करोड़ों खर्च के बाद भी गंगा रह गई मैली

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धर्मशास्त्रों की मान्यता के अनुसार जिस गंगा में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं, मन निर्मल हो जाता है, उसी जल से अब शरीर रोगी हो जा रहा है। लोग स्नान करने से तमाम संक्रामक बीमारियों की गिरफ्त में आ रहे हैं। कई बार तो परीक्षणों के दौरान भी रिपोर्ट आती है कि गंगा जल आचमन करने योग्य नहीं है, पीने की तो बात छोड़ ही दीजिए। कहने का अभिप्राय जब तक गंगा किनारे चल रहे कल कारखानों को सख्ती के आधार पर मलजल गिराने के लिए मना नहीं किया जाएगा, कोई भी परियोजना सफल हो पाएगी, कहा नहीं जा सकता है।केंद्र सरकार द्वारा अब तक 270 परियोजनाओं में लगभग 20 हजार करोड़ रुपए गंगा को निर्मल बनाने के लिए खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन हालात अभी भी वही है, जो परियोजनाओं के पूर्व थी। 1340 मिलियन लीटर मलजल प्रतिदिन गंगा में गिर रहा है। ऐसे में स्वच्छ एवं निर्मल गंगा की कल्पना कैसे की जा सकती है? पौराणिक कथा के अनुसार राजा सागर अपने 60 हजार पूर्वजों की मुक्ति के लिए गंगा को पृथ्वी पर लेकर आए, जिसके चलते उनके पूर्वजों को मुक्ति मिली। आज गंगा स्वयं यह विचार कर रही होंगी कि क्या कोई भगीरथ आएगा, जो उनको स्वच्छ एवं निर्मल बना सकेगा। दशकों से सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर निर्मल गंगा के लिए योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन परिणाम हम सबके सामने है।

लगभग 25 सौ किलोमीटर गंगा की सफाई के लिए राज्य सरकारें ज्यादा जिम्मेदार हैं। सुरसरि के तीरे बसे 29 बड़े शहरों, 23 छोटे शहरों एवं 48 नगरों को प्रदूषण मुक्त कराए बिना गंगा को कैसे स्वच्छ किया जा सकता है? आंकड़ों के मुताबिक 1993 में प्रतिदिन गंगा में 2538 मिलियन लीटर मलजल गिराया जाता था, जो अब घटकर 1340 मिलियन लीटर हो गया है।

केंद्र की मोदी सरकार ने अपने प्रथम बजट में गंगा निर्मल के लिए 2040 करोड़ रुपए देने का वादा किया। सफाई अभियानों में कहीं न कहीं बड़ी चूक हो रही है, जिसके कारण इतना बड़ा यह अभियान सफल होते नहीं दिखाई दे रहा है। देश में गंगा को नदी नहीं बल्कि मोक्षदायिनी के रूप में देखा जाता है। करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केंद्र बनी गंगा दूसरों को निर्मल बनाने के लिए प्रसिद्ध है, वो अब अपनी निर्मलता के लिए संघर्ष कर रही है।

सर्वाधिक खराब हालात तो कानपुर के नजदीक के हैं। कानपुर एवं आस-पास के क्षेत्रों में स्थापित 400 कारखानों से प्रतिदिन लगभग पांच करोड़ लीटर कचरा निकलता है, जिसमें कुल 90 लाख लीटर को ही ट्रीट किया जा रहा है। जब तक इतनी भारी मात्रा में गंगा में कचरा आदि गिरता रहेगा तब तक निर्मल गंगा की कल्पना बेमानी रहेगी।

केंद्र एवं राज्य सरकारें गंगा स्वच्छता अभियान को जब तक औपचारिक तौर पर लेती रहेंगी, यह कार्य मुश्किल लगेगा। जब इस कार्य को गंभीरता से लिया जाने लगेगा निर्मल गंगा का सपना साकार हो जाएगा। सरकारों के साथ ही जन जागरूकता अभियान भी पर्याप्त रूप से चलाए जाने की आवश्यकता है। लोगों को इस मामले में भी जागरूकता प्रदान की जानी चाहिए कि गंगा में स्वयं गंदगी नहीं फैलाए साथ ही दूसरों को भी ऐसा करने से यथाशक्ति रोकें।

राज्य सरकारें व्यापारियों के हित को सर्वोपरि रखने के चक्कर में उचित एवं दंडात्मक कार्यवाही नहीं करती जिसके कारण उद्योगपति कोई वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में गम्भीरता से विचार नहीं करते हैं। सरकारें जबतक कानून बनाकर कड़ाई से अभियान नहीं चलाएंगी गंगा को स्वच्छ देखने एवं करने का सपना पूरा नहीं हो पाएगा।

प्रयाग में लगने वाले माघ मेला एवं प्रति 12 वर्ष में महाकुंभ एवं छह वर्ष के अंतराल पर पड़ने वाले अर्धकुंभ के दौरान संतों द्वारा हो हल्ला किया जाता है। माघमेला को ध्यान में रखते हुए उद्योगपतियों ने नई चाल चलनी शुरू कर दी है। माघमेला के पूर्व ही कारखाने का सारा मलजल गंगा में छोड़कर अपना टैंक रिक्त कर लेते हैं एवं पूरे माघ माह के दौरान गंगा में मलजल नहीं छोड़ते हैं। इस प्रकार से उनका उद्देश्य गंगा सफाई अथवा कानून में सहयोग प्रदान करने के बजाय अपना उल्लू सीधा करने का रहता है।

माघ के मास में चूंकि संपूर्ण भारत वर्ष से लोग गंगा स्नान के निमित्त प्रयाग आते हैं, इस कारण इस माह में गंगा जल की स्वच्छता एवं निर्मलता पर ध्यान दिया जाने लगा है। शेष दिनों पर कोई विशेष ध्यान नहीं होता। हिमालय से निकलकर बंगाल की खाड़ी तक जाने वाली मोक्षदायिनी में कहीं-कहीं तो गंगाजल होता ही नहीं, वहां नाले का पानी अथवा मलजल की भरमार होती है। गंगा स्नान करने वाले भी अब स्नान के पश्चात खुजली एवं तमाम प्रकार की त्वचा की बीमारियों की शिकायत करने लगे हैं।

इलाहाबाद में लगभग एक माह चलने वाले माघमेले के दौरान कल्पवासियों में त्वचारोग की प्रमुखता पाई जाने लगी है। पीड़ितों के अनुसार नहाने के पश्चात दाने निकलना, त्वचा में रुखापन एवं खुजली का होना आम हो गया है। चिकित्सकों के अनुसार संक्रमित जल में स्नान के चलते त्वचा रोग जैसी बीमारियों से सामना करना पड़ता है।

धर्मशास्त्रों की मान्यता के अनुसार जिस गंगा में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं, मन निर्मल हो जाता है, उसी जल से अब शरीर रोगी हो जा रहा है। लोग स्नान करने से तमाम संक्रामक बीमारियों की गिरफ्त में आ रहे हैं। कई बार तो परीक्षणों के दौरान भी रिपोर्ट आती है कि गंगा जल आचमन करने योग्य नहीं है, पीने की तो बात छोड़ ही दीजिए। कहने का अभिप्राय जब तक गंगा किनारे चल रहे कल कारखानों को सख्ती के आधार पर मलजल गिराने के लिए मना नहीं किया जाएगा, कोई भी परियोजना सफल हो पाएगी, कहा नहीं जा सकता है।

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