मानसून से परे देखने की जरूरत

लगातार दो साल तक सूखा झेलने के बाद इस साल देश में मानसून सीजन (जुलाई-सितम्बर तक) के दौरान अच्छी बारिश हुई। अब देश के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य से पाँच फीसद की कमी के साथ इस साल मानसून की विदाई भी आरम्भ हो गई है। हालाँकि सीजन की शुरुआत में मानसून की बारिश का औसत 106 फीसद रहने का अनुमान था, जिसमें रह गई कमी का अनुमान (चार फीसद की घट-बढ़) पहले ही लगाया गया था। माना जा सकता है कि इस बार मानसून ने कोई दगा नहीं दिया, पर कुछ सवाल फिर भी छोड़े हैं जिनके ठोस जवाब की जरूरत भारत जैसे मानसून पर टिकी अर्थव्यवस्था वाले देश में बनी हुई है। जहाँ तक अर्थव्यवस्था के सूचक के रूप में मानसून को देखे जाने की जरूरत का सवाल है, तो हाल के कुछ आँकड़े इसकी गवाही देते हैं कि अब मानसून में वह ताकत नहीं रही कि वह सिर्फ अपने बूते पर भारत जैसे विशाल देश की अर्थव्यवस्था को ठेल सके।

औद्योगिक उत्पादन सूचक (आइआइपी) के ताजा आँकड़ों के मुताबिक निर्माण क्षेत्र में 3.4 फीसद की गिरावट पिछले कुछ ही महीनों में हुई है। अच्छी बारिश के बावजूद ग्रामीण माँग (रूरल डिमांड) में कोई इजाफा नहीं हुआ है और निवेश में भी गति नहीं आ पाई है। ये आँकड़े खासतौर से इसलिये चौंकाने वाले हैं कि इनमें अच्छे मानसून के बल पर तेजी आने की उम्मीद लगाई गई थी। चूँकि देश की 60 फीसद खेती आज भी मानसूनी वर्षा पर निर्भर है, ऐसे में अच्छे मानसून से देश के योजनाकार और अर्थशास्त्री राहत महसूस कर रहे थे। हालाँकि इस साल अन्य एजेंसियों के उलट भारतीय मौसम विभाग ने मानसून के देरी से आने का अनुमान पेश किया था, जो सही निकला। इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून ने आठ जून को केरल के तट को छुआ था और 13 जुलाई तक पूरे देश में फैल गया था। इसी तरह मानसून के सामान्य रहने की भविष्यवाणी भी सही निकली। पर सब कुछ सही होने के बावजूद अगर देश में पानी के बँटवारे को लेकर झगड़े-झंझट पैदा हो रहे हों, खेती-बाड़ी से जुड़े करोड़ों लोगों के चेहरे पर राहत की मुस्कान न देखी जा पा रही हो, तो विचार करना होगा कि ऐसा क्यों है? असल में अब वक्त आ गया है कि देश अपने बेहतर भविष्य के लिये मानसून से बाहर निकलकर देखे और विचार करे कि अगर पर्याप्त मानसूनी वर्षा न हो, तब भी क्या अर्थव्यवस्था को टिकाए रखा जा सकता है।

पानी की जरूरत को मानसून से अलग रखकर भी पूरा किया जा सकता है, इसका एक उदाहरण इस साल उज्जैन में आयोजित सिंहस्थ कुम्भ पर्व में मिला था। वहाँ कुम्भ पर्व के आरम्भ में ही सूखी शिप्रा में जल पहुँचाने के लिये मध्यप्रदेश सरकार ने कुछ करोड़ रुपये खर्च करके पाइप लाइन बिछाकर उसे नर्मदा से जोड़ दिया था। इससे श्रद्धालुओं को यह अहसास ही नहीं हुआ कि असल में शिप्रा सूखी पड़ी है और वे इस कारण कुम्भ स्नान का पुण्य लाभ लेने से वंचित हो सकते हैं। यह मिसाल थी कि यदि इसी तरह खेती से लेकर लोगों की प्यास बुझाने के माकूल प्रबंध देश में कर लिये जाएँ, तो सूखे के दौरान भी हमारी कई नदियाँ इतना जल दे सकती हैं कि सिंचाई आदि का कहीं कोई संकट नहीं पैदा हो। बेशक अब से कुछ समय पहले तक मानसून ही हमारे देश का भाग्यविधाता था। इस दौर में हमारी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था मानसूनी वर्षा के अभाव में किस प्रकार धराशायी हो जाती थी, इसका अनुमान सभी को हो रहा है। खरीफ की बुवाई करने वाले किसान शताब्दियों से इसी मानसून की प्रतीक्षा में टकटकी लगाए आसमान निहारते रहे हैं और जिस-जिस साल मानसून की कृपा उन पर नहीं बरसी है, उस-उस साल सूखा और अकाल हमारी नियति बनी है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से देश में यह कहा जाने लगा है कि हमारी कुल खेती अब मानसून पर आश्रित नहीं हो रही है।

यानी मानसून से भारतीय अर्थव्यवस्था का रिश्ता कमजोर पड़ा है। ऐसा दावा करने वाले मानसून आधारित वर्षा का वह क्षेत्रफल आँकड़ों में दर्शाते हैं, जहाँ सामान्य मानसून की स्थिति में भी सतत सूखा एक सच्चाई है। गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के कुछ इलाके तब भी सूखे की चपेट में रहते हैं, जब देश में मानसून की सामान्य वर्षा हो रही होती है। पश्चिमी राजस्थान के जिन इलाकों में मानसून देश में सबसे आखिर में पहुँचता है, वहीं से सबसे पहले उसकी वापसी भी होती है। इसका अभिप्राय यह है कि वहाँ नाममात्र मानसूनी वर्षा होती है। फिर भी ऐसे इलाकों में खेती होती है। पश्चिमी राजस्थान की तरह ही मानसूनरहित रहने वाले अनेक इलाके पानी की वैकल्पिक व्यवस्था के चलते फसलों के मामले में कमजोर नहीं पड़े हैं। यह सही है कि मानसूनी वर्षा से अछूते रहने वाले क्षेत्रों में नहरों या ट्यूबवेलों से सिंचाई हो जाती है, लेकिन एक सच यह भी है कि मानसून सामान्य नहीं रहने की दशा में वे नहरें और ट्यूबवेल ज्यादा दिन पानी नहीं दे सकते। लिहाजा जरूरत इसकी है कि मानसून से अपना रिश्ता तोड़ने से पहले उन जरूरी उपायों पर नजर दौड़ाई जाए जो जून-सितम्बर की चार महीने की बारिश से अलग भी हमारी खेती और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखने का प्रबंध कर सकते हैं। असली मुद्दा मानसून पर अपनी निर्भरता कम करने का है।

अभी तक तो हमारे योजनाकार सूखे से निपटने और उसका असर कम करने के लिये प्रभावी कदम उठाने में ज्यादातर मौकों पर नाकाम रहे हैं। वे मानसून के पैटर्न में बदलाव की घटनाओं से भी कोई सबक नहीं सीखना चाहते। असल में कई बार सूखे के बाद भारी वर्षा होने से शुष्क क्षेत्रों में बाढ़ आ जाती है। बाढ़ से जमा हुए पानी का क्या किया जाए, कैसे उसे उन इलाकों में पहुँचाया जाए जहाँ उसकी जरूरत है, इसकी कोई योजना हमारे पास नहीं है। हालाँकि सरकार के योजनाकारों के सामने कुछ किसानों और जमीन से जुड़े समझदार लोगों ने मानसूनी वर्षा में कमी से निपटने के अच्छे तरीके विकसित किये हैं। जैसे पंजाब के कुछ किसानों ने भयंकर सूखे से सबक लेते हुए बासमती चावल की ऐसी किस्मों को अपनाया है, जिन्हें देर से बोया जाता है और जो कम पानी माँगती हैं। पिछले कई सालों में इस नीति पर चलते हुए पंजाब में धान की फसल के एक-चौथाई क्षेत्र में ऐसे ही बासमती चावल की खेती की गई है।

ऐसे ही अन्य उपायों में जल संग्रहण और नदियों को परस्पर जोड़ने वाली उस महत्त्वाकांक्षी परियोजना का उल्लेख किया जा सकता है जिसका जिक्र राजग सरकार ने तो छेड़ा था, लेकिन उसके बाद किसी ने उसकी सुध तक नहीं ली है। इधर केन-बेतवा को जोड़ने की खबरें चर्चा में आती रही हैं, लेकिन ठोस अमल का काम अब भी बाकी है। मानसून पर निर्भरता कम करने का एक सरल उपाय यह है कि देश में वर्षाजल संग्रहण को आज नए आयाम देकर प्रोत्साहित किया जाए। गाँव और शहर के हर घर में पानी के संरक्षण के लिये वहाँ की परिस्थितियों के अनुसार जल संग्रहण का काम होना चाहिए। हर गाँव का हर घर अपने एक खेत को पानी के संरक्षण के लिये समर्पित कर पानी की स्थानीय स्तर पर व्यवस्था कर सकता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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