‘आइला’ से बदल सकता है मानसून का रुख

पिछले दिनों बंगाल की खाड़ी में आए चक्रवाती तूफान आइला के कारण देश के कई हिस्सों में तापमान में गिरावट और ऊपरी वायुमंडल में चक्रवाती हवाओं के प्रभाव का क्षेत्र बनने से मानसून की आमद में विलंब होने की संभावना नजर आ रही है।

यहां स्थित वराह मिहिर वैज्ञानिक धरोहर एवं शोध संस्थान के खगोल वैज्ञानिक संजय कैथवास ने बताया कि आइला ने मानसून को प्रभावित किया है, जिसके चलते देश के कई हिस्सों में अब उसके आने में विलंब से होने की संभावना नजर आ रही है।कैथवास ने कहा कि 27 मई 2009 तक सौर मंडल के मुखिया सूर्य से असामान्य श्रेणी की सौर ज्वालाएं उठते हुए देखी गई जिनका रुख पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध की तरफ था। इसके असर से दिन के तापमान में अचानक वृद्धि दर्ज की गई थी।कैथवास ने कहा कि इस घटना की वजह से बंगाल की खाड़ी में हुई तेज गतिविधियों के कारण चक्रवाती तूफान आइला निर्मित हुआ। इसके असर से तापमान में गिरावट आई और वायुमंडल में चक्रवाती हवाओं का प्रभाव देखा गया। उन्होंने कहा कि 20 मई तक भूमध्य रेखा के आसपास हिंद महासागर से मानसूनी बादल बनाने वाली दोहरी द्रोणिका (डबल ट्रफ) की गतिविधियां सुचारू रूप से चलीं। इसके चलते पानी के बादल जिन्हें कपासी वर्षा मेघ कहा जाता है सुदृढ बने।

कैथवास ने बताया कि मई में तेज गर्मी पड़ने से गरम और ठंडे वायुचक्र का निर्माण होता है। इसके जरिए समुद्री क्षेत्रों से करोड़ों टन पानी से भरे बादलों को ऊंचे इलाकों तक पहुंचने के लिए आवश्यक गतिज ऊर्जा मिलती है। उन्होंने कहा कि आइला के प्रभाव से मई के अंतिम सप्ताह में तापमान कम हुआ और देश के कई इलाकों में बारिश भी हुई। इस कारण दक्षिण-पश्चिम की ओर से मानसून का रास्ता प्रशस्त करने वाली पछुवा हवाओं का चक्र भी बिगड़ गया।

खगोल विज्ञानी ने कहा कि ऊपरी वायुमंडल में चक्रवाती हवा के प्रभाव से पछुवा हवाओं को पर्याप्त गतिज ऊर्जा नहीं मिल पा रही है। कैथवास ने कहा कि देश के सभी हिस्सों में यूं तो औसत बारिश होने की संभावना है, लेकिन वायुचक्र बिगड़ने से मानसून के आने में विलंब हो सकता है।

कैथवास ने कहा कि यद्यपि दक्षिण-पश्चिम भारत के कुछ भाग मानसून पूर्व की वर्षा से तरबतर हो सकते हैं, लेकिन यह सिलसिला आगे बढ़ पाएगा इसमें संदेह है।
 
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