देवभूमि में उड़ी लोकतांत्रिक मर्यादाओं की धज्जियां
Ganga river Uttarakhand

एक तरफ कांग्रेस का एक मंत्री धारी देवी को डुबाने वाली परियोजना को चालू करने की मांग करे और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री धारी देवी मंदिर को बचाने का आश्वासन दें, तो इस दोतरफा खेल को आप क्या कहेंगे? शाह से कहो-जागते रहो और चोर से कहो-चोरी करो। गंगा, अब एक कारपोरेट एजेंडा बन चुकी है। गंगाजल का जल और उसकी भूमि अब निवेशकों के एजेंडे में है। किए गये निवेश की अधिक से अधिक कीमत वसूलने के लिए निवेशक कुछ भी करने पर आमादा हैं। अब चूंकि निर्णय राजनेता करते हैं, अतः दिखावटी तौर पर नेता आगे हैं और निवेशक उनके पीछे।

देश की राष्ट्रीय नदी की कम से कम अविरलता तो फिलहाल पूरी तरह एक प्रदेश की स्वार्थपरक व एकपक्षीय राजनीति में फंस चुकी है। उत्तराखंड सरकार ने इसके लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था की मर्यादाओं के उल्लंघन से भी कोई परहेज नहीं किया है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने गंगा को पूरी तरह क्षुद्र राजनीति का अखाड़ा बना डाला है। अभी विधानसभा का सदस्य बनकर मुख्यमंत्री की कुर्सी सुरक्षित करने का काम बाकी है, उससे पहले ही उन्होंने बिजली बांध परियोजनाओं जैसे विवादित मसले को सड़क पर उतरकर निबटने के आक्रामक अंदाज से जो संकेत दिए हैं, वे अच्छे नहीं हैं। गंगा मुक्ति संग्राम समेत गंगा के पक्ष में आंदोलित तमाम समूहों की टक्कर में मुख्यमंत्री ने जैसे बांध बनाओ मुहिम ही छेड़ दी है। इस मामले में वह पूर्ववर्ती सरकार के सहयोगी उत्तराखंड क्रांतिदल ‘उक्रांद’ से आगे निकल गये हैं।

उल्लेखनीय है कि उक्रांद के नेता ने गंगा की प्रमुख धाराओं पर उत्तराखंड में प्रस्तावित बिजली परियोजनाओं का विरोध कर रहे प्रख्यात पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह को बाहरी बताते हुए उनके उत्तराखंड प्रवेश पर धमकी दी थी। बाहरी और भीतरी के नाम पर गंगा पक्षधरों को बांटने की राजनीति को हवा देते हुए उन्होंने कहा था कि कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती हो, तो बिगड़े, लेकिन उन्हें उत्तराखंड में घुसने नहीं दिया जायेगा।

उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार ने भी कानून-व्यवस्था के नाम पर ही तो बीते जून में उत्तराखंड गये स्वामी सानंद, राजेन्द्र सिंह, भरत झुनझुनवाला समेत तमाम गंगा आंदोलनकारियों को वापस लौटा दिया था। इस बार वापस लौटाने में पार्टी कार्यकर्ता नहीं, सरकार की कठपुतलियों को आगे रखा गया। अब मालूम नहीं कि पीछा करने वाले कठपुतलियां थीं या स्वयं सरकार ही किसी की कठपुतली बन चुकी है। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि उत्तराखंड की सरकार...मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा नहीं, बांध निर्माता कंपनियां व उनके निवेशक चला रहे हैं। पैसा देकर कुछ दलालों को आंदोलनकारियों के खिलाफ खड़े करने का चलन सत्ता व कारपोरेट जगत के लिए नया नहीं है, लेकिन इस बार चिंता की बात यह है कि बदली बयार में बहते हुए अन्य के साथ-साथ ऐसे संगठन और बुद्धिजीवी भी परियोजनाओं की जमकर वकालत करने लगे हैं, जिन्हे उत्तराखंड में प्रतिष्ठा की नजर से देखा जाता रहा है।

एक पत्रिका के जुलाई अंक में छपे एक लेख के मुताबिक नामी साहित्यकार लीलाधर जगूड़ी, एनजीओ चलाने वाले अवधेश कौशल और गढ़वाल विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति पद्मश्री ए.एन. पुरोहित इसमें प्रमुख हैं। दिलचस्प है कि इन्होने बंद परियोजनाओं के शुरू न होने पर पद्मश्री लौटाने तक की धमकी दे दी है। लेख के लेखक ने मुख्यमंत्री का मीडिया सलाहकार बनने की लाइन में लगे एक पत्रकार की निष्पक्षता पर भी उंगली उठाई है।

उल्लेखनीय है मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा राजनीति में आने से पूर्व एक जज की कुर्सी पर बैठते थे। वह गांधी परिवार के लिए हमेशा गले की हड्डी बने रहे प्रख्यात नेता हेमवतीनंदन बहुगुणा के पुत्र हैं और उ. प्र. में कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा के भाई। लगता है कि दोनों ही कांग्रेस से अपने पिता का हिसाब चुकता कर रहे हैं। जहां तक कांग्रेस का सवाल हैं... कांग्रेस तो क्या, स्वयं प्रधानमंत्री भी भूल गये हैं कि उन्होंने कभी गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर इसकी पवित्रता व शुद्धता को अक्षुण्ण बनाये रखने का संकल्प लिया था।

अखिर इसे क्षूद्र राजनीति न कहें, तो क्या कहें! श्रीनगर जलविद्युत परियोजना श्रीनगर गढ़वाल को पानी नहीं पिलाने वाली। टिहरी परियोजना ने टिहरी वालों को पानी नहीं पिलाया। फिर भी उत्तराखंड में कांग्रेस के पेयजल मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी मांग कर रहे हैं कि श्रीनगर परियोजना का स्थगित काम शुरू किया जाये। इसके लिए पेयजल मंत्री ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना भी दे डाला है। एक तरफ कांग्रेस का एक मंत्री धारी देवी को डुबाने वाली परियोजना को चालू करने की मांग करे और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री धारी देवी मंदिर को बचाने का आश्वासन दें.... तो इस दोतरफा खेल को आप क्या कहेंगे? शाह से कहो-जागते रहो और चोर से कहो-चोरी करो।

गंगा पर राजनीति के इस नमूने के बाद भी अगर किसी के मन में गंगा के प्रति किसी शासन-प्रशासन-पार्टी की संवेदनशीलता का भ्रम हो, तो कृपया उस पर पुनर्विचार कर लें। मैं लंबे अरसे से कह रहा हूं कि गंगा को लेकर इन तीनों के मन में अब न कोई राष्ट्रीय नदी का सम्मान है, न कोई आस्था बची है। गंगा, अब एक कारपोरेट एजेंडा बन चुकी है। गंगाजल का जल और उसकी भूमि अब निवेशकों के एजेंडे में है। किए गये निवेश की अधिक से अधिक कीमत वसूलने के लिए निवेशक कुछ भी करने पर आमादा हैं। अब चूंकि निर्णय राजनेता करते हैं, अतः दिखावटी तौर पर नेता आगे हैं और निवेशक उनके पीछे। पहले यह फर्क उत्तर प्रदेश में माया मेमसाब और जेपी के गठजोड़ से मिटता दिखाई दिया था और अब बिजली परियोजनाओं के पक्ष में पूरी तरह खम ठोककर आगे आये उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के तेवरों से। माया मेम ने गंगा एक्सप्रेसवे आगे बढ़ाया था। उनकी उत्तरावर्ती अखिलेश यादव सरकार ने भी गंगा एक्सप्रेसवे को प्राधिकरण के एजेंडे में आगे बढ़ाकर वही रवैया दिखाया है। इससे भ्रमित होने की जरूरत नहीं है। जरूरत है, संघर्ष की दिशा मोड़कर सीधे निवेशकों की ओर कर देने की। लेकिन आर्थिक आतंकवादियों के खिलाफ लड़ाई पूरी तरह एकजुट हुए बिना नहीं जीती जा सकती। क्या हम एकजुट होने को तैयार हैं???
 

 

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