नदी

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नदी की तरह सोचो
तो सुंदर लगती है नदी
पास जाओ तो तुम्हारा नाम लेकर
पुकारती है नदी

जल का स्पर्श करो
तो तुरंत बजे मृदंग-सी कांपती है नदी-
सपने में आए तो
थरथराती लहरों-सी अद्विग्न-
महसूस करो तो आत्मा में
निरंतर बहती-सी लगती है नदी

कितने तो रूप हैं उसके
कितने तो नाम
पहाड़ को छूकर आए तो
पहाड़ी धुन और ऊपर झुके हों
बांस के झुरमुट
तो कभी-कभी
बांसुरी-सी बजती है नदी
किंतु यहां-जहां मैं हूं
काले हीरे की खरीद-फरोख्त में
व्यस्त बाजार के बीच
चार बाल्टी पानी में
चार बोरी कोयले का चूर्ण घोलती है नदी

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