आधुनिक कृषि
9 Apr 2018


आधुनिक कृषि प्रणाली ने समूचे देश में अनाज के उत्पादन की वृद्धि में भारी योगदान दिया है। आधुनिक कृषि प्रणाली के प्रयोग से देश अनाज के उत्पादन में पर्याप्तता प्राप्त कर सकता है। कृषि कार्य में उपयोगी आधुनिक विधियाँ हैं- बेहतर बीजों का प्रयोग, उचित सिंचाई तथा रासायनिक खादों के प्रयोग से पौधों को पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों की आपूर्ति व कीटनाशकों के प्रयोग से पौधों को लगने वाली बीमारियों व कीटाणुओं का नियंत्रण। आधुनिक कृषि में ट्रैक्टर, कम्बाइन हार्वेस्टर व सिंचाई के लिये ट्यूबवेलों द्वारा आधुनिक जोताई (खेती) की विधियों का प्रयोग किया है। उच्च उत्पादकता वाले बीजों के माध्यम से खाद्य-उत्पादन में भारी वृद्धि को हरित क्रांति कहा गया है। आधुनिक कृषि का मुख्य उद्देश्य अच्छी फसल के साथ-साथ वायु, जल, भूमि व मानवीय स्वास्थ्य का संरक्षण भी होना चाहिए।

उद्देश्य


इस पाठ के अध्ययन के समापन के पश्चात, आपः

- हरित क्रांति को परिभाषित कर पाएँगे;
- भारत के प्रयोग में आने वाले ऊँची उत्पादकता के पौधों की किस्मों (HYV) के विषय में जान पाएँगे;
- खादों व कीटनाशकों की आवश्यकता का महत्त्व जान पाएँगे;
- बेहतर किस्म के बीजों, कृषि यंत्रों और सिंचाई की आवश्यकता पर पर्याप्त जोर दे सकेंगे;
- मशरूम (खुम्मी) की बुवाई, पशुपालन व मत्स्य पालन की विधियाँ जैसी नई कृषि विधियों के बारे में जान पाएँगे;
- पशुपालन को परिभाषित कर पाएँगे;
- मवेशियों का निवास, भोजन इत्यादि के सम्बन्ध में प्रबंधन प्रक्रिया का वर्णन कर पाएँगे;
- मवेशियों को साधारणतः होने वाली बीमारियों का नाम बता पाएँगे;
- मरे हुए पशुओं के निपटान का पर्यावरण पर दुष्प्रभाव से सम्बन्ध जोड़ सकेंगे;
- हार्मोनों के अविवेकपूर्ण ढंग से प्रयोग का मवेशी, इत्यादि पर दुष्प्रभाव को जान पाएँगे;
- जलीय कृषि के विपरीत प्रभावों की विवेचना कर पाएँगे।

20.1 हरित क्रांति क्या है


‘हरित क्रांति’ शब्द का अर्थ है नए पौधों की किस्मों के विकास द्वारा उत्पादन को कई गुना बढ़ाने के उपाय। उच्च उत्पादन वाली (High yielding varieties, HYVs) धान व गेहूँ की किस्में हरित क्रांति के मुख्य तत्व रहे हैं। मार्च 1968 में अमेरिकी अन्तरराष्ट्रीय विकास एजेंसी (US Agency for International Development, USAID) के संचालक विलियम गैंड ने पहली बार ‘‘हरित क्रांति’’ शब्दों का प्रयोग किया था। इस शब्द का प्रयोग नई तकनीकों द्वारा चावल, गैहूँ, मक्के और अन्य पौधों की कई गुना विकसित हुई उत्पादकता के संदर्भ में किया गया था। हालाँकि ‘हरित क्रांति’ नामक शब्दों का प्रयोग मुख्यतः गेहूँ और धान के संदर्भ में किया जाता है, परन्तु कुछ कृषि विशेषज्ञों ने मक्का, सोयाबीन व गन्ने जैसे उन अन्य अनाजों को भी इस श्रेणी में शामिल किया है, जिनके उत्पादन में, नई तकनीकों के प्रयोगों द्वारा, कई गुणा वृद्धि हुई है। जिनके द्वारा हरित क्रांति संभव हुई है, वे इस प्रकार है:-

- फसलों के उच्च उत्पादकता वाले पौधों का प्रवेशन (Introduction)।
- बहु-कृषि (सम्मिलित रूप से पौधे उगाने की प्रक्रिया), बेहतर सिंचाई व पर्याप्त मात्रा में खादों की आपूर्ति।
- बीमारियों व कीटाणुओं के विरुद्ध पौधों के संरक्षण की विधियों का प्रयोग।
- वैज्ञानिक कृषि की तकनीकों का अनुसंधान व उनका खेतों से ग्रामीण कृषकों तक स्थानान्तरण।
- खेतों से बाजार तक फसल के यातायात की बेहतर व्यवस्था करना।

आधुनिक तकनीकों के प्रयोग द्वारा पौधों (विशेषकर अनाज) के उत्पादन में महत्त्वपूर्ण वृद्धि को हरित क्रांति नाम दिया गया है।

उदाहरण के लिये, जब एक मेक्सिकन गेहूँ की किस्म (ऊँची उत्पादकता एवं अच्छी तरह सिंचाई किए हुए) का उतने ही अच्छे स्तर की भारत गेहूँ की किस्म (रोग की प्रतिरोधक क्षमता एवं अच्छी गुणवत्ता वाला अनाज) से आधुनिक तकनीक द्वारा संकरण किया गया तब एक उच्च उत्पादकता वाले और बीमारी से लड़ने में सक्षम गेहूँ की किस्म की उत्पत्ति हुई। कुछ मुख्य ‘क्रांतिकारी’ किस्मों के नाम हैं- ‘कल्याण सोना’, ‘सोनालिका’, और ‘शर्बती सोनोरा’ इत्यादि।

20.1.1 भारत में उच्च उत्पादन की किस्मों के प्रयोग का आरम्भ


कृषि के क्षेत्र में विकसित देशों के मुकाबले, हमारी औसत राष्ट्रीय उत्पादकता की दर केवल 800 किलो प्रति हेक्टेयर के स्तर की ही थी, जो कि विकसित देशों की तुलना में बहुत कम थी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के प्राक्तन डायरेक्टर जनरल एम एस स्वामीनाथन (M.S. Swaminathan) ने पौधों की उत्पादकता के ठहराव व पौधों के उत्पादन की अस्थिरता का गहरा विश्लेषण किया तथा उन कारणों की तह तक पहुँचने की कोशिश की, जिनके कारणवश यह स्थिति विद्यमान थी। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि उस समय प्रयोग में आने वाली लम्बी किस्मों की शारीरिक बनावट ही अधिक उत्पादन के मार्ग में एक बाधा सिद्ध हो रही थी। उन्होंने उक्त पौधों की किस्मों की उत्पत्ति की प्रक्रिया की ही जननिक कार्यशैलियों के पुनःनिर्देशन पर जोर दिया।

सन 1970-80 के दशक के दौरान, गेहूँ की जननिक प्रक्रियाओं के माध्यम से नए किस्म के बीजों वाले, उच्च उत्पादकता के छोटे आकार के गेहूँ की किस्मों का विकास किया गया। इसी दौरान कुछ महत्त्वपूर्ण किस्में, ‘कल्याण सोना’, ‘शर्बती सोनारा’, ‘सोनालिका’ जैसी ऊँची उत्पादकता की किस्मों का विकास हुआ जिन्होंने खादों और सिंचाई की ओर अच्छा रुख अपनाया।

भारतीय जननिक वैज्ञानिकों के अनुरोध पर, सन 1963 में भारत सरकार ने मैक्सिको देश से प्रोफेसर नॉर्मन-ई-बोरलौग (Prof. Norman G. Borlaug) को आमंत्रित किया ताकि पौधों की बौनी (कम आकार) किस्मों के उत्पादन की संभावनाओं का वे भारत वर्ष में मूल्यांकन करें। भारत के कई क्षेत्रों का दौरा करने के पश्चात, उन्होंने भारत में मैक्सिकी उद्भव के ही छोटे आकार के गेहूँ की किस्मों को बोने का प्रस्ताव रखा। वे इस निष्कर्ष पर इस कारणवश पहुँचे क्योंकि मैक्सिको का मौसम व भूमि दोनों तुलनात्मक रूप से एक समान थीं। उनके सुझाव पर, लेरमा-राजो व सोनोरा-64 नामक दो किस्मों का चयन किया गया और उन्हें हमारे सींचे गए खेतों में बोने के लिये प्रयुक्त किया गया। इन किस्मों के प्रयोग से गेहूँ की उत्पादकता कई गुना बढ़ गयी और हमारे गेहूँ के निर्यात में क्रांति आ गई।

डॉ. बोरलॉग, मैक्सिको सरकार तथा रॉकफेलेर फाउंडेशन की सहकारी योजना के अन्तर्गत गेहूँ अनुसंधान व विकास कार्यक्रम के मुखिया के रूप में जुड़े। सन 1966 में उनकी गेहूँ के विकास की गुपचुप क्रांति ने संसार भर का ध्यान आकर्षित किया तथा मैक्सिको में ही अन्तरराष्ट्रीय गेहूँ व मक्के के विकास का केन्द्र (Centre for Quiet Revolution in Wheat Improvement) स्थापित किया गया। सन 1970 में उन्हें ‘हरित क्रांति’ लाने के लिये नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसी हरित क्रांति ने भारत की इतनी मदद की थी।

डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन एक बेहतरीन उत्परिवर्तन जननिक वैज्ञानिक रहे हैं। इन्होंने सन 1967 में उगाने के लिये ‘शर्बती सोनारा’ नामक किस्म को निर्मित किया। उत्परिवर्तन जनन के कार्यक्रम में सोनारा 64 को अल्ट्रावायलेट किरणों से पारित करके उन्होंने इस ‘किस्म’ का निर्माण किया।

20.2 उर्वरक और पीड़क नाशक खादें (Fertilizers)


उर्वरक वे पदार्थ हैं जिन्हें पौधों के स्वस्थ विकास के लिये मृदा में मिलाया जाता है। ये उर्वरक मृदा के खोए हुए पोषक तत्वों को पुनःस्थापित कर देते हैं। कृषक आमतौर से कार्बनिक खादें जो पौधों और पशुओं के अपशिष्ट पदार्थों इत्यादि से बनाई हुई प्राकृतिक खाद है तथा रासायनिक खाद, दोनों का प्रयोग करते हैं।

खादों को भूमि में मुख्यतः इसलिये डाला जाता है ताकि पेड़-पौधों की जड़ें उन्हें सोख लें। इन्हें छिड़काव के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है। रासायनिक खादें, मुख्यतः निम्नलिखित प्रकार की हैं:-

(a) नाइट्रोजन-युक्त खादः ऐसे उर्वरक जिनमें नाइट्रोजन पायी जाती है। उदाहरणः अमोनियम सल्फेट, अमोनियम नाइट्रेट तथा यूरिया।

(b) फॉस्फेट युक्त खादः ऐसे उर्वरक जिनमें फॉसफेट पायी जाती है, उदाहरणः अमोनियम फॉस्फेट, कैल्शियम डाइहाइड्रोजन फॉस्फेट (सुपरफॉस्फेट)

(c) पोटेशियम युक्त खाद: ऐसे उर्वरक जिनमें पोटेशियम पाया जाता है। उदाहरणः पोटेशियम सल्फेट व पोटेशियम नाइट्रेट।

नाइट्रोजनयुक्त खादें पौधों को विकसित करने में सहायक हैं तथा खाद्य उत्पादन में अनिवार्य है। परन्तु इनका प्रयोग बुद्धिमत्ता से होना चाहिए। पौधों द्वारा अकुशल अवशोषण व गैर-जिम्मेदारी से उर्वरक का प्रयोग पर्यावरण के प्रदूषण के मुख्य कारण हैं। बिना प्रयोग में लाए गए उर्वरक तब नदियों, तालाबों के सतही जल व भूमि के नीचे के जल में प्रवेश करते हैं। उर्वरक का प्रयोग जब बिना सोचे समझे किया जाता है, तब वे न केवल पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं बल्कि खर्च किया हुआ पैसा भी नष्ट होता है।

कार्बनिक खाद
कार्बनिक खाद, पौधों और पशुओं द्वारा छोड़े गए अपशिष्ट पदार्थों पर सूक्ष्म जीवों द्वारा की गई जैविक प्रक्रिया से उत्पन्न हो जाती है। इसको खाद या कम्पोस्ट भी कहा जाता है। ये मवेशियों के गोबर, अन्य किस्म के पशुओं द्वारा छोड़े गए अपशिष्ट तथा भूमि पर गिरे हुए पत्तों, टहनियों, इत्यादि पर सूक्ष्मजीवों की प्रक्रिया के उपरांत उत्पन्न होती हैं। कार्बनिक खाद पर्यावरण भूमि और जल को किसी प्रकार से प्रदूषित नहीं करती। प्राकृतिक खाद भूमि को पोषक तत्वों से परिपूर्ण करती है तथा मृदा की संरचना, भूमि के गुणों की उन्नति व भूमि के जल को बांधने की क्षमता में विकास करती है।

कीटाणुनाशक/पीड़क नाशक


कीटाणुनाशक वे रासायनिक पदार्थ हैं जिनका उन जीवों को मारने व नियंत्रित करने के लिये विकास किया गया है जो कृषि के लिये हानिकारक सिद्ध होते हैं।

आधुनिक कीटाणुनाशक (Pesticides) खाद्यान्नों की आपूर्ति में वृद्धि करते हैं, कृषकों के मुनाफे की वृद्धि करते हैं और सही प्रयोग करने पर सुरक्षा भी प्रदान करते हैं। कीटाणुनाशक न केवल अधिकतर कीटाणुओं का जल्द ही नियंत्रण कर लेते हैं, बल्कि लम्बे समय तक प्रयोग-योग्य रहते हैं। इसके अतिरिक्त इनका यातायात और लागूकरण सरल है। यदि पौधों की ओर से जननिक विरोध होता है, तब कृषक या तो इन दवाओं को अधिक खुराक में प्रयुक्त कर सकते हैं, अथवा अन्य कीटनाशकों का प्रयोग कर सकते हैं। नियंत्रित रूप से प्रयोग की स्थिति में, ये कीटनाशक कृषक, श्रमिक या उपभोक्ताओं के लिये किसी भी तरह से हानिकारक नहीं है।

दिल्लीवासियों के शरीर के ऊतकों में डीडीटी (क्लोरीन युक्त हाइड्रोकार्बन) का स्तर विश्व में सबसे ऊँचा है।

पाठगत प्रश्न 20.1


1. हरित क्रांति की परिभाषा दीजिए।
2. ‘शर्बती सोनोरा’, डॉ. स्वामीनाथन द्वारा किस प्रकार निर्मित किया गया था?
3. ‘फर्टिलाइजर’ (उर्वरक) की परिभाषा दीजिए।
4. प्राकृतिक खादों के प्रयोग के क्या-क्या लाभ हैं?

20.3 अधिक गुणवत्ता के बीजों के प्रयोग की आवश्यकता


सीमित भूमि क्षेत्र में अधिक उत्पादन के लिये उत्तम स्तर के बीजों का प्रयोग अतिआवश्यक हैं। जननिक विज्ञान के माध्यम से बीजों की गुणवत्ता में विकास अब एक आम बात हो गई है। जैविक तकनीक के ज्ञान के उपयोग से, अब बेहतर स्तर के बीजों का उत्पादन हो रहा है।

बीजों की गुणवत्ता का विकास निम्नलिखित निर्माण के लिये हो रहा है:

- उच्च उत्पादकता वाली किस्मों का निर्माण।
- बेहतर स्तर के पोषक तत्वों से युक्त बीजों के निर्माण में जिनमें दालों में प्रोटीन की गुणवत्ता, गेहूँ के बेहतर पकने की गुणवत्ता, फलों और सब्जियों की संरक्षण की गुणवत्ता तथा तेल का निर्माण करने वाले पौधों की अधिक गुणवत्ता व मात्रा सम्मिलित हैं।
- कुछ ऐसी किस्मों का निर्माण जो कि बीमारियों व पीड़कों, दोनों का मुकाबला कर सके।
- ऐसी किस्मों का निर्माण जो कि गर्मी, सर्दी, खारेपन, बर्फ, सूखे इत्यादि से जूझने में सक्षम हों।

रोग प्रतिरोधक एवं पीड़क प्रतिरोधक क्षमता वाले जीवों को अधिक कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं होती- इससे न केवल पर्यावरण के प्रदूषण से बचाव होता है, कीटनाशकों की खरीददारी में जो पैसा खर्च होता है, उसे भी रोका जा सकता है।

पौधों को विभिन्न प्रकार की कठिनाई-युक्त स्थितियों में भी उगाया जा सकता है। इससे जोताई (बुवाई) के क्षेत्र का फैलाव होता है। उदाहरणतः सूखे, खारे या जलीय क्षेत्रों की जोताई के लिये इन किस्मों का प्रयोग किया जा सकता है।

20.4 कृषि का मशीनीकरण


विशाल क्षेत्रों पर उत्पादन की वृद्धि के लिये कृषि के क्षेत्र में मशीनीकरण का प्रारम्भ हुआ। विशाल भूमि के क्षेत्रों पर कृषि से सम्बन्धित सब प्रक्रियाएँ, थोड़े समय की अवधि में ही मशीनीकरण द्वारा संभव हो सकती है। साथ ही साथ मशीनों की सहायता से फसल जल्दी से जल्दी बाजार में भी पहुँच जाती है। विकासशील देशों में कृषि मजदूरों के कार्य पर निर्भर रहती थी, परन्तु बड़ी संख्या में ग्रामीण लोगों का शहरों में स्थानान्तरण के कारण, खेतों पर श्रमिकों की संख्या कम हो गयी। इस नई स्थिति से निपटने के लिये, कृषि-सम्बन्धी कार्यों को पूरा करने में कृषि के मशीनीकरण के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं रह गया। खेतों पर कार्यरत कुछ मशीनों के नाम इस प्रकार हैं- पानी के पम्प, जोत, कम्बाइन हार्वेस्टर, भूमि को समतल बनाने वाली मशीनें, जोतक, ऊर्जा द्वारा संचालित ट्रैक्टरों द्वारा छिड़काव के उपकरण, बुवाई करने वाली मशीनें, ट्रॉलियां, इत्यादि।

कम्बाइन हार्वेस्टर: इनको ‘कम्बाइन’ के नाम से भी जाना जाता है। यह एक बड़े आकार की मशीन है जो न केवल मक्के की कटाई करती है, बल्कि पौधों के बालों से अनाज को भी अलग करती हैं। इसमें पौधों के काटने व फसलीकरण के कार्य शामिल हैं। ये मशीनें खेतों के अंदर ही बालों से अनाज को अलग करती हैं।

हल: खेतों की जोताई या मशीनीकृत के लिये कई किस्म के मृदा की यांत्रिकीकरण द्वारा गुड़ाई, मिट्टी को ऊपर-नीचे करने के हल आजकल उपलब्ध हैं।

भूमि समतलक यंत्र: ये यंत्र भूमि के बड़े भागों को तोड़कर, भूमि को समतल बनाते हैं तथा इस तरह भूमि को बीज बोने के लिये तैयार करते हैं।

बॉक्स-ड्रिल (वपित्र): ये ट्रैक्टरों से जुड़े यंत्र होते हैं, जो बीजों को बोने के प्रयोग में आते हैं।

ऊर्जा द्वारा संचालित ट्रैक्टर स्प्रे: ये यंत्र पौधों की कतारों के बीच होकर खेत में फसलों के दोनों ओर कीटनाशकों या पीड़कनाशकों का छिड़काव करते हैं।

पम्प: ये साधारण बिजली द्वारा चलने वाले उपकरण हैं जो सिंचाई के पानी को खेतों तक पहुँचाते हैं।

थ्रेशर: वे मशीनें हैं जो कि मक्के, धान व गेहूँ के पौधों की बालों या शेष पौधों में से अनाज को पृथक करने के काम आती हैं।

मशीनीकृत पिकर: ये वे यंत्र हैं जो चूषण के सिद्धांत पर चलते हैं तथा रुई की फसल से रुई को अलग करने के प्रयोग में आते हैं। रुई उतारने के लिये रसायनों द्वारा पौधों का निष्पत्रण किया जाता है।

20.5 नवीन कृषि प्रणालियाँ


आधुनिक कृषि में पशुपालन, मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन एवं मशरूम संवर्धन इत्यादि शामिल हैं जो भोजन के अन्य उत्पाद जैसे दूध, मांस, मछली, अंडे, मशरूम इत्यादि प्रदान करते हैं। पोषक भोजन की आपूर्ति करने के साथ-साथ ये दालों के उपभोग को भी कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इस प्रकार आधुनिक किसान फसल उगाने के साथ-साथ उपरिलिखित कृषिकल्पों में से किसी को भी अपना सकता है।

(क) मुर्गीपालन की कृषि (Poultry)


मुर्गीपालन शब्द का प्रयोग बत्तख व मुर्गियों जैसे पक्षियों को, उनसे अण्डे व मांस पाने के लिये उनकी देखरेख और पालन की कृषि है। मुर्गीपालन थोड़े ही समय में इसलिये लोकप्रिय हुआ है क्योंकि इसका प्रारम्भ व संचालन की प्रक्रिया सरल है। मुर्गीपालन पर खर्च शीघ्र ही एक से छह महीनों में धनराशि लौटाता है। यह सरल रूप से संचालित और कम स्थान व श्रम से सम्भव है। मुर्गियों जैसे पक्षी व उनके अण्डे पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं।

भारतीय मुर्गियों से अच्छी गुणवत्ता का माँस पाया जा सकता है। परन्तु इनके अण्डे छोटे आकार के होते हैं। बाहर के कुछ देशों की विशिष्टतम किस्मों के मुकाबले में इनकी साधारण बीमारियों से लड़ने की स्वाभाविक क्षमता कम है।

विदेशीय पक्षियों के कुछ साधारण किस्में इस प्रकार हैं- लेग हॉर्न, रोड आइलैण्ड रेड, कॉर्निश।

साधारण भारतीय किस्में इस प्रकार हैं- असील, चिट्टागौंग, बसरा।

(ख) मशरूम (खुम्भी) की कृषि (Mushroom Culture)


मशरूम की कृषि न सिर्फ धन कमाने का एक आकर्षक तरीका है, बल्कि वह पोषक तत्वों से भी भरपूर खाद्य पदार्थ है। मशरूम एक प्रकार के कवक हैं जोकि छोटे आकार की सफेद गेदों के रूप में दिखायी देते हैं। इनमें एक छोटी शाखा और टोपी होती है, जो कि एक छतरी के समान ऊपर को खुलती हैं। इनमें क्लोरोफिल नामक तत्व की कमी होती है और ये खेतों व कारखानों के अपशिष्ट पदार्थों या कार्बनिक पदार्थों व कूड़ा-करकट पर उगते हैं। मानवीय उपभोग के लिये बेकार पदार्थों, कूड़ा-करकट को माध्यम बनाकर खुम्बी उगाई जा सकती है। इस प्रकार अपशिष्ट पदार्थों को पुनः प्रयोग में लाया जा सकता है। मशरूमों की अनेक किस्मों में से केवल कुछ ही खाने के योग्य हैं। भारत में उगने वाले कुछ खाने योग्य मशरूमों के नाम इस प्रकार हैं- सफेद बटन मशरूम (ऐगेरीकस बाइस्पोरस), धान के रेशे की मशरूम व ऑयस्टर मशरूम।

मशरूम ऊँचे स्तर के प्रोटीनों का एक अच्छा स्रोत हैं। इसके अतिरिक्त ये विटामिनों एवं खनिजों जैसे पोषक तत्वों से भी भरपूर है। फल और सब्जियों की तरह मशरूम भी जल्दी सड़ने वाले पदार्थ हैं तथा संरक्षण व व्यवसायीकरण की प्रक्रियाओं के दौरान उन पर बहुत ध्यान देने की आवश्यकता होती है।

(ग) मधुमक्खी पालन (Apiculture)


एपीकल्चर (मधुमक्खी पालन) को मधुमक्खी रखरखाव/पालन के नाम से जाना जाता है। ‘एपिस’ का अर्थ है- ‘मधुमक्खी’। मधुमक्खी-पालन, बड़ी मात्रा में मधुमक्खियों से निकाले गए मधु के निर्यात के लिये, मधुमक्खियों के समूहों (कॉलोनियों) की देख-रेख व नियंत्रण है। प्राचीन काल में मधुमक्खी पालन लोग घर में ही कर लेते थे। परन्तु अब यह एक महत्त्वपूर्ण उद्योग का रूप ले चुका है।

मधुमक्खी-पालन के तीन मुख्य लाभ हैं:


(1) मधु (शहद) जैसे मूल्यवान खाद्य पदार्थ को प्राप्त करना।
(2) मधुमक्खी मोम प्रदान करती है, जिसका उद्योग में बहुत प्रयोग होता है
(3) मधुमक्खियाँ परागण के बहुत अच्छे एजेन्ट (कारक) हैं, जिनकी परागण प्रक्रिया से कृषि-उत्पादन बढ़ता है।

मधुमक्खियाँ मधु (Honey) व मोम (Wax) दोनों को निर्मित करती हैं, जिनकी बाजार में बहुत मांग है। परन्तु, कृषि में, परागण के एजन्टों के रूप में इनका कार्य प्रमुख है। फूलों से निकाला गया मधुरस (मकरंद) व पराग, शहद के निर्माण में प्रयोग होते हैं। मधुरस फूलों से निकला हुआ एक मीठा स्राव है। यह शहद के लिये कच्चा माल है। पराग कण भ्रूण (निषेचित अण्डों) के लिये, भोजन के रूप में काम आते हैं।

(घ) मछली-पालन और जलीय कृषि (Pisciculture and Aquaculture)


दुनिया के बहुत से भागों में मछलियाँ प्रोटीनयुक्त खाद्य रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मछली पालन (मत्स्य पालन) का विकास अब एक अधिक संभावना वाला उद्योग बन चुका है।

भारत का एक लम्बा समुद्र तट है, जो कि समुद्री मछलियों का एक बड़ा उत्पादक है।

ऐसे जलीय क्षेत्र जहाँ मछलीपालन व्यावसायिक रूप से होता है, उन्हें कृत्रिम मात्स्यकी (Artifical fisheries) का नाम दिया जाता है। यहाँ पर मछलियों की उत्पत्ति, पालन-पोषण व अंत में इनको ‘फसल’ के रूप में प्राप्त किया जाता है। मत्स्य उद्योग या तो एक प्राकृतिक जलीय क्षेत्र में, अथवा एक कृत्रिम जलीय क्षेत्र में सम्भव है। कई प्रकार की मछलियों का एक साथ पालन-पोषण भी किया जा सकता है।

जिस किस्म के जल में उनका पालन होता है, उसके आधार पर मात्स्यकी को निम्न श्रेणियों में बांटा जा सकता हैः-

1. समुद्री मात्स्यकी: यानि जहाँ समुद्र तट पर मछली पकड़ी जाती है उदाहरण मैकरेल, सार्डीन, कैटफिश।

2. अलवण जल या अंतःस्थली मत्स्य केन्द्रः ये मछलियाँ नदियों, सिंचाई में प्रयुक्त नाले, झीलों, टैंकों, इत्यादि में पाई जाती है। उदाहरण- रोहू, कतला, मिस्टस।

3. ज्वारनदः ये उन जगहों पर पाई जाती हैं जहाँ नदी का पानी व समुद्र का पानी मिश्रित हो जाता है जैसे लगून, तटीय झील, डेल्टा चैनल इत्यादि। ये प्रायः बंगाल व केरल जैसे प्रदेशों में पाई जाती हैं। उदाहरण मुलेट, मिल्कफिश, पर्लस्पॉट।

इसके अतिरिक्त अन्य जलीय स्रोत हैं मोलसक जिनमें कस्तूरा, समुद्रफेनी, ऑक्टोपस एवं समुद्री खरपतवार इत्यादि शामिल हैं। इनका भी जलीय कृषि के लिये प्रयोग किया गया है। समुद्री खरपतवारों का प्रयोग खाद्य, मवेशियों और मुर्गियों के चारे, खाद व औद्योगिक उद्देश्य से अगार-अगार व ऐल्जिन की प्राप्ति के स्रोत के रूप में इस्तेमाल किये जाते हैं। अतः ये नई किस्म की कृषि प्रणालियों न केवल रोजगार दे सकती हैं, बल्कि लाभदायक व्यवसाय का रूप भी धारण कर सकती हैं।

पाठगत प्रश्न 20.2


1. बीमारियों से लड़ने में सक्षम बीजों की किस्मों के क्या-क्या लाभ हैं?
2. कम्बाइन हार्वेस्टरों, हल व भूमि समतलक जैसे यंत्रों के क्या-क्या कार्य हैं?
3. खारेपन, सूखे या पानी से भरी स्थितियों से जूझने में सक्षम बीजों की किस्मों के प्रतिपालक का क्या महत्त्व है?
4. किन्हीं तीन महत्त्वपूर्ण कृषि प्रणालियों के विषय में लिखिए व उनके लाभ भी बताइये।

20.6 पशुपालन सम्बन्धी कृषि


कृषि की वह शाखा जो पालतू पशुओं के पालन, पोषण व देख-रेख से सम्बन्धित है, पशुपालन कहलाती है।

पशुपालन आधुनिक कृषि का एक अभिन्न अंग है क्योंकि दूध, अण्डा, मांस जैसे महत्त्वपूर्ण खाद्य पदार्थ हमें पशुओं से ही मिलते हैं। गाय व भैंस हमारे दूध के मुख्य स्रोत हैं। दूध देने वाले पशुओं को ‘दुग्ध पशु’ के नाम से भी बुलाया जाता है।

मुर्गियां अण्डे देने वाले जानवर हैं। मछलियाँ, सूअर, मुर्गियां व बकरी, माँस के मुख्य स्रोत हैं।

भोजन में प्रोटीनयुक्त खाद्य के सेवन में वृद्धि हुई क्योंकि लोग पशुओं से प्राप्त खाद्य स्रोतों का अधिक प्रयोग कर रहे हैं। पशुओं द्वारा प्रदत्त खाद्य-पदार्थों (दूध, मछली व अण्डों) की प्राप्ति में पिछले चार दशकों से लगातार वृद्धि हुई है।

पशुपालन ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में, ग्रामीण घरों की आय बढ़ाने में एक प्रमुख भूमिका निभाई है।

कई संगठन, सहकारी समितियां, विश्वविद्यालय व राष्ट्रीय संस्थान अनुसंधान प्रक्रियाओं में जुटे हुए हैं, जिसके परिणामस्वरूप दूध, मछली व अण्डों के कुल उत्पादन में बहुत अधिक वृद्धि हुई है।

पालतू पशुओं का प्रजनन भी पशुपालन का एक अभिन्न अंग है।

20.7 मवेशी/पशुओं का प्रबंधन


प्रबंधन में पशुओं की उचित देख-रेख, उनको चारा-पानी प्रदान करना, उन्हें निवास-स्थल (आश्रय) प्रदान करना व बीमारियों से रक्षा करना, ये सब शामिल हैं।

(क) मवेशियों का भोजन


पशुओं द्वारा खाए जाने वाले भोजन को भरण (Feed) कहते हैं। मवेशियों (गाय-भैसों) का भोजन सभी प्रकार के पोषक तत्वों से परिपूर्ण होना चाहिए। इसको देने से पहले जानवर की आयु, कार्य के प्रकार व स्वास्थ्य को ध्यान में रखना चाहिए। उदाहरण के लिये, एक जवान गाय के बछड़े को एक बूढ़ी गाय से अधिक भोजन की आवश्यकता होती है। पर्याप्त दूध देने के लिये व अच्छे स्वास्थ्य के लिये पशुओं को अच्छे आहार की आवश्यकता होती है।

गाय-भैंस के आहार में कार्बोहाईड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, जैसे पोषक तत्व शामिल होने चाहिए। मवेशियों के आहार को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता हैः-

(i) रुक्षांस (मोटा चारा), (ii) सांद्र (गाढ़ा किस्म का आहार)

(i) रुक्षांस में सेल्यूलोज जैसे कम पोषक पदार्थों व स्थूल कण एवं रेशे सम्मिलित हैं। चारा (ज्वार, बाजरा, रागी व मक्का), व फलीदार सब्जी (बरसीम इत्यादि) इसके उदाहरण हैं।

(ii) सांद्र में वे आहार शामिल हैं जो एक या एक से अधिक पोषक तत्वों से परिपूर्ण होते हैं। तिलहल (बिनोला), खल, अनाज, बाजरा, चना एवं भूसा इसके मुख्य उदाहरण हैं।

गाय-भैसों के अव्वल आहार बड़ी मात्रा में पानी, सांद्र और रुक्षांस से भरपूर होते हैं।

बरसीम, लूसर्न, कावपी जैसे फलीदार हरे चारे (Leguninous green fodder) बहुत पोषक हैं तथा मवेशियों को पसंद हैं। इन्हें शीतकाल में देना चाहिए। कुछ पोषक चारे की घास के नाम इस प्रकार हैं- एलीफेन्ट घास (Elephant grass), रोड्स घास, सूडान घास व नेपियर घास।

एक सामान्य गाय को प्रतिदिन निम्नलिखित आहार की आवश्यकता होती है-

1. हरा चारा व सूखी घास (रुक्षांस): 15 से 20 किलो।
2. अनाज का ‘मिक्सचर’ (सम्मिश्रण): 4 से 5 किलो
3. पानीः 32 किलो।

भारत के मवेशियों की जनसंख्या विश्व की मवेशी जनसंख्या का 25% हैं। परन्तु उनसे दूध की उत्पादन विश्व की कुल दूध की मात्रा का केवल 5% है। हमारे देश में एक गाय औसतन 1.5 लीटर दूध प्रतिदिन देती है व एक भैंस औसतन 2.5 लीटर प्रतिदिन देती है। इसके ठीक विपरीत कुछ विकसित देशों में एक गाय औसतन 8-11 लीटर दूध प्रतिदिन देती है। हमारे देश में दूध का कम उत्पादन निम्नलिखित कारणवश हैः-

- मवेशी को निम्न स्तर का चारा (आहार) देना।
- चारा एवं आहार, इत्यादि की कमी।
- कम दूध देने वाली गाय-भैसों की स्थानीय किस्में।

इन सब कारणों के होते हुए भी, पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश में मवेशियों की अच्छी नस्लों व बेहतर चारे के दौरान दूध का उत्पादन बढ़ा है। हमारी कुछ स्थानीय नस्लों की गायों के नाम हैं- साहिवाल, गीर, थारपरकर, लाल सिंधी, इत्यादि। विदेशीय किस्म की गायों के संकरण से हमारे देश की गायों की कुछ नई नस्लें इस प्रकार हैं- जर्सी, करन एवं स्विस ब्राउन (भूरे स्विस और साहिवाल का संकरण), करन और फ्राइज (थारपरकर और होलस्टाइन), फ्रेशवाल (फ्रोजियन और साहिवाल), होलस्टाइन-फ्रीजियन। ये नस्लें अधिक मात्रा में दूध देती हैं।

जर्सी नस्ल अमेरिका के जर्सी टापू की नस्ल है।
ब्राउन स्विस स्विटजरलैंड की एक प्रमुख नस्ल है।
होलस्टाइन-फ्रेशियन हॉलैंड की एक नस्ल है।
भारत की कुछ भैंसों की नस्लों के नाम इस प्रकार हैं- मुर्रा, मेहसाना, सुरती और जाफराबादी।

(ख) जनन और दुग्धस्रवण


एक आयु के बाद एक मादा बछिया प्रजनन के लिये परिपक्व हो जाती है। वह दोनों प्रकार के प्रजनन के लिये, चाहे प्राकृतिक विधि हो या कृत्रिम विधि, तैयार हो जाती है और इसके फलस्वरूप वह बछड़े को दस महीने के प्रसवकाल के उपरांत जन्म देती है। इस समय अवधि में वह दुग्ध स्रवण (दूध देने की प्रक्रिया) की प्रक्रिया में प्रवेश कर जाती है और दूध देने लगती है। चार-छः महीने के उपरांत, दूध का उत्पादन कम हो जाता है। दुग्धस्रवण की अवधि बढ़ाकर उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। परन्तु यदि दुग्धस्रवण अवधि को बाहर से, हॉर्मोनों के अविवेकपूर्ण प्रयोग से बढ़ाने की कोशिश की जाए, तब ये जानवरों व दूध की गुणवत्ता, दोनों के लिये हानिकारक सिद्ध होगा।

20.8 आश्रय-स्थल का प्रबंधन


पालतू जानवरों को वर्षा, गर्मी शीत एवं बीमारियाँ उत्पन्न करने वाले जीवों व परभक्षियों से संरक्षण के लिये उचित आश्रय-स्थल प्रदान करने चाहिए। जो जानवर अच्छे आश्रय-स्थलों में पलते हैं, उनके द्वारा दूध आदि की उत्पादकता भी अधिक होती हैं।

एक आदर्श आश्रय-स्थल में निम्नलिखित विशेषताएँ होनी आवश्यक हैं-

- साफ-सुथरा, सुखाया गया व अधिक हवादार।
- भीड़-भाड़ वाला नहीं।
- स्वच्छ पेयजल व पर्याप्त मात्रा में सूर्य का प्रकाश (रोशनी) की प्राप्ति।
- मल-मूत्र आदि को निपटाने की सुलभ व्यवस्था।
- एक स्वच्छ जगह, जो कि बीमारियों के फैलाव से बचाव कर सके।
- परभक्षियों से सुरक्षित रखे।

20.8.1 पशुधन को होने वाले रोग


पालतू जानवरों को कई प्रकार के बैक्टीरिया, कवक व वाइरस जनित रोग लग जाते हैं। एक कमजोर एवं बीमार जानवर कम मात्रा में दूध या मांस प्रदान करता है। ऐसा दूध बीमारी उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं से संक्रमित भी हो सकता है। पशुधन की कुछ सामान्य बीमारियाँ तालिका में दी गई हैं:

बीमारी

कारक जीवाणु

प्रभावित पशु का नाम

रोग लक्षण

पाद और मुखपका रोग

वाइरस

मवेशी

पांव व मुँह पर छाले (चकत्ते) लार आवश्यकता से अधिक बहाव/उत्पन्न होना, भूख में कमी, शरीर का उच्च तापमान, कंपकपी।

पॉक्स (चेचक)

वाइरस

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