सामाजिक-आर्थिक सवाल भी है यमुना का प्रदूषण
यमुना बचाओ आंदोलन
योगीराज कृष्ण की भूमि मथुरा से शुरू हुआ यमुना बचाओ आंदोलन नियोजित न होकर स्वतः स्फूर्त है। आंदोलन में कश्मीर से कन्याकुमारी तक के पुरुष हैं। महिलाएं हैं, किसान है, व्यापारी है, शहर है, गांव है। और इन सबके लिए यमुना जीवन-मरण का प्रश्न है। 52 वर्षीय सियाराम यादव इलाहाबाद की फूलपुर तहसील के जगतपुर गांव से चलकर आए हैं।

सियाराम पहले ही दिन यात्रा में शामिल हुए बकौल सियाराम यमुना-गंगा हिंदुस्तान की गरिमा ही नहीं, यहां की आर्थिक स्थिति का आधार है। बकौल यादव गंगा का स्तर कम हुआ और प्रदूषित हुई तो हमारी आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई, आज संगम में कहीं यमुना नहीं है। जब यमुना है ही नहीं तो क्यों नहीं संगम को इतिहास से खत्म कर दिया जाए। उनके साथ गांव ठाकुर बजरंग बहादुर सिंह और भूलचंद भी आए हैं। पहली मार्च को मथुरा से निकली पदयात्रा नियोजित न होकर पूरी तरह से स्वतः स्फूर्त है।

सजला व पुण्य सलिला कही जाने वाली यमुना की दुर्दशा पर यमुना भक्त विचलित हैं। उनकी पीड़ा के पीछे केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक व सांस्कृतिक कारण भी है। यमुना के प्रदूषण व नैसर्गिक प्रवाह बाधित से जहां उनकी भावनाएं आहत हुई हैं वहीं उनकी खेती-किसानी, व व्यापार प्रभावित हुआ है। छाता के लोग गन्ने की खेती करते थे, अब वहां गन्ने की खेती कम हो गई है। पानी शुद्ध था, खाद का काम करता था, अब पानी ही नहीं है। गांव में लड़के लड़कियों के रिश्ते नहीं हो रहे हैं। पोरबंदर से आए सेवानिवृत वन अधिकारी मनसुख भाई आर तन्ना कहते हैं कि संस्कृति ही नहीं, सामाजिक-अर्थतंत्र का सवाल भी जमुना।

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