प्रदूषण से रिसाइक्लिंग की ओर

भूजल एवं जलस्रोत प्रदूषित करता ई-कचरानये इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खरीददारी का मतलब है कि हर साल हजारों टन पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को त्याग दिया जाता है। सबसे ज्यादा चिन्ता की बात यह है कि यह इलेक्ट्रॉनिक कचरा गैरकानूनी रूप से विकासशील देशों में डम्प किया जा रहा है। दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक कचर जमा करने में हिन्दुस्तान, चीन, ब्राजील और मैक्सिको जैसे विकासशील देशों का अपना योगदान भी कम नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की स्टेप इनिशिएटिव रिपोर्ट के मुताबिक अगले चार वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक कचरे की विश्वव्यापी मात्रा में 33 प्रतिशत की वृद्धि होगी। इस कचरे का वजन मिस्र के आठ बड़े पिरामिडों के बराबर होगा। पिछले साल पूरी दुनिया में 5 करोड़ टन इलेक्ट्रॉनिक कचरे का उत्पादन हुआ जो प्रति व्यक्ति करीब 7 किलो पड़ता है।

इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माण में कई तरह के विषाक्त पदार्थों का इस्तेमाल होता है जिनमें सीसा, पारा, कैडमियम और आर्सेनिक शामिल हैं। मसलन एक पुराने सीआरटी कम्प्यूटर स्क्रीन में तीन किलो तक सीसा हो सकता है। एक बार लैंडफिल में पहुँचने पर ये विषाक्त पदार्थ पर्यावरण में प्रविष्ट होकर जमीन, हवा, पानी को प्रदूषित कर सकते हैं। इसके अलावा इन उपकरणों के हिस्सों और दूसरे पदार्थों को बहुत ही गलत तरीके से अलग किया जा सकता है। ऐसी जगहों पर काम करने वाले लोग बार-बार बीमार पड़ते हैं।

ई-कचरा जिसे हम कचरा समझकर फेंक देते हैं, उसकी बहुत बड़ी अहमियत है, जिसे हम समझ नहीं पाते हैं और उन कचरों में एक बहुत बड़ा राज छुपा हुआ है, जिसे शायद कम ही लोग जानते हैं। इसका खुलासा मुम्बई की जीडब्ल्यूआर कम्पनी के संचालक पंकज बियानी ने किया है।

शनिवार को कल्याण के नजदीक वरप स्थित सेक्रेट हार्ट स्कूल में छोटे-छोटे बच्चों द्वारा कचरे के रूप में जमा की गई इलेक्ट्रॉनिक वस्तु को देखकर अन्दाजा लगाया गया कि इन उपकरणों को काम लायक बनाया जा सकता है और प्रदूषण से भी बचा जा सकता है। बता दें कि जीडब्ल्यूआर कम्पनी के माध्यम से सेक्रेट हार्ट स्कूल के बच्चों ने तमाम अनुपयोगी वस्तुओं को जैसे खराब मोबाइल, टीवी, लैपटॉप, बल्ब, पेन, वायर, करप्ट सीडी इत्यादि वस्तु बड़े पैमाने में जमा की थी। जीडब्ल्यूआर कम्पनी के संचालक पंकज बियानी ने ‘दोपहर का सामना’ से बात करते हुए बताया कि इन अनुपयोगी पार्ट्स को हमारी कम्पनी रिसाक्लिंग के लिये जापान और बेल्जियम नामक देश में भेजती और वहाँ पर पार्ट्स को अलग-अलग कर केमिकल और उपयोगी पार्ट्स को रिसाइक्लिंग कर लिया जाता है और पुनः उसे उपयोग में लाया जाता है। बदले में कम्पनी जीडब्ल्यूआर कम्पनी को पैसा देती है।

बियानी ने कहा कि इण्डिया में जो मेटल रिकवरी कम्पनियाँ हैं, वो कामयाब नहीं हैं, इसलिये हमें जापान और बेल्जियम भेजना पड़ता है। उन्होंने कहा कि जिस तरह एक स्कूल के बच्चों ने अनुपयोगी पार्ट्स को जमा कर हौसला दिखाया ठीक उसी तरह प्रत्येक सोसाइटी और समाज में रहनेवाल बुद्धिजीवियों को भी करना चाहिए। बताया जाता है कि अनुपयोगी पार्ट्स को रिसाइक्लिंग करने के बाद जहाँ उसे उपयोग में लाया जा सकता है, वहीं प्रदूषण से भी बचा जा सकता है। सेक्रेट हार्ट स्कूल के संचालक आलविन एंथोनी ने कहा कि प्रदूषण से बचने के लिये यह प्रोजेक्ट बहुत अच्छा है और इसके लिये विद्यार्थियों के माध्यम से खराब हुए बल्ब, मोबाइल, कम्प्यूटर, टीवी जैसे अनुपयोगी पार्ट्स को जमा कर जीडब्ल्यूआर कम्पनी को सहयोग करते रहेंगे।

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