पॉलीथीन प्रदूषण समस्या एवं निदान (Solution of plastic and pollution)

Submitted by Hindi on Sat, 10/01/2016 - 14:17
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Source
अश्मिका, जून 2005

पॉलिथीन के ढेर में खाना तलाशती गायपॉलिथीन के ढेर में खाना तलाशती गायप्रकृति एवं मानव ईश्वर की अनमोल एवं अनुपम कृति हैं। प्रकृति अनादि काल से मानव की सहचरी रही है। लेकिन मानव ने अपने भौतिक सुखों एवं इच्छाओं की पूर्ति के लिये इसके साथ निरंतर खिलवाड़ किया और वर्तमान समय में यह अपनी सारी सीमाओं की हद को पार कर चुका है। स्वार्थी एवं उपभोक्तावादी मानव ने प्रकृति यानि पर्यावरण को पॉलीथीन के अंधाधुंध प्रयोग से जिस तरह प्रदूषित किया और करता जा रहा है उससे सम्पूर्ण वातावरण पूरी तरह आहत हो चुका है। आज के भौतिक युग में पॉलीथीन के दूरगामी दुष्परिणाम एवं विषैलेपन से बेखबर हमारा समाज इसके उपयोग में इस कदर आगे बढ़ गया है मानो इसके बिना उनकी जिंदगी अधूरी है।

वर्तमान समय को यदि पॉलीथीन अथवा प्लास्टिक युग के नाम से जाना जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि सम्पूर्ण विश्व में यह पॉली अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान बना चुका है और दुनिया के सभी देश इससे निर्मित वस्तुओं का किसी न किसी रूप में प्रयोग कर रहे हैं। सोचनीय विषय यह है कि सभी इसके दुष्प्रभावों से अनभिज्ञ हैं या जानते हुए भी अनभिज्ञ बने जा रहे हैं। पॉलीथीन एक प्रकार का जहर है जो पूरे पर्यावरण को नष्ट कर देगा और भविष्य में हम यदि इससे छुटकारा पाना चाहेंगे तो हम अपने को काफी पीछे पाएँगे और तब तक सम्पूर्ण पर्यावरण इससे दूषित हो चुका होगा।

हालाँकि प्लास्टिक निर्मित वस्तुएँ गरीब एवं मध्यवर्गीय लोगों का जीवनस्तर सुधारने में सहायक हैं, लेकिन वहीं इसके लगातार उपयोग से वे अपनी मौत के बुलावे से भी अनभिज्ञ हैं। यह एक ऐसी वस्तु बन चुकी है जो घर में पूजा स्थल से रसोईघर, स्नानघर, बैठकगृह तथा पठन-पाठन वाले कमरों तक के उपयोग में आने लग गई है। यही नहीं यदि हमें बाजार से कोई भी वस्तु जैसे राशन, फल, सब्जी, कपड़े, जूते यहाँ तक तरल पदार्थ जैसे दूध, दही, तेल, घी, फलों का रस इत्यादि भी लाना हो तो उसको लाने में पॉलीथीन का ही प्रयोग हो रहा है। आज के समय में फास्ट फूड का काफी प्रचलन है जिसको भी पॉली में ही दिया जाता है। आज मनुष्य पॉली का इतना आदी हो चुका है कि वह कपड़े या जूट के बने थैलों का प्रयोग करना ही भूल गया है। अर्थात दुकानदार भी हर प्रकार के पॉलीथीन बैग रखने लग गए है और मजबूर भी हैं रखने के लिये, क्योंकि ग्राहक ने उसे पॉली रखने को बाध्य सा कर दिया है यह प्रचलन चार पाँच दशक पहले इतनी बड़ी मात्रा में नहीं था तब कपड़े, जूट या कागज से बने थैलों का प्रयोग हुआ करता था जोकि पर्यावरण के लिये लाभदायक था।

भारत में लगभग दस से पंद्रह हजार इकाइयाँ पॉलीथीन का निर्माण कर रही हैं। सन 1990 के आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में इसकी खपत 20 हजार टन थी जो अब बढ़कर तीन से चार लाख टन तक पहुँचने की सूचना है जोकि भविष्य के लिये खतरे का सूचक है।

लेकिन जब से पॉलीथीन प्रचलन में आया, पुरानी सभी पद्धतियाँ धरी रह गईं और कपड़े, जूट व कागज की जगह पॉलीथीन ने ले ली। पॉलीथीन या प्लास्टिक निर्मित वस्तुओं का एक बार प्रयोग करने के बाद दुबारा प्रयोग में नहीं लिया जा सकता है लिहाजा इसे फेंकना ही पड़ता है। और आज तो यत्र-तत्र सर्वत्र पॉली ही पॉली दिखाइ देती है जो सम्पूर्ण पर्यावरण को दूषित कर रही है यह पॉली निर्मित वस्तुएँ प्रकृति में विलय नहीं हो पाती हैं यानि यह बायोडिग्रेडेबल पदार्थ नहीं है। खेत खलिहान जहाँ भी यह होगा वहाँ की उर्वरा शक्ति कम हो जाएगी और इसके नीचे दबे बीज भी अंकुरित नहीं हो पाएँगे। अत: भूमि बंजर हो जाती है। इससे बड़ी समस्या नालियाँ अवरुद्ध होने को आती हैं। जहाँ-तहाँ कूड़े से भरे पॉलीथीन वातावरण को प्रदूषित करते हैं। खाने योग्य वस्तुओं के छिलके पॉली में बंदकर फेंके जाने से, पशु इनका सेवन पॉलीथीन सहित कर लेते हैं, जो नुकसानदेय है और यहाँ तक की पशुओं की मृत्यु तक हो जाती है।

जहाँ-जहाँ भी मानव ने अपने पाँव रखे वहाँ-वहाँ पॉलीथीन प्रदूषण फैलता चला गया। यहाँ तक यह हिमालय की वादियों को भी दूषित कर चुका है। यह इतनी मात्रा में बढ़ चुका है कि सरकार भी इसके निवारण के अभियान पर अभियान चला रही है। सैर सपाटे वाले सभी स्थान इससे ग्रस्त है।

भारत में लगभग दस से पंद्रह हजार इकाइयाँ पॉलीथीन का निर्माण कर रही हैं। सन 1990 के आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में इसकी खपत 20 हजार टन थी जो अब बढ़कर तीन से चार लाख टन तक पहुँचने की सूचना है जोकि भविष्य के लिये खतरे का सूचक है।

प्रदूषण निवारण में समाज की भूमिका


उपर्युक्त कथन कि प्रकृति ईश्वर की अनुपम देन है को संजोए रखना समाज का कर्तव्य बन जाता है। अत: मानव समाज को पॉलीथीन से होने वाले प्रदूषण के बचाव के लिये बढ़ चढ़ कर आगे आना होगा और अपने-अपने स्तर पर इससे निपटने के लिये सहभागी होना होगा। इसमें चाहे बच्चें हों या बूढ़े, स्त्री हो या पुरूष शिक्षित हो या अशिक्षित अमीर हो या गरीब, शहरवासी हो या गाँववासी सभी को इससे निजात पाने के लिये सहृदय कार्य करना होगा। परिवार के बड़े सदस्य स्वयं पॉली का प्रयोग न करें साथ ही सभी दूसरे सदस्यों को भी इसका प्रयोग करने से रोकें। साथ ही आस-पास के लोगों को भी इसके विषय में जानकारी दें तो यह सबसे बड़ा कदम होगा इसके निवारण में। यदि बाजार खरीदारी करने जाएँ तो अपने साथ जूट या कपड़े निर्मित थैले लेकर जाएँ और यदि दुकानदार पॉली में सामान दें तो उनको भी इसका प्रयोग करने से रोकें और पॉली का बहिष्कार करें। यदि उपभोगता ही इसका भोग करना बंद कर दें तो इसकी जरूरत दिन प्रति दिन कम होती चली जाएगी और एक समय ऐसा भी आएगा जब पॉलीथीन का पूरे वातावरण से सफाया हो जाएगा। सरकारी तंत्र को भी चाहिए कि वह इस निर्माण में लगी इकाइयों को बंद करें।

महिलाएँ विशेषकर पॉलीथीन रूपी जहर को फैलाने से रोक सकती हैं क्योंकि महिला शक्ति की प्रतिमूर्ति है। वह रचनात्मक प्रकृति की होती है। घर बच्चों व समाज की निर्मात्री होती हैं। इसलिये वह अपनी प्रवृत्तिनुसार वह पॉलीथीन प्रदूषण निवारण में रचनात्मक कार्य कर सकती हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण श्री सुंदर लाल बहुगुणा जी का चिपको आन्दोलन है जिसमें महिलाओं ने वृक्षों से लिपटकर इनको कटने से बचाया और यह एक मिसाल बन गई महिला शक्ति की। महिलाओं के साथ-साथ समाज के हर वर्ग को चाहे उसका कोई भी कार्य क्षेत्र हो, इस पॉलीथीन रूपी बीमारी से छुटकारा पाने के लिये अपना योगदान करना होगा। इसमें योगी, साधक, पुजारी, पादरी, मौलवी, समाज सुधारक, समाजसेवी संस्थाएं सभी को अपना योगदान कर इससे निजात पानी होगी तभी हम पर्यावरण को स्वच्छ एवं शुद्ध रख पाएँगे और अपने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ वातावरण देने में सक्षम होंगे। हम सरकारी तंत्र से भी यही आग्रह करना चाहेंगे कि पॉलीथीन का कम से कम प्रयोग करें और पॉली बनाने वाली इकाइयों को कम करें। इस प्रकार प्रकृति की गरिमा बनी रहेगी और जीव-जन्तु तथा पेड़ पौधे स्वस्थ एवं प्रदूषण मुक्त रहेंगे।

सम्पर्क


जगदीश प्रसाद सती
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, देहरादून



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Comments

Submitted by shakthi (not verified) on Tue, 01/23/2018 - 17:51

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download about polythen bags

Submitted by Sushil Kumar Giri (not verified) on Fri, 05/25/2018 - 13:29

In reply to by Ashish kumar (not verified)

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Mem/Sir good afternoon I am Sushil Kumar Student of 10 CBSE from Greater Noida (UP). Sir maine apake dwara likha ek leakh padha jo ki is prakar hai ki  

पॉलीथीन प्रदूषण समस्या एवं निदान

is leakh me apane wakai bahut acchi-acchi bate likhe hai jise padh ke mujhe bahut accha laga. Lakin wahi dusari or mujhe bahut bura bhi laga ki hamare desh ke logo ko yah pata hote huae bhi ki plastic zeher ke saman hai woose upyog me late hai. Sir maine inhi sab  samasyo ko deakhate huae ek kitab likha hai jo ki pollution ko hamare desh se khatam karne kae liyae hai Sir is kitab ko maine Swachh Bharat Abhiyan kae tahat likha hai. Sir is kitab me wo sari bate likhi hue hai jiske chalte hamare desh kae saharo or gallio me pollution hoti hai or sabse badhia or acchi batt to yah hai ki is kitab me woon sabhi pollution ki samasyao kae liyae bahut hi accha or upayukt upaay likhae huae hai Sir yah kitab bahut accha hai yae me nhi bahut logo ne kaha hai.

Sir mera apse yah savinay nivaden hai ki app bhi jald se jald mere sampark me aaye taki ham sath milkar desh ke liyae kuch accha kar sake or apane desh kae logo ko kuch naya de sake. Or ha Sir agar app kuch bhi madad nhi kar saktae to ek bar jarur mere dwara likhi gai is pustak ko jarur deakhiea ga or phi batayea ga ki yah pustak kaisa hai ok Sir Please....Sir ek request or bhi hai ki app is letter ka jald se jald response or jabab de taki me protsahit ho saku mujhe bahut accha lagega ki app mera help karengae. From:- Surajpur, Greater Noida, Gautam Budha Nagar (UP).Contact Details:- Ph No: 9911625564,7011619150, Whatapp No: 7011619150.Email Address; girisushilkumar39@gmail.com

Submitted by Anonymous (not verified) on Tue, 06/12/2018 - 09:49

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Me ghar ki purani polythene kaha bechu

Submitted by Falony Tripathy (not verified) on Fri, 06/15/2018 - 14:32

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Hello i am Falony I like this speach

Submitted by Falony Tripathy (not verified) on Fri, 06/15/2018 - 14:33

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Hello i am Falony I like this speach \ \

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