पंचायत समिति राजगढ़ की भूजल स्थिति

पंचायत समिति, राजगढ़ (जिला चूरू) अतिदोहित (डार्क) श्रेणी में वर्गीकृत

हमारे पुरखों ने सदियों में बूँद-बूँद पानी बचाकर भूजल जमा किया था। जिले में उपलब्ध भूजल के अनियोजित दोहन के कारण भूजल संसाधन में कमी उत्पन्न हो गई है।

राजगढ़ पंचायत समिति में वर्ष 1998 में भूमि में उपलब्ध पानी का प्रतिवर्ष 296 प्रतिशत ही उपयोग करते थे। वर्तमान में भूजल दोहन बढ़कर लगभग 444 प्रतिशत हो गया है। कुल वार्षिक पुनर्भरण 6 मिलियन घनमीटर की तुलना में 21 मिलियन घनमीटर भूजल का अधिक दोहन किया जा रहा है। इस पंचायत समिति को केन्द्रीय भूजल अभिकरण द्वारा नोटिफाइड क्षेत्र के रूप में अधिसूचित करने की कार्यवाही की जा रही है।

1995 में औसत 43 मीटर गहराई पर पानी उपलब्ध था जो अब 48 मीटर तक हो गया है, अर्थात भूजल स्तर में गिरावट दर्ज की गई है।

पंचायत समिति का लगभग 85 प्रतिशत भूभाग खारा भूजल क्षेत्र में है तथा उपयुक्त गुणवत्ता वाला भूजल संसाधन सीमित, जिसका निरन्तर दोहन जारी है। भूजल आधारित सिंचित क्षेत्र में निरन्तर दोहन के कारण उपलब्ध उपयुक्त भूजल संसाधन की कमी की आशंका है।

राजस्थान की भूजल स्थिति


जल प्रकृति की अमूल्य देन है और जीव मात्र का अस्तित्व इसी पर टिका है। समय के बदलाव के साथ इस प्राकृतिक संसाधन का अत्यधिक दोहन होना तथा वर्षा की कमी से प्रदेश में जल संकट के हालात सामने आ रहे हैं। राजस्थान देश का सबसे बड़ा राज्य है। राज्य में सतही जल की कम उपलब्धता एवं कमी के कारण पीने के पानी की लगभग 90 प्रतिशत योजनाएँ एवं 60 प्रतिशत सिंचाई कार्य भूजल पर आधारित है। प्रदेश में हमारे पूर्वज जल का महत्व समझते थे एवं प्रारम्भ से ही सुदृढ जल प्रबन्धन कर रहे थे। विगत 40-50 वर्षों से जब से राज्य सरकार ने पेयजल प्रबन्धन की जिम्मेदारी ली एवं यह जल बहुत कम मूल्य पर बिना श्रम किये मिलने लगा, हम इसका महत्व भूल गये एवं वर्षाजल संचयन जोकि हमारे पूर्वज वर्षों से कर रहे थे वह भी बन्द कर दिया। इसके साथ ही भूजल की अंधाधुन्ध निकासी तथा वर्षाजल से भूजल पुनर्भरण में गिरावट के परिणामस्वरूप प्रदेश का भूजल स्तर तेजी से गिरने लगा। राज्य के पिछले वर्षों की भूजल स्थिति इंगित करती है कि हम किस प्रकार गम्भीर भूजल संकट की तरफ बढ़ रहे हैं। जहाँ वर्ष 1984 में 86 प्रतिशत क्षेत्र सुरक्षित श्रेणी में आते थे वहीं वर्तमान में मात्र 13 प्रतिशत क्षेत्र ही सुरक्षित श्रेणी में आते हैं। वर्तमान में 237 ब्लॉक्स में से 198 ब्लॉक्स डार्क श्रेणी में हैं।

वर्ष

पंचायत समिति

सुरक्षित

अर्द्धसंवेदनशील

संवेदनशील

अति-दोहित

1984

237

203 (86 प्रतिशत)

10 (04 प्रतिशत)

11 (05 प्रतिशत)

12  (05 प्रतिशत)

1995

237

127 (54 प्रतिशत)

35 (15 प्रतिशत)

14 (06 प्रतिशत)

60 (25 प्रतिशत)

2001

237

49 (21 प्रतिशत)

21 (09 प्रतिशत)

80 (34 प्रतिशत)

86 (36 प्रतिशत)

2008

237

30 (13 प्रतिशत)

08 (03 प्रतिशत)

34 (14 प्रतिशत)

164 (69 प्रतिशत)

चूरू जिले की एक पंचायत समिति तारानगर खारे क्षेत्र में वर्गीकृत है।

 

चूरू जिले की भूजल स्थिति


1. सामान्य तौर पर ऐसा मानते हैं कि भूमि के नीचे पाताल में अथाह भूजल है। यह भ्रम है। भूजल का एकमात्र स्रोत वर्षाजल है। जितनी वर्षा होती है उसका लगभग 10 प्रतिशत जल ही धरती में जाता है एवं हमें भूजल के रूप में उपलब्ध होता है।

2. चूरू जिले का कुल क्षेत्रफल 13793 वर्ग किलोमीटर है एवं औसत वार्षिक वर्षा 370 मिलीमीटर है। चूरू जिले में वार्षिक वर्षा का लगभग 10 प्रतिशत जल ही भूमि में जाता है, जिससे लगभग 142 मिलियन घनमीटर भूजल उपलब्ध होता है। लेकिन इसके विरुद्ध 114 मिलियन घनमीटर भूजल का दोहन कर रहे हैं। इस क्षेत्र में पीने का पानी एवं खेती मुख्य रूप से भूजल पर निर्भर है परन्तु सरशहर, तारानगर, रतनगढ़ एवं चूरू पंचायत समितियों में ‘आपणी योजना’ (जर्मन प्रोजेक्ट) के अन्तर्गत पीने के पानी हेतु नहरी जल का उपयोग किया जा रहा है।

3. कोटा जिले में मुख्य रूप से दो तरह के एक्वीफर (भूजल क्षेत्र) है:- एल्युवियम: क्षेत्रफल 9887 वर्ग किलोमीटर (2) चट्टानी क्षेत्र : क्षेत्रफल 3906 वर्ग किलोमीटर।

4. जब क्षेत्र में उपलब्ध होने वाले भूजल का 100 प्रतिशत से अधिक दोहन किया जाये यानि वर्षाजल से पुनर्भरित भूजल के अलावा पूर्वजों द्वारा अनंत वर्षों से संचित किये भूजल धन में से भी भूजल का दोहन किया जाये तो क्षेत्र अतिदोहन (डार्क) श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है।

5. सिमित क्षेत्र में ही कृषि एवं पीने योग्य भूजल की उपलब्धता है, परन्तु इसके अधिक दोहन से जल की गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।

6. जिले में वर्ष 1998 में भूजल दोहन 53 प्रतिशत था जो वर्तमान में बढ़कर 84 प्रतिशत हो गया है।

7. हमें भूजल के अंधाधुंध दोहन से बचना चाहिए एवं भूजल संरक्षण की दिशा में सार्थक प्रयास करने चाहिये ताकि उपलब्ध भण्डार आगामी पीढ़ियों के लिये सुरक्षित रहे।

8. चूरू जिले में वर्ष 1995 में औसत भूजल स्तर 49 मीटर था जो वर्ष 2010 में घटकर 62 मीटर तक हो गया है।

9. जनसंख्या वृद्धि और अन्य प्रकार की जल आवश्यकताओं में वृद्धि से चूरू जिले में जल की आवश्यकता में वृद्धि हुई है। उपयुक्त गुणवत्ता के सीमित जल संसाधन को देखते हुए यह आवश्यक है कि उपलब्ध भूजल का समुचित उपयोग किया जाए। राज्य में प्रतिव्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता 780 घनमीटर है जबकि न्यूनतम आवश्यकता 1000 घनमीटर आंकी गई है।

10. चूरू जिले में कुल 6 पंचायत समितियाँ हैं। (1) चूरू (2) राजगढ़ (3) रतनगढ़ (4) सरशहर (5) सुजानगढ़ (6) तारानगर। पंचायत समिति राजगढ़ एवं सुजानगढ़ अतिदोहित श्रेणी में वर्गीकृत हैं। पंचायत समिति तारानगर का सम्पूर्ण क्षेत्र खारा पानी क्षेत्र में आता है। शेष पंचायत समिति सुरक्षित श्रेणी में वर्गीकृत है।

पंचायत समिति राजगढ़ में भूजल स्थिति


राजगढ़ पंचायत समिति का कुल क्षेत्रफल 2225 वर्ग कि.मी. है।
पंचायत समिति पोटेशियल भूजल क्षेत्र 324 वर्ग कि.मी. तथा खारा पानी क्षेत्र 1901 वर्ग कि.मी. है।
औसत वार्षिक वर्षा 372 मि.मी. है।
भूजल स्तर 13 मीटर से 55 मीटर के मध्य है।
भूजल भण्डारों का पुनर्भरण सिर्फ वर्षाजल के कारण होता है।
भूजल स्तर में गिरावट प्रतिवर्ष 33 सेंटीमीटर है।
अतिदोहित डार्क श्रेणी में वगीकृत।
भूजल का दोहन 444 प्रतिशत है।
वार्षिक भूजल पुनर्भरण 6 मिलियन घनमीटर है। जबकि प्रतिवर्ष सिंचाई, पीने एवं अन्य उपयोग हेतु 27 मिलियन घनमीटर भूजल जमीन में से निकाला जा रहा है। अर्थात लगभग 21 मिलियन घनमीटर अधिक भूजल भंडार से निकाला जा रहा है। यदि इसी गति से भूजल दोहन होता रहा तो आगामी पीढ़ियों के लिये भविष्य में भूजल भंडार समाप्त हो जाएगा।

भूजल अतिदोहन


निम्न तथ्य संकेत करते हैं कि क्षेत्र में भूजल का अतिदोहन हो रहा है।
वर्ष 1995 में भूजल स्तर औसतन 43 मीटर था जो अब घटकर 48 मीटर तक हो गया है।
वर्ष 1995 से 2010 तक भूजल स्तर में गिरावट 5 मीटर तक है।
वर्ष 1995 में कृषि, पीने एवं अन्य उपयोग हेतु 26 मिलियन घनमीटर भूजल जमीन में से निकाला जा रहा था जबकि वर्तमान में 27 मिलियन घनमीटर है।
1995 की तुलना में वर्तमान में लगभग 1 मिलियन घनमीटर भूजल अधिक निकाला जा रहा है।
वर्ष 1995 में भूजल दोहन मात्र 296 प्रतिशत था जबकि वर्तमान में 444 प्रतिशत है।

घटते भूजल संसाधन एवं अतिदोहन के कारण


भूजल स्तर में भारी गिरावट। कुँओं, बोरवैल आदि के डिस्चार्ज में कमी होना एवं इनका सूखना। बिजली पर अधिक खर्चा।
भूजल गुणवत्ता में गिरावट।
अतिदोहन के कारण भूजल भंडार की स्थिति सम्भवतः वर्ष 2025 तक अत्यन्त चिन्ताजनक हो जाएगी।
भविष्य में शुद्ध पेयजल की आपूर्ति की चुनौती।
भावी पीढ़ी के लिए गम्भीर जल संकट को बुलावा।
भूजल आधारित सिंचित क्षेत्र में अनियन्त्रित दोहन के कारण उपलब्ध भूजल संसाधन में कमी की आशंका है क्योंकि उपयुक्त गुणवत्ता वाला भूजल क्षेत्र सीमित है।

जल प्रबंधन निम्न प्रकार से किया जाना चाहिए, क्या इस स्थिति में सुधार हो सकता है?


जी हाँ। विश्व में भूजल प्रबन्धन इस तरह किया जाता है कि उपलब्ध समस्त भूजल का 70 प्रतिशत से अधिक उपयोग में नहीं लिया जाये ताकि भविष्य हेतु जल संरक्षित किया जा सके। यह सर्वविदित है कि प्राकृतिक संसाधन पैदा नहीं किये जा सकते लेकिन समुदाय के प्रयासों से भूजल संरक्षित एवं पुनर्भरित किया जा सकता है। इसलिए जल प्रबन्धन का केन्द्र बिन्दु जल संरक्षण करें तो ही जल संकट से निपटा जा सकता है। अब समय आ गया है कि ‘जितना बचाओगे - उतना पाओगे’ की धारणा पर कार्य करना होगा।

घरेलू/व्यक्तिगत स्तर पर


1. घरेलू निष्कासित जल का बगीचों आदि में पुनः उपयोग करना एवं घरेलू नलों से व्यर्थ पानी न बहाना।
2. खाना पकाने के लिए छोटे आकार के बर्तन व समुचित मात्रा में पानी का उपयोग करना। खाना बर्तन ढककर बनाना ताकि वाष्पीकरण से जल की क्षति को बचाया जा सके।
3. खाना बनाने के लिए पेड़ पौधों की कटाई पर अंकुश लगाना ताकि औसत वार्षिक वर्षा में बढ़ोत्तरी हो सके, साथ ही मृदा संरक्षण भी की जा सके।
4. घरों में वर्षा जल संग्रहण हेतु व्यवस्था करना, ताकि घरेलू कार्य हेतु भूजल दोहन के दबाव को कम किया जा सके।
5. सार्वजनिक नल आदि से जल को न बहने दें। घरों व होटलों में फव्वारों से नहा कर जल बर्बाद न करें। शौचालय में कम क्षमता के सिस्टम लगाना।
6. प्रत्येक घर में वर्षा जल से भूजल पुनर्भरण हेतु पुनर्भरण संरचना बनाई जायें जिससे भूजल भंडारों में बढ़ोत्तरी की जा सके।

कृषि क्षेत्र स्तर पर


1. फव्वारा व बूँद-बूँद सिंचाई पद्धति को अपनाना ताकि पानी की 40 से 60 प्रतिशत तक बचत की जा सके।
2. कम पानी के उपयोग वाली फसलों को उगाकर लगभग 30 से 40 प्रतिशत तक पानी बचाया जा सकता है।
3. उचित मात्रा में उपयुक्त खाद व कीटनाशक दवाईयों का उपयोग करना ताकि शुद्ध जल को प्रदूषण से बचाया जा सके।

औद्योगिक स्तर पर


1. उद्योगों को उपयोग में लाये गये पानी की 80 प्रतिशत मात्रा को पुनः उपयोग हेतु रिसायकलिंग आवश्यक करना।
2. उद्योगों में कृत्रिम भूजल पुनर्भरण अनिवार्य होना चाहिए।

सामुदायिक स्तर पर


1. नलकूप/हैण्डपम्प आदि के आस-पास भरे हुए जल को पुनर्भरण संरचनाएँ बनाकर कृत्रिम रूप से भूजल का पुनर्भरण करें एवं इस भरे/एकत्रित जल को व्यर्थ नहीं जाने दें।
2. वर्षा से होने वाले वार्षिक भूजल पुनर्भरण की गणना कर स्वयं फैसला करें कि कितना भूजल निकाला जाना है।
3. अनुपयोगी कुओं, नलकूपों, हैण्डपम्प आदि का भूजल कृत्रिम पुनर्भरण के लिये उपयोग करना।
4. गाँवों के तालाबों, बावड़ियों आदि का जीर्णोद्धार करना जिसमें वर्षा जल एकत्रित कर उपयोग में लिया जा सके। यह कार्य महानरेगा योजना के अन्तर्गत भी किया जा सकता है।
5. तालाब आदि सतही जल के वाष्पीकरण की दर को न्यूनतम करने के प्रभावी तरीकों को लागू करना।

भूजल सम्बन्धित सामान्य भ्रम


भ्रम: पाताल तक पानी है, नीचे नदियाँ बहती हैं।
सच्चाई: कुल वर्षा से प्राप्त पानी की 12 से 15 प्रतिशत मात्रा ही भूजल में जमा होती है। यही पानी उपयोग हेतु उपलब्ध है। नीचे कोई नदियाँ नहीं बह रही हैं।
भ्रम: जितना गहरा जाओगे उतना ही अधिक पानी मिलेगा।
सच्चाई: जी नहीं। गहराई में जाने से जरूरी नहीं कि अधिक मात्रा में पानी मिले।
भ्रम: वर्षा का पानी गंदा होता है, पीने लायक नहीं।
सच्चाई: यदि वर्षा जल का संग्रहण वैज्ञानिक तरीके से किया जाए तो यह पानी सबसे स्वच्छ है एवं पीने योग्य है। राजस्थान में टांके व बावड़ियों में पानी एकत्र कर पीने के उपयोग में लाने की सदियों पुरानी परम्परा है।
भ्रम: यदि भूजल पुनर्भरण करूँगा तो उसका लाभ मुझे नहीं होगा?
सच्चाई: इसका लाभ आपको एवं आपके नजदीक वाले कुओं को भी मिलेगा। यदि सभी करेंगे तो सभी लाभान्वित होंगे।

वर्षा जल से, कम लागत की भूजल पुनर्भरण संरचना (संरचना ढकी होनी चाहिए।)

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