प्रतापगढ़ में सई संवाद – दो
24 Nov 2011
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sai river

कुण्डों, बीहड़ों और घुमावों वाली सई नदी की संवाद-यात्रा के दौरान सई के विभिन्न पहलुओं से परिचय हुआ। सई का भूगोल, प्रदूषण तथा प्रदूषण के खतरनाक प्रभाव लोक-अनुभवों का संस्मरण यहां प्रस्तुत है। ‘बर्बाद सई- बदहाल समाज’ प्रतापगढ़ में सई संवाद – दो है

सई संवाद यात्रा से पहले मुझे यह तो मालूम था कि प्रतापगढ़ में प्रवेश करने से पूर्व ही सई अपनी नीलिमा खो बैठती है। किंतु यह नहीं मालूम था सई की कालिमा सई के समाज को इतना गहरा संताप दे बैठी है, कि समाज को पलायन करना पड़े। वस्तुस्थिति यही है कि पानी का प्रकोप अब सई के समाज को दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद जैसे शहरों की ओर पलायित कर रहा है।

पानी की कमी से लढवत जैसे गांवों के जवान मर्द बारिश का मौसम छोड़कर वर्षभर मेरठ, सहारनपुर, देहरादून के ईंट भट्ठों पर काम करने को मजबूर हैं। औरतें दिन में बमुश्किल एक से दो किलो मूंज का रस्सी बना पाती हैं। इसी से इनका व बच्चों का गुजारा चलता है। मनरेगा में किए काम के भुगतान कब होगा? अनिश्चित ही रहता है। अतः इन्हें रोजी-रोटी के लिए रोज-का-रोज इंतजाम करना पड़ता है। नजदीक कोई पुल है नहीं और गांव की नाव टूटी मिली। नाव ठीक करने वाले मर्द बाहर हैं। क्या करें ? बेबस हैं। लढवत गांव की औरतें कभी तैरकर तो कभी उपर तक भीगकर रस्सी बेचने किठावर बाजार जाती हैं। हमे भी भीगकर ही पार जाना पड़ा। पीने का पानी लाने के लिए भी इन गरीबों की आबादी से बाहर एक इंडिया मार्का हैंडपंप है। ये प्रदूषण व सूखेपन से उपजी बेबसी ही है कि ये नदी किनारे रहते हुए भी प्यासे ही हैं।

सई का दूसरा प्रकोप फ्लोरोसिस है। फ्लोराइड की अधिकता के कारण उन्नाव जिले में गंगा व सई किनारे के कई इलाके लंबे अरसे से फ्लोराइड का भयानक दंश झेल रहे हैं। इस दुर्दशा की कहानी मीडिया के माध्यम से सालों पहले से सुनते आ रहे हैं।

सई का दूसरा प्रकोप फ्लोरोसिस है। फ्लोराइड की अधिकता के कारण उन्नाव जिले में गंगा व सई किनारे के कई इलाके लंबे अरसे से फ्लोराइड का भयानक दंश झेल रहे हैं। इस दुर्दशा की कहानी मीडिया के माध्यम से सालों पहले से सुनते आ रहे हैं। राहत के छिटपुट अस्थायी प्रयास भी हुए हैं। किंतु प्रतापगढ़ भी इसका शिकार बन चुका है। चम्पादेवी इस इलाके की पहली ज्ञात फ्लोरोसिस रोगी है। करीब 10 वर्ष पहले चम्पादेवी के इलाज के दौरान डोमीपुर - भुआलपुर वालों पता चला कि पानी में फ्लोराइड की अधिकता उन्हें बीमार बना रही हैं। यह सई संवाद यात्रा में ही पता चला। यात्रियों द्वारा प्रदत जानकारी के आधार पर अधिकारिक जांच हुई। प्रतापगढ़ के जिलाधिकारी एके बरनवाल ने बाकायदा 15 गांवों को फ्लोरोसिस प्रभावित गांवों की सूची जारी की। तद्नुसार मोहनगंज, पूरे खुशई, पूरे लोका, देवघाट, विक्रमपुर, डोमीपुर-भुआलपुर, ढेराहना, बडा पुरवा, पांचों सिद्ध, कटकावली, पथरहा, पूरे उसरहा, पूरे मना, गौरबारी और रेणबीर फ्लोरोसिस से बुरी तरह प्रभावित गांव हैं।

इन गांव के बच्चों के दांत पीले व टूटे-टूटे से हैं। छोट-छोटे बच्चों हाथ-पैर कमजोर होकर झूल गये हैं। कमर में दर्द का रोगी तो जैसे पूरा गांव ही है। कमर झुकना, दांत गिरना, चेहरे पर झांई और मवेशियों की असमय मौत इन गांवों में आम है। इसकी खबर फैलने के बाद अब रिश्ते वाले भी यहां आने से कतराने लगे हैं। ऐसे तमाम कारणों से डोमीपुर-भुआलपुर के कई परिवार अब अब अपने संबंधियों के पास मुंबई चले गये हैं।

उल्लेखनीय है कि सई अपने किनारे के शहरों का मलस्राव तो झेल ही रही है। प्रतापगढ़ शहर का मलशोधन संयत्र अभी तक चालू नहीं हो सका है। खेती में प्रयुक्त रसायनों का प्रदूषण भी सई में पहुंचता ही है। लेकिन सई की मुसीबत की जड़ तो उन्नाव और रायबरेली की फैक्टरियां हैं। ओंकारनाथ नामक एक शख्स ने मुकदमा भी किया, पर कोई परिणाम दिखाई नहीं देता। सई में प्रदूषण के लिए रायबरेली की भवानी पेपर मिल की बदनामी इतना ज्यादा है कि नदी के काले पानी का कारण पूछते ही प्रतापगढ़ का हर शख्स भवानी का ही नाम लेता है। जब भी सई में झाग व बदबू भरा काला रेला आता है, लोग कह उठते हैं -’’वा देखा भवनिया पानी छोड़ दीहिस।’’ ’’ला भैया फिर हत्या भय।’’ यह सच है कि भवानी पेपर मिल का जहरीला पानी आते ही सई किनारे मरी मछलियों का ढेर लग जाता है। जहरीली जहर से मरी मछलियों के जहरीले व्यापार का चस्का कुछ सौदागारों को ऐसा लगा है कि ’जहर बम’ डालकर खुद भी बडे पैमाने पर नदी व मछली.... दोनों के हत्यारे बन रहे हैं। लोग बीमार हो रहे हैं, सो अलग। पानी इतना जहरीला है कि इंसान तो इंसान नीलगाय तक सई के पानी को पीने से मुंह फेर लेते हैं। तेजगढ़ के जंगलों में यह दृश्य द्रवित कर गया। अब ये नीलगाय अपने भोजन और पानी की तलाश में गांवों तक चले आयें, तो इनका क्या दोष?

इस प्रदूषण की मार से देवता भी नहीं बचे। घुइसरनाथ व बेल्हादेवी धाम में यही मृत पानी देवों को चढ़ता है। घुइसरनाथ में रोज पवित्र आरती का उच्चारण होता है, लेकिन नदी के पेट में बना शौचालय किसी को बेचैन नहीं करता। नदी भूमि पर भारी भरकम पक्के निर्माणों ने इस स्थान की शुचिता और नदी का प्रवाह छीन लिया है। नीली-काली पॅालीथीन का अंबार देखकर भी वहां किसी को अपनी ही बेअदबी पर गुस्सा नहीं आता। बेल्हादेवी के सामने की धारा भी इतनी बुरी लगती है कि अपना ही सिर पीटने को जी चाहे।

सई के प्रदूषण का प्रभाव अब गांवों के हैंडपंप में भी उतर आया है। अत्यधिक खारेपन का शिकार तो थारू, थरियाघाट, रजवट, खजूरी, पहाडपुर, पांचों सिद्ध से लेकर लगभग पूरा यात्रा मार्ग ही मिला। थरियाघाट सई से 700 मीटर की दूरी पर स्थित गांव है। थरियाघाट के इंडिया मार्का हैंडपंपों के उपरी ढांचे तक गल चुके हैं। किसी भी ट्यूबवैल के भूमिगत पाइप एक वर्ष तक से अधिक नहीं चलते। पानी में ऑक्सीजन की मात्रा इतनी कम है कि ताजा पानी भी पीने में बासी लगता है। पानी के पीलेपन और बदबू को जांचने के लिए किसी मशीन की आवश्कता नहीं, एहसास ही काफी है। उंचाई पर बसे कटका गांव की औरतें ऐसे पानी से ही रोजमर्रा के कार्यो को अंजाम देने को मजबूर हैं।

पानी की मात्रा को मारने की बेसमझी भी यहां ऐसी हुई कि कुंओं में पानी नहीं है। खजूरी तीन तरफ से सई से घिरा है। कभी 15-30 फीट पर रहने वाला पानी अब 70 से लेकर 170 फीट गहरे तक उतर चुका है। ज्यादातर इंडिया मार्का हैंडपंप फेल हो चुके हैं। संकट अब सामने है कि पीने लायक पानी लाने कहां जायें? नदी और कुओं का पानी यूं ही नीचे नहीं आया। यहां बड़ी गलतियां बड़े पैमाने पर अंजाम दी गईं और सुधारने की कोशिश कभी नहीं हुई।

थरियाघाट के आगे ही नदी ने करीब पांच किमी का यू टर्न लिया। ’70 के दशक में आई बाढ़ में इस इलाके को बचाने के लिए किसी ने बड़ा बंधा बना दिया। अब वह सारा इलाका पानी-पानी मांग रहा है। सई के निचले तल वाले इलाके में तालाबों की आवश्यकता ज्यादा नहीं रही। जहां कहीं ये तालाब थे, बाढ़ के दिनों में उनमें से निकासी नाले बना दिये गये थे। आज भी वे वैसे ही हैं। शेष तालाबों पर कब्जे कर खेत व बाग बना दिए गये हैं। अदालत आदेश जारी करती रहती है और कब्जे होते रहते हैं। ऐसे में आखिर पानी रुके, तो रुके कैसे? कोल के अब्दुल बारी ने बताया कि वहां के जंगल में हर साल आग लगती है। लगती है या लगाई जाती है? मालूम नहीं, पर उसी की आड़ में शेष पेड़ भी काटकर बेच दिए जाते हैं। यह सच है। जब जंगल बचेगा नहीं, पानी रुकेगा नहीं....समाज सोता रहेगा, तो इलाका तो बेपानी होगा ही। सई भी सूखेगी ही। दुआ कीजिए कि इलाके में सई जलबिरादरी द्वारा शुरु नदी साक्षरता समेत जन जागृति के प्रयास रंग लायें। सई का समाज उठे और एक दिन ’भवानी’ को चुनौती दे दे। आसमान से बरसे पानी को पकड़कर धरती के पेट में बैठा ले। ज्यादा नहीं, तो अपनी जिंदगी में एक पंचवटी लगाने का संकल्प हर शख्स ले ले। पीपल, बरगद, आम, जामुन, पाकड़ या गूलर।

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