विकास या विनाश


हिमालयी क्षेत्र में बाढ़, भूस्खलन, भूकंप की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। उत्तराखंड हिमालय से निकलने वाली पवित्र नदियां, भागीरथी, मंदाकिनी, अलकनंदा, भिलंगना, सरयू, पिंडर, रामगंगा आदि के उद्गम से आगे लगभग 150 किमी तक सन् 1978 से लगातार जलप्रलय की घटनाओं की अनदेखी होती रही है। लेकिन पिछले सालों से अतिवृष्टि और भूस्खलनों की न थमने वाली आपदाओं से उत्तराखंड पिट रही है और बार-बार क्षत-विक्षत हो रही है। पवित्र पहाड़ों पर जब बादल फटा, उस समय उन्हें ईश्वर भी नहीं बचा पाए। तूफानी रफ्तार से आते पानी और टूटते पहाड़ों की शक्ल में नीचे उतरती मौत एक-एक कर लोगों को निगलती गई। लाशों की ढेर के बीच जो बचे थे, वे जीवन की डोर थामे रहने की नाकाम कवायद में जुटे थे। अब तक की सबसे भयंकर बरसात में से एक ने उत्तराखंड को हजारों लाशों की कब्रगाह में तब्दील कर डाला है और हमारे लिए बड़ा सबक लेकर आई है कि कैसे मनुष्य की लापरवाही से प्रकृति की विनाशक क्षमता बढ़ जाती है। तबाही के अगले दिन घटनास्थल पर जो मंजर सामने आया, वह अपनी कहानी खुद कहता नजर आ रहा था।

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