नर्मदा की परकम्मा


नर्मदा की परकम्मावासी मीराबेन का यात्रा वृतान्त पढ़ना, उनके साथ परकम्मा करना जैसा ही है। हालांकि उन्होंने जो प्रत्यक्ष अनुभव, नर्मदा का सौन्दर्य और उसके आसपास के जनजीवन को देखा उसकी बात अलग है, लेकिन उसकी झलक उनकी पुस्तिका में मिलती है।

मीराबेन एक विदेशी महिला हैं और उन्होंने नर्मदा की पूरी परकम्मा पैदल की और उसके तय समय में ही। गुजरात से अमरकंटक उत्तर में और फिर अमरकंटक से समुद्र में जहाँ नर्मदा मिलती है वहाँ तक। उन्हें कई अनुभव हुए- वे कई जगह रास्ता भटकीं, पाँव में कपड़ा बाँध कर चलीं, क्योंकि पैर में चलते-चलते घाव हो गए थे, एक जगह मलेरियाग्रस्त हो गई थीं। साधुवेश में एक आदमी ने उनके सामान की चोरी कर ली।

लेकिन इसके साथ ही उन्होंने रास्ते में कई लोगों की मदद भी मिली और स्नेह मिला। कई विशिष्ट लोग उनसे मिलने आये जिनमें जाने माने चित्रकार और लेखक अमृतलाल वेंगड़ भी है। वेंगड़ जी ने खुद नर्मदा की परकम्मा की है और बहुत सुन्दर यात्रा वृतान्त लिखा है, जिस पर उनकी तीन किताबें आ चुकी हैं।

मीराबेन ने नर्मदा का अनुपम सौन्दर्य देखा और उसकी महिमा परकम्मावासियों से सुनी और उसे अनुभव किया। उन्होंने लिखा है कि परकम्मा उनकी एक आन्तरिक यात्रा भी है।

उन्होंने अपने यात्रा वृतान्त को बहुत रोचक शैली में लिखा है, इसे पढ़ते हुए एक यात्रा का अनुभव होता है, मंदिरों, आश्रमों और परकम्मावासियों की बातचीत का सजीव वर्णन किया है।

नर्मदा घाटों के बारे में वे लिखती हैं कि जैसे हर रात्रि के पड़ाव के अपने विशिष्ट लक्षण होते हैं उसी प्रकार हर घाट एक भिन्न स्नान का अनुभव करता है- कीचड़, रेत, कंकड़, चट्टानें, गहरा, उथला, तेज, शान्त, सदा परिवर्तनीय, सदा अप्रत्याशित।

वर्षा में नर्मदा के सौन्दर्य के बारे में लिखा है कि वर्षा ऋतु के बाद नर्मदा पर सूर्योदय दृष्टिगोचर हुए थे। अब फिर खूब सबेरे किनारे-किनारे चलने का आनन्द उपलब्ध हुआ, सुगंधयुक्त ओस- जड़ित पौधे और पक्षियों के गीतों से घनी वायु के बीच। मेरे आनन्दपूर्ण भजन चिड़ियों के गीतों से मिल गए।

नरसिंहपुर जिले में छोटे धुआँधार के बारे में उन्होंने लिखा है कि नर्मदा संगमरमर की बड़ी चट्टानों के बीच से झागयुक्त तीव्र प्रवाह के रूप में दौड़ती है। ऊपर हल्की नीली, नीचे हाथी के रंग की भूरी, जलरेखा पर नारंगी पट्टी वाली नदी को समतल बुनावट कोमल दिखती है कि लगता है कि उँगली का स्पर्श उसे क्षतिग्रस्त कर देगा। आन्दोलित जल और कोमल चट्टान का यह संयोग सौन्दर्य पिपासा को शान्त कर देता है।

परकम्मा संक्षेप क्या है, इसे वे कुछ इस तरह लिखती हैं कि वह साकार होती है सरिता के वातावरण में, प्रकृति के सौन्दर्य में और उन लोगों के स्वागत भरी मुस्कान और वाणी तथा इच्छुक हाथों और प्रेमपूर्ण हृदयों में जो उसके तट पर रहते हैं। स्त्रियाँ, पुरुष और बच्चे, सब उस देवी की प्रकृति को ग्रहण कर लेते हैं जो उनका पोषण करती हैं।

हृदयस्थ नर्मदा नामक यह छोटी पुस्तिका पठनीय, रोचक और विवरणात्मक है जो एक छोटा उपन्यास ही है। पढ़ते समय जिज्ञासा और कौतूहल बना रहता है। इसे पढ़ना नर्मदा से साक्षात्कार है।
 

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