भारत की कीमत पर इंडिया की तरक्की

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जब समाज में लोग एक-दूसरे के कौशल पर निर्भर हो, जब एक-दूसरे के लिए सम्मान की भावना हो और विकास का मानवीय चेहरा ही, जब किसी के अपमान, भ्रष्टाचार, शोषण और अन्याय की कोई गुंजाइश न हो तो भारत इंडिया से आजाद होकर खुद अपने मन का राजा होगा। भारत के पास खुद के प्रबंधन, नियंत्रण के तमाम अधिकार होंगे तो यही विकास के सपने को सही तौर पर साकार करना होगा।

हमारे योजनाकारों, नीतिकारों और दानदाताओं ने पिछले 10 बरस से यही भ्रम पैदा करने का प्रयास किया है कि भारत (ग्रामीण) को इंडिया (शहरी) की जरूरत है। भारत ने ही तेजी से आगे बढ़ते इंडिया को पानी, खाद्य सामग्री, श्रमिक, कच्चा माल सब-कुछ सस्ते में दिया। भारत की कीमत पर इंडिया ने खासी तरक्की की है। लगातार बढ़ता मीडिल क्लास, आकार के सभी बंधनों को तोड़ते शहर, गांव से काम की तलाश में आए लोगों की शहरी झुग्गियों में बड़े पैमाने पर बसाहट और लाखों लोगों की निम्नस्तरीय जिंदगी, यही है आज की चिंताजनक हकीकत, लेकिन अपना सब कुछ देने के बदले में भारत को इंडिया से क्या मिला? फर्जी डिग्रियों और कागजी ज्ञान वाले डॉक्टरों, इंजीनियर्स और टीचर्स जो गांव में रहने तक में रत्ती भर भी रुचि नहीं रखते। इसके ठीक उलट तो इसे सजा की तरह मानते हैं। कई तो ड्यूटी पर ही नहीं आते, जो आते हैं उनमें से बहुत कम लोग गांव में रहना पसंद करते हैं, अधिकांश तो शहर से ही अप-डाउन करते हैं। तकरीबन छह लाख गाँवों के लिए काम कर रहे इन लोगों में अधिकांश चिढ़े हुए। हताश, नाकाबिल और भ्रष्ट ही हैं। दूसरी ओर इंडिया की नजरों में यही लोग परिवर्तन लाने वाले एजेंट्स हैं। वे ग्रामीण श्रमशक्ति को सरकार द्वारा तय मापदंडों से भी कम वेतन देकर उनका खुला शोषण करते हैं। वे (शहरी पढ़े-लिखे, धनवान किसानों समेत) जमीन हथिया लेते हैं, विकास के लिए मिली सरकारी राशि का गबन करते हैं, विकास के लिए मिली सरकारी राशि का गबन करते हैं, हैल्थ सेंटर्स, आंगनवाड़ी व स्कूल्स आदि से नियमित तौर पर अनुपस्थित रहते हैं और तय करते हैं कि सामाजिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आए।

हर बरस दिल्ली से विकास के लिए चलने वाले लाखों डॉलर्स राज्य सरकारों के जरिए कलेक्टोरेट से होते हुए ब्लॉक स्तर पर पहुंचते हैं। यहां पर मौजूद अधिकारी को ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (बीडीओ) कहा जाता है। इनका काम वैसे तो ब्लॉक का डेवलपमेंट होता है, लेकिन आमतौर पर वह डेवलपमेंट को ही ब्लॉक (रुकावट) करने का काम करता है। यह काम वह बहुत अच्छी तरह से करता है। हर वर्ष के अंत में वह सरकार से मिले पैसे को खर्च बता देता है। उल्लेखनीय है कि उसका इस पैसे को खर्च करना ही उसको वाहवाही दिला जाता है। किसी को इससे कोई मतलब नहीं होता कि आखिर यह पैसा खर्च हुआ तो कहाँ? देखा जाए तो इस तरह से कागज पर तो हमारे पास सब-कुछ होता है, भले ही हकीकत में वहां कुछ भी न हो। हजारों स्कूल्स, डॉक्टरों से भरे-पूरे बड़े-बड़े अस्पताल, पानी से लबरेज छोटे-छोटे बांध जो कभी बने ही नहीं। बरसों से पानी की एक बूंद तक का मुंह न देख पाने वाले गांवों में कागजों पर ताजा और शुद्ध पेयजल पाइपलाइनों द्वारा पहुंचा हुआ बता दिया जाता है। हर गांव में बिजली एक अन्य बड़े घोटाले का कारण होती है। ऐसे गांव जहां बिजली को पहुंचा देने के दावे किए जाते हैं, बरसों से केरोसिन, लकड़ी और डीजल का इस्तेमाल कर रहे हैं।

रात को लोग लालटेनों और चिमनियों के सहारे घरों में रोशनी करते हैं। यानी न जाने कितने दावे कागजों पर किए जाते हैं, पर जमीनी हकीकत कुछ और ही होती है। ऐसे में यह सोचा जा सकता है कि राजनीतिज्ञ जनता के हक में आवाज उठाएंगे और भ्रष्ट नौकरशाहों की नकेल कसेंगे। बदकिस्मती से भ्रष्टाचार सभी ओर फैला हुआ है, इतना ज्यादा कि अब उसको छिपाने पर बहुत सारा पैसा खर्च किया जाने लगा है। जनीतिज्ञों और नौकरशाहों के बीच गठबंधन का खुलासा केवल इस बात से हो जाता है कि किसी भी बड़े घोटाले में आज तक आजादी के बाद से इनमें से किसी ने भी इस किस्म के मामलों में कैद की सजा नहीं झेली है। यहां तक कि रंगे हाथों पकड़े जाने के बाद भी। पढ़े-लिखों से तो समाज के आधारभूत ढांचे में बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती। अगले 20 बरस में अगर किसी से उम्मीद है तो वह है गरीब, आम आदमी, निरक्षर लेकिन जानकार, जिसे केवल जरूरत है तो एक चिंगारी की, जिससे वह इस अपमान-लांछन के खिलाफ उठ खड़ा हो सके। जो कागजी पढ़ाई वाले टीचर्स, डॉक्टर्स और इंजीनियर्स पर अपने इलाके की बेहतरी के लिए निर्भर न हो।

सूचना के अधिकार के ताजातरीन अभियान में पहली बार राजस्थान के गांव वालों को यह पूछने का मौका मिला कि आखिर उनके विकास के लिए सरकार द्वारा दिए जा रहे पैसे का कहां और कैसे इस्तेमाल हो रहा है। वहां पर मौजूद हजारों ग्रामीणों की आवाज इतनी मुखर थी कि वहां पर तो भ्रष्ट अधिकारियों को गलत खर्च की कई रकम को वापस करना पड़ा। वाकई जनता-जनार्दन के सामने फजीहत से बढ़कर कोई कानून, कोई ट्रांसफर या कोई भी धमकी नहीं है। आखिर हमें इन कागजी एक्सपर्ट्स की ग्रामीण इलाकों में जरूरत ही क्या है? आखिर वो क्या जीच है, जिसके कारण हम उनको इस काम के लिए ग्रामीणों से बेहतर समझते है? अगले 20 बरस में ग्रामीण गरीब भारतीय अपनी ताकत और परंपरागत ज्ञान की उपयोगिता साबित करेगा। अपने विकास पर अपनी निर्भरता को कम करके रहेगा। भारत के पास यह ताकत और है कि वह नंगे पांव रहकर एक ऐसी क्रांति का आगाज करे जहां पर किसी भी कॉलेज या यूनिवर्सिटी की डिग्री के बगैर ही वह अपने ही ग्रामीण इलाके की बतौर डॉक्टर, टीचर, सोलर-वॉटर इंजीनियर, आर्किटेक्ट, पैथोलॉजिस्ट और कंप्यूटर प्रोग्रामर्स के तौर पर सेवा कर सके। जब समाज में लोग एक-दूसरे के कौशल पर निर्भर हो, जब एक-दूसरे के लिए सम्मान की भावना हो और विकास का मानवीय चेहरा ही, जब किसी के अपमान, भ्रष्टाचार, शोषण और अन्याय की कोई गुंजाइश न हो तो भारत इंडिया से आजाद होकर खुद अपने मन का राजा होगा। भारत के पास खुद के प्रबंधन, नियंत्रण के तमाम अधिकार होंगे तो यही विकास के सपने को सही तौर पर साकार करना होगा। यात्री, यहां कोई राह नहीं है राह तो चलकर ही बनाई जाती है।

(लेखक जाने-माने पर्यावरणविद व बेयरफुट कालेज के संस्थापक है।)

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