वनभूमि और वनाधिकार

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लगभग 25 सालों तक हजारों लोग अपनी ही जमीन पर अवैध निवासी बने रहे मगर सरकार ने वनभूमि पर वनवासी समुदायों के परंपरागत अधिकार की न तो पहचान की और ना ही उसे मंजूर किया। वन संरक्षण कानून और इसी से जुड़े वन और पर्यावरण मंत्रालय के दिशानिर्देशों में वनभूमि पर वनवासी समुदायों के जिन परंपरागत अधिकार को मान्यता दी गई थी उन्हें भी सरकार ने सीमित करने के प्रयास किये। वनाधिकार अधिनियम पारित होने तथा राष्ट्रीय समिति की अनुशंसाएं दर्ज होने के इस वक्फे में 182389 हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न परियोजनाओं को दी जा चुकी है।

नवंबर,2011 से जनवरी,2012 के बीच पर्यावरण मंत्रालय की परामर्श समिति ने लगभग 4166 हेक्टेयर वन भूमि बीस ऐसी बड़ी परियोजनाओं को प्रदान की है जिनके तहत खनन और बांध निर्माण जैसे कार्य किए जाएंगे। आदिवासी मामलों के मंत्रालय की मौजूदा सक्रियता शायद ऐसी घटनाओं से ही प्रेरित है, क्योंकि लंबे समय से इस आशय की खबरें आती रही हैं कि वनवासियों से जमीन लेने के लिए बाकायदा ग्राम सभा की बैठक बुलाई जाती थी लेकिन यह पूरी तरह प्रतिबंधित कार्रवाई होती थी।

आदिवासी मामलों के मंत्री किशोर चन्द्र देव ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों से कहा है कि वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों का सख्ती से पालन किया जाए, ताकि वन क्षेत्र में रहने वाले समुदायों को वन भूमि पर वाजिब हकदारी मिल सके। पहली नजर में इसे बेशक केंद्रीय मंत्रालय की एक रूटीनी कार्रवाई ही माना जाएगा, पर माननीय मंत्री का इस संबंध में यह वक्तव्य जरूर ध्यान खींचता है कि अगर निर्दिष्ट वन भूमि का किसी अन्य उद्देश्य के लिए उपयोग किए जाने की योजना सामने आए तो ग्राम सभा द्वारा इस बाबत की जाने वाली कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग की जानी चाहिए। गौरतलब है कि जंगल की जमीन पर स्थानीय समुदायों की हकदारी का मसला पिछले कई बरसों से अटका पड़ा है। जिसके लिए वनों पर काबिज नौकरशाही सीधे तौर पर जिम्मेदार दिखाई देती है। इस मामले में उसका अड़ियल रवैया तभी सामने आ गया था, जब 2006 में वन अधिकार अधिनियम में एक बड़ा नीतिगत संशोधन किया गया था।

उक्त संशोधन में राज्य ने एक तरफ यह बात सैद्धांतिक तौर पर मानी थी कि वन क्षेत्र में रहने वाले समुदायों को अतिक्रमणकारी नहीं माना जा सकता तो दूसरी तरफ इस बात को भी मान्यता दी गई थी कि ऐसे समुदाय वन के कुछ निश्चित संसाधनों और वनोपज का जीविका के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। पर इसे सरकार की कमजोरी ही कहा जाएगा कि उसी की नौकरशाही उसके नीतिगत फैसले में अड़ंगा लगाती रही है। याद रहे कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य और वन अधिनियम में अपेक्षित सुधार लाने के लिए गठित की गई राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष एनके सक्सेना ने पिछले साल वन नौकरशाही के आला अधिकारियों को उनके अड़ियल रवैए के लिए सख्त फटकार लगाई थी। इसे नौकरशाही की औपनिवेशिक स्वेच्छाचारिता की मिसाल ही माना जाएगा कि देश के 11 राज्यों में आज तक उन सुधारों को लागू नहीं किया गया है, जिनकी राष्ट्रीय समिति ने अनुशंसा की थी।

इस मसले पर सरकार की सुस्ती को उसकी कमजोरी कहा जाए या फिर खुद नौकरशाही के साथ जुगलबंदी? यह शंका इसलिए उठती है, क्योंकि वन अधिकार अधिनियम पारित होने तथा राष्ट्रीय समिति की अनुशंसाएं दर्ज होने के इस वक्फे में 182389 हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न परियोजनाओं को दी जा चुकी है। यही नहीं नवंबर,2011 से जनवरी,2012 के बीच पर्यावरण मंत्रालय की परामर्श समिति ने लगभग 4166 हेक्टेयर वन भूमि बीस ऐसी बड़ी परियोजनाओं को प्रदान की है जिनके तहत खनन और बांध निर्माण जैसे कार्य किए जाएंगे। आदिवासी मामलों के मंत्रालय की मौजूदा सक्रियता शायद ऐसी घटनाओं से ही प्रेरित है, क्योंकि लंबे समय से इस आशय की खबरें आती रही हैं कि वनवासियों से जमीन लेने के लिए बाकायदा ग्राम सभा की बैठक बुलाई जाती थी लेकिन यह पूरी तरह प्रतिबंधित कार्रवाई होती थी। औद्योगिक लॉबी के जनसंपर्क विभाग पहले ही पूरी प्रक्रिया का अपने पक्ष में प्रबंधन कर लेते थे। बहरहाल, ग्राम सभा की कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग के बाद यह उम्मीद जगती है कि शायद इस कदम से झूठी और दिखावटी कार्यवाहियों पर विराम लग सकेगा।

परियोजनाओं की वजह से विस्थापित होते आदिवासी

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