रदूषित हुई जिससे हजारों लोग मौत एवं विकलांगता का शिकार हो गए। प्रदूषित वायु मानव के श्वसन-तंत्र को कुप्रभावित करती है।

विभिन्न गैसों का घातक प्रभाव निम्न प्रकार है-

 

क्र.सं.

प्रदूषक

प्रभाव

1.

कार्बन मोनो ऑक्साइड

रक्त के हीमोग्लोबिन से मिलकर विषैला पदार्थ कार्बाक्सीहीमोग्लोबिन बनता है तथा अनेक व्याधियां पैदा करता है।

2.

क्लोरीन

आँख, नाक, गले में जलन, आँखों में सूजन तथा खाँसी की बीमारी

3.

धूलकण

एलर्जी, साँस के रोग, रेत की अधिकता से सिलकोसिस नामक रोग

4.

एसबेस्टस कण

एस्बेस्टॉसिस नामक रोग

5.

लेड कण

लेड विषाक्तता तथा कैंसर

6.

मैगनीज कण

निमोनिया साँस की बीमारी

7.

हाइड्रोजन सल्फाइड

नाक, कान, गले में जलन, लकवा

8.

हाइड्रोजन फ्लोराइड

बच्चों की शारीरिक संरचना में विकृति तथा फ्लोरोसिस

9.

हाइड्रोजन के ऑक्साइड

श्वसन क्रिया अवरूद्ध होने से फेफड़ों में धूलकण कजली का अधिक प्रवेश।

10.

फास्जीन

खाँसी, क्षोभ को प्रेरित करती है।

11.

पारे की वाष्प

अत्यंत विषैला होने की वजह से पारे की विषाक्तता हो जाती है।

12.

नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड

जलन, फेफड़ों के रोग तथा दृष्टि की समस्या होती है।

13.

ओजोन

आँख, नाक, गले में जलन, दमे की बीमारी तथा वातावरण में स्मॉग बनाना।

14.

सल्फर डाइ ऑक्साइड

सिरदर्द, उल्टी, साँस लेने में तकलीफ तथा मृत्यु दर में वृद्धि।

15.

रेडियोधर्मी कण

मुख्यत: कैंसर तथा आगे की पीढ़ी में संतानों में विकृति होना तथा आयु भी घटती है।

 

 
उक्त के अतिरिक्त प्रदूषित वायुमण्डल के कारण धातु की बनी वस्तुओं में अनेक बार रंगाई करनी पड़ती है। वायु प्रदूषण से ऐतिहासिक धरोहरों को भी क्षति पहुँचती है। ताजमहल का ‘‘पत्थर कैंसर’’ वायु प्रदूषण का ही परिणाम है। धुआँ तथा धूल के सूक्ष्म कणों के कारण सूर्य का प्रकाश भूमि तक ठीक से नहीं पहुँच पाता जिससे आकाश की निर्मलता घटती है। इससे वायुयानों के चालन में कठिनाई होती है और दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।

वायु प्रदूषण से होने वाले असंतुलन का परिणाम हमें चातुर्दित दिखाई दे रहा है। इस समस्या के समाधान के लिये भारत सरकार ने इस दिशा में वायु (प्रदूषण, निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम- 1981 पारित किया। केंद्र में केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड तथा विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रदूषण नियंत्रण केंद्रों की स्थापना की गई। जिन उद्योगों द्वारा प्रदूषण बोर्ड के निर्देशों के बावजूद प्रदूषण नियंत्रण के संबंध में यथोचित कार्यवाही नहीं की जाती उनके विरुद्ध अभियोजनात्मक कार्यवाही की जाती है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा परिवेशीय वायु की गुणवत्ता का मानक बनाया गया है, जो निम्न प्रकार है-

 

(सांद्रता-माइक्रोग्राम/घन मीटर)

क्र.सं.

परिक्षेत्र

निलंबित सल्फर डाइ ऑक्साइड

सूक्ष्म

कार्बन मोनो ऑक्साइड

नाइट्रोजन के ऑक्साइड

1.

औद्योगिक और मिश्रित वातावरण

120

500

5000

120

2.

आवासीय और शहरी

80

200

2000

80

3.

संवेदनशील क्षेत्र (ऐतिहासिक इमारतें, पर्यटन स्थल एवं अभयारण्य आदि)

30

100

1000

30

 

 

 

क्र.सं.

प्रदूषक

प्रभाव

1.

कार्बन मोनो ऑक्साइड

रक्त के हीमोग्लोबिन से मिलकर विषैला पदार्थ कार्बाक्सीहीमोग्लोबिन बनता है तथा अनेक व्याधियां पैदा करता है।

2.

क्लोरीन

आँख, नाक, गले में जलन, आँखों में सूजन तथा खाँसी की बीमारी

3.

धूलकण

एलर्जी, साँस के रोग, रेत की अधिकता से सिलकोसिस नामक रोग

4.

एसबेस्टस कण

एस्बेस्टॉसिस नामक रोग

5.

लेड कण

लेड विषाक्तता तथा कैंसर

6.

मैगनीज कण

निमोनिया साँस की बीमारी

7.

हाइड्रोजन सल्फाइड

नाक, कान, गले में जलन, लकवा

8.

हाइड्रोजन फ्लोराइड

बच्चों की शारीरिक संरचना में विकृति तथा फ्लोरोसिस

9.

हाइड्रोजन के ऑक्साइड

श्वसन क्रिया अवरूद्ध होने से फेफड़ों में धूलकण कजली का अधिक प्रवेश।

10.

फास्जीन

खाँसी, क्षोभ को प्रेरित करती है।

11.

पारे की वाष्प

अत्यंत विषैला होने की वजह से पारे की विषाक्तता हो जाती है।

12.

नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड

जलन, फेफड़ों के रोग तथा दृष्टि की समस्या होती है।

13.

ओजोन

आँख, नाक, गले में जलन, दमे की बीमारी तथा वातावरण में स्मॉग बनाना।

14.

सल्फर डाइ ऑक्साइड

सिरदर्द, उल्टी, साँस लेने में तकलीफ तथा मृत्यु दर में वृद्धि।

15.

रेडियोधर्मी कण

मुख्यत: कैंसर तथा आगे की पीढ़ी में संतानों में विकृति होना तथा आयु भी घटती है।

 

 

वायु प्रदूषण को रोकने हेतु प्रमुख उपाय निम्न प्रकार हैं-


1. वायु प्रदूषण रोकने में वृक्षों का सबसे बड़ा योगदान है। पौधे वायुमण्डलीय कार्बन डाइ ऑक्साइड अवशोषित कर हमें प्राणवायु ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। अत: सड़कों, नहर पटरियों तथा रेल लाइन के किनारे तथा उपलब्ध रिक्त भू-भाग पर व्यापक रूप से वृक्ष लगाए जाने चाहिए ताकि हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ वायुमण्डल भी शुद्ध हो सके। औद्योगिक क्षेत्रों के निकट हरि पट्टियाँ विकसित की जानी चाहिए जिसमें ऐसे वृक्ष लगाए जायें जो चिमनियों के धुएँ से आसानी से नष्ट न हों तथा घातक गैसों को अवशोषित करने की क्षमता रखते हों। पीपल एवं बरगद आदि का रोपण इस दृष्टि से उपयोगी है।

2. औद्योगिक इकाइयों को प्रयास करना चाहिए कि वायुमण्डल में फैलने वाली घातक गैसों की मात्रा निर्धारित मानकों के अनुसार रखें जिसके लिये प्रत्येक उद्योग में वायु शुद्धिकरण यंत्र अवश्य लगाए जाएं।

3. उद्योगों में चिमनियों की ऊँचाई पर्याप्त होनी चाहिए ताकि आस-पास कम से कम प्रदूषण हो।

4. पेट्रोल कारों में कैटेलिटिक कनवर्टर लगाने से वायु प्रदूषण को बहुत हद तक कम किया जा सकता है। इस प्रकार की कारों में सीसा रहित पेट्रोल का प्रयोग किया जाना चाहिये।

5. घरों में धुआँ रहित ईंधनों को बढ़ावा देना चाहिये।

6. जीवाश्म ईंधनों (पेट्रोलियम, कोयला), जो वायुमण्डल को प्रदूषित करते हैं, का प्रयोग कुछ कम करके सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा जैसी वैकल्पिक ऊर्जाओं का प्रयोग किया जा सकता है।

हमारा वायुमण्डल हमारे स्वास्थ्य को सर्वाधिक प्रभावित करता है, इस तथ्य के विपरीत हमने विभिन्न पर्यावरणीय तंत्रों को इस सीमा तक परिवर्तित कर दिया है जिसका परोक्ष दुष्परिणाम हमें स्पष्ट दिखाई देता है। इस स्थिति पर ध्यान न देना आत्महत्या सिद्ध होगा। अत: हम सबको मिलकर इस धरती पर प्रलयकारी परिस्थिति पैदा होने की आशंका को टालने के लिये निरंतर संघर्ष करना होगा। वायु प्रदूषण से उत्पन्न समस्याओं को हम भले ही रोक तो नहीं सकते, परंतु कुछ विशिष्ट सुरक्षा उपायों से कुछ हद तक पर्यावरण संरक्षण, संतुलन व विकास में योगदान कर सकते हैं।

2. जल प्रदूषण


जल में ठोस कार्बनिक, अकार्बनिक पदार्थ, रेडियोएक्टिव तत्व, उद्योगों का कचरा एवं सीवेज से निकला हुआ पानी मिलने से जल प्रदूषित हो जाता है।

जल प्रदूषण के कारण


जल प्रदूषण के मुख्य कारण निम्न प्रकार हैं-
1. उद्योगों से निकलने वाला कचरा- कई धातुयें जैसे- मरकरी, कैडमियम एवं लेड आदि अपने साथ निकालता है।

2. सीवेज का जल मानव तथा पशुओं के मल को अपने साथ ले जाता है जिसमें कई जीवाणु, हानिकारक पदार्थ जैसे यूरिया एवं यूरिक एसिड आदि मिले रहते हैं।

3. बहुत से साबुनों से निकलने वाला पानी भी जल को प्रदूषित करता है।

4. निर्माण कार्य में प्रयुक्त पदार्थ, इमारतों में प्रयोग होने वाले पदार्थ जैसे फास्फोरिक एसिड, कार्बोनिक एसिड, सल्फ्यूरिक एसिड आदि नदी में मिलकर जल प्रदूषण फैलाते हैं।

5. कुछ कीटनाशक पदार्थ जैसे डीडीटी, बीएचसी आदि के छिड़काव से जल प्रदूषित हो जाता है तथा समुद्री जानवरों एवं मछलियों आदि को हानि पहुँचाता है। अंतत: खाद्य श्रृंखला को प्रभावित करते हैं।

6. नाइट्रेट तथा फॉस्फेट लवण ही साधारणतया उर्वरक के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। यह लवण वर्षा में मिट्टी के साथ मिलकर जल को प्रदूषित कर देते हैं।

7. कच्चा पेट्रोल, कुँओं से निकालते समय समुद्र में मिल जाता है जिससे जल प्रदूषित होता है।

जल प्रदूषण के प्रभाव


1. भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली बीमारियों का एक मुख्य कारण प्रदूषित जल है। अतिसार, पेचिश, हैजा एवं टायफाइयड आदि दूषित जल के प्रयोग से ही होते हैं। जल में पाए जाने वाले विभिन्न प्रदूषकों से उत्पन्न होने वाली बीमारियाँ निम्न प्रकार हैं-

 

क्र.सं.

प्रदूषक

प्रभाव

1.

आर्सेनिक

कैंसर, ब्लैक फुट रोग

2.

कैडमियम

उच्च रक्तचाप, रक्तकणिकाओं का क्षय, मिचली, दस्त, हृदय रोग

3.

बेरेलियम

कैंसर

4.

फ्लोराइड

दांतों का फ्लोरोसिस रोग, हड्डियों का क्षय

5.

सीसा

कैंसर, एनिमिया, उग्र शरीर विष, तंत्रिका तंत्र पर कुप्रभाव, गर्भवती महिलाओं में रोग

6.

पारा

अत्यधिक विषैला, मस्तिष्क पर कुप्रभाव, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर कुप्रभाव

7.

क्रोमियम

चर्म रोग, खुजली, कैंसर

8.

सिलेनियम

बालों का झड़ना, त्वचा संबंधी रोग

9.

मल जल (सीवेज)

कुषोषण, पेचिस, आंत्र रोग

10.

कार्बनिक रसायन डिटरजेंट आदि

जलीय जीवों पर कुप्रभाव, कृमि रोग, पेट संबंधी रोग

11.

नाइट्रेट

मेटहीमोग्लोबैमिया

12.

मैंगनीज

श्वांस रोग, निमोनिया, त्वचा रोग

 

2. सूक्ष्म-जीव जल में घुले हुये ऑक्सीजन के एक बड़े भाग को अपने उपयोग के लिये अवशोषित कर लेते हैं। जब जल में जैविक द्रव्य बहुत अधिक होते हैं तब जल में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। जिसके कारण जल में रहने वाले जीव-जन्तुओं की मृत्यु हो जाती है।

3. औद्योगिक प्रक्रियाओं से उत्पन्न रासायनिक पदार्थ प्राय: क्लोरीन, अमोनिया, हाइड्रोजन सल्फाइड, जस्ता, सीसा, निकिल एवं पारा आदि विषैले पदार्थों से युक्त होते हैं। यदि यह जल पीने के माध्यम से अथवा इस जल में पलने वाली मछलियों को खाने के माध्यम से शरीर में पहुँच जायें तो गंभीर बीमारियों का कारण बन जाता है जिसमें अंधापन, शरीर के अंगों को लकवा मार जाना और श्वसन क्रिया आदि का विकार शामिल है। जब यह जल, कपड़ा धोने अथवा नहाने के लिये नियमित प्रयोग में लाया जाता है तो त्वचा रोग उत्पन्न हो जाता है।

4. प्रदूषित जल से खेतों में सिंचाई करने पर प्रदूषक तत्व पौधों में प्रवेश कर जाते हैं। इन पौधों अथवा इनके फलों को खाने से अनेक भयंकर बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।

5. आज हजारों जलयान एवं पेट्रोलियम टैंकर समुद्र में चल रहे हैं। ये लाखों टन पेट्रोलियम का विसरण समुद्र की सतह पर करते हैं, जो इनके लीकेज अथवा छोटी-मोटी दुर्घटनाओं से होते हैं। यह तेल मछलियों के लिये विष है और समुद्री पर्यावरण के लिये अभिशाप है। इस तेल की कुछ हानिकारक धातुएं जैसे- सीसा, निकिल अथवा कोबाल्ट आदि वनस्पतियों अथवा जीवों के माध्यम से मनुष्य तक पहुँच जाती है।

मनुष्य द्वारा पृथ्वी का कूड़ा-कचरा समुद्र में डाला जा रहा है। नदियाँ भी अपना प्रदूषित जल समुद्र में मिलाकर उसे लगातार प्रदूषित कर रही हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि भू-मध्य सागर में कूड़ा-कचरा डालना बंद न किया गया तो डॉलफिन और टूना जैसी सुंदर मछलियों का यह सागर शीघ्र ही इनका कब्रगाह बन जाएगा।

जल प्रदूषण रोकने के उपाय


1. अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग को रोका जाना चाहिए तथा उसके स्थान पर गोबर की खाद का प्रयोग किया जाना चाहिए।

2. रासायनिक साबुनों के बढ़ते प्रयोग को कम किया जाना चाहिए।

3. उद्योगों के कचरे को नदियों में मिलाने से पूर्व उसमें उपस्थित कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थों को नष्ट कर देना चाहिए।

4. रेडियो एक्टिव पदार्थ, अस्पतालों एवं रासायनिक प्रयोगशालाओं के कूड़े को जल में मिलाने के स्थान पर उसे जमीन में गाड़ना चाहिए। जल संकट की ओर विश्व जनमत का ध्यान आकृष्ट करने हेतु प्रति वर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है।

3. ध्वनि प्रदूषण


अनियंत्रित, अत्यधिक तीव्र एवं असहनीय ध्वनि को ध्वनि प्रदूषण कहते हैं। ध्वनि प्रदूषण की तीव्रता को ‘डेसिबल इकाई’ में मापा जाता है। शून्य डेसिबल, ध्वनि की तीव्रता का वह स्तर है जहाँ से ध्वनि सुनाई देने लगती है। फुसफुसाहट में बोलने पर ध्वनि की तीव्रता 30 डेसिबल होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार 40 से 50 डेसिबिल तक की ध्वनि मनुष्य के सहने लायक होती है। उससे अधिक की तीव्रता की ध्वनि मनुष्य के लिये हानिकारक होती है। मानव के परिप्रेक्ष्य में ध्वनि का स्तर निम्न प्रकार है-

 

क्र.सं.

क्रिया

ध्वनि का स्तर (डेसिबल में)

1.

सामान्य श्रवण की सीमा

20

2.

सामान्य वार्तालाप

50.60

3.

सुनने की क्षमता में गिरावट

75

4.

चिड़चिड़ाहट

80

5.

मांस-पेशियों में उत्तेजना

90

6.

दर्द की सीमा

120

 

ध्वनि प्रदूषण का कारण


1. औद्योगिक क्षेत्रों में उच्च ध्वनि क्षमता के पावर सायरन, हॉर्न तथा मशीनों के द्वारा होने वाले शोर।

2. शहरों एवं गाँवों में किसी भी त्योहार व उत्सव में, राजनैतिक दलों के चुनाव प्रचार व रैली में लाउडस्पीकरों का अनियंत्रित इस्तेमाल/प्रयोग।

3. अनियंत्रित वाहनों के विस्तार के कारण उनके इंजन एवं हार्न के कारण।

4. जनरेटरों एवं डीजल पम्पों आदि से ध्वनि प्रदूषण।

ध्वनि प्रदूषण का प्रभाव


पर्यावरण प्रदूषण के अन्य स्वरूपों के साथ ध्वनि प्रदूषण भी हमारे लिये बड़े खतरे का कारण है। अधिक शोर से हमारे मस्तिष्क पर घातक प्रभाव पड़ता है तथा सुनने की शक्ति लगातार घटती जाती है जिससे धीरे-धीरे बहरापन आ जाता है। ध्वनि प्रदूषण से हृदय गति बढ़ जाती है जिससे रक्तचाप, सिरदर्द एवं अनिद्रा जैसे अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर ध्वनि प्रदूषण का बुरा प्रभाव पड़ता है तथा इससे कई प्रकार की शारीरिक विकृतियां उत्पन्न हो जाती हैं। गैस्ट्रिक, अल्सर और दमा जैसे शारीरिक रोगों तथा थकान एवं चिड़चिड़ापन जैसे मनोविकारों का कारण भी ध्वनि प्रदूषण ही है।

ध्वनि प्रदूषण का नियंत्रण


1. यथासंभव लाउडस्पीकरों का प्रयोग प्रतिबंधित कर देना चाहिये। जब तक अत्यंत आवश्यक न हो इनके प्रयोग की अनुमति नहीं देनी चाहिये। लाउडस्पीकरों का प्रयोग चिकित्सालयों एवं शिक्षण संस्थानों आदि से 500 मी. से अधिक दूरी पर ही किया जाना चाहिये।

2. घरों में रेडियो, टेप, टेलीविजन का प्रयोग कम आवाज में करना चाहिये।

3. वाहनों के हार्न का प्रयोग कम से कम करना चाहिये।

4. वाहनों के सायलेंसरों एवं इंजन की देखभाल समय से करनी चाहिये।

5. हवाई जहाजों एवं जेट विमानों को निर्धारित ऊँचाई पर ही उड़ना चाहिये।

6. पटाखों का प्रयोग कम से कम करना चाहिये।

7. सड़कों के किनारे वृक्ष लगाकर ध्वनि प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

8. ध्वनि प्रदूषण से बचाव के साधन जैसे-ईयर प्लग, ईयर पफ आदि का प्रयोग करके ध्वनि प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

9. रेलगाड़ी से उत्पन्न शोर को बैलास्ट विहीन रेल पथों के निर्माण द्वारा दूर किया जा सकता है।

10. ध्वनि प्रदूषण से ग्रसित सड़कों एवं मकानों को ध्वनि निरोधी बनाना चाहिये।

4. मृदा-प्रदूषण


वर्षा से भूमि की संरचना का बिगड़ना, दिन-प्रतिदिन उर्वरकों का प्रयोग, चूहे मारने की दवा आदि का प्रयोग तथा फसलों को बीमारी से बचाने के लिये दवा का छिड़काव भूमि की उर्वरकता को नष्ट कर देता है तथा ऐसा प्रदूषण मृदा प्रदूषण कहलाता है।

मृदा प्रदूषण का कारण


1. सल्फर डाइअॉक्साइड एवं नाइट्रोजन डाइऑक्साइड वर्षा से क्रिया करके अम्ल बनाती हैं जिसे अम्लीय वर्षा कहते हैं। अम्लीय वर्षा भूमि की उर्वरकता को नष्ट करती है।

2. कई उर्वरक जैसे-अमोनियम सल्फेट, यूरिया, कैल्शियम सायनामाइड, अमोनियम नाईट्रेट एवं कैल्शियम सुपर फॉस्फेट आदि का लगातार प्रयोग मृदा की उर्वरकता को नष्ट करता है।

3. सब्जी, फलों तथा फूलों पर लगने वाले कीड़ों को मारने के लिये किया जाने वाला रासायनिक छिड़काव मृदा को प्रदूषित करता है।

मृदा प्रदूषण का प्रभाव


मृदा प्रदूषण से भूमि की उत्पादकता घटती है तथा उसमें कोई भी फसल एवं पेड़-पौधे आदि नहीं तैयार हो पाते हैं। धीरे-धीरे भूमि उसरीली हो जाती है। नग्न भूमि मृदाक्षरण को बढ़ावा देती है जिससे बाढ़ की विकराल समस्या आती है।

मृदा प्रदूषण का नियंत्रण


1. कृषि कार्य में रासायनिक खादों के स्थान पर गोबर, घास, कूड़ें आदि से निर्मित कम्पोस्ट खाद एवं हरी खाद का प्रयोग करने से मृदा प्रदूषण को रोकने में सहायता मिलती है।

2. एक खेत में एक ही फल उगाने के स्थान पर अलग-अलग फसल को उगाने से मृदा प्रदूषण को रोकने में सहायता मिलती है।

3. वृक्षारोपण मृदा प्रदूषण को रोकने का एक प्रभावी उपाय है।

5. ओजोन परत में छेद


पृथ्वी के वायुमण्डल की विभिन्न परतें निम्न प्रकार हैं-

 

क्र.सं.

ऊँचाई

परत

तापमान

1.

0 से 11 किलोमीटर

ट्रोपोस्फेयर

15 से .56 डिग्री सेंटीग्रेड

2.

11 से 50 किलोमीटर

स्ट्रेटोस्फेयर

.56 से .02 डिग्री सेंटीग्रेड

3.

50 से 85 किलोमीटर

मेजोस्फेयर

.02 से 92 डिग्री सेंटीग्रेड

4.

85 से 500 किलोमीटर

थर्मोस्फेयर

92 से 1200 डिग्री सेंटीग्रेड

 

हमारे वायुमण्डल के भीतर ओजोन स्ट्रेटोस्फेयर स्तर में 11 से 35 किलो मीटर ऊँचाई तक घने आवरण के रूप में (प्रति क्यूबिक सेंटीमीटर हवा में 3,000 बिलियन अणु) पाई जाती है। कम सान्द्रण में यह गैस 10 से 15 किलो मीटर एवं 30 से 50 किलो मीटर ऊँचाई तक पाई जाती है। ओजोन गैस ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनती है एवं इसका अणुसूत्र O3 है।

ओजोन की यह परत सूर्य से आने वाली घातक पराबैगनी किरणों को अवशोषित एवं परावर्तित कर पृथ्वी की रक्षा करती है। इसी आवरण को ओजोन सुरक्षा कवच कहते हैं। यहाँ पर ओजोन का निर्माण ऑक्सीजन पर पराबैगनी किरणों के प्रभाव से होता है। पराबैगनी किरणों के ट्रोपोस्फेयर में पहुँचने से प्रमुख घातक प्रभाव निम्नानुसार हैं-

1. मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता का ह्रास होता है जिससे रोगों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है।
2. आनुवांशिक गुणों के वाहक डीएनए की क्षति होती है।
3 त्वचा कैंसर एवं मोतियाबिंद जैसे रोग बढ़ते हैं।
4. पौधों में होने वाली प्रकाश संश्लेषण की क्रिया पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
5. फसल उत्पादन में कमी आती है।
6. समुद्री जीवों को हानि पहुँचती है।
7. अनेक पेड़-पौधों व जीवों की प्रजातियाँ धीरे-धीरे लुप्त हो जाती हैं।

ओजोन परत के बावजूद लगभग एक प्रतिशत पराबैगनी किरणें धरती पर आती हैं। यदि ओजोन परत न होती तो धरती पर जीवन न होता। वायुमण्डल में बढ़ते प्रदूषण के कारण ऑक्सीजन एवं ओजोन का संतुलन बिगड़ रहा है। ओजोन परत को हानि पहुँचाने वाली प्रमुख गैसें निम्न हैं-

1 क्लारोफ्लोरो कार्बन
2 क्लोरो ब्रोमो कार्बन
3 कार्बन टेट्रा क्लोराइड
4 मेथिल क्लोरोफार्म हैलोजन

प्रयोगों द्वारा यह सत्यापित है कि C.F.C. का एक अणु स्ट्रेटोस्फेयर में एक लाख ओजोन अणुओं को नष्ट कर सकता है। ओजोन की सबसे कमी वाला क्षेत्र अण्टार्कटिका है। अण्टार्कटिका एवं दक्षिणी ध्रुव पर पाया जाने वाला ओजोन छिद्र किसी क्षेत्र विशेष को नहीं बल्कि पूरे विश्व को प्रभावित करता है। ओजोन परत की क्षति के भयंकर कुपरिणाम हैं। अनुमान है कि ओजोन परत में एक प्रतिशत की क्षति से हुए पराबैगनी विकिरण की वृद्धि से एक वर्ष में स्किन कैंसर के मरीजों में 6 प्रतिशत की वृद्धि होती है। ओजोन परत को हानि पहुँचाने वाले पदार्थों का प्रयोग मुख्यत: रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर, प्लास्टिक फोम, स्प्रे के द्रवों, अग्निशमन एवं इलेक्ट्रॉनिक के साल्वेंट क्लीनर के रूप में हो रहा है। क्लोरोफ्लोरो कार्बन निम्न सतह पर बहुत स्थिर होते हैं। जैसे- ये स्ट्रेटोस्फेयर में ओजोन परत तक पहुँचते हैं, पराबैगनी किरणों से क्रिया करके हैलोजन बनाते हैं। ये मुक्त मूलक ओजोन का तीव्र क्षरण करते हैं।

लुप्त हो रही ओजोन परत की रक्षा हेतु प्रभावी कदम उठाने के लिये 2 मई 1989 में विश्व के 80 राष्ट्रों ने अपनी सहमति दी थी। 1990 में एक अन्तरराष्ट्रीय बैठक में तय हुआ कि विकसित देश 2000 तक ‘क्लारो फ्लोरो कार्बन’ का उत्पादन पूर्णत: बंद कर देंगे। विकासशील देशों को इस लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु 10 वर्ष की छूट दी गई। ओजोन परत में छिद्र के व्यास की बढ़त को देखते हुए शीघ्रातिशीघ्र संपूर्ण विश्व में सीएफसी के उत्पादन पर रोक लगाना आवश्यक हो गया है। माण्ट्रियल प्रोटोकॉल दिनांक 16 सितम्बर 1987 को लागू हुआ ओजोन परत में बढ़ते छिद्र की ओर विश्व जनमत का ध्यान आकृष्ट करने के लिये प्रतिवर्ष 16 सितम्बर को ‘अन्तरराष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस’ मनाया जाता है। इन प्रयासों से अब ओजोन छिद्र के आकार में निरंतर कमी देखी जा रही है।

6. रेडियो एक्टिव प्रदूषण


नाभिकीय परमाणु परीक्षणों के फलस्वरूप कई रेडियो एक्टिव तत्व जैसे- यूरेनियम, थोरियम, प्लूटोनियम तथा रेडियो एक्टिव किरणें जैसे- अल्फा, बीटा व गामा किरणें वातावरण में प्रवेश करके रेडियो धर्मी प्रदूषण उत्पन्न करते हैं।

रेडियो एक्टिव प्रदूषण का कारण


नाभिकीय भट्टियाँ तथा युद्ध में प्रयोग हो रहे नाभिकीय बम तथा अन्य सामग्री तथा नाभिकीय परीक्षण आदि रेडियोधर्मी प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं। इन सब के द्वारा हानिकारक रेडियोएक्टिव तत्व, किरणें आदि निकलकर वातावरण में प्रवेश कर वायु, जल तथा मृदा को हानि पहुँचाती हैं।

रेडियो एक्टिव प्रदूषण का प्रभाव


1. रेडियोएक्टिव पदार्थ वातावरण में इतनी अधिक मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जित करते हैं कि इससे पौधों की कोशिकाएं तथा जानवरों एवं मनुष्यों की कोशिकाएं भी नष्ट हो जाती हैं।

2. रेडियो धर्मी प्रदूषण के आस-पास रहने से ट्यूमर हो जाता है तथा समय से पूर्व ही गाल सफेद हो जाते हैं।

3. नाभिकीय विस्फोट से नदियों तथा समुद्र का जल प्रदूषित हो जाता है जिससे समुद्री जीव-जंतु नष्ट हो जाते हैं।

4. रेडियोएक्टिव तत्व स्ट्रान्शियम मृदा को नष्ट कर देता है।

5. गामा रेडियो एक्टिव किरणें अत्यधिक खतरनाक होती हैं। अत्यधिक भेदन क्षमता होने के कारण इनसे उत्सर्जित ऊर्जा से जीवित कोशिकाएं आदि नष्ट हो जाती हैं।

6. नाभिकीय रिएक्टरों में यू-235 ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस नाभिकीय विखंडन से अत्यधिक ऊर्जा अवमुक्त होती है जो मनुष्य एवं पेड़ पौधों के लिये हानिकारक होती है।

रेडियो एक्टिव प्रदूषण का निदान- परमाणु एवं नाभिकीय परीक्षणों को सीमित करना।

7. जलवायु परिवर्तन


पृथ्वी के उद्भव से लेकर आज तक इसमें निरंतर परिवर्तन हो रहा है। इसकी गति कभी तीव्र होती है तो कभी मंद। पर्यावरण के प्रमुख भौगोलिक घटक जैसे- ताप, वायुदाब, आर्द्रता, वायु वेग, वर्षा आदि जलवायु का निर्माण करते हैं।

विगत वर्षों में जनसंख्या वृद्धि, औद्योगीकरण, वन विनाश, स्वचालित वाहनों में वृद्धि तथा रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग से पर्यावरण को क्षति पहुँची है तथा जलवायु के विभिन्न तत्वों जैसे- ताप, वायुदाब, आर्द्रता, वायु वेग, वर्षा आदि में व्यापक परिवर्तन हुआ है। इन परिवर्तनों के कारण मानव अस्तित्व खतरे में है। जलवायु परिवर्तन के मुख्य कारण निम्न प्रकार हैं-

प्राकृतिक कारण- मृदा क्षरण, बाढ़, तूफान, चक्रवात, भूस्खलन, ज्वालामुखी, दावाग्नि, सूखा, आँधी, तड़ित एवं भूकम्प आदि।

मानवीय कारण- जनसंख्या वृद्धि, औद्योगीकरण, वन विनाश, यातायात के साधन, अनियोजित नगरीकरण, संसाधनों का असीमित विदोहन आदि।

जलवायु परिवर्तन के मुख्य प्रभाव निम्न प्रकार हैं-
1. ग्रीन हाउस प्रभाव तथा वैश्विक ताप में वृद्धि, 2. अम्लीय वर्षा, 3. ओजोन परत का क्षरण, 4. नाभिकीय दुर्घटनाएं, 5. प्रचण्ड अग्निकाण्ड, 6. भू-स्खलन, 7. मरुस्थलीकरण, 8. मृदाक्षरण, 9. पर्यावरण प्रदूषण, 10. बाढ़, 11. अकाल, 12. भूकम्प, 13. तूफान।

8. वैश्विक ताप वृद्धि


सामान्य परिस्थितियों में पृथ्वी का ताप इससे टकराने वाले सूर्य विकिरणों तथा अंतरिक्ष में वापस लौट जाने वाली किरणों द्वारा नियंत्रित होता है। जब वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता बढ़ जाती है तो इस गैस की मोटी परत किरणों को परावर्तित होने से रोकती है। यह मोटी ग्रीन हाउस की काँच की दीवार तथा कार की खिड़की के काँच की भाँति होती है। यह दोनों ही गर्मी को बाहर विकिरित होने से रोकती है। इसे ‘ग्रीन हाउस प्रभाव’ कहते हैं। यही क्रिया प्रकृति में भी होती है। यहाँ कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन, ओजोन, जलवाष्प, मीथेन, नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा क्लोरोफ्लोरोकार्बन गैसें एक मोटी परत पृथ्वी के वातावरण में बना लेती हैं जो गलास हाउस के काँच की भाँति ही कार्य करती है अर्थात सूर्य उष्मा जो भीतर आती है पूरी की पूरी वापस नहीं जाने पाती जिससे विश्व स्तर पर वातावरण की निचली परत में वायु का ताप बढ़ जाता है। बढ़ी हुई कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को समुद्रों द्वारा अवशोषित किया जा सकता है परंतु औद्योगीकरण तथा ऊर्जा के अत्यधिक उपयोग से समुद्री अवशोषण क्षमता की तुलना में वायु मण्डल में अधिक कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जित हो रही है। इस प्रकार वायुमण्डल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की सांद्रता निरंतर बढ़ रही है। कार्बन डाइ ऑक्साइड पृथ्वी के ताप में 50 प्रतिशत एवं क्लोरोफ्लोरोकार्बन में 20 प्रतिशत तक की वृद्धि करती है।

कुछ अन्य गैसें जैसे सल्फर डाइ ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन भी ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार 2050 में पृथ्वी का ताप 1 से 5 डिग्री तक बढ़ जाएगा। ताप बढ़ने से ध्रुवों पर अधिक प्रभाव पड़ेगा। ग्रीनलैंड, आइसलैंड, नार्वे, साइबेरिया एवं अलास्का इससे सर्वाधिक प्रभावित होंगे। ध्रुवीय बर्फ पिघल जायेगी। 5 डिग्री ताप वृद्धि से समुद्र स्तर में 5 मीटर की वृद्धि होगी जो सेनफ्रांसिस्को एवं शंघाई जैसे उच्च जनसंख्या वाले तटीय शहरों पर प्रभाव डालेगा।

वैश्विक तापवृद्धि से उत्पन्न प्रमुख समस्याएं निम्न प्रकार हैं-
1. जैविक विविधता में तेजी से कमी आएगी तथा महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक स्रोतों का ह्रास होगा।

2. 1 डिग्री तापवृद्धि अक्षांश के 100 किमी परिवर्तन के बराबर होगा।

3. बढ़े हुए ताप से विश्व के अनेक भागों में तीव्र तूफान आएंगे। उन क्षेत्रों में भी तूफान आ सकते हैं जहाँ पहले कभी ऐसा नहीं होता था।

4. ताप बढ़ने से वर्षा एवं मानसून के स्वरूप में परिवर्तन होगा। कहीं पर सूखा होगा तथा कहीं अत्यधिक वर्षा होगी। इससे मृदा क्षरण बढ़ेगा।

5. पर्वत शिखरों एवं ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ेगा।

6. ताप वृद्धि से समुद्र गर्म होगा जिससे बांग्लादेश, भारत, मिश्र, इण्डोनेशिया आदि में बाढ़ आ सकती है।

7. वैश्विक तापवृद्धि से समुद्री पारिस्थिकी तंत्र अत्यधिक बिगड़ जाएगा।

8. तटीय शहरों की बाढ़ वहाँ संक्रामक रोग फैला सकती है।

वैश्विक ताप वृद्धि को नियंत्रित करने के उपाय


1. ऊर्जा उत्पादन व उपयोग में सुधार करना।
2. कार्बनिक ईंधन का प्रयोग कम करके उसके स्थान पर हाइड्रोजन ईंधन का प्रयोग किया जाए।
3. कार्बन मुक्त ऊर्जा स्रोत जैसे सूर्य, वायु एवं नाभिकीय ऊर्जा का विकास किया जाए।
4. वन क्षेत्र को कटने से रोकना एवं वनावरण में वृद्धि का प्रयास करना।

9. अम्लीय वर्षा


वायुमण्डल में विद्यमान कार्बन डाइ ऑक्साइड गैस पानी में घुलकर कार्बोनिक अम्ल बनाती है। वर्षा के जल में कार्बोनिक अम्ल मिले होने के कारण वर्षा के जल का पी-एच सामान्य से कुछ कम (लगभग 6.5) होता है। घातक गैसें जैसे सल्फर डाइ ऑक्साइड, सल्फर ट्राई ऑक्साइड तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड आदि, जो वायु प्रदूषण के कारण वायुमण्डल में विद्यमान रहती हैं, वर्षा जल को अवशोषित कर उसका पी-एच और कम कर देती हैं। यही अम्लीय वर्षा कहलाती है। भारत के कुछ प्रमुख महानगरों में वर्षा का पी-एच निम्न प्रकार पाया गया-

1. कोलकाता-5.8, 2. चेन्नई-5.85, 3. दिल्ली-6.21, 4. मुंबई-4.8।

प्रमुख गैसें जो अम्लीय वर्षा हेतु उत्तरदायी हैं, निम्न प्रकार हैं-
1. सल्फर डाइ ऑक्साइड- यह पानी के साथ घुलकर सल्फ्यूरिक अम्ल बनाती है।
2. सल्फर ट्राई ऑक्साइड- यह पानी के साथ घुलकर सल्फ्यूरस अम्ल बनाती है।
3. हाइड्रोजन सल्फाइड- यह वायुमण्डल में हाड्रोजन मूलकों के साथ सल्फर डाइ ऑक्साइड बनाती है।
4. नाइट्रोजन के ऑक्साइड- यह प्रकाश ऑक्सीकरण द्वारा नाइट्रस अम्ल बनाती है।
5. कार्बन डाइ ऑक्साइड- यह पानी के साथ घुलकर कार्बोनिक अम्ल बनाती है।

अम्लीय वर्षा के प्रमुख स्रोत


सल्फर डाइ ऑक्साइड कोयले के जलने, विद्युत शक्ति संयंत्रों एवं पेट्रोलियम शोधन से सल्फर डाइ ऑक्साइड गैस निकलती है। इसी के साथ कुछ मात्रा में सल्फर ट्राइ ऑक्साइड भी निकलती है। प्राकृतिक स्रोतों में ज्वालामुखी प्रमुख है। हाइड्रोजन सल्फाइड गैस प्राकृतिक रूप से सल्फर को अपचयित करने वाले जीवाणुओं से प्राप्त होती है तथा दलदली भूमि से निकलती रहती है। यह गैस जीवाष्म ईधनों के आंशिक रूप से जलने एवं अनेक उद्योगों में द्वितीयक उत्पाद के रूप में प्रकट होती है। नाइट्रोजन की विभिन्न ऑक्साइड गैसें अनेक जीवाश्म इंधनों के ज्वलन तथा विस्फोटक उद्योगों से निकलकर वायुमण्डल में मिल जाती हैं।

आजकल होने वाली 60 से 70 प्रतिशत अम्लीय वर्षा सल्फर के विभिन्न ऑक्साइड से होती है। 30 से 40 प्रतिशत अम्लीय वर्षा नाइट्रोजन के ऑक्साइड एवं अन्य कारणें से होती है।

अम्लीय वर्षा के कुप्रभाव


अम्लीय वर्षा के अत्यंत घातक परिणाम होते हैं जिनमें प्रमुख निम्न प्रकार हैं-
1. यह जल, स्थल, वायु, वनस्पतियों, जीव जन्तुओं एवं इमारतों सभी को क्षति पहुँचाती है।
2. झीलों, तालाबों नदियों आदि का जल अत्यधिक अम्लीय हो जाता है जिसे अम्ल सदमा कहते हैं। इससे पानी में रहने वाले जीव प्रभावित होते हैं।
3. झीलों, तालाबों आदि से पानी रिस कर भू-गर्भ में स्थित विभिन्न धातुओं जैसे तांबा, एल्युमिनियत, कैडमियम आदि से क्रिया करके विभिनन जहरीले यौगिक बनाता है जो प्राणियों को प्रभावित करते हैं।
4. अम्लीय वर्षा से त्वचा रोग तथा एलर्जी होती है।
5. अम्लीय जल जब घरों में जस्ता, सीसा या ताम्बे के पाइपों से गुजरता है तो इस जल में धातुओं की अधिकता हो जाती है जिससे अतिसार व पेचिश जैसे रोगों की संभावना बढ़ती है।
6. इससे दमा तथा कैंसर का भय होता है।
7. इससे मृदा की उर्वरता में कमी आती है।
8. इससे पौधों की वृद्धि में कमी आती है।
9. पौधों की पत्तियों में उपस्थित पर्णहरित का विघटन हो जाता है जिससे पत्तियों का रंग परिवर्तित हो जाता है।
10. पौधों की पत्तियाँ, पुष्प एवं फल असमय झड़ जाते हैं।
11. प्राचीन इमारतों का क्षरण होता है जिसे ‘‘स्टोन कैंसर’’ कहते हैं।

आगरा से 40 किमी दूर मथुरा का तेल शौधक कारखाना है जो प्रतिदिन 25 से 30 टन सल्फर डाइ ऑक्साइड गैस वायुमण्डल को देता है। इसी कारण आगरा के वायुमण्डल में सल्फर डाइ ऑक्साइड की मात्रा 1.75 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। इसके कारण ताजमहल पर कहीं-कहीं संक्षारक धब्बे दिखाई देते हैं।

अम्लीय वर्षा से स्वीडन की बीस हजार झीलों की मछलियाँ मर गई। जर्मनी के जंगलों को अम्लीय वर्षा से अपार क्षति पहुँची है। अम्लीय वर्षा को नियत्रिंत करने के लिये सल्फर एवं नाइट्रोजन के ऑक्साइडों के प्रयोग में कमी लाना आवश्यक है।

10. पॉलीथीन प्रदूषण


प्राथमिक रूप से प्लास्टिक थैलों, प्लास्टिक फिल्म व बोतल आदि जैसे वाहकों में प्रयुक्त होने वाली पॉलीथीन सर्वप्रथम संयोगवश संश्लेषित हुई। वर्ष 1898 में जर्मन रसायनशास्त्री हास वान पेचमान द्वारा डाइ एजोमीथेन को गर्म करते समय पॉलीएथीलीन या पॉलीथीन सर्वप्रथम संयोगवश संश्लेषित हुई। सर्वाधिक प्रयोग होने वाली प्लास्टिक उनके सहयोगियों यूजेन बामबर्गर व फ्रेडिक शीरनर ने इस वेत पदार्थ जो –CH2 - की लंबी श्रृंखला धारित करती है, को पॉलीमेथीलीन नाम दिया। पॉलीएथीलीन या पॉलीथीन का वैज्ञानिक (आइयूपीएसी) नाम पॉली ईथीन या पॉलीमेथीलीन है। इसका वार्षिक वैश्विक उत्पादन लगभग 8 करोड़ टन है। विभिन्न प्रकार के ज्ञात पॉलीएथीलीन का रासायनिक सूत्र ¼C2H4½nH2 है। इस प्रकार सामान्यतया पॉलीएथीलीन समान कार्बनिक यौगिकों का मिश्रण है जो n के मान के साथ परिवर्तित होता है। उद्योगों में व्यावहारिक रूप से प्रयुक्त होने वाली संश्लेषित पॉलीएथीलीन का आविष्कार वर्ष 1933 में एरिक फॉसेट व रेनाल्ड गिडसन ने संयोगवश किया था।

पॉलीथीन के भौतिक गुण - सामान्य रूप से व्यापारिक कार्यों में प्रयुक्त होने वाले मध्यम व उच्च घनत्व वाले पॉलीथीन 120 डिग्री सेंटीग्रेड से 180 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान के मध्य पिघलता है। अत: प्रयुक्त होने के उपरांत जहाँ फेंका जाता है- वहीं अत्यंत लम्बे समय तक बने रहकर सामान्य क्रियाकलाप बाधित करता है।

रासायनिक गुण - अधिकांश एलडीपई (लो डेंसिटी पॉलीथीन, मिडिल डेंसिटी पॉलीथीन एवं हाई डेंसिटी पॉलीथीन) अत्यंत उत्कृष्ट कोटि के रासायनिक प्रतिरोधक होते हैं, अर्थात तीव्र अम्लीय या तीव्र क्षारीय पदार्थ से अभिक्रिया नहीं करते हैं। पॉलीथीन, नीली ज्वाला देते हुए धीरे-धीरे जलता है। जलने पर पॉलीथीन से पैराफीन की गंध आती है। लगातार जलाने पर ज्वाला समाप्त होने पर बूँद के रूप में हो जाता है। कमरे के तापमान पर क्रिस्टल नहीं घुलते हैं। सामान्यतया टालूईन या जाईलीन जैसे ऐरोमेटिक हाइड्रोकार्बन एवं ट्राई क्लोरोइथेन या ट्राई क्लोरोबेंजीन जैसे क्लोरीनेट विलायक में पॉलीथीन उच्च तापमान पर घुलता है।

कम मूल्य, सहज रूप से सुलभ होने व अत्यंत उपयोगी होने के कारण पॉलीथीन का प्रयोग अत्यंत तेजी से बढ़ रहा है। कागज के थैलों, कुल्हड़ों, कागज की प्लेटों का चलन पॉलीथीन का बढ़ते प्रयोग के कारण समाप्त होता जा रहा है। आसानी से उपलब्ध होने के कारण सामान क्रय करने जाते समय कपड़े का थैला ले जाने की प्रवृत्ति समाप्त होती जा रही है। पॉलीथीन की बढ़ती लोकप्रियता व प्रयोग के कारण समाज व पर्यावरण के समक्ष नई समस्याएं व चुनौतियाँ उत्पन्न हो रही हैं, इसका मुख्य कारण पॉलीथीन का अपघटन न होना है। पॉलीथीन के अपघटन न होने से शहरों, गाँवों व यहाँ तक कि दुर्गम वन क्षेत्रों में भी प्रयोग के पश्चात फेंके गये पॉलीथीन का ढेर बहुत लंबे समय तक पड़ा रहता है। इस कारण उत्पन्न होने वाली समस्याएं एक दृष्टि में-

विषय सामग्री (इन्हें भी पढ़ें)

1

पर्यावरण प्रदूषण (Environmental pollution)

2

पर्यावरण प्रदूषण (Environment Pollution)

3

पर्यावरण प्रदूषण : नियंत्रण एवं उपाय

4

पर्यावरण प्रदूषण : प्रकार, नियंत्रण एवं उपाय

5

पर्यावरण, प्रदूषण एवं आकस्मिक संकट

6

पर्यावरण प्रदूषण : कानून और क्रियान्वयन

7

पर्यावरण प्रदूषण एवं उद्योग

8

पर्यावरण-प्रदूषण और हमारा दायित्व

 

पॉलीथीन थैली के प्रयोग से होने वाली हानि-


1. प्लास्टिक थैले में मुख्यत: जाइलीन, एथीलीन ऑक्साइड एवं बेंजीन का प्रयोग होता है। यह सभी टॉक्सिक रसायन हैं जो मानव स्वास्थ्य के लिये घातक हैं।

2. भूमि पर प्लास्टिक इकट्ठा होने पर वह लंबे समय तक गलती नहीं है। प्लास्टिक से भरे स्थान पर पौधे नहीं उगते हैं तथा यह भूमि की उर्वरा शक्ति को धीरे-धीरे समाप्त करती है।

3. प्लास्टिक के थैले में फेंकी हुई खाद्य सामग्री को खाकर गाय, बंदर एवं अन्य जीव तड़प-तड़प कर मर जाते हैं। नदियों या समुद्र के किनारे फेंकी गई पॉलीथीन थैली को खाकर मछलियाँ, डॉल्फिन, कछुए एवं अन्य समुद्री जीव मर जाते हैं।

4. पॉलीथीन थैली या प्लास्टिक को जलाने पर जहरीली गैस निकलती है, जो वायुमण्डल के लिये हानिकारक है।

5. पॉलीथीन या प्लास्टिक भूमि, जल एवं वायु तीनों के लिये अभिशाप है। धरती पर इसके गलने में 400 वर्ष से भी अधिक का समय लगता है।

पॉलीथीन या प्लास्टिक का प्रयोग रोकने या कम करने की दिशा में मात्र राजकीय प्रयास पर्याप्त नहीं है। पॉलीथीन/प्लास्टिक का प्रयोग कम करने की दिशा में हम निम्न प्रकार से सहयोग कर सकते हैं-

1. पॉलीथीन के थैले का प्रयोग न करें। सब्जी लेने या अन्य किसी कार्य के लिये बाजार जाते समय कपड़े का थैला लेकर जाएं।

2. प्लास्टिक के कप में चाय बिल्कुल न ग्रहण करें। यह स्वास्थ्य के लिये अत्यंत खतरनाक है। इसके स्थान मिट्टी के कुल्हड़ या गिलास आदि का प्रयोग करें।

3. पॉलीथीन के थैले में भरकर कूड़ा या खाद्य पदार्थ कदापि इधर-उधर न फेंके। यदि अपरिहार्य परिस्थिति वश पॉलीथीन या प्लास्टिक फेंकना आवश्यक हो तो ऐसे स्थान पर फेंके, जहाँ से रिसाइकिल हेतु उसे एकत्रित किया जा सके।

4. जहाँ अत्यंत आवश्यक न हो, पानी हेतु प्लास्टिक की बोतल का प्रयोग न करें।

5. विवाह समारोह व अन्य पर्वों पर प्लास्टिक की प्लेट तथा कप के स्थान पर पत्तल, दोना तथा मिट्टी के कुल्हड़ के प्रयोग को प्रोत्साहित किया जाये।

6. जहाँ अत्यंत आवश्यक हो, प्लास्टिक के विकल्प के रूप बायोडेग्रेडेबल पदार्थों से बने बैग, कप आदि का प्रयोग किया जाए, जो मिट्टी में आसानी से गल जाते हैं।

संदर्भ
1. सिंह, केदार नाथ (2002) 21वीं सदी की वानिकी, वितरक-नटराज पब्लिशर्स।
2. श्रीवास्तव, मनोज (2010) पर्यावरण प्रदूषण के खतरे, ग्लोबल ग्रीन्स, इलाहाबाद।
3. चौधरी, बीएल एवं प्रसाद, जीतेन्द्र (2013) पर्यावरण अध्ययन, एसएफ पब्लिकेशन्स हाउस, दरियागंज, नई दिल्ली।
4. जोसेफ, बेनी (2005) इनवायरनमेंटल स्टडीज, टाटा मैक्ग्रॉ हिल।

महेन्द्र प्रताप सिंह
उप वन संरक्षक, कार्यालय प्रमुख वन संरक्षक, 17, राणा प्रताप मार्ग, लखनऊ-226001, उत्तर प्रदेश, भारत Mahendrapratapsingh_60@yahoo.com


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