बुन्देलखण्ड का घटता नीर, बढ़ा रहा पीर
19 Jun 2019
पानी की मार झेल रहा बुंदेलखंड।

‘जीवनम् भुवन जलम’ अर्थात संसार में ही जल ही जीवन है। वेदो से निकला यह यथार्थ सत्य एक ऐसा मंत्र है, जिसके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

हमारे महापुरूषों ने जल की महत्ता को अपने-अपने शब्दों से परिभाषित किया है। महाकवि गोस्वामी तुलसीदास महाराज श्री रामचरित मानस में लिखते हैं कि ‘छित जल पावक गगन समीरा, पंच तत्व मिल रचहि शरीरा’। पूज्य संत कबीर दास ने लिखा है कि ‘पानी केरा बुदबुदा अस मानुष की जात’। रहीमदास जी ने पानी के महत्व को इस तरह से परिभाषित किया है कि ‘रहिमन पानी रखिए, बिन पानी सब सून’।

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार 2.1 अरब लोगों के पास स्वच्छ पानी पीने के लिए उपलब्ध नहीं है। दुनियाभर में लगभग पांच हजार बच्चे अशुद्ध पानी पीने के कारण मौत के शिकार हो जाते हैं। प्रदूषित जल से होने वाली बीमारियों में प्रतिवर्ष 22 लाख लोग मरते हैं। पृथ्वी सतह पर 71 प्रतिशत पानी होने के बावजूद सिर्फ 25 फीसदी पानी पीने योग्य है।

वेदों से लेकर हमारे महापुरूषों तक ने पहले ही इस सत्य को जान लिया था कि जल के बिना जीवन नहीं चल सकता। लेकिन आधुनिकवादी इस युग में हम पानी के साथ कहां खड़े हैं। यदि इसे हम प्राचीन और वर्तमान सभ्यता से मिलान करके देखे तो पाएंगे कि जहां हमारे पूर्वज प्यासे को पानी पिलाना पुण्य मानकर गांव-गांव में तालाब, कुंआ बीहर व बावली का निर्माण कराकर जल को ज्यादा से ज्यादा संरक्षित करने का काम करते रहे हैं। वही पानी आज हमारे घरों में ‘मोल-तोल’ के साथ पहुंच रहा है। जबकि जल वही है, न तो उसका रूप बदला और न ही रंग। अगर कुछ बदला है तो सिर्फ हमारा नजरिया।

जिस पानी को हमारे पूर्वज पुण्य के जरिए परमात्मा से जुड़ने का सूत्रधार मानते रहे हैं, आज उसी जल को व्यवसायिक और बाजारीकरण के बर्तन में भर दिया गया है। यह विषय यहीं आराम नहीं ले लेता बल्कि जिस तरह से पानी को व्यवसायीकरण की प्यास बुझाने का एक माध्यम बना लिया गया इसके उलट भविष्य के लिए पानी बचेगा और मिलेगा कैसे? इस पर शायद ही किसी का ध्यान जा रहा हो। क्योंकि हमारे पूर्वजों ने पानी के परंपरागत श्रोतों तालाब, कुंआ, बावली व बीहर जो एक धरोहर के रूप में दिए गए हैं। आज उनकी जो दशा है उससे स्पष्ट हो रहा है कि आने वाले समय में ये पानी हमारे पास लंबे वक्त तक रहने वाला नहीं है।

इन सभी पारंपरिक श्रोतों का अस्तित्व धीरे-धीरे मिटता जा रहा है। जबकि ये हमारे जल भंडारण के आधार ही नहीं रहे बल्कि इनका नाता हमारे सामाजिक सरोकारों से है। विभिन्न उत्सवों और अनुष्ठानों के समय नदी, तालाब और कुंआ पूजन की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। खासकर बुन्देलखण्ड में तो इनका विशेष महत्व है। क्योंकि इस सूखे इलाके में पानी देने वाले यही श्रोत मुख्य आधार हैं। सामयिक लिहाज से देखें तो आज भी यही श्रोत पानी बचाने के कारगर आधार हैं।

बुंदेलखंड में बात जब जल संकट की आती है, तो नदी, तालाब और कुंओं के इतर समाधान का कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझता। बेशक जल संकट से उबरने के लिए ज्यादा कुछ गुणा-गणित लगाने की बजाय यही उचित होगा कि पूर्वजों से धरोहर के रूप में मिले तालाब, कुंआ, बीहर बावली को बचा लिया जाए। नए तालाब व कुंओं का निर्माण कराकर जल के ‘चैन सिस्टम’ को और बेहतर बना लिया जाए तो सतही सूखा तो मिटेगा ही साथ में धरती की कोख (पाताल) का घटता पानी भी नीचे जाने की बजाय सतह की ओर बढ़ने लगेगा।

देश-दुनिया में पानी

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार 2.1 अरब लोगों के पास स्वच्छ पानी पीने के लिए उपलब्ध नहीं है। दुनियाभर में लगभग पांच हजार बच्चे अशुद्ध पानी पीने के कारण मौत के शिकार हो जाते हैं। प्रदूषित जल से होने वाली बीमारियों में प्रतिवर्ष 22 लाख लोग मरते हैं। पृथ्वी सतह पर 71 प्रतिशत पानी होने के बावजूद सिर्फ 25 फीसदी पानी पीने योग्य है। इसमे से मात्र 0.08 प्रतिशत पानी में ही वह तत्व पाये जाते हैं जो मानव शरीर के लिए उपयोगी है। उधर देश में कुल 18.5 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर खेती होती है जो सिंचाई पर निर्भर है। आजादी के बाद सन 1950-51 में नहरों से सिंचाई का क्षेत्रफल बढ़ाया गया है।

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